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मनरेगा पशु शेड योजना और इसके लिए आवेदन से संबंधित जानकारी

मनरेगा पशु शेड योजना और इसके लिए आवेदन से संबंधित जानकारी

खेती के उपरांत पशुपालन किसानों के लिए दूसरा सबसे बड़ा कारोबार है। बहुत सारे किसान खेती के साथ पशुपालन करना बेहद पसंद करते हैं, क्योंकि खेती के साथ पशुपालन काफी मुनाफे का सौदा होता है। पशुओं के लिए ज्यादा से ज्यादा हरा और सूखा चारा खेती से ही प्राप्त हो जाता है। यही कारण है, कि सरकार पशुपालक किसानों के लिए भी विभिन्न अच्छी योजनाएं लाती हैं, जिससे पशुपालक किसानों को ज्यादा से ज्यादा लाभान्वित किया जा सके। किसान की आमदनी का मुख्य साधन कृषि होता है, जिसके माध्यम से भारत के ज्यादातर पशुपालक आवश्यकताओं को भी पूरा कर सकते हैं। अधिकांश किसान कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से पशुओं के लिए मकान निर्मित नहीं कर पाते हैं। ठंड के मौसम में समान्यतः पशुओं को परेशानी होती है। क्योंकि ठंड के समय ही मकान की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। बारिश और ठंड से पशुओं को बचाने के लिए जरूरी है, कि पशुओं के लिए शेड का निर्माण किया जाए। सरकार पशुओं के लिए शेड या घर बनाने के लिए किसानों को 1 लाख 60 हजार रुपए का अनुदान प्रदान कर रही है।

कितना मिलेगा लाभ

मनरेगा पशु शेड योजना से किसानों को व्यापक स्तर पर लाभ मिलेंगे। गौरतलब यह है, कि किसानों को ठंड के मौसम में सामान्य तौर पर दुधारू पशुओं में दूध की कमी का सामना करना पड़ता है। दरअसल, इसकी बड़ी वजह पशुओं के लिए ठंड के मौसम में उचित घर या शेड का न होना भी है। मनरेगा पशु शेड योजना के अंतर्गत पशुओं के लिए घर निर्मित पर सरकार द्वारा किसानों को अनुदान उपलब्ध किया जाता है। इससे पशुओं की सही तरह से देखभाल सुनिश्चित हो सकेगी। शेड में यूरिनल टैंक इत्यादि की व्यवस्था भी कराई जा सकेगी। इससे पशुओं की देखभाल तो होगी ही साथ ही किसानों की आमदनी में भी बढ़ोतरी होगी। साथ ही, किसानों के जीवन स्तर में सुधार देखने को मिलेगा।

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मनरेगा पशु शेड योजना

पशुपालक किसानों को पशुओं के लिए घर बनाने पर यह अनुदान प्रदान किया जाता है। इस योजना से ठंड या बारिश से पशुओं को बचाने के लिए घर बनाने के लिए धनराशि मिलती है। पशुओं का घर बनाकर किसान अपने पशु की देखभाल कर सकेंगे और पशु के दूध देने की क्षमता में भी वृद्धि कर सकेंगे। मनरेगा पशु शेड योजना से किसानों को व्यापक लाभ मिल पाएगा।

मनरेगा पशु शेड से कितना लाभ मिलता है

मनरेगा पशु शेड योजना के तहत किसानों को पशु शेड बनाने पर 1 लाख 60 हजार रुपए का अनुदान दिया जाता है। इस योजना का लाभ किसानों को बैंक के माध्यम से दिया जाता है। इस योजना से मिलने वाला पैसा एक तरह से किसानों के लिए ऋण होता है जिसकी ब्याज दर बहुत कम होती है।

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योजना के तहत किसको लाभ मिलेगा

मनरेगा पशु शेड योजना के तहत मिलने वाले लाभ की कुछ पात्रता शर्तें इस प्रकार है।

इस योजना का फायदा केवल भारतीय किसानों को ही मुहैय्या कराया जाएगा। पशुओं की तादात कम से कम 3 अथवा इससे अधिक होनी आवश्यक है।

योजना के लिए अनिवार्य दस्तावेज

पशुओं के लिए घर बनाने वाली इस योजना में आवेदन करने के लिए कुछ जरूरी दस्तावेजों का होना अनिवार्य है। जैसे कि - आधार कार्ड, पैन कार्ड, कृषक पंजीयन, बैंक पासबुक, मोबाइल नम्बर, ईमेल आईडी (अगर हो)

योजना में आवेदन करने की प्रक्रिया

पशुओं के लिए घर निर्मित करने की योजना में अनुदान लेने के लिए नजदीकी सरकारी बैंक शाखा में संपर्क करें। एसबीआई, इस योजना के अंतर्गत लोन प्रदान करती है। शाखा में ही आवेदन फॉर्म भर कर जमा करें। इस प्रकार इस योजना का लाभ किसानों को प्राप्त हो जाएगा।
जानें सबसे ज्यादा सरसों की खरीद किस राज्य में हुई है, नाफेड को खुद भी क्यों करनी पड़ी खरीद शुरू

जानें सबसे ज्यादा सरसों की खरीद किस राज्य में हुई है, नाफेड को खुद भी क्यों करनी पड़ी खरीद शुरू

नाफेड ने मार्केटिंग सीजन 2023-24 के लिए सरसों की एमएसपी दर 5450 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। अगर हम राजस्थान की बात करें तो यह भारत का एकमात्र प्रदेश है, जो अकेला 42 फीसदी सरसों की पैदावार करता है। गेहूं समेत भारत के ज्यादातर राज्यों में तिलहन की खरीद भी चालू हो चुकी है। हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत विभिन्न राज्यों में एमएसपी पर सरसों की खरीद की जा रही है। मौसम के गर्म होते-होते सरसों की खरीद में तीव्रता भी होती जा रही है। यही कारण है, कि भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नाफेड) द्वारा अब तक 169217.45 मिट्रिक टन सरसों की खरीद की जा चुकी है। साथ ही, इसके एवज में किसान भाइयों के खाते में करोड़ों रुपये की धनराशि भी भेजी जा चुकी है। इससे सरसों का उत्पादन करने वाले कृषक काफी खुश हैं। ऐसी स्थिति में किसानों को आशा है, कि आगामी दिनों में सरसों खरीदी में और ज्यादा तीव्रता आएगी।

नाफेड ने खुद की सरसों की खरीद शुरू

किसान तक की खबरों के अनुसार, तीन वर्ष बाद ऐसा हुआ है, कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दर होने के कारण नाफेड स्वयं सरसों की खरीदी कर रहा है। इससे पूर्व किसान स्वयं मंडियों में जाकर व्यापारियों को एमएसपी से महंगी कीमत पर सरसों विक्रय करते थे। अब तक 84914 किसानों ने एमएसपी पर सरसों विक्रय करते है। इसके एवज उनके खाते में 922.24 रुपये भेजे जा चुके हैं। आहिस्ते-आहिस्ते सरसों खरीद केंद्रों पर किसानों की संख्या काफी बढ़ती जा रही है। हालाँकि, बेमौसम बारिश के कारण से राजस्थान एवं मध्य प्रदेश समेत बहुत से तिलहन उपादक राज्यों में फसल की कटाई में विलंब हो गया था। साथ ही, बरसात से सरसों की फसल को काफी क्षति भी पहुंची है। यह भी पढ़ें: न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए 25 फरवरी तक करवा सकते हैं, रजिस्ट्रेशन मध्य प्रदेश के किसान

हरियाणा में विगत 20 मार्च से सरसों की खरीद शुरू हो चुकी है

भारत में राजस्थान सरसों का सर्वाधिक उत्पादन करता है। परंतु, इस बार हरियाणा सरसों की खरीद करने के संबंध में राजस्थान से आगे है। नाफेड ने अब तक हरियाणा के अंदर 139226.38 मिट्रिक टन सरसों की खरीद करली है। हालाँकि, हरियाणा राज्य में भी देश के कुल उत्पादन का अकेले 13.5 फीसद सरसों का उत्पादन किया जाता है। इसके बदले में कृषकों को 758.78 करोड़ रुपये दिए गए हैं। विशेष बात यह है, कि हरियाणा में विगत 20 मार्च से सरसों की खरीद शुरू की गई है।

इन राज्यों में इतने मीट्रिक टन सरसों की एमएसपी पर खरीद की जा चुकी है

नाफेड ने मार्केटिंग सीजन 2023-24 हेतु सरसों की एमएसपी दर 5450 रुपये प्रति क्विंटल तय कर दी है। यदि हम राजस्थान की बात करें तो यहां की जलवायु के अनुरूप यह भारत का एकमात्र राज्य है, जो अकेला 42 फसदी सरसों का उत्पादन करता है। इसके बावजूद भी राजस्थान में अब तक 4708.40 मिट्रिक टन ही सरसों की खरीद हो सकती है। साथ ही, सरसों उत्पादन में मध्य प्रदेश भी कोई पीछे नहीं है। यह 12 प्रतिशत सरसों का उत्पादन किया करता है। मध्य प्रदेश में अब तक 9977.74 मीट्रिक टन सरसों की खरीद संपन्न हुई है। इसके उपरांत गुजरात 4.2 फीसद सरसों का उत्पादन करता है।
बाजरा के प्रमुख उत्पादक राजस्थान के लिए FICCI और कोर्टेवा एग्रीसाइंस ने मिलेट रोडमैप कार्यक्रम का आयोजन किया

बाजरा के प्रमुख उत्पादक राजस्थान के लिए FICCI और कोर्टेवा एग्रीसाइंस ने मिलेट रोडमैप कार्यक्रम का आयोजन किया

हाल ही में राजस्थान के जयपुर में FICCI और कॉर्टेवा एग्रीसाइंस द्वारा राजस्थान सरकार के लिए मिलेट रोडमैप कार्यक्रम आयोजित किया। जिसका प्रमुख उद्देश्य बाजरा की पैदावार में राजस्थान की शक्ति का भारतभर में प्रदर्शन करना है। फिक्की द्वारा कोर्टेवा एग्रीसाइंस के साथ साझेदारी में 19 मई 2023, शुक्रवार के दिन जयपुर में मिलेट कॉन्क्लेव - 'लीवरेजिंग राजस्थान मिलेट हेरिटेज' का आयोजन हुआ। दरअसल, इस कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य बाजरा की पैदावार में राजस्थान की शक्ति को प्रदर्शित करना है। विभिन्न हितधारकों के मध्य एक सार्थक संवाद को प्रोत्साहन देना है। जिससे कि राजस्थान को बाजरा हेतु एक प्रमुख केंद्र के तौर पर स्थापित करने के लिए एक भविष्य का रोडमैप तैयार किया जा सके। इसी संबंध में टास्क फोर्स के अध्यक्ष के तौर पर कॉर्टेवा एग्रीसाइंस बाजरा क्षेत्र की उन्नति व प्रगति में तेजी लाने हेतु राजस्थान सरकार द्वारा बाजरा रोडमैप कवायद का नेतृत्व किया जाएगा।

इन संस्थानों एवं समूहों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया

कॉन्क्लेव में कृषि व्यवसाय आतिथ्य एवं पर्यटन, नीति निर्माताओं, प्रसिद्ध शोध संस्थानों के प्रगतिशील किसानों, प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों एवं शिक्षाविदों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। पैनलिस्टों ने बाजरा मूल्य श्रृंखला में महत्वपूर्ण समस्याओं का निराकरण करने एवं एक प्रभावशाली हिस्सेदारी को उत्प्रेरित करने के लिए एक समग्र और बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने पर विचार-विमर्श किया। चर्चा में उन फायदों और संभावनाओं की व्यापक समझ उत्पन्न करने पर भी चर्चा की गई। जो कि बाजरा टिकाऊ पर्यटन और स्थानीय समुदायों की आजीविका दोनों को प्रदान कर सकता है। ये भी देखें: IYoM: भारत की पहल पर सुपर फूड बनकर खेत-बाजार-थाली में लौटा बाजरा-ज्वार

श्रेया गुहा ने मिलेट्स के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त किए

श्रेया गुहा, प्रधान सचिव, राजस्थान सरकार का कहना है, कि राजस्थान को प्रत्येक क्षेत्र में बाजरे की अपनी विविध रेंज के साथ, एक पाक गंतव्य के तौर पर प्रचारित किया जाना चाहिए। पर्यटन उद्योग में बाजरा का फायदा उठाने का बेहतरीन अवसर है। इस दौरान आगे उन्होंने कहा, "स्टार्टअप और उद्यमियों के लिए बाजरा का उपयोग करके विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को लक्षित करके नवीन व्यंजनों और उत्पादों को विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं। बाजरा दीर्घकाल से राजस्थान के पारंपरिक आहार का एक अभिन्न भाग रहा है। सिर्फ इतना ही नहीं राजस्थान 'बाजरा' का प्रमुख उत्पादक राज्य है। बाजरा को पानी और जमीन सहित कम संसाधनों की जरूरत पड़ती है। जिससे वह भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद उत्पाद बन जाता है। जितेंद्र जोशी, चेयरमैन, फिक्की टास्क फोर्स ऑन मिलेट्स एंड डायरेक्टर सीड्स, कोर्टेवा एग्रीसाइंस - साउथ एशिया द्वारा इस आयोजन पर टिप्पणी करते हुए कहा गया है, कि "राजस्थान, भारत के बाजरा उत्पादन में सबसे बड़ा योगदानकर्ता के रूप में, अंतरराष्ट्रीय वर्ष में बाजरा की पहल की सफलता की चाबी रखता है। आज के मिलेट कॉन्क्लेव ने राजस्थान की बाजरा मूल्य श्रृंखला को आगे बढ़ाने के रोडमैप पर बातचीत करने के लिए विभिन्न हितधारकों के लिए एक मंच के तौर पर कार्य किया है। यह व्यापक दृष्टिकोण राज्य के बाजरा उद्योग हेतु न सिर्फ स्थानीय बल्कि भारतभर में बड़े अच्छे अवसर उत्पन्न करेगा। इसके लिए बाजरा सबसे अच्छा माना गया है।

वर्षा पर निर्भर इलाकों के लिए कैसी जलवायु होनी चाहिए

दरअसल, लचीली फसल, किसानों की आमदनी में बढ़ोत्तरी और संपूर्ण भारत के लिए पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराते हुए टिकाऊ कृषि का समर्थन करना। इसके अतिरिक्त बाजरा कृषि व्यवसायों हेतु नवीन आर्थिक संभावनाओं के दरवाजे खोलता है। कोर्टेवा इस वजह हेतु गहराई से प्रतिबद्ध है और हमारे व्यापक शोध के जरिए से राजस्थान में जमीनी कोशिशों के साथ, हम किसानों के लिए मूल्य जोड़ना सुचारू रखते हैं। उनकी सफलता के लिए अपने समर्पण पर अड़िग रहेंगे। ये भी देखें: भारत सरकार ने मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किये तीन नए उत्कृष्टता केंद्र बाजरा मूल्य श्रृंखला में कॉर्टेवा की कोशिशों में संकर बाजरा बीजों की पेशकश शम्मिलित है, जो उनके वर्तमानित तनाव प्रतिरोध को बढ़ाते हैं। साथ ही, 15-20% अधिक पैदावार प्रदान करते हैं। साथ ही, रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रदान करते हैं एवं अंततः किसान उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाते हैं। जयपुर में कोर्टेवा का इंडिया रिसर्च सेंटर बरसाती बाजरा, ग्रीष्म बाजरा और सरसों के प्रजनन कार्यक्रम आयोजित करता है। "प्रवक्ता" जैसे भागीदार कार्यक्रम के साथ कोर्टेवा का उद्देश्य किसानों को सभी फसल प्रबंधन रणनीतियों, नए संकरों में प्रशिक्षित और शिक्षित करने के लिए प्रेरित करना है। उनको एक सुनहरे भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले बाकी किसान भाइयों को प्रशिक्षित करने में सहयोग करने हेतु राजदूत के रूप में शक्तिशाली बनाना है। इसके अतिरिक्त राज्य भर में आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय बाजरा महोत्सव का उद्देश्य उत्पादकों और उपभोक्ताओं को बाजरा के पारिस्थितिक फायदे एवं पोषण मूल्य पर बल देना है। कंपनी बाजरा किसानों को प्रौद्योगिकी-संचालित निराकरणों के इस्तेमाल के विषय में शिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना बरकरार रखे हुए हैं, जो उन्हें पैदावार, उत्पादकता और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ाने में सशक्त बनाता है।

कॉर्टेवा एग्रीसाइंस कृषि क्षेत्र में क्या भूमिका अदा करती है

कॉर्टेवा एग्रीसाइंस (NYSE: CTVA) एक सार्वजनिक तौर पर व्यवसाय करने वाली, वैश्विक प्योर-प्ले कृषि कंपनी है, जो विश्व की सर्वाधिक कृषि चुनौतियों के लिए फायदेमंद तौर पर समाधान प्रदान करने हेतु उद्योग-अग्रणी नवाचार, उच्च-स्पर्श ग्राहक जुड़ाव एवं परिचालन निष्पादन को जोड़ती है। Corteva अपने संतुलित और विश्व स्तर पर बीज, फसल संरक्षण, डिजिटल उत्पादों और सेवाओं के विविध मिश्रण समेत अपनी अद्वितीय वितरण रणनीति के जरिए से लाभप्रद बाजार वरीयता पैदा करता है। कृषि जगत में कुछ सर्वाधिक मान्यता प्राप्त ब्रांडों एवं विकास को गति देने के लिए बेहतर ढ़ंग से स्थापित एक प्रौद्योगिकी पाइपलाइन सहित कंपनी पूरे खाद्य प्रणाली में हितधारकों के साथ कार्य करते हुए किसानों के लिए उत्पादकता को ज्यादा से ज्यादा करने के लिए प्रतिबद्ध है। क्योंकि, यह उत्पादन करने वालों के जीवन को बेहतर करने के अपने वादे को पूर्ण करती है। साथ ही, जो उपभोग करते हैं, आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्नति एवं विकास सुनिश्चित करते हैं। इससे संबंधित ज्यादा जानकारी के लिए आप www.corteva.com पर भी विजिट कर सकते हैं।
Isabgol Farming-ईसबगोल की खेती में लगाइये हजारों और पाइए लाखों

Isabgol Farming-ईसबगोल की खेती में लगाइये हजारों और पाइए लाखों

किसान भाइयों, आज के जमाने में कम लागत में अधिक कमाई कौन नहीं करना चाहता है, फिर किसान भाई ही इसमें पीछे क्यों रहें? ऐसा नहीं कि किसानों के लिये संभव नहीं है, संभव है लेकिन जरा सा उस ओर ध्यान देने की जरूरत है। बाकी आप खेती तो करते हो चाहे गेहूं की खेती करो चाहे जीरा की खेती करो। खेती तो खेती है लेकिन दोनों के बाजार भाव में जमीन आसमान का अंतर होता है। कहने का मतलब यह है कि जिन किसान भाइयों को कम समय में अधिक कमाई करनी है, उन्हें परम्परागत खेती से हट कर खेती करनी होगी। ऐसे किसान भाइयों को सगंधीय व औषधीय फसलों की खेती करनी होगी, उन्हें अपनी मनचाही मंजिल मिल जायेगी। आज हम यहां पर ऐसी ही खेती के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसमें आपको हजारों रुपये की लागत लगानी है और जब फसल तैयार होगी तो आपको लाखों की कमाई होगी। साथ में समय भी बहुत कम लगेगा।

आइये जानते हैं कि ईसबगोल का क्या महत्व है ?

ईसबगोल की खेती

ईसबगोल एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय फसल है। औषधीय फसलों के निर्यात में ईसबगोल का पहला स्थान है। मौजूदा समय में भारत से प्रतिवर्ष 120 करोड़ रुपये के मूल्य का ईसबगोल विदेशों को निर्यात हो रहा है।भारत में ईसबगोल का उत्पादन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा आदि में होता है। ईसबगोल के बीज पर पाए जाने वाला छिलका ही इसका औषधीय उत्पाद है, जिसे ईसबगोल की भूसी के नाम से पहचाना जाता है। ईसबगोल के बीज में एक चौथाई भूसी होती है। ईसबगोल की भूसी का उपयोग पेट की सफाई, कब्जियत, दस्त, आंव,पेचिस,अल्सर, बवासीर जैसी बीमारियों के उपचार में दवा के रूप में किया जाता है। इसके अलावा इसका उपयोग आइस्क्रीम, रंग-रोगन व प्रिंटिंग उद्योग में भी किया जाता है।

किस प्रकार की जाती है ईसबगोल की खेती?

ईसबगोल की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु, मिट्टी, बीज,खाद, सिंचाई प्रबंधन आदि चाहिये उसके बारे में जानते हैं।

भूमि एवं जलवायु

ईसबगोल की खेती के लिए दोमट और बलुई मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसके अलावा जलनिकासी का विशेष प्रबंध होना चाहिये, जलभराव में यह फसल बहुत जल्द खराब हो जाती है। इसकी फसल के लिए मिट्टी का पीएच मान 7-8 होना चाहिये। यह फसल थोड़ी सी क्षारीय व रेतीली मिट्टी में उगाई जा सकती है। ईसबगोल की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती रबी की फसलों के साथ की जाती है। इसकी फसल के लिए 25 डिग्री सेल्सियश के आसपास तापमान की आवश्यकता होती है। इसकी फसल को शुरुआत में पानी की जरूरत होती है लेकिन फसल के  पकने के समय पानी से नुकसान हो जाता है। उस समय अधिक गर्मी की आवश्यकता होती है।

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उन्नत किस्में

ईसबगोल की अनेक उन्नत किस्में हैं। इनका चयन क्षेत्र की भूमि, फसल के पकने की अवधि और पैदावार के आधार पर किया जाता है। जवाहर ईसबगोल-4: इस तरह के बीज से रोपाई के लगभग 110-120 दिन बाद फसल पककर तैयार हो जाती है। इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 15 क्विंटल तक होता है। आर.आई. 89: इसका पौधा छोटे आकार का होता है। इसकी भी फसल 120 दिनों में तैयार हो जाती है और उत्पादन 12 से 15 क्विंटल तक होता है। गुजरात ईसबगोल-2: इस बीज से गुजरात में सबसे अधिक खेती की जाती है। इस बीज से प्रति हेक्टेयर 10 क्विंटल के आसपास उत्पादन होता है। आई.आई.1: अधिक उत्पादन के लिए यह बीज तैयार किया गया है। इस बीज से उत्पादन 16 क्विंटल से 18 क्विंटल तक प्रति हेक्टेयर होता है। हरियाणा ईसबगोल-5: इसकी फसल भी 120 दिन में ही तैयार हो जाती है और इससे उत्पादन 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है। इसके अलावा अन्य किस्मों में गुजरात ईसबगोल-1, हरियाणा ईसबगोल-2, निहारिका, ट्राबे सेलेक्Ñशन 1 से 10 तक आदि का चयन करके बुआई की जा सकती है। ईसबगोल की उन्नत किस्में

खेत की तैयारी कैसे करें

ईसबगोल की खेती के लिए खेत से पुरानी फसल के अवशेषों को  समाप्त करके मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करनी चाहिये। उसके बाद खेत में गोबर की खाद डालकर उसे मिट्टी में कल्टीवेटर से मिला दें। इसके बाद पानीदेकर उसे छोड़ दें। जब मिट्टी की ऊपरी सतह सूखने लगे तब खेत की रोटावेटर से गहरी जुताई करें। फिर पाटा चलाकर खेत को समतल बना लें ताकि खेत में जलनिकासी की अच्छी व्यवस्था हो सके। जो किसान भाई ईसबगोल की खेती मेड़ों पर करना चाहते हों उन्हें जुताई के बाद खेतों में निश्चित दूरी की मेड़ बना लेनी चाहिये।

बुआई का समय और बुआई के तरीके

ईसबगोल की खेती में समय पर बुआई का बहुत महत्व है। इसकी पछैती खेती में अनेक तरह के रोग लगने की संभावनाएं रहतीं हैं। इसलिये किसान भाइयों को चाहिये कि इसका निर्धारित समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के मध्य तक अवश्य बुआई कर लेनी चाहिये। बुआई से पहले बीजों को मेटालेक्जिकल से उपचारित कर लेनाचाहिये। एक हेक्टेयर में लगभग 5 किलो बीज की आवश्यकता पड़ती है। समतल भूमि में ईसबगोल के बीजों की बुआई छिड़काव विधि से की जाती है और मेड़ पर बीजों की बुआई ड्रिल प्रणाली से की जाती है, इसमें किसान भाइयों को चाहिये कि मेड़ों के बीच की दूरी एक फिट के रखें  तथा बीजों की दूरी दो इंच के बराबर रखें तो अच्छा उत्पादन मिलेगा। छिड़काव विधि से बुआई करने के लिए पहले समतल भूमि में बीजों का छिड़काव कर दें उसके बाद कल्टीवेटर के पीछे पाटा बांधकर खेत की दो बार हल्की जुताई कर दें। इससे बीज मिट्टी में अच्छी तरह से मिल जाते हैं। ये भी पढ़े: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान कि सुझाई इस वैज्ञानिक तकनीक से करें करेले की बेमौसमी खेती

सिंचाई प्रबंधन

ईसबगोल की फसल को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। बुआई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना लाभप्रद रहता है। यदि बीजों का अंकुरण कम दिखाई दे तो 4-5 दिन बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिये। अंकुरण के बाद पौधों को मात्र दो-तीन सिंचाई की जरूरत होती है, जिसमें पहली सिंचाई 30 से 35 दिन के बाद और दूसरी सिंचाई 50 से 60 दिन बाद करनी चाहिये। फव्वारा विधि से सिंचाई करने से अधिक लाभ होता है।

खाद प्रबंधन

ईसबगोल की खेती के लिए जुताई के वक्त प्रतिहेक्टेयर 10 गाड़ी गोबर की खाद खेत में देनी चाहिये। इसके साथ एक बोरा एनपीके प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना अच्छा रहेगा। साथ ही 25 किलो प्रति हेक्टेयर सिंचाई के समय डालने से पैदावार और अच्छी होती है।

खरपतवार प्रबंधन

ईसबगोल की खेती में दो बार निराई-गुड़ाई करने की आवश्यकता होती है। पहली बार बुआई के एक माह बाद और दूसरी बार लगभग दो माह बाद निराई गुड़ाई की जानी चाहिये। इसके अलावा खरपतवार नियंत्रण के लिए बुआई के बाद सल्फोसल्फ्यूरॉन या आइसोप्रोट्यून का छिड़काव करना चाहिये।

ईशबगोल के पौधों में लगने वाले रोग और उपचार

हालांकि ईसबगोल के पौधों में रोग बहुत कम लगते हैं, फिर भी कुछ ऐसे भी रोग हैं जिनके लगने से पौधा जल्दी नष्ट हो जाता है। इससे फसल बर्बाद हो जाती है। प्रमुख रोग इस प्रकार हैं:- मोयला: ईसबगोल के पौधे में लगने वाला यह रोग कीटों से लगता है। इस रोग का प्रभाव बुआई के दो माह बाद जब पौधों में फूल आना शुरू होते हैं तभी दिखाई देने लगता है। इस रोग में कीट पौधों का रस चूसने लगते है और पौधा जल्द ही सूख जाता है। किसान भाइयों जैसे ही इस रोग के संकेत मिलें तो तत्काल ही पौधों पर इमिडाक्लोपिड या आॅक्सी मिथाइल डेमेटान की उचित मात्रा का छिड़काव करना चाहिये। फसल बच जायेगी। मृदुरोमिल आसिता : यह रोग ईसबगोल के पौधे पर बाली निकलने के समय दिखाई देता है। रोग लगते ही पौधे की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियों पर सफेद रंग का चूर्ण दिखाई देने लगता है। रोग का पता लगते ही पौधों पर कॉपर आक्सीक्लोराइड या मैंकोजेब का छिड़काव करना लाभदायक साबित होगा। ये भी पढ़े: कीटनाशक दवाएं महंगी, मजबूरी में वाशिंग पाउडर छिड़काव कर रहे किसान

फसल की कटाई

ईसबगोल के पौधों की पत्तियां जब पली पड़कर सूखने लगती हैं, तब समझ लेना चाहिये कि अब फसल पक कर तैयार हो गयी है और उसकी कटाई कर लेनी चाहिये। किसान भाइयों कटाई के समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि फसल की कटाई सुबह के समय ही करनी चाहिये जिससे बालियों से बीज कम झड़ते हैं। छोटे किसान जो छोटे रकबे में खेती करने वाले छोटे किसान भाई तो इसकी बालियों को सुखाकर हाथ से मसल कर दानों को निकाल लेते हैं जबकि बड़े किसान भाई इसके दानों को मशीनों की सहायता से निकालते हैं। पेड़ो की भूसी पशु चारे के रूप में काम आती है।  इसलिये किसान भाई इसका भी बहुत ध्यान रखते हैं।

किसानोंं को मिलता है कितना लाभ

ईसबगोल की औसतन पैदावार 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास पाई जाती है। इसके दानों से मिलने वाली भूसी की मात्रा 25 प्रतिशत के आसपास होती है। इस तरह से औसतन ढाई से तीन क्विंटल प्रति हेक्टेयर भूसी तैयार होती है। इसका बाजार में 11 से 15 हजार रुपये क्विंटल के आसपास रहता है। इस तरह से किसान भाइयों को प्रति हेक्टेयर 3 से 4 लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है। यह फसल कुल 110 से 120 दिन में तैयार होती है। इस तरह से किसान भाइयों को मात्र चार महीने में हजारों की लागत से लाखों रुपये की कमाई हो सकती है।
यह ड्रैगन फ्रूट ऐसा, जिसकी दुम पर पैसा

यह ड्रैगन फ्रूट ऐसा, जिसकी दुम पर पैसा

यह ड्रैगन फ्रूट ऐसा, बीस साल तक बरसे पैसा : जानें ड्रैगन फ्रूट की जैविक खेती का राज

हम बात कर रहे हैें ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) की। इसे पिताया फल (
pitaya or pitahaya) के नाम से भी जाना जाता है। इसकी जैविक खेती करने वाले भारत के किसान मित्र भरपूर कमाई कर रहे हैं। लगभग बीस सालों तक किसान की कमाई का जरिया बने रहने वाले इस फ्रूट के और लाभ क्या हैं, कहां इसका बाजार है, इन विषयों पर हाजिर है पड़ताल।

ड्रैगन फ्रूट के लाभ

ड्रैगन फ्रूट लगाने से लाभ पक्का होने की वजह कई प्रदेशों के साथ ही विदेशों में इस स्पेशल फ्रूट की भारी डिमांड है। खास बात यह भी है कि, ड्रैगन फ्रूट लगाने के लिए किसानों को सरकारी मदद भी दी जाती है।

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जिले का उद्यान विभाग ड्रैगन फ्रूट की खेती के इच्छुक किसान को अनुदान प्रदान करता है। अनुदान योजना की शर्तें पूरी करने पर प्रति एकड़ के मान से किसान को ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए अनुदान दिया जाता है।

पैदावार बढ़ाने वाले कारक

ड्रैगन फ्रूट की ऑर्गेनिक खेती से लाभ है। वर्मी कंपोस्ट, जैविक खाद, गोमूत्र और नीम से बने कीटनाशक का इस्तेमाल ड्रैगन फ्रूट की उत्तम पैदावार में सहायक है। इसकी सिंचाई ड्रिप सिस्टम से होती है। खास बात यह है कि, जैसे-जैसे ड्रैगन फ्रूट का पेड़ पुराना होता जाता है, उसकी पैदावार क्षमता बढ़ती जाती है।

आयु 20 साल

ड्रैगन फ्रूट की आयु करीब 20 वर्षों से ज्यादा मानी गई है। इस अवधि के दौरान ड्रैगन फ्रूट का पेड़ न केवल खेत के लिए फायदेमंद साबित होता है बल्कि उसकी सेवा करने वाले किसान की भी तकदीर बदल देता है।

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देश और विदेश में है मांग

ड्रैगन फ्रूट की मांग देश और विदेश में है। उत्तरी राज्यों लखनऊ, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में इसका अच्छा बाजार है। इसके अलावा विदेशों में भी ड्रैगन फ्रूट का निर्यात किया जाता है।

खराब न होने की खासियत

ड्रैगन फ्रूट की खास बात ये है कि यह फल जल्दी खराब नहीं होता। ज्यादा समय तक खराब न होने के इस गुण के कारण ड्रैगन फ्रूट की पैदावार से किसान की कमाई के अवसर कई सालों तक सतत बरकरार रहते हैं।

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उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के हरदोई जिले में की जाने वाली इस स्पेशल फ्रूट की फार्मिंग किसानों के बीच चर्चा का विषय है। हरदोई के पहाड़पुर में इस स्पेशल फल की खेती की जा रही है। यहां के किसानों को लखनऊ में एक सेमिनार के दौरान ड्रैगन फ्रूट (Dragon Fruit) के फल को देखने का अवसर मिला था। इस फल की खेती और उससे मिलने वाले लाभों को जानकर वे इसकी खेती करने लिए आकर्षित हुए थे। ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में सेमिनार से हासिल जानकारी जुटाने के बाद उन्होंने अपने खेत पर ड्रैगन फ्रूट की खेती करना शुरू कर दिया।

जिला उद्यान विभाग की मदद

जिला उद्यान विभाग की सहायता से किसानों ने ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की है। जिसमें सलाहकारी एवं आर्थिक मदद शामिल है।

सीमेंट का पोल

इसकी खेती के लिए सीमेंट के पोल के सहारे 4 पौधे लगाए जाते हैं, क्योंकि समय के साथ इसका पेड़ काफी वजनदार होता जाता है। ड्रैगन फ्रूट पेड़ों से उत्पादन क्रमशः बढ़ते हुए 25 से 30 किलो के आसपास पहुंच जाता है।

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उद्यान विभाग ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए किसानों को आर्थिक मदद प्रदान करता है। जिला उद्यान विभाग से ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए जरूरी जानकारी प्रदान की जाती है। जैविक खेती की मदद से इसकी सफल किसानी का खास मंत्र बताया जाता है। ड्रैगन फ्रूट पोषक तत्वों से भी भरपूर है। इस फल में फाइबर की प्रचुर मात्रा तो उपलब्ध है ही, साथ ही इसका व्यापक बाजार भी इसकी खेती के लिए किसानों को प्रेरित कर रहा है।
अनार की खेती ने जेठाराम की तकदीर बदली, बड़े- बड़े बिजनेसमैन को पीछे छोड़ा

अनार की खेती ने जेठाराम की तकदीर बदली, बड़े- बड़े बिजनेसमैन को पीछे छोड़ा

किसान जेठाराम कोडेचा द्वारा उपजाए गए अनार की सप्लाई दिल्ली, अहमदाबाद, कलकत्ता, बेंगलुरु और मुंबई ही नहीं बल्कि बंग्लादेश में भी हो रही है। इससे वे साल में लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं। ज्यादातर लोगों का कहना है, कि खेती- किसानी में अब लाभ नहीं रहा। लागत की तुलना में आमदनी बहुत कम हो गई है। बहुत बार तो उचित भाव नहीं मिलने पर किसानों को हानि हो जाती है। परंतु, परिश्रम और नवीन तकनीक के माध्यम से खेती की जाए, तो यही धरती सोना उगलने लगती है। बस इसके लिए आपको थोड़ा धीरज रखना होगा। आज हम राजस्थान के एक ऐसे किसान के बारे में बात करेंगे, जिन्होंने खेती से बड़े- बड़े व्यवसायियों को लोहा मनवा दिया है। वे खेती से ही लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं।

अनार की खेती ने बदली जेठाराम की किस्मत

बतादें, कि हम बाड़मेर जिला स्थित भीमडा गांव निवासी जेठाराम कोडेचा के विषय में बात कर रहे हैं। पहले वे पांरपरिक फसलों की खेती करते थे, लेकिन इसमें उन्हें उतनी आमदनी नहीं होती थी। इसके उपरांत उन्होंने खेती करने का तरीका बदल दिया एवं बागवानी शुरू कर दी। वह वर्ष 2016 से अनार की खेती कर रहे हैं। इससे उनकी तकदीर चमक गई। उनके खेत में उगाए गए अनार की आपूर्ति महाराष्ट्र, कलकत्ता बांग्लादेश तक में हो रही है। 

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जेठाराम ने 15 लाख रुपये का लोन लेकर स्टार्टअप के रूप में अनार की खेती शुरू की थी

विशेष बात यह है, कि वर्ष 2016 में जेठाराम ने 15 लाख रुपये का लोन लेकर स्टार्टअप के रूप में अनार की खेती शुरू की थी। इसके लिए उन्होंने महाराष्ट्र के नाशिक से अनार की उन्नत किस्म के 4 हजार पौधे मंगवाए थे। इसके उपरांत कोडेचा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

 

जेठाराम कोडेचा को इतनी आमदनी होती है

मुख्य बात यह है, कि जेठाराम कोडेचा पढ़े- लिखे नहीं है। वे अनपढ़ अंगूठा छाप किसान हैं। इसके होते हुए भी उन्होंने बड़े- बड़े बिजनेसमैन को खुद से पीछे छोड़ दिया है। वह अपने खेत में अनार की भगवा एवं सिंदूरी सरीखी उन्नत किस्मों की पैदावार कर रहे हैं। जेठाराम ने 45 बीघा भूमि में अनार की खेती कर रखी है। एक पौधे से 25 किलो अनार की पैदावार होती है। जेठाराम की मानें तो अनार की खेती चालू करने के एक साल के उपरांत से आमदनी होने लगी। अनार बेचकर दूसरे वर्ष उन्होंने 7 लाख रुपये की आमदनी की थी। इसी प्रकार तीसरे वर्ष 15 लाख, चौथे साल 25 लाख, पांचवें साल अनार से उन्हें 35 लाख रुपये की आमदनी हुई। वह कहते हैं, कि अभी तक अनार बेचकर वह 80 लाख रुपये की आमदनी कर चुके हैं।

आलू प्याज भंडारण गृह खोलने के लिए इस राज्य में दी जा रही बंपर छूट

आलू प्याज भंडारण गृह खोलने के लिए इस राज्य में दी जा रही बंपर छूट

राजस्थान राज्य के 10,000 किसानों को प्याज की भंडारण इकाई हेतु 50% प्रतिशत अनुदान मतलब 87,500 रुपये के अनुदान का प्रावधान किया गया है। बतादें, कि राज्य में 2,500 प्याज भंडारण इकाई शुरू करने की योजना है। फसलों का समुचित ढंग से भंडारण उतना ही जरूरी है। जितना सही तरीके से उत्पादन करना। क्योंकि बहुत बार फसल कटाई के उपरांत खेतों में पड़ी-पड़ी ही सड़ जाती है। इससे कृषकों को काफी हानि वहन करनी होती है। इस वजह से किसान भाइयों को फसलों की कटाई के उपरांत समुचित प्रबंधन हेतु शीघ्र भंडार गृहों में रवाना कर दिया जाए। हालांकि, यह भंडार घर गांव के आसपास ही निर्मित किए जाते हैं। जहां किसान भाइयों को अपनी फसल का संरक्षण और देखभाल हेतु कुछ भुगतान करना पड़ता है। परंतु, किसान चाहें तो स्वयं के गांव में खुद की भंडारण इकाई भी चालू कर सकते हैं। भंडारण इकाई हेतु सरकार 50% प्रतिशत अनुदान भी प्रदान कर रही है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि राजस्थान सरकार द्वारा प्याज भंडारण हेतु नई योजना को स्वीकृति दे दी गई है। जिसके अंतर्गत प्रदेश के 10,000 किसानों को 2,550 भंडारण इकाई चालू करने हेतु 87.50 करोड़ रुपए की सब्सिड़ी दी जाएगी।

भंडारण संरचनाओं को बनाने के लिए इतना अनुदान मिलेगा

मीडिया खबरों के मुताबिक, किसानों को विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत प्याज के भंडारण हेतु सहायतानुदान मुहैय्या कराया जाएगा। इसमें प्याज की भंडारण संरचनाओं को बनाने के लिए प्रति यूनिट 1.75 लाख का खर्चा निर्धारित किया गया है। इसी खर्चे पर लाभार्थी किसानों को 50% फीसद अनुदान प्रदान किया जाएगा। देश का कोई भी किसान अधिकतम 87,500 रुपये का फायदा हांसिल कर सकता है। ज्यादा जानकारी हेतु निजी जनपद में कृषि विभाग के कार्यालय अथवा राज किसान पोर्टल पर भी विजिट कर सकते हैं। ये भी पढ़े: Onion Price: प्याज के सरकारी आंकड़ों से किसान और व्यापारी के छलके आंसू, फायदे में क्रेता

किस योजना के अंतर्गत मिलेगा लाभ

राजस्थान सरकार द्वारा प्रदेश के कृषि बजट 2023-24 के अंतर्गत प्याज की भंडारण इकाइयों पर किसानों को सब्सिड़ी देने की घोषणा की है। इस कार्य हेतु राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत 1450 भंडारण इकाइयों हेतु 12.25 करोड रुपये मिलाके 34.12 करोड रुपये व्यय करने जा रही है। इसके अतिरिक्त 6100 भंडारण इकाईयों हेतु कृषक कल्याण कोष द्वारा 53.37 करोड़ रुपये के खर्च का प्रावधान है। ये भी पढ़े: भंडारण की परेशानी से मिलेगा छुटकारा, प्री कूलिंग यूनिट के लिए 18 लाख रुपये देगी सरकार

प्याज की भंडारण इकाई बनाने की क्या जरूरत है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इन दिनों जलवायु परिवर्तन से फसलों में बेहद हानि देखने को मिली है। तीव्र बारिश और आंधी के चलते से खेत में खड़ी और कटी हुई फसलें तकरीबन नष्ट हो गई। अब ऐसी स्थिति में सर्वाधिक भंडारण इकाईयों की कमी महसूस होती है। यह भंडारण इकाईयां किसानों की उत्पादन को हानि होने से सुरक्षा करती है। बहुत बार भंडारण इकाइयों की सहायता से किसानों को उत्पादन के अच्छे भाव भी प्राप्त हो जाते हैं। यहां किसान उत्पादन के सस्ता होने पर भंडारण कर सकते हैं। साथ ही, जब बाजार में प्याज के भावों में वृद्धि हो जाए, तब भंडार गृहों से निकाल बेचकर अच्छी आय कर सकते हैं।
परेशानी का निकाला तोड़, पथरीली जमीन पर उगा दिया आलू

परेशानी का निकाला तोड़, पथरीली जमीन पर उगा दिया आलू

पारम्परिक खेती क्लाइमेट बदलने की वजह से काफी बर्बाद हो रही है. लेकिन आजकल की पीढ़ी के युवा किसानों ने इस परेशानी का तोड़ निकाल लिया है. खेती से जुड़े नये नये प्रयोग से युवा किसान ने पथरीली जमीन को भी उपजाऊ बना दिया और उसमें आलू की दो नई किस्में बो दी. जैसा की हम सब जानते हैं, कि क्लाइमेट बदलने की वजह से मौसम की मार बुरी तरह से पारम्परिक खेती को बर्बाद कर देता है. जिसके चलते अब पारम्परिक खेती करने के तरीके में बदलाव आ चुका है. हालांकि राजस्थान के सिरोही जिले के गांवों में खेती करके के ही किसान अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. जिस जगह पर जीरा, गेहूं और सौंफ जैसी फसलों की पैदावार वाले इलाके में युवा किसान आलू बो रहे हैं. इस जिले से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर बसे भूतगांव के युवा किसान दिनेश माली ने अपनी 34 साल की उम्र में आलू की दो किस्में संताना और एलआर को 80 बीघा जमीन पर बोया है. दिनेश माली की मानें तो उन्होंने पहले पपीते का व्यापार किया. जिस वजह से उनका आना जाना गुजरात में होता था. आलू की स्पेशल क्रॉप को बोने का ये आईडिया भी उन्हें वहीं से मिला. उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने काफी ज्यादा मेहनत की है. इसके लिए उन्होंने पहले पथरीली जमीन को उपजाऊ बनाया. फिर गुजरात से लाल और सफेद रंग के आलू को 80 बीघा जमीन पर बोया. उनका कहना है कि, यह उनकी पहली फसल है. ये भी देखें: हवा में आलू उगाने की ऐरोपोनिक्स विधि की सफलता के लिए सरकार ने कमर कसी, जल्द ही शुरू होगी कई योजनाएं युवा किसान दिनेश ने बताया कि उन्होंने अपनी 30 बीघा जमीन पर लाल आलू बोया है. वहीं 10 बीघा प्रति टन के हिसाब से यह फसल चार महीने में तैयार हो जाएगी. वहीं सफ़ेद आलू की फसल तीन महीने में तैयार हो जाएगी. शार्ट टर्म में इस खेती में अच्छी खाद, पानी और गुड़ाई की जरूरत पड़ती है. अगर इन सब चीजों का अच्छे से ध्यान रखा जाए तो, यह फसल अच्छी कमाई करवाएगी.
Rajasthan ka krishi budget: किसानों के लिए बहुत कुछ है राजस्थान के कृषि बजट में

Rajasthan ka krishi budget: किसानों के लिए बहुत कुछ है राजस्थान के कृषि बजट में

13 महीनों तक चले किसान आंदोलन ने यह साबित किया कि अब सरकारों को उनकी तरफ ध्यान देना होगा अन्यथा सरकारें चल नहीं पाएंगी। उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चल रहे चुनावों के मद्देनजर ही, डैमेज कंट्रोल करने के वास्ते प्रधानमंत्री को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। यह वापसी इसलिए हुई क्योंकि देश भर के किसान एकजुट हो गए थे। किसानों की एकता का ही यह परिणाम था कि कानून वापस हुए और अब किसान अपने घरों पर हैं। लेकिन, इसके दूरगामी परिणाम को आपने देखा क्या। इसका दूरगामी परिणाम है, 23 फरवरी को राजस्थान में पेश किया गया कृषि बजट। जी हां, जब से राजस्थान बना है, तब से लेकर अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ था कि बजट के बाद कोई कृषि बजट पेश किया गया हो। वह भी अलग से। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। राजस्थान में जो कृषि बजट पेश किया गया, वह किसानों के आंदोलन की ही परिणिति है, ऐसा मानना गलत नहीं होगा।

क्या है कृषि बजट में

अब बड़ा सवाल यह है कि इस किसान बजट में है क्या।

दरअसल, इस किसान बजट में कई व्यवस्थाएं दी गई हैं। इन व्यवस्थाओं को गौर से देखें तो समझ जाएंगे कि राजस्थान सरकार किसानों को लेकर कितनी चिंतित है। हां, सरकारी खजाने की अपनी एक सीमा होती है। कृषि ही सब कुछ नहीं होती पर कृषि को तवज्जो देकर सरकार ने एक सकारात्मक रुख का प्रदर्शन तो जरूर किया है। आइए समझें कि इस कृषि बजट में है क्या।

1. मुख्यमंत्री कृषक साथी का बजट बढ़ गया

दरअसल, 2021 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उद्योग क्षेत्र में चलाई जाने वाली योजना को कृषि क्षेत्र में, थोड़े परिवर्तन के साथ लागू कर दिया। अर्थात, अगर आप किसान हैं और कृषि कार्य करते हुए आपके साथ कोई हादसा हो गया तो इस योजना के तहत आपको दो से 5 लाख रुपये तक की तात्कालिक सहायता मिलेगी। यह योजना कई क्लाउजेज की व्याख्या करती है। जैसे, यदि आपकी एक अंगुली कट जाए तो सरकार आपको 5000 रुपये देगी। दो कट जाए तो 10000 रुपये, तीन कट जाए तो 15000 रुपये और चार कट जाए तो 20000 रुपये का भुगतान करेगी सरकार। ऐसे ही अगर आपकी पांचों अंगुलियां कट जाती हैं तो सरकार आपको 25000 रुपये देगी। इस योजना के लिए बीते साल के बजट में 2000 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई थी। अब इसका दायरा बढ़ाने की गरज से सरकार ने इस योजना के लिए 5000 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है। धनराशि बढ़ाने को किसानों ने बेहद बढ़िया माना है।

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2. मुख्यमंत्री जैविक कृषि मिशन

कृषि बजट में सरकार ने घोषणा की है कि इसी सत्र से मुख्यमंत्री जैविक खेती मिशन शुरू कर दिया जाएगा। इसके तहत सरकार उन किसानों को ज्यादा लाभ देगी, जो शुद्ध रूप से जैविक केती के लिए तैयार होंगे। इस योजना के तहत, सरकार उन्हें आर्थिक पैकेज तो देगी ही, जरूरत पड़ी तो उनकी फसलों को भी खरीद लेगी। इसके लिए पहले 600 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। अगले बजट में इस धनराशि को बढ़ाया भी जा सकता है।

3. बीज उत्पादन एवं विपणन तंत्र की घोषणा

इस कृषि बजट में सरकार ने एक ऐसा तंत्र विकसित करने की घोषणा की, जिसके तहत सभी किसानों तक सरकारी योजनाएं पहुंच सकें। खास कर बीज और कृषि के अन्य अवयवों को सरकार एक साथ किसानों तक पहुंचाना चाहती है। सरकार का जोर इस बात पर ज्यादा है कि राज्य के कम से कम दो लाख छोटे किसानों तक मूंग, मोठ और उड़द के प्रमाणित बीजों के मिनी किट्स मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं। इन चीजों के लिए ही बीज उत्पादन एवं विपणन तंत्र की घोषणा की गई है। सरकार एक सिस्टम बनाना चाह रही है जिससे समय पर और सिस्टमेटिक रुप में किसानों तक कृषि संबंधित चीजों की डिलीवरी हो सके। इस किस्म का सिस्टम छत्तीसगढ़ में पहले से चल रहा है।

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4. राजस्थान भूमि उर्वरकता मिशन की घोषणा

इस कृषि बजट में सरकार ने राजस्थान भूमि उर्वरकता मिशन की घोषणा की। इस मिशन के तहत राजस्थान के किसान यह जान सकेंगे कि उनकी जो जमीन है, उसकी उर्वरक क्षमता क्या है। किस किस्म की खेती उन्हें कब और कैसे करनी चाहिए। अभी राजस्थान में सभी किसान परंपरागत खेती कर रहे हैं। इस मिशन के शुरू हो जाने के बाद माना जा रहा है कि खेती कार्य में विविधता आएगी। समय-समय पर जब मिट्टी की जांच होगी तो किसानों को यह एडवाइस भी दिया जाएगा कि इसकी उर्वरकता बढ़ाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए।

5. दूध पर 5 रुपये प्रति लीटर अनुदान

राजस्थान सरकार ने अपने कृषि बजट में यह व्यवस्था की है कि जो भी किसान अपना दूध सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों को देंगे, उन्हें 5 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से अनुदान भी मिलेगा। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि दूध सहकारी दुग्ध उत्पादक संघों के माध्यम से राजस्थान भर में बिके। 

6. कर्ज की व्यवस्था

इस कृषि बजट में घोषणा की गई है कि सरकार वर्ष 2022 में किसानों को फसली ऋण भी देगी। यह फसली ऋण 20000 करोड़ की लिमिट के भीतर होगी। ऐसे लाभार्थी किसानों की संख्या इस साल के लिए पांच लाख तय की गई है। इतना ही नहीं, जो लोग कृषि कार्य से प्रत्यक्ष रुप से नहीं जुड़े हैं, उन्हें भी कर्ज दिया जाएगा। इस साल ऐसे परिवारों की संख्या एक लाख तय की गई है। कर्ज कितना मिलेगा, यह तय नहीं है पर मिलेगा जरूर। कुल मिलाकर, यह किसानों के भीतर हौसला बुलंद करने वाला बजट है। इसे अगर अमली जामा पहना दिया जाए तो राजस्थान के किसानों की स्थिति बेहद सुदृढ़ हो सकती है। जिस भाव से बजट पेश किया गया है, वह बेहतर है। उसी भाव से इस पर अमल हो तो किसानों का सच में भला हो जाएगा।

राजस्थान सरकार गाय पालने पर देगी 90 प्रतिशत अनुदान

राजस्थान सरकार गाय पालने पर देगी 90 प्रतिशत अनुदान

राजस्थान की गेहलोत सरकार ने गाय के गोबर को 2 रुपये प्रति किलो की कीमत से खरीदने का ऐलान की है। राज्य सरकार गौ पालन और गौ संरक्षण के लिए पूर्व से भी कामधेनु योजना को चलाया जा रहा है, जिसके लिए सरकार डेयरी चालकों को 90 फीसद तक का अनुदान प्रदान करती है। भारत में जहां एक तरफ गाय गौ मूत्र एवं गौ गोबर को लेकर आप विभिन्न प्रकार की समाचार को सुनते ही आए हैं। परंतु, आज हम आपको इस लेख जिस समाचार को बताने जा रहे हैं, वह आपके लाभ की बात है। दरअसल फिलहाल राजस्थान सरकार गाय के गोबर को 2 रुपये/किलो की कीमत से खरीदेगी। राज्य के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत ने यह जानकारी पुरानी पेंशन योजना की शुरुआत करने की चल रही मीटिंग के चलते प्रदान की। राजस्थान सरकार ने यह ऐलान किसानों को आर्थिक एवं सामाजिक तौर पर सबल बनाने एवं गाय के गोबर को बेहतर ढंग से प्रयोग में लाने की दिशा में एक नया बताया है।

ये योजनाऐं गौ पालन के लिए चल रही हैं

राजस्थान सरकार गाय पालने के लिए तथा उनका संरक्षण करने हेतु 90 प्रतिशत तक की अनुदान योजना को भी चला रही है। राज्य सरकार के मुताबिक, इससे राज्य में दुग्ध की पैदावार की मात्रा तो बढ़ेगी। इसके साथ ही गौ वंशों के संरक्षण के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी किया जा सकेगा। सरकार इस योजना के जरिए ज्यादा दूध देने वाली गायों की प्रजनन दर को बढ़ाएगी। साथ ही, इनकी खरीद पर नियमावली के मुताबिक किसानों को 90 फीसद तक का अनुदान भी प्रदान करेगी। सरकार की इस योजना का फायदा सिर्फ डेयरी धारकों के लिए ही है। क्योंकि, यह अनुदान योजना 25 गायों के पालन पर दी जाती है, जिसके लिए प्रदेश सरकार भिन्न-भिन्न तरीकों के जरिए से लागत का 90 प्रतिशत तक की अनुदान के रूप में प्रदान करेगी।

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गोबर 2 रुपए किलो के हिसाब

राजस्थान सरकार ने गौ संरक्षण के साथ-साथ गाय के गोबर को 2 रुपये प्रति किलो की कीमत से खरीदेगी। राज्य सरकार इससे पूर्व में भी गायों के संरक्षण एवं लोगों के द्वारा इसके पालन के लिए विभिन्न योजनाओं को संचालित कर रही है। इन योजनाओं में कामधेनु योजना, कामधेनु पशु बीमा योजना और गाय योजना इत्यादि हैं। राजस्थान राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किसानों को इस दिशा में और भी ज्यादा प्रोत्साहित करने के लिए गाय के गोबर को 2 रुपये प्रति किलो की कीमत से खरीदने का ऐलान किया है।

टिड्डी दल नियंत्रण को यूपी में खुले कंट्रोल रूम

टिड्डी दल नियंत्रण को यूपी में खुले कंट्रोल रूम

उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में टिड्डी दल पहुंच चुका है, यह बहुत ही चिंताजनक है। प्रदेश सरकार टिड्डी दल पर नियंत्रण करने की पूरी कोशिश कर रही है। संबंधित अधिकारी को इसके रोकथाम के लिए आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। टिड्डी दल की रोकथाम के लिए सीमावर्ती जिले मथुरा,आगरा,झांसी ललितपुर आदि जनपदों के लिए 5 लाख रुपये और अन्य जनपदों के लिए 2 लाख की धनराशि दी गयी है। साथ ही सभी जिला अधिकारियों को कोषागार नियम 27 के अंतर्गत आवश्यकता अनुसार धनराशि आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के अंतर्गत नियमानुसार व्यय करने के निर्देश दे दिए गए हैं। 

टिड्डी दल पर नियंत्रण के दृष्टिगत प्रदेश स्तर पर एक कंट्रोल रूम की स्थापना कृषि निदेशालय की गई है। जिसका दूरभाषा 0522-2205867 है। किसान भाई सोमवार से रविवार प्रातः 8:00 बजे से रात 8:00 बजे तक दिए गए नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। टिड्डी दल के प्रकोप से सुरक्षा हेतु जनपद एवं प्रदेश स्तर पर निरंतर निगरानी रखने के लिए आपदा राहत दल का गठन किया गया है।

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निदेशालय स्तर पर गठित आपदा राहत दल में कृषि निदेशक (कृषि रक्षा) मुख्यालय अध्यक्ष, सहायक निदेशक (कृषि रक्षा) द्वितीय, सहायक निदेशक (कृषि रक्षा) प्रथम सदस्य है, जो प्रदेश स्तर पर टिड्डी दल के रोकथाम के लिए आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे। साथ ही जिले स्तर पर गठित आपदा राहत दल में मुख्य विकास अधिकारी अध्यक्ष, उप कृषि निदेशक, जिला कृषि अधिकारी और कृषि रक्षा अधिकारी सदस्य है, जो टिड्डी दल के प्रकोप से सुरक्षा हेतु आवश्यक उपाय करने के साथ-साथ इसके रोकथाम के लिए समुचित कार्यवाही सुनिश्चित करेंगे।

अब होगी ड्रोन से राजस्थान में खेती, किसानों को सरकार की ओर से मिलेगी 4 लाख की सब्सिडी

अब होगी ड्रोन से राजस्थान में खेती, किसानों को सरकार की ओर से मिलेगी 4 लाख की सब्सिडी

किसानों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार कई प्रकार के योजनाओं का संचालन कर रही है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो और कम से कम समय में कार्य हो. बजट घोषणा के दौरान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ड्रोन से खेती (Agriculture Drone) करने की योजना जारी की थी. इस योजना से 40 करोड़ रुपए तक सब्सिडी का प्रावधान किया गया है. इस योजना के तहत यदि कोई भी कस्टम हायरिंग सेंटर ड्रोन को खरीदेगा तो सब्सिडी मिलेगी और फिर किसान उससे ड्रोन किराए पर ले सकते है. यदि किसान भी ड्रोन खरीदना चाहे तो खरीद सकता है. किसानों को इस योजना से काफी फायदा मिलेगा. वो काम कीमत पर ड्रोन खरीद या किराए पर ले सकते है.

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योजना से किसानों का फायदा

इस योजना से किसानों का कई प्रकार से फायदा होगा. जैसे- किसानों का समय बचेगा ड्रोन कम से कम समय में छिड़काव का काम कर देगा. यदि पुराने तरीके से इस काम को किया जाए तो बहुत समय लगेगा साथ ही बहुत मेहनत भी. यदि किसान 2-3 मजदूर लगाए तो बहुत खर्च भी हो जायेगा. जैसे- 1 मजदूर की कीमत 400 रुपए तो 3 मजदूर 1200 रुपए में आएंगे. जबकि ड्रोन सिर्फ 300 से 400 के बीच में आ जाएगा. ड्रोन से हर जगह बराबर का छिड़काव होगा जबकि मजदूर कही कम तो कही ज्यादा छिड़काव कर देंगे.

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10 मिनट में 1 एकड़ जमीन पर छिड़काव

कृषि में किसी फसल के उपज के लिए कई स्टेप होते है, जैसे- कटाई, सिंचाई और साथ - साथ कीटनाशक छिड़काव भी जरूरी है. यदि कीटनाशक का छिड़काव न किया जाए तो फसल बर्बाद हो सकती है. अभी के समय लोग कीटनाशक के छिड़काव के लिए पेटीनुमा चीज को कंधो में टांगकर स्प्रे के द्वारा छिड़काव करते है. 1 एकड़ जमीन के लिए अगर इस पेटीनुमा स्प्रे से छिड़काव किया जाए तो 3 से 4 घंटे लग सकते है. साथ ही कीटनाशक से छिड़काव करने वाले किसान के शरीर को भी बहुत नुकसान पहुंचता है. वही , ड्रोन से इतने ही क्षेत्र में छिड़काव किया जाए तो 10 मिनट में हो जाएगा और किसान के शरीर भी बचा रहेगा.