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मछली

मछलियों के रोग तथा उनके उपचार

मछलियों के रोग तथा उनके उपचार

मछलियां भी अन्य प्राणियों के समान प्रतिकूल वातावरण में रोग ग्रस्त हो जाती हैं रोग फैलते ही संचित मछलियों के स्वभाव में प्रत्यक्ष अंतर आ जाता है.

रोग ग्रस्त मछलियों में निम्नलिखित लक्षण पाए जाते हैं

  • बीमार मछलियां समूह में ना रहकर किनारे पर अलग अलग दिखाई देती है
  • बेचैनी अनियंत्रित रहती है
  • अपने शरीर को पानी में गड़े फूट में रगड़ना
  • पानी में बार-बार कूदना
  • पानी में बार-बार गोल गोल घूमना पानी में बार-बार गोल गोल घूमना
  • भोजन न करना
  • पानी में कभी कभी सीधा टंगे रहना व कभी कभी उल्टा हो जाना
  • मछली के शरीर का रंग फीका पड़ जाता है शरीर का चिपचिपा होना
  • आँख, शरीर व गलफड़ों का फूलना
  • शरीर की त्वचा का फटना
  • शरीर में परजीवी का वास हो जाना

रोग के कारण:

मछली में रोग होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं: १- पानी की गुणवत्ता तापमान पीएच ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड आदि की असंतुलित मात्रा. २- मछली के वर्जय यानी ना खाने वाले पदार्थ ( मछली का मल आदि ) जल में एकत्रित हो जाते हैं और मछली के अंगों जैसे गलफड़े, चर्म, मुख गुहा आदि के संपर्क में आकर उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं ३- बहुत से रोग जनित जीवाणु व विषाणु जल में होते हैं जब मछली कमजोर हो जाती हैं तब वो मछली पर आक्रमण करके मछली को रोग ग्रसित कर देते हैं. ये भी पढ़े:
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 मुख्यतः रोगों को चार भागों में बांटा जा सकता है

१-  परजीवी जनित रोग २- जीवाणु जनित रोग ३- विषाणु जनित रोग ४- कवक फंगस जनित रोग

1.परजीवी जनित रोग:

आंतरिक परजीवी मछली के आंतरिक अंगों जैसे शरीर गुहा रक्त नलिका आदि को संक्रमित करते हैं जबकि बाहरी परजीवी मछली के गलफड़ों, पंखों चर्म आदि को संक्रमित करते हैं

1-ट्राइकोडिनोसिस :

लक्षण: यह बीमारी ट्राइकोडीना नामक प्रोटोजोआ परजीवी से होती है जो मछली के गलफड़ों व शरीर के सतह पर रहता है इस रोग से संक्रमित मछली शिथिल व भार में कमी आ जाती है.  गलफड़ों से अधिक श्लेष्म प्रभावित होने से स्वसन में कठिनाई होती है.  उपचार: निम्न रसायनों में संक्रमित मछली को 1 से 2 मिनट डुबो के रखने से रोग को ठीक किया जा सकता है 1.5% सामान्य नमक घोल कर 25 पीपीएम फर्मोलिन, 10 पी पी एम कॉपर सल्फेट.

2- माइक्रो एवं मिक्सो स्पोरिडिसिस:

लक्षण: यह रोग अंगुलिका अवस्था में ज्यादा होता है. यह कोशिकाओं में तंतुमय कृमिकोष बनाके रहते हैं तथा ऊतकों को भारी क्षति पहुंचाते हैं. उपचार: इसकी रोकथाम के लिए कोई ओषधि नहीं है. इसके उपचार के लिए या तो रोगग्रस्त मछली को बाहर निकल देते हैं. या मतस्य बीज संचयन के पूर्व चूना ब्लीचिंग पाउडर से पानी को रोग मुक्त करते हैं.

3- सफेद धब्बेदार रोग:

लक्षण : यह रोग इन्कयियोथीसिस प्रोटोजोआ द्वारा होता है. इसमें मछली की त्वचा, गलफड़ों एवं पंख पर सफेद छोटे छोटे धब्बे हो जाते हैं. उपचार: मैला काइट ग्रीन ०.1 पी पी ऍम , 50 पी पी ऍम फर्मोलिन में १-२ मिनट तक मछली को डुबोते हैं.

2. जीवाणु जनित रोग:

1- कालमानेरिस रोग:

लक्षण: यह फ्लेक्सीबेक्टर कालमानेरिस नामक जीवाणु के संकम्रण से होता है, पहले शरीर के बाहरी सतह पर फिर गलफड़ों में घाव होने शुरू हो जाते हैं. फिर जीवाणु त्वचीय ऊतक में पहुंच कर घाव कर देते हैं. उपचार: संक्रमित भाग में पोटेशियम परमेगनेट का लेप लगाया जाता है. 1 से 2 पी पी ऍम का कॉपर सल्फेट का खोल पोखरों में डालें. ये भी पढ़े: ठण्ड में दुधारू पशुओं की देखभाल कैसे करें

2- ड्रॉप्सी:

लक्षण: मछली जब हाइड्रोफिला जीवाणु के संपर्क में आती है तब यह रोग होता है. यह उन पोखरों में होता है जहाँ पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध नहीं होता है. इससे मछली का धड़ उसके सिर के अनुपात में काफी छोटा हो जाता है. शल्क बहुत अधिक मात्रा में गिर जाते हैं व पेट में पानी भर जाता है. उपचार: मछलियों को पर्याप्त भोजन देना पानी की गुणवत्ता बनाये रखना १०० किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पानी में 15 दिन में चूना डालते रहना चाहिए.

3- बाइब्रियोसिस रोग:

लक्षण: यह रोग बिब्रिया प्रजाति के जीवाणुओं से होता है. इसमें मछलियों को भोजन के प्रति अरुचि के साथ साथ रंग काला पड़ जाता है. मछली अचानक मरने भी लगती हैं. यह मछली की आंखों को अधिक प्रभावित करता है सूजन के कारण आंखें बाहर आ जाती हैं. उपचार: ऑक्सीटेटरासाइक्लिन तथा सल्फोनामाइन को 8 से 12 ग्राम प्रति किलोग्राम भोजन के साथ मिला कर देना चाहिए.

 3. कवक एवं फफूंद जनित रोग:

 लक्षण: सेप्रोलिग्नियोसिस:  यह रोग सेप्रोलिग्नियोसिस पैरालिसिका नामक फफूंद से होता है. जाल द्वारा मछली पकड़ने व परिवहन के दौरान मत्स्य बीज के घायल हो जाने से फफूंद घायल शरीर पर चिपक कर फैलने लगती है. त्वचा पर सफेद जालीदार सतह बनाता है. जबड़े फूल जाते हैं पेक्टरल वाका डॉल्फिन पेक्टोरल व काडल फिन के पास रक्त जमा हो जाता है. रोग ग्रस्त भाग पर रुई के समान गुच्छे उभर आते हैं. उपचार:  3% नमक का घोल या 1 :1000 पोटाश का घोल पोटाश का घोल या 1 अनुपात 2 हजार कैलशियम सल्फेट का घोल मैं 5 मिनट तक डुबोने से विषाणु रोग समाप्त किया जा सकता है.

1 - स्पिजुस्टिक अल्सरेटिव सिंड्रोम:

गत 22 वर्षों से यह रोग भारत में महामारी के रूप में फैल रहा है. सर्वप्रथम यह रोग त्रिपुरा राज्य में 1983 में प्रविष्ट हुआ तथा वहां से संपूर्ण भारत में फैल गया यह रोग तल में रहने वाली सम्बल, सिंधी, बाम, सिंघाड़ कटरंग तथा स्थानीय छोटी मछलियों को प्रभावित करता है. कुछ ही समय में पालने वाली मछलियां कार्प, रोहू ,कतला, मिरगला  मछलियां भी इस रोग की चपेट में आ जाती हैं. ये भी पढ़े: अब किट से होगी पशु के गर्भ की जांच लक्षण:  इस महामारी में प्रारंभ में मछली की त्वचा पर जगह-जगह खून के धब्बे उतरते हैं बाद में चोट के गहरे घाव में तब्दील हो जाते हैं. चरम अवस्था में हरे लाल धब्बे बढ़ते हुए पूरे शरीर पर यहां वहां गहरे अल्सर में परणित हो जाते हैं. पंख व पूंछ गल जाती हैं. अतः शीघ्र व्यापक पैमाने पर मछलियां मर कर किनारे पर दिखाई देती है. बचाव के उपाय: वर्षा के बाद जल का पीएच देखकर या कम से कम 200 किलो चूने का उपयोग करना चाहिए. तालाब के किनारे यदि कृषि भूमि है तो तालाब की चारों ओर से बांध देना चाहिए ताकि कृषि भूमि का जल सीधे तलाब में प्रवेश न करें. शीत ऋतु के प्रारंभिक काल में ऑक्सीजन कम होने पर पंप ब्लोवर से  पानी में ऑक्सीजन प्रवाहित करना चाहिए. उपचार: अधिक रोग ग्रस्त मछली को तालाब से अलग कर देना चाहिए. चूने के उपयोग के साथ-साथ ब्लीचिंग पाउडर 1 पीपीएम अर्थात 10 किलो प्रति हेक्टेयर मीटर की दर से तालाब में डालना चाहिए.
एकीकृत कृषि प्रणाली से खेत को बना दिया टूरिज्म पॉइंट

एकीकृत कृषि प्रणाली से खेत को बना दिया टूरिज्म पॉइंट

इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम मॉडल (Integrated Farming System Model) यानी एकीकृत या समेकित कृषि प्रणाली मॉडल (ekeekrt ya samekit krshi pranaalee Model) को बिहार के एक नर्सरी एवं फार्म में नई दशा-दिशा मिली है। पटना के नौबतपुर के पास कराई गांव में पेशे से सिविल इंजीनियर किसान ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग (INTEGRATED FARMING) को विलेज टूरिज्म (Village Tourism) में तब्दील कर लोगों का ध्यान खींचा है। कराई ग्रामीण पर्यटन प्राकृतिक पार्क नौबतपुर पटना बिहार (Karai Gramin Paryatan Prakritik Park, Naubatpur, Patna, Bihar) महज दो साल में क्षेत्र की खास पहचान बन चुका है।

लीज पर ली गई कुल 7 एकड़ भूमि पर खान-पान, मनोरंजन से लेकर इंटीग्रेटेड फार्मिंग के बारे में जानकारी जुटाकर प्रेरणा लेने के लिए काफी कुछ मौजूद है। एकीकृत कृषि प्रणाली से खेती किसानी को ग्रामीण पर्यटन (Village Tourism) का केंद्र बनाने के लिए सिविल इंजीनियर दीपक कुमार ने क्या कुछ जतन किए, इसके बारे में जानने से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) यानी एकीकृत या समेकित कृषि प्रणाली (ekeekrt ya samekit krshi pranaalee) क्या है।

एकीकृत या समेकित कृषि प्रणाली (Integrated Farming System)

एकीकृत कृषि प्रणाली किसानी की वह पद्धति है जिसमे, कृषि के विभिन्न घटकों जैसे फसल पैदावार, पशु पालन, फल एवं साग-सब्जी पैदावार, मधुमक्खी पालन, कृषि वानिकी, मत्स्य पालन आदि तरीकों को एक दूसरे के पूरक बतौर समन्वित तरीके से उपयोग में लाया जाता है। इस पद्धति की खेती, प्रकृति के उसी चक्र की तरह कार्य करती है, जिस तरह प्रकृति के ये घटक एक दूसरे के पूरक होते हैं। 

इसमें घटकों को समेकित कर संसाधनों की क्षमता, उत्पादकता एवं लाभ प्रदान करने की क्षमता में वृद्धि स्वतः हो जाती है। इस प्रणाली की सबसे खास बात यह है कि इसमें भूमि, स्वास्थ्य के साथ ही पर्यावरण का संतुलन भी सुरक्षित रहता है। हम बात कर रहे थे, बिहार में पटना जिले के नौबतपुर के नजदीकी गांव कराई की। यहां बिहार स्टेट हाउसिंग बोर्ड में कार्यरत सिविल इंजीनियर दीपक कुमार ने समेकित कृषि प्रणाली को विलेज टूरिज्म का रूप देकर कृषि आय के अतिरिक्त विकल्प का जरिया तलाशा है।

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सफलता की कहानी अब तक

जैसा कि हमने बताया कि, इंटीग्रेटेड फार्मिंग में खेती के घटकों को एक दूसरे के पूरक के रूप मेें उपयोग किया जाता है, इसी तर्ज पर इंजीनियर दीपक कुमार ने सफलता की इबारत दर्ज की है। उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन बेचकर, पिछले साल 2 जून 2021 को 7 एकड़ लीज पर ली गई जमीन पर अपने सपनों की बुनियाद खड़ी की थी। बचपन से कृषि कार्य में रुचि रखने वाले दीपक कुमार इस भूमि पर समेकित कृषि के लिए अब तक 30 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम के उदाहरण के लिए उनका फार्म अब इलाके के साथ ही, देश के अन्य किसान मित्रों के लिए आदर्श मॉडल बनकर उभर रहा है। उनके फार्म में कृषि संबंधी सभी तरह की फार्मिंग का लक्ष्य रखा गया है। 

इस मॉडल कृषि फार्म में बकरी, मुर्गा-मुर्गी, कड़कनाथ, मछली, बत्तख, श्वान, विलायती चूहों, विदेशी नस्ल के पिग, जापानी एवं सफेद बटेर संग सारस का लालन-पालन हो रहा है। मुख्य फसलों के लिए भी यहां स्थान सुरक्षित है। आपको बता दें प्रगतिशील कृषक दीपक कुमार ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग के इन घटकों के जरिए ही विलेज टूरिज्म का विस्तार कर कृषि आमदनी का अतिरिक्त जरिया तलाशा है। मछली एवं सारस के पालन के लिए बनाए गए तालाब के पानी में टूरिस्ट या विजिटर्स नौकायन का लुत्फ ले सकते हैं।

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इसके अलावा यहां तैयार रेस्टॉरेंट में वे अपनी पसंद की प्रजाति के मुर्गा-मुर्गी और मछली के स्वाद का भी लुत्फ ले सकते हैं। इस फार्म के रेस्टॉरेंट में कड़कनाथ मुर्गे की चाहत विजिटर्स पूरी कर सकते हैं। इलाके के लोगों के लिए यह फार्म जन्मदिन जैसे छोटे- मोटे पारिवारिक कार्यक्रमों के साथ ही छुट्टी के दिन सैरगाह का बेहतरीन विकल्प बन गया है।

अगले साल से होगा मुनाफा

दीपक कुमार ने मेरीखेती से चर्चा के दौरान बताया, कि फिलहाल फार्म से होने वाली आय उसके रखरखाव में ही खर्च हो जाती है। इससे सतत लाभ हासिल करने के लिए उन्हें अभी और एक साल तक कड़ी मेहनत करनी होगी। नौकरी के कारण कम समय दे पाने की विवशता जताते हुए उन्होंने बताया कि पर्याप्त ध्यान न दिए जाने के कारण लाभ हासिल करने में देरी हुई, क्योंकि वे उतना ध्यान फार्म प्रबंधन पर नहीं दे पाते जितने की उसके लिए अनिवार्य दरकार है।

हालांकि वे गर्व से बताते हैं कि उनकी पत्नी उनके इस सपने को साकार करने में हर कदम पर साथ दे रही हैं। उन्होंने अन्य कृषकों को सलाह देते हुए कहा कि जितना उन्होंने निवेश किया है, उतने मेंं दूसरे किसान लगन से मेहनत कर एकीकृत किसानी के प्रत्येक घटक से लाखों रुपए की कमाई प्राप्त कर सकते हैं।

इनका सहयोग

उन्होंने बताया कि वेटनरी कॉलेज पटना के वीसी एवं डॉक्टर पंकज से उनको समेकित कृषि के बारे में समय-समय पर बेशकीमती सलाह प्राप्त हुई, जिससे उनके लिए मंजिल आसान होती गई। वे बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट पर उन्होंने किसी और से किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं जुटाई है एवं अपने स्तर पर ही आवश्यक धन राशि का प्रबंध किया।

युवाओं को जोड़ने की इच्छा

समेकित कृषि को अपनाने का कारण वे बेरोजगारी का समाधान मानते हैं। उनका मानना है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स के कारण इलाके के बेरोजगारों को आमदनी का जरिया भी प्राप्त हो सकेगा।

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नए प्रयोग

आधार स्थापना के साथ ही अब दीपक कुमार के कृषि फार्म पर गोबर गैस प्लांट ने काम करना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि उनके फार्म पर गाय, बकरी, भैंस, सभी पशुओं के प्रिय आहार, सौ फीसदी से भी अधिक प्रोटीन से भरपूर अजोला की भी खेती की जा रही है। इस चारा आहार से पशु की क्षमता में वृद्धि होती है।

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आपको बता दें अजोला घास जिसे मच्छर फर्न (Mosquito ferns) भी कहा जाता है, जल की सतह पर तैरने वाला फर्न है। अजोला अथवा एजोला (Azolla) छोटे-छोटे समूह में गठित हरे रंग के गुच्छों में जल में पनपता है। जैव उर्वरक के अलावा यह कुक्कुट, मछली और पशुओं का पसंदीदा चारा भी है। इसके अलावा समेकित कृषि प्रणाली आधारित कृषि फार्म में हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) तकनीक द्वारा निर्मित हरा चारा तैयार किया जा रहा है। 

इसमेें गेहूं, मक्का का चारा तैयार होता है। आठ से दस दिन की इस प्रक्रिया के उपरांत चारा तैयार हो जाता है। अनुकूल परिस्थितियों में हाइड्रोपोनिक्स चारे में 9 दिन में 25 से 30 सेंटीमीटर तक वृद्धि दर्ज हो जाती है। इस स्पेशल कैटल डाइट में प्रोटीन और पाचन योग्य ऊर्जा का प्रचुर भंडार मौजूद है। उनके अनुभव से वे बताते हैं कि इस प्रक्रिया में लगने वाला एक किलो गेहूं या मक्का तैयार होने के बाद दस किलो के बराबर हो जाता है। अल्प लागत में प्रोटीन से भरपूर तैयार यह चारा फार्म में पल रहे प्रत्येक जीव के जीवन चक्र में प्राकृतिक रूप से कारगर भूमिका निभाता है।

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हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics) अर्थात जल संवर्धन विधि से हरा चारा तैयार करने में मिट्टी की जरूरत नहीं होती। इसे केवल पानी की मदद से अनाज उगाकर निर्मित किया जा सकता है। इस विधि से निर्मित चारे को ही हाइड्रोपोनिक्स चारा कहते हैं। यदि आप भी इस फार्म के आसपास से यदि गुजर रहे हों तो यहां समेकित कृषि प्रणाली में पलने बढ़ने वाले जीवों और उनके जीवन चक्र को समझ सकते हैं। 

अन्य कृषि मित्र इस तरह की खेती से अपने दीर्घकालिक लाभ का प्रबंध कर सकते हैं। (फार्म संचालक दीपक कुमार द्वारा दूरभाष संपर्क पर दी गई जानकारी पर आधारित, आप इस फार्म के बारे में फेसबुक लिंक पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।) 

संपर्क नंबर - 8797538129, दीपक कुमार 

फेसबुक लिंक- https://m.facebook.com/Karai-Gramin-Paryatan-Prakritik-Park-Naubatpur-Patna-Bihar-100700769021186/videos/1087392402043515/

यूट्यूब लिंक-https://youtube.com/channel/UCfpLYOf4A0VHhH406C4gJ0A

जानिये PMMSY में मछली पालन से कैसे मिले लाभ ही लाभ

जानिये PMMSY में मछली पालन से कैसे मिले लाभ ही लाभ

खेती किसानी में इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) या एकीकृत कृषि प्रणाली के चलन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारें किसानों को परंपरागत किसानी के अलावा खेती से जुड़ी आय के अन्य विकल्पों को अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। मछली पालन भी इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) का ही एक हिस्सा है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना

इस प्रोत्साहन की कड़ी में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana)(PMMSY) भी, किसान की आय में वृद्धि करने वाली योजनाओं में से एक योजना है। इस योजना का लाभ लेकर किसान मछली पालन की शुरुआत कर अपनी कृषि आय में इजाफा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना क्या है, किस तरह किसान इस योजना का लाभ हासिल कर सकता है, इस बारे में जानिये मेरी खेती के साथ। केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता देश के किसानों की आय में वृद्धि करने की है। 

खेती, मछली एवं पशु पालन के अलावा जैविक खाद आदि के लिए सरकार की ओर से कृषक मित्रों को उपकरण, सलाह, बैंक ऋण आदि की मदद प्रदान की जाती है। किसानों की आय को बढ़ाने में मछली पालन (Fish Farming) भी अहम रोल निभा सकता है। ऐसे में आय के इस विकल्प को भी किसान अपनाएं, इसलिए सरकारों ने मछली पालन मेें किसान की मदद के लिए तमाम योजनाएं बनाई हैं।

प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना के शुभारम्भ अवसर पर प्रधानमंत्री का सम्बोधन

कम लागत में तगड़ा मुनाफा पक्का

मछली पालन व्यवसाय में स्थितियां अनुकूल रहने पर कम लागत में तगड़ा मुनाफा पक्का रहता है। किसान अपने खेतों में मिनी तालाब बनाकर मछली पालन के जरिए कमाई का अतिरिक्त जरिया बना सकते हैं। मछली पालन के इच्छुक किसानों की मदद के लिए पीएम मत्स्य संपदा योजना बनाई गई है। इस योजना का लाभ लेकर किसान मछली पालन के जरिए अपनी निश्चित आय सुनिश्चित कर सकते हैं।

PMMSY के लाभ ही लाभ

पीएमएमएसवाय (PMMSY) यानी प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना में किसानों के लिए फायदे ही फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा ये है कि, इसमें पात्र किसानों को योजना में सब्सिडी प्रदान की जाती है। सब्सिडी मिलने से योजना से जुड़ने वाले पर धन की उपलब्धता का बोझ कम हो जाता है। खास तौर पर अनुसूचित जाति से जुड़े हितग्राही को अधिक सब्सिडी प्रदान की जाती है। इस वर्ग के महिला और पुरुष किसान हितग्राही को PMMSY के तहत 60 फीसदी तक की सब्सिडी प्रदान की जाती है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से जुड़ने वाले अन्य वर्ग के किसानों के लिए 40 फीसदी सब्सिडी का प्रबंध किया गया है।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना लोन, वो भी प्रशिक्षण के साथ

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मछली पालन की शुरुआत करने वाले किसानों को सब्सिडी के लाभ के साथ ही मत्स्य पालन के बारे में प्रशिक्षित भी किया जाता है। अनुभवी प्रशिक्षक योजना के हितग्राहियों को पालन योग्य मुफाकारी मछली की प्रजाति, मत्स्य पालन के तरीकों, बाजार की उपलब्धता आदि के बारे में प्रशिक्षित करते हैं।

कैसे जुड़ें PMMSY योजना से

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत लाभ लेने के इच्छुक किसान मित्र पीएम किसान योजना की अधिकृत वेबसाइटपर आवेदन कर सकते हैं। और अधिक जानकारी के लिए, भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट को देखें : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मात्स्यिकी विभाग  मत्स्य पालन विभाग (Department of Fisheries) - PMMSY पीएम मत्स्य संपदा योजना के साथ किसान नाबार्ड से भी मदद जुटा सकता है। मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए लागू पीएम मत्स्य संपदा योजना के अलावा, किसान हितग्राही को मछली पालन का व्यवसाय शुरू करने के लिए सस्ती दरों पर बैंक से लोन दिलाने में भी मदद की जाती है।

आधुनिक तकनीक से बढ़ा मुनाफा

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से जुड़े झारखंड के कई किसानों की आय में उल्लेखनीय रूप से सुधार हुआ है। राज्य के कई किसान इस योजना के तहत बॉयोफ्लॉक (Biofloc) और आरएएस (Recirculating aquaculture systems (RAS)) जैसी आधुनिक तकनीक अपनाकर मछली पालन से भरपूर मुनाफा कमा रहे हैं। राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (NATIONAL FISHERIES DEVELOPMENT BOARD), भारत सरकार द्वारा जारी लेख "जलकृषि का आधुनिक प्रचलन : बायोफ्लॉक मत्स्य कृषि" की पीडीएफ फाइल डाउनलोड करने के लिये, यहां क्लिक करें - बायोफ्लॉक मत्स्य कृषि 

पीएम मत्स्य संपदा योजना में किसानों को रंगीन मछली पालन के लिए भी अनुदान की मदद प्रदान की जाती है। साथ ही नाबार्ड भी टैंक या तालाब निर्माण के लिए 60 फीसदी अनुदान प्रदान करता है।

ऐसे सुनिश्चित करें मुनाफा

खेत में मछली पालन का जो कारगर तरीका इस समय प्रचलित है वह है तालाब या टैंक में मछली पालन। इन तरीकों की मदद से किसान मुख्य फसल के साथ ही मत्स्य पालन से भी कृषि आय में इजाफा कर सकते हैं। मत्स्य पालन विशेषज्ञों के मान से 20 लाख की लागत से तैयार तालाब या टैंक से किसान बेहतरीन कमाई कर सकते हैं।

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विशेषज्ञों के अनुसार मछली पालन में अधिक कमाई के लिए किसानों को फीड आधारित मछली पालन की विधि को अपनाना चाहिए। इस तरीके से मछलियों की अच्छी बढ़त के साथ ही वजन भी बढ़िया होता है। यदि मछली की ग्रोथ और वजन बढ़िया हो तो किसान की तगड़ी कमाई भी निश्चित है। प्रचलित मान से किसान को एक लाख रुपए के मछली के बीज पर पांच से छह गुना ज्यादा लाभ मिल सकता है। किसान बाजार में अच्छी मांग वाली मछलियों का पालन कर भी अपनी नियमित कमाई में यथेष्ठ वृद्धि कर सकते हैं। किसानों को पंगास या मोनोसेक्स तिलापिया प्रजाति की मछलियों का पालन करने की सलाह मत्स्य पालन के विशेषज्ञों ने दी है।

मत्स्य पालन की पूरी जानकारी (Fish Farming information in Hindi)

मत्स्य पालन की पूरी जानकारी (Fish Farming information in Hindi)

परंपरागत तरीके से किया गया मछली पालन भी आपकी कमाई को समय के साथ इतना बढ़ा सकता है, जो कि कई गाय और भैंस पालने से होने वाली बचत से कई गुना ज्यादा हो सकती है "  - चार्ल्स क्लोवर (लोकप्रिय कृषि वैज्ञानिक)

क्या है मछली पालन और कैसे हुई इसकी शुरुआत

मछली पालन में पानी की मदद से घर पर ही एक छोटा तालाब या पूल बनाकर मछलियां को बड़ा किया जाता है और उन्हें भोजन के रूप में बेचा जाता है या फिर खुद भी इस्तेमाल किया जाता है। एनिमल फूड प्रोडक्शन में मछली पालन सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली खेती में गिना जाता है, जिसके तहत अलग-अलग प्रजातियों की मछलियों की कृत्रिम रूप से ब्रीडिंग करवाई जाती है। मुख्यतः मछली पालन की शुरुआत रोमन एम्पायर से जुड़े हुए देशों में हुई थी ,परंतु जिस विधि से वर्तमान मछली पालन किया जाता है, उसकी शुरुआत चीन में हुई मानी जाती है। मछली के अंडे की मदद से आधुनिक तरीके के फार्म हाउस बनाकर 1733 में जर्मनी के कुछ किसानों ने भी आधुनिक मत्स्य पालन की नींव रखी थी और भारत में भी कुछ क्षेत्रों में वर्तमान समय में इसी प्रकार का मत्स्य पालन किया जाता है।

कैसे करें मछली पालन की शुरुआत :

वर्तमान में भारत में मछली पालन की कई अलग-अलग विधियां अपनायी जाती है।

  • मछली फार्म/फिश टैंक :

मछली पालन की शुरुआत के लिए सबसे पहले आपको एक मछली फार्म/फिश टैंक बनाना होगा। उसी जगह पर मछलियों को लंबे समय तक रखा जाता है। मछली फार्म एक बड़ा तालाब या पूल होता है, जिसमें पानी भर कर रखा जाता है और इसे पूरी तरीके से साफ पानी से ही भरा जाता है।

किसान भाइयों को ध्यान रखना होगा कि इस प्रकार के तालाबों में अलग-अलग तरह के उपकरण इस्तेमाल करने के लिए बीच में जगह का होना भी अनिवार्य है, साथ ही उस तालाब में पानी भरे जाने और निकालने के लिए ड्रेनेज की भी उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए, नहीं तो पानी के प्रदूषित होने की वजह से आपके तालाब में पनप रही मछलीयां पूरी तरीके से खत्म हो सकती है।

साथ ही पानी के प्रदूषण को रोकने के लिए आपको तालाब की ऊपरी सतह को बारिश के समय एक कवर से ढक कर रखना होगा, नहीं तो कई बार अम्लीय वर्षा होने की वजह से तालाब के पानी की अम्लता काफी बढ़ जाती है और इससे मछलियों की ग्रोथ पूरी तरीके से रुक सकती है।

  • मछली की प्रजाति का निर्धारण करना :

सबसे पहले किसान भाइयों को अपने आस पास के मार्केट में मांग के अनुसार मछली की प्रजाति का चयन करना होगा। वर्तमान में भारत में रावस (Rawas or Indian Salmon) तथा कतला (katla) के साथ ही तिलापिया (Tilapia) और कैटफिश (Catfish) जैसी प्रजातियां बहुत ही तेजी से वृद्धि करके बचत देने वाली प्रजातियों में गिनी जाती है। यदि आप अपने घर के ही किसी एरिया में मछली फार्म बनाकर उत्पादन करना चाहते हैं तो कतला और तिलपिया मछली को सबसे अच्छा माना जाता है।

पिछले एक दशक से भारत का बाजार विश्व में पानी से उत्पादित होने वाले एनिमल फूड में सर्वश्रेष्ठ माना जाता रहा है और अभी भी विश्व निर्यात में भारत पहले स्थान पर आता है।

  • फिश फार्मिंग करने की लोकप्रिय विधियां :

वर्तमान में भारत में एकल प्रजाति मछली पालन और क्लासिकल तरीके से मछली की खेती की जाती है।

एकल प्रजाति विधि :

एकल प्रजाति विधि में फिश फार्म में लंबे समय तक केवल एक ही प्रजाति की मछलियों को रखना होगा, यदि आप एक नए किसान भाई है तो इस विधि को ही अपनाना चाहिए क्योंकि इसमें अलग-अलग प्रजाति की मछलियां ना होने की वजह से आपको कम ध्यान देने की जरूरत होगी, जिससे कि व्यापार में नुकसान होने की संभावना कम रहेगी।

क्लासिकल तरीके से मछली की खेती :

दूसरी विधि के तहत पांच से दस प्रकार की अलग-अलग प्रजातियों को एक ही जगह पर बड़ा किया जाता है।

इस विधि में किसान भाइयों को ध्यान रखना होगा कि अलग-अलग मछलियों की भोजन और दूसरी आवश्यकता भी अलग-अलग होती है, इसलिए अपने फिश फार्म निरंतर निगरानी करते रहना होगा।

वर्तमान में मछलियों के अंडे को बड़ा करके भी कई युवा किसान भाई मछली पालन कर रहे हैं, परंतु इसके लिए आपको कई प्रकार की वैज्ञानिक विधियों की आवश्यकता होगी जो कि एक नए किसान के लिए काफी कठिन हो सकती है।

  • मछली पालन के लिए कैसे प्राप्त करे लाइसेंस :

मछली पालन के लिए भारत के कुछ राज्यों में सरकारी लाइसेंस की आवश्यकता होती है। इसके बिना उत्पादन करने पर आपको भारी दंड भी भरना पड़ सकता है। आंध्र प्रदेश,तमिलनाडु और केरल राज्य सरकार ने इस प्रकार के प्रावधान बनाए है।

इस लाइसेंस की जानकारी आप अपने राज्य सरकार के कृषि मंत्रालय के मछली विभाग की वेबसाइट पर जाकर ले सकते है।

अलग-अलग राज्यों ने मछली उत्पादन के दौरान होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव और नियंत्रण के लिए कई प्रकार के कानून भी बना रखे है, क्योंकि मछली पालन के दौरान काफी ज्यादा वेस्ट उत्पादित होता है, जिसे मुर्गी पालन के दौरान उत्पादित होने वाले वेस्ट के जैसे खाद के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना कम होती है।

  • मछली पालन के लिए कैसे करें सही जगह का चुनाव :

यदि आप बड़े स्तर पर मछली पालन करना चाहते हैं, तो आपको एक खुली और समतल जगह का चुनाव करना होगा और वहां पर ही मछली फार्म के लिए छोटे छोटे तालाब बनाने होंगे।

इस प्रकार के तालाब दोमट मिट्टी वाली समतल जमीन में बनाए जाएं, तो उनकी उत्पादकता सबसे प्रभावी रूप से सामने आती है।

अलग-अलग प्रजाति के लिए तालाब के आकार और डिजाइन में भी अंतर रखा जाता है, जैसे कि कैटफिश प्रजाति ज्यादातर तालाब के नीचे के हिस्से में ही रहती है इसीलिए इस प्रकार की प्रजाति के उत्पादन के लिए तालाब को ऊपर की तुलना में नीचे की तरफ ज्यादा बड़ा और चौड़ा रखा जाता है।

  • मत्स्य पालन में कौन-कौन से उपकरणों की होगी आवश्यकता :

यह बात तो किसान भाई जानते ही हैं, कि किसी भी प्रकार की खेती के लिए अलग-अलग उपकरण और सामग्री की आवश्यकता होती है, वैसे ही मछली पालन के लिए भी कुछ उपकरण जरूरी होंगे।

जिनमें सबसे पहले एक पंप (pump) को शामिल किया जा सकता है, क्योंकि कई बार पानी पूरी तरीके से साफ ना होने पर उस में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे कि मछलियों को अपने गलफड़ों से सांस लेने में तकलीफ होने लगती है, इसके लिए आपको पम्प की मदद से ऊपर की वातावरणीय हवा को पानी में भेजना होगा, ऐसा करने से मछलियों की वृद्धि काफी तेजी से होगी और उनके द्वारा खाया गया खाना भी पूरी तरीके से उनकी वृद्धि में ही काम आ पाएगा।

दूसरे उपकरण के रूप में एक पानी शुद्धिकरण (Water Purification) सिस्टम का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, इसके लिए कुछ किसान पानी को समय-समय पर तालाब से बाहर निकाल कर उसे फिर से भर देते है वहीं कुछ बड़े स्तर पर मछली पालन करने वाले किसान वैज्ञानिक उपकरणों की मदद से अल्ट्रावायलेट किरणों का इस्तेमाल कर पानी में पैदा होने वाले हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं।

यदि आप घर से बाहर बने किसी प्राकृतिक तालाब में मछली पालन करना चाहते हैं, तो वहां से मछलियों को बाहर निकलने से रोकने के लिए बड़े जाली से बने हुए नेट का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके अंदर मछलियों को फंसा कर बाहर निकालकर बाजार में बेचा जा सकता है।

वर्तमान में तांबे की धातु से बने हुए नेट काफी चर्चा में है, क्योंकि इस प्रकार के नेट को समय-समय पर तालाब में घुमाते रहने से वहां पर पैदा होने वाले कई हानिकारक जीवाणुओं के साथ ही शैवाल का उत्पादन भी पूरी तरीके से नष्ट हो सकता है और पानी में डाला गया भोजन पूरी तरह से मछलियों की द्वारा ही काम में लिया जाता है।

  • कैसे डालें मछलियों को खाना :

मछली उत्पादन की तेज वृद्धि के लिए आपको लगभग एक पाउंड वजन की मछलियों को 2 पाउंड वजन का खाना खिलाना होता है। यह खाना बाजार में ही कई कंपनी के द्वारा बेचा जाता है, इस खाने में डेफनिया (Defnia) , टुबीफेक्स (Tubifex) और ब्लडवॉर्म (Bloodworm) का इस्तेमाल किया जाता है।

इस खाने की वजह से मछलियों में कैल्शियम,फास्फोरस और कई प्रकार के ग्रोथ हार्मोन की कमी की पूर्ति की जा सकती है। यह खाना मछलियों के शरीर में कार्बोहाइड्रेट की कमी को पूरा करने के अलावा प्रोटीन के स्तर को भी बढ़ाते है, जिससे उनका वजन बढ़ने के अलावा अच्छी क्वालिटी मिलने की वजह से बाजार में मांग भी तेजी से बढ़ती है और किसानों को होने वाला मुनाफा भी अधिक हो सकता है।

किसान भाई ध्यान रखें कि मछली फार्म में मछलियों को दिन में 2 बार ही खाना खिलाना होता है, इससे कम या ज्यादा बार खिलाने की वजह से उनकी मस्क्युलर (Muscular) ग्रोथ पूरी तरीके से रुक सकती है।

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मछली पालन में कितनी हो सकती है लागत ?

मछली पालन के दौरान होने वाली लागत का निर्धारण अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्तर पर किया जाता है, क्योंकि कई जगह पर तालाब में डालने के लिए काम में आने वाली छोटी मछलियों की कीमत काफी कम होती है, उसी हिसाब से वहां पर आने वाली लागत भी कम हो जाती है। भारत के पशुपालन मंत्रालय और मछली विभाग (मत्स्यपालन विभाग - DEPARTMENT OF FISHERIES) की तरफ से जारी की गई एक एडवाइजरी के अनुसार, एक बीघा क्षेत्र में मछली फार्म स्थापित करके पूरी तरीके से मछली उत्पादन करने के दौरान, लगभग दस लाख रुपए तक का खर्चा आ सकता है। अलग-अलग राज्यों में इस्तेमाल में होने वाले अलग उपकरणों और लेबर के खर्चे को मिलाकर यह लागत सात लाख रुपए से लेकर बारह लाख रुपए तक हो सकती है।

मछलियों में होने वाली बीमारियां और इनका इलाज

अलग-अलग प्रजाति की मछलियों को बड़ा होने के लिए अलग प्रकार के पर्यावरणीय कारकों की आवश्यकता होती है कई बार दिन ही पर्यावरणीय कारकों की कमी से और संक्रमण तथा दूसरी समस्याओं की वजह से मछलियों में कई तरह की बीमारियां देखने को मिलती है जिनमें कुछ बीमारियां और उनके इलाज की जानकारी निम्न प्रकार है :-

  • लाल घाव रोग (Epizootic ulcerative disease syndrome) :

इस रोग से संक्रमित मछली के शरीर के आंतरिक हिस्सों में जगह-जगह पर घाव हो जाते हैं और एक बार यदि एक मछली इस रोग से संक्रमित हो जाए तो इसका संक्रमण सभी मछलियों में फैल सकता है, यहां तक कि अलग प्रजातियां भी इस रोग की चपेट में आ जाती है।

लाल घाव बीमारी के पीछे कई प्रकार के कारक जैसे कि जीवाणु, फंगस और विषाणु को जिम्मेदार माना जाता है। संक्रमण फैलने के 1 से 2 दिन के बाद ही मछलियों की मृत्यु होना शुरू हो जाती है।

इस रोग का इलाज करने के लिए आपको अपने तालाब में चूने का मिश्रण बनाकर एक सप्ताह के अंतराल के साथ छिड़काव करना होगा।

हालांकि अभी इसके उपचार के लिए भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने एक औषधि भी तैयार की है, जिसे 'सीफैक्स' ब्रांड नाम से बाजार में भी बेचा जा रहा है। इस औषधि का इस्तेमाल प्रति हेक्टेयर क्षेत्र के आधार पर एक लीटर की दर से किया जा सकता है।

यदि औषधि के छिड़काव के 5 से 6 दिन बाद भी मछलियों की मृत्यु जारी रहे,तो तुरंत किसी पशु चिकित्सक से सलाह लेना ना भूलें।

  • ड्राप्सी रोग(Dropsy Disease) :

यह रोग मुख्यतया कैटफ़िश प्रजाति की मछलियों में देखा जाता है, इस रोग से ग्रसित होने के बाद मछली के शरीर का आकार पूरी तरह असंतुलित हो जाता है और उसके सिर की तुलना में धड़ का आकार बहुत ही छोटा और पतला रह जाता है, जिससे मछली की आगे की ग्रोथ भी पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।

ड्रॉप्सी रोग की वजह से शरीर की अंदरूनी गुहा में पानी का जमाव होने लगता है, जोकि एक बिना संक्रमित मछली में गलफड़ों के जरिए बाहर निकल जाना चाहिए था।

इस रोग के इलाज के लिए किसान भाइयों को अपने तालाब में पानी की साफ सफाई का पूरा ध्यान रखना होगा और मछलियों को पर्याप्त मात्रा में भोजन देना होगा।

ऊपर बताई गई चूने की विधि का इस्तेमाल इस रोग के इलाज के लिए भी किया जा सकता है, बस छिड़काव के बीच का अंतराल 15 दिन से अधिक रखें।

  • मछलियों के शरीर में ऑक्सीजन की कमी (Hypoxia) :

मछलियां अपने गलफड़ों की मदद से पानी में घुली हुई ऑक्सीजन का इस्तेमाल करती है परन्तु यदि किन्हीं भी कारणों से जल प्रदूषण बढ़ता है तो उस में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे मछलियों के लिए काम में आने वाली ऑक्सीजन भी स्वतः ही कम हो जाती है।

मुख्यतया ऐसी समस्या मानसून काल और गर्मियों के दिनों में नजर आती है परंतु कभी-कभी सर्दियों के मौसम में भी प्रातः काल के समय मछलियों के लिए ऐसी दिक्कत हो सकती है।

इसके इलाज के लिए मछलियों को दिए जाने वाले भोजन को थोड़ा कम करना होगा और पंप की सहायता से बाहर की पर्यावरणीय वायु को अंदर प्रसारित करना होगा, जिससे कि जल में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा को एक अच्छे स्तर पर पुनः पहुंचाया जा सके।

  • अमोनिया पॉइजनिंग :

जब भी किसी फिश टैंक को शुरुआत में स्थापित किया जाता है और उसमें एकसाथ ही सही अधिक मात्रा में मछलियां लाकर डाल दी जाती है तो उस पूरे टैंक में अमोनिया की मात्रा काफी बढ़ सकती है।

ऐसी समस्या होने पर मछलियों के गलफड़े लाल आकार के हो जाते है और उन्हें सांस लेने में बहुत ही तकलीफ होने लगती है।

इससे बचाव के लिए समय-समय पर पानी को बदलते रहना होगा और यदि आप एक साथ इतने पानी की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं तो कम से कम उस टैंक में भरे हुए 50% पानी को तो बदलना ही होगा।

इसके अलावा अमोनिया स्तर को और अधिक बढ़ने से रोकने के लिए मछलियों को सीमित मात्रा में खाना खिलाना चाहिए और अपने टैंक में मछलियों की संख्या धीरे-धीरे ही बढ़ानी चाहिए।साथ ही बिना खाए हुए खाने को तुरंत बाहर निकाल देना होगा, इसके अलावा पानी की गुणवत्ता की भी समय-समय पर जांच करवानी होगी।

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मछली पालन की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी :

अपने ग्राहकों तक सही समय और सही मात्रा में मछलियां पहुंचाने के अलावा अच्छे मुनाफे के लिए आपको एक बेहतर मार्केटिंग स्ट्रेटजी की आवश्यकता होगी। इसके लिए, संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्थान (Food and Agriculture Organisation of United Nations) ने एक एडवाइजरी जारी की है, इस एडवाइजरी के अनुसार एक बेहतर मार्केट पकड़ बनाने के लिए आपको कुछ बातों का ध्यान रखना होगा, जैसे कि:

  • प्राइमरी मार्केट में केवल उसी विक्रेता को अपनी मछलियां बेचें, जो सही कीमत और तैयार की गई मछलियों की निरंतर खरीदारी करता हो।
  • किसान भाइयों को ध्यान रखना होगा कि अपने द्वारा तैयार की गई मछलियों की अंतिम बाजार कीमत की तुलना में लगभग 65% तक मुनाफा मिल रहा हो।

जैसे कि यदि एक किलो मछली की वर्तमान बाजार कीमत 400 रुपए है, तो आपको लगभग 330 रुपए प्रति किलोग्राम से कम कीमत पर अपनी मछली नहीं बेचनी चाहिए।

  • यदि बाजार में मांग अधिक ना हो और आपके टैंक की मछलियां पूरी तरीके से बिकने के लिए तैयार है तो उन्हें एक कोल्ड स्टोरेज हाउस में ही संरक्षित करना चाहिए।

इसके लिए भारत सरकार के उपभोक्ता (Consumer) मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले वेयरहाउस डिपॉजिटरी (Warehouse Depository) संस्थान या फिर फ़ूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया (Food Corporation of India - FCI) के साथ जुड़े हुए कुछ कोल्ड स्टोरेज (Cold Storage) हाउस में भी संरक्षित कर सकते है।

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इसके लिए कंजूमर मंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर अपने आसपास में स्थित किसी ऐसे ही कोल्ड स्टोरेज हाउस की जानकारी लेनी होगी।

  • संयुक्त राष्ट्र की FAO संस्थान के द्वारा ही किए गए एक सर्वे में पाया गया कि भारतीय मत्स्य किसानों को लगभग 56% मुनाफा ही देय किया जाता है और 44% मुनाफा बिचौलिये अपने पास रख लेते हैं।

अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए आप अलग-अलग बिचौलियों से संपर्क कर सकते है या फिर सरकार के राष्ट्रीय कृषि बाजार E-NAM (National Agriculture Market - eNAM) प्रोजेक्ट के तहत सीधे ही खरीदार से संपर्क कर, अपनी मछलियों को भारत के किसी भी हिस्से में बेच सकते हैं।

  • मछलियों के टैंक में बड़ा होते समय उनके खानपान का पूरा ध्यान रखना चाहिए, जिससे कि वजन भी अच्छा बढ़ेगा साथ ही प्रोटीन की मांग रखने वाले युवा लोगों के मध्य आप के फार्म हाउस की लोकप्रियता भी बढ़ेगी।
  • अपने लोकल मार्केट में मछलियों को बेचने के लिए आप एक वेबसाइट का निर्माण करवा सकते हैं, जिसमें ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा उपलब्ध करवाकर डायरेक्ट डिलीवरी भी कर सकते हैं।

यदि आपके क्षेत्र में दूसरा प्रतिस्पर्धी नहीं है तो आसानी से आपकी सभी मछलियों को अपने इलाके में ही बेचा जा सकता है।

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मछली पालन में योगदान के लिए कुछ सरकारी स्कीम और उनके तहत मिलने वाली सब्सिडी :

भारत में मत्स्य पालन करने वाले किसानों की आय को बढ़ाने के लिए अपने संकल्प के तौर पर साल 2019 में ही, भारत सरकार ने मत्स्य पालन के लिए अलग से एक विभाग की स्थापना भी की है और इसी के तहत कुछ नई सरकारी स्कीमों की भी शुरुआत की है, जो कि निम्न प्रकार है :

 मछली उत्पादन के लिए लाई गई नील क्रांति के पहले फेज में अच्छी सफलता मिलने के बाद अब इसी का अगला फेस शुरू किया गया है। इस स्कीम के तहत यदि आप सामान्य कैटेगरी में आते हैं तो आपको अपने प्रोजेक्ट में लगने वाली कुल आय का लगभग 40% सब्सिडी के तौर पर दिया जाएगा, वहीं अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए सब्सिडी को 60% रखा गया है।

इस स्कीम का उद्देश्य मछली उत्पादन के अलग-अलग क्षेत्र में काम कर रहे अलग-अलग प्रकार के किसानों को सब्सिडी प्रदान करना है। इस स्कीम के तहत यदि आप एक नया फिश टैंक बनाते है और उस पर तीन लाख रुपए तक की लागत आने तक 20% सब्सिडी दी जाती है, वहीं अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए 25% सब्सिडी रखी गई है। यदि आप अपने पुराने टैंक को पुनर्निर्मित कर उसे मत्स्य पालन में इस्तेमाल करने योग्य बनाना चाहते हैं तो भी आपको यह सब्सिडी मिल सकती है।

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कुछ समय पहले ही भारत सरकार ने कृषि से जुड़े किसानों को मिलने वाले किसान क्रेडिट कार्ड की पहुंच को अब मत्स्य पालन के लिए भी बढ़ा दिया है और इसी क्रेडिट कार्ड की मदद से अब मछली पालन करने वाले किसान भी आसानी से कम ब्याज दर पर लोन दिया जा सकेगा। यदि आप दो लाख रुपए तक का लोन लेना चाहते हैं तो आपको 7% की ब्याज दर चुकानी होगी, जिसमें समय-समय पर सरकार के द्वारा रियायत भी दी जाती है। किसान भाइयों को ध्यान रखना होगा, कि एक बार यह क्रेडिट कार्ड मिल जाने पर आपको किसी भी प्रकार के संसाधन को गिरवी रखने की जरूरत नहीं होती है और बिना अपनी पूंजी दिखाए आसानी से 3 लाख रुपए का लोन ले पाएंगे।

पिछले 2 से 3 वर्षों में भारत के मछली उत्पादक किसानों ने 2020 में लांच हुई प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मिलने वाली सब्सिडी का काफी अच्छा फायदा उठाया है। इस स्कीम के तहत अनुसूचित जाति और महिलाओं को मत्स्य पालन करने के लिए बनाए गए पूरे सेटअप पर आने वाले खर्चे का लगभग 60% सब्सिडी के तौर पर दिया जाता है, वहीं सामान्य केटेगरी से आने वाले किसानों को 40% सब्सिडी मिलेगी। इस स्कीम से जुड़ने के लिए आपको अपना आधार कार्ड और मूल निवास प्रमाण पत्र के साथ ही बैंक पासबुक की एक प्रति और जाति प्रमाण पत्र के साथ भारत सरकार के ही अंत्योदय सरल पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रेशन करवाना होगा या फिर आप अपने आसपास ही स्थित मछली विभाग के स्थानीय ऑफिस में जाकर भी इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत लांच की गई इस स्कीम के अंतर्गत किसानों की आय को दोगुना करने के अलावा मछली उत्पादन के बाद उसे बाजार तक पहुंचाने में आने वाली लागत को भी 30% तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है।

और अधिक जानकारी के लिए, भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट को देखें : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मात्स्यिकी विभाग मत्स्य पालन विभाग (Department of Fisheries) - PMMSY


आशा करते है कि Merikheti.com के द्वारा दी गई जानकारी के साथ ही सरकार के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की मदद से आप भी मत्स्य पालन कर अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे और मछली उत्पादन में भारत को विश्व में श्रेष्ठ स्थान दिलाने में भी कामयाब हो पाएंगे।

सहफसली तकनीक से किसान अपनी कमाई कर सकते हैं दोगुना

सहफसली तकनीक से किसान अपनी कमाई कर सकते हैं दोगुना

किसानों को परंपरागत खेती में लगातार नुकसान होता आ रहा है, जिसके कारण जहाँ किसानों में आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही है, वहीं किसान खेती से विमुख भी होते जा रहे हैं. इसको लेकर सरकार भी चिंतित है. लगातार खेती में नुकसान के कारण किसानों का खेती से मोहभंग होना स्वभाविक है, इसी के कारण सरकार आर्थिक तौर पर मदद करने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है. सरकार की तरफ से किसानों को खेती में सहफसली तकनीक (multiple cropping or multicropping or intercropping) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. विशेषज्ञों की मानें, तो ऐसा करने से जमीन की उत्पादकता बढ़ती है, साथ ही एकल फसली व्यवस्था या मोनोक्रॉपिंग (Monocropping) तकनीक की खेती के मुकाबले मुनाफा भी दोगुना हो जाता है.


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सहफसली खेती के फायदे

परंपरागत खेती में किसान खरीफ और रवि के मौसम में एक ही फसल लगा पाते हैं. किसानों को एक फसल की ही कीमत मिलती है. जो मुनाफा होता है, उसी में उनकी मेहनत और कृषि लागत भी होता है. जबकि, सहफसली तकनीक में किसान मुख्य फसल के साथ अन्य फसल भी लगाते हैं. स्वाभाविक है, उन्हें जब दो या अधिक फसल एक ही मौसम में मिलेगा, तो आमदनी भी ज्यादा होगी. किसानों के लिए सहफसली खेती काफी फायदेमंद होता है. कृषि वैज्ञानिक लंबी अवधि के पौधे के साथ ही छोटी अवधि के पौधों को लगाने का प्रयोग करने की सलाह किसानों को देते हैं. किसानों को सहफसली खेती करनी चाहिए, ऐसा करने से मुख्य फसल के साथ-साथ अन्य फसलों का भी मुनाफा मिलता है, जिससे आमदनी दुगुनी हो सकती है.


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धान की फसल के साथ लगाएं कौन सा पौधा

सहफसली तकनीक के बारे में कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर दयाशंकर श्रीवास्तव सलाह देते हैं, कि धान की खेती करने वाले किसानों को खेत के मेड़ पर नेपियर घास उगाना चाहिए. इसके अलावा उसके बगल में कोलस पौधों को लगाना चाहिए. नेपियर घास पशुपालकों के लिए पशु आहार के रूप में दिया जाता है, जिससे दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ता है और उसका लाभ पशुपालकों को मिलता है, वहीं घास की अच्छी कीमत भी प्राप्त की जा सकती है. बाजार में भी इसकी अच्छी कीमत मिलती है.


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गन्ना, मक्की, अरहर और सूरजमुखी के साथ लगाएं ये फसल

पंजाब हरियाणा और उत्तर भारत समेत कई राज्यों में किसानों के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है और इसका कारण लगातार खेती में नुकसान बताया जाता है. इसका कारण यह भी है की फसल विविधीकरण नहीं अपनाने के कारण जमीन की उत्पादकता भी घटती है और साथ हीं भूजल स्तर भी नीचे गिर जाता है. ऐसे में किसानों के सामने सहफसली खेती एक बढ़िया विकल्प बन सकता है. इस विषय पर दयाशंकर श्रीवास्तव बताते हैं कि सितंबर से गन्ने की बुवाई की शुरुआत हो जाएगी. गन्ना एक लंबी अवधि वाला फसल है. इसके हर पौधों के बीच में खाली जगह होता है. ऐसे में किसान पौधों के बीच में लहसुन, हल्दी, अदरक और मेथी जैसे फसलों को लगा सकते हैं. इन सबके अलावा मक्का के फसल के साथ दलहन और तिलहन की फसलों को लगाकर मुनाफा कमाया जा सकता है. सूरजमुखी और अरहर की खेती के साथ भी सहफसली तकनीक को अपनाकर मुनाफा कमाया जा सकता है. कृषि वैज्ञानिक सह्फसली खेती के साथ-साथ इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) यानी ‘एकीकृत कृषि प्रणाली’ की भी सलाह देते हैं. इसके तहत खेतों के बगल में मुर्गी पालन, मछली पालन आदि का भी उत्पादन और व्यवसाय किया जा सकता है, ऐसा करने से कम जगह में खेती से भी बढ़िया मुनाफा कमाया जा सकता है.
इस सरकारी योजना में मिलता है गजब का फायदा, 50% तक का मिलता है किसानों को अनुदान

इस सरकारी योजना में मिलता है गजब का फायदा, 50% तक का मिलता है किसानों को अनुदान

किसानों को इस योजना से गजब का फायदा मिलता है। जो किसान सिंचाई कि समस्या से परेशान है उनके लिए यह योजना बड़ा ही कारगर साबित होने वाला है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा इस योजना के माध्यम से किसानों के सिंचाई की समस्या से समाधान निकालने के लिए जोर दिया जा रहा है। पूरे भारतवर्ष में कृषि के मामले में किसानों को बेहतर मुनाफा अर्जित करने के लिए सरकार द्वारा लगता नए-नए योजनाओं को धरातल पर लागू कराने के लिए प्रयास किया जा रहा है। सरकार किसानों के बेहतर भविष्य के लिए चिंतित है। सरकार ने किसानों के सिंचाई को समस्या को देखते हुए इस योजना का शुभारंभ किया है। इस योजना का नाम खेत तालाब योजना (Khet Talab Yojna; Farm Pond Scheme) है। खेत तालाब योजना के माध्यम से किसानों को सिंचाई के समस्या से वंचित कराना है। खेती करने के लिए किसान को जल की आवश्यकता होती है। जल के द्वारा ही उगाए जा रहे फसलों की सिंचाई की जाती है। बहुत सारे किसान सिंचाई के लिए आवश्यक जल का उपयोग ट्यूबवेल और अन्य साधनों से करते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार किसानों के लिए खेत तालाब योजना लाकर के किसानों को सिंचाई की समस्या से उबारने का भरपूर प्रयास कर रही है।

क्या है खेत तालाब योजना

इस योजना के अंतर्गत किसानों के खेतों में एक छोटे से भाग में तालाब का निर्माण कराया जा रहा है, जिसमें बारिश के पानी को एकत्रित किया जाएगा, इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को सिंचाई के समस्या से उबारना है। खेतिहर जमीन में तालाब निर्माण के लिए किसानों को अनुदान भी दिया जाता है, अपने जमीन के भूभाग में किसान तालाब का निर्माण करा करके इसमें
मछली का पालन भी कर सकते हैं। इससे किसानों को सिंचाई की समस्या से वंचित होने के साथ-साथ ट्यूबवेल में लगने वाली किसानों की लागत भी कम हो जाती है। [embed]https://twitter.com/UPGovt/status/1285431902313144320[/embed]


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सरकार के द्वारा दिया जाता है इतना प्रतिशत का अनुदान

इस योजना का सबसे बेहतर फायदा यह है कि सरकार के द्वारा 50% अनुदान दिया जाता है, यानी आपके लागत का आधा सरकार खुद आपको देती है। खेतिहर जमीन में तालाब बनाने के लिए लगभग ₹100000 का खर्चा आता है, जिसमें ₹50000 इस योजना के अंतर्गत सरकार के द्वारा आपको तालाब के निर्माण के लिए मिल सकता है। अगर आप इस योजना का लाभ लेना चाहते है तब। वही बड़े तालाब के निर्माण के लिए 2 से ढाई लाख रुपए का खर्चा आता है, जिसमें आधी रकम सरकार के द्वारा आप को अनुदान के रूप में दिया जाता है। अभी तक उत्तर प्रदेश के सरकार ने इस योजना के अंतर्गत लगभग दो हजार से ज्यादा तालाबों का निर्माण करवाया है। जिसमें 50 प्रतिशत की राशि सरकार के द्वारा किसानों को तालाब निर्माण के लिए अनुदान के रूप में दिया गया है।

खेत तालाब योजना से किसानों को मिलेंगे ये लाभ :

यह योजना किसानों के लिए बहुत ही लाभप्रद है। खेत तालाब योजना का किसान अगर लाभ लेते हैं, तो इससे सबसे बेहतर फायदा यह है कि जल संरक्षण को पूर्ण रूप से बढ़ावा मिलेगा। किसानों को सच्चाई की समस्या जो उत्पन्न होती है, उसका निवारण अपने ही जमीन में निर्माण कराए गए तालाब के द्वारा आसानी से हो जाएगा। साथ ही साथ किसान को एक बेहतर फायदा यह मिलेगा कि निर्माण कराए गए तालाब में वह मछली का पालन आसानी से कर पाएंगे और उससे भी मुनाफा अर्जित करने में सक्षम हो पाएंगे। इस योजना का लाभ लेने के लिए किसानों के लिए तत्काल ऑनलाइन अप्लाई करने की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। अब किसानों को इस योजना का लाभ लेने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने नहीं पड़ेंगे। इस योजना का लाभ लेने के लिए सबसे पहले आपको उत्तर प्रदेश का स्थाई निवासी होना अनिवार्य माना गया है। वहीं दूसरी तरफ अगर आप पहले से ही किसी तालाब योजना का लाभ ले रहे हैं, तो इस योजना का लाभ आपको प्राप्त नही होगा। अगर आप एक रजिस्टर्ड किसान है तो इस योजना का लाभ ले पाएंगे। अब अगर आप इस योजना का लाभ लेना चाहते है और सिंचाई की समस्या से वंचित होकर उगाए गए फसलों पर अधिक लाभ कमाना चाहते है, तो आपको जल्द ही इसे ऑनलाइन अप्लाई करना चाहिए। इसके लिए उपयुक्त दस्तावेज होना अनिवार्य है, जिसमें जाति प्रमाण पत्र आधार कार्ड बैंक खाते का विवरण स्थानीय निवास प्रमाण पत्र मोबाइल नंबर और खाते का दस्तावेज होना अनिवार्य माना गया है। खेत तालाब योजना आवेदन के लिए आप यूपी कृषि विभाग पारदर्शी किसान सेवा योजना की वेबसाइट पर जाएँ:  https://upagripardarshi.gov.in/Index-hi.aspx पारदर्शी सेवा वेबसाइट के होम पेज पर आप उपर मीनू में " योजनायें > मुद्रा एवं जल सरंक्षण > राज्य प्रायोजित विकल्प " पर क्लिक करें। तो देर ना करें जल्दी इस योजना का लाभ लेने के लिए ऑनलाइन अप्लाई करें और इस योजना का बेहतर लाभ ले करके अपने आय को खेती के माध्यम से दुगुना करें।
किसानों को हेमंत सरकार का मरहम

किसानों को हेमंत सरकार का मरहम

झारखंड में बारिश उम्मीद से कम हुई, नतीजा यह हुआ कि खेत में लगी फसल चौपट हो गई। किसान बारिश की उम्मीदों में रह गए, बारिश हुई नहीं और किसान फिर एक साल पीछे चला गया। फौरी तौर पर बीते दिनों हेमंत सोरेन की सरकार ने प्रति किसान 3500 रुपये की सहायता राशि देने का ऐलान किया है।


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24 में से 22 जिले सूखा प्रभावित

बारिश के होने या न होने की पुख्ता सूचना आज भी इंसान नहीं दे पाता है। उसे आसमान की तरफ देखना ही पड़ता है, झारखंड जैसे राज्य में यही हो रहा है। सितंबर से अक्टूबर तक जितनी बारिश की उम्मीद थी। उतनी हुई नहीं, नतीजा यह हुआ कि जो फसल खेत में लगी थी, वह या तो मुरझा गईं या फिर कुपोषण का शिकार होकर रह गईं। झारखंड के 24 में से 6 से 7 जिले ऐसे थे, जहां बारिश ज्यादा हो गई। ज्यादा बारिश होने के नाते भी फसलें मार खा गईं। किसानों की इस तकलीफ को सरकार ने गंभीरता से देखा और सूखा घोषित करने के लिए एक टीम बनाई। जिसने वस्तुस्थिति का आंकलन कर अपनी रिपोर्ट दे दी है। सूखा घोषित करने के जो पैमाने हैं, उनके अनुसार 24 में से 22 जिले सूखा प्रभावित घोषित किये गए।


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प्रति किसान 3500 रुपये का मुआवजा

बीते दिनों मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कैबिनेट की मीटिंग की और उस मीटिंग में यह फैसला किया, कि सरकार किसानों को यूं ही परेशान नहीं होने देगी। सरकार ने तय किया कि हर किसान को 3500 रुपये दिये जाएंगे. इससे उनका दुख थोड़ा तो कम होगा। हाल के दिनों में झारखंड की सिंचाई परियोजनाओं को लेकर भी मुख्यमंत्री चिंतित दिखे। वह हर खेत को पानी पहुंचाना चाहते हैं, पर यह अकेले राज्य सरकार के बूते की बात नहीं। इसमें केंद्र को सहयोग करना ही पड़ेगा।

पोखरे बनाने के लिए अनुदान

सूत्रों के अनुसार, इस संबंध में कई बार केंद्रीय कृषि मंत्री से पत्राचार भी किया गया पर केंद्र से बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं मिला। यह मान कर लोग चल रहे हैं कि किसानों के बारे में बात करना और किसान की योजनाओं को झारखंड की धरती पर उतारना दो अलग बातें हैं। शायद यही कारण था, कि जब केंद्र से झारखंड सरकार को मुकम्मल जवाब नहीं मिला तो झारखंड सरकार ने खुद ही कमर कस लिया। अब एक योजना का प्रारूप तैयार किया जा रहा है, इस योजना के तहत सरकार छोटे-छोटे पोखरों के लिए अनुदान की व्यवस्था करेगी। शर्त यह होगी कि इन पोखरों से सिर्फ सिंचाई और मछली पालन ही किया जाएगा।


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अभी यह योजना शुरूआती दौर में है, मान कर चलें कि दिसंबर के आखिरी तक यह तैयार हो जाएगी। अगर ऐसा हो गया तो, किसानों को थोड़ी राहत तो होगी ही, जो किसान बरसात के लिए आसमान की तरफ टकटकी लगाए देखता रहता है। वह सामान्य दिनों में होने वाली बारिश के जल को उस पोखरे में सहेज कर तो रख सकेगा। आने वाले दिनों में पंपिंग सेट की मदद से उस पोखरे के पानी से सिंचाई भी की जा सकती है, सरकार ने इस दिशा में कदम तो बढ़ा दिये हैं। देखते चलें, कब तक इस पर प्रभावी ढंग से अमल हो पाता है।
मछली पालें, धन कमाएं

मछली पालें, धन कमाएं

आप अगर बिजनेस में रुचि लेते हैं, तो मछली पालन एक बढ़िया विकल्प है। आप खेती के साथ-साथ मछली पालन कर बढ़िया आय प्राप्त कर सकते हैं। बस, थोड़ी मेहनत बढ़ जाएगी, मछली पालन के थोड़े गुर सीखने होंगे और थोड़ी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी बनानी पड़ेगी।
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मछली पालन अब एक व्यवसाय बन चुका है, लोग इस काम को कर रहे हैं। जहां पोखरे-तालाब हैं, वहां तो यह काम हो ही रहा है, जहां नहीं हैं, वहां लोग तालाब-पोखरे खुदवा रहे हैं। यह गांव का सीवान हो सकता है, बीचों-बीच गांव में भी हो सकता है, शहर के किसी किनारे पर हो सकता है, माने, कहीं भी आप मछली पालन कर सकते हैं।

जरूरी क्या है

सबसे जरूरी है, एक तालाब या पोखरे का होना। मछली जल में ही रहती है तो, मछली को आप प्लास्टिक के पौंड में नहीं पाल सकते। उसके लिए आपको तालाब खुदवाना ही पड़ेगा। तालाब अगर 100 फुट गुने 100 फुट का है तो बेहतर, कम-ज्यादा भी चल सकता है।

किन मछलियों का पालन करें

अगर आप शॉर्ट टर्म के लिए मछली पालन करना चाहते हैं, तो आपके लिए रोहू, कतला, भाकुर, सिल्वर ग्रास, नैना जैसी प्रजातियां ठीक रहेंगी। ये वो मछलियां हैं, जो किसी भी वातावरण में पल जाती हैं, जी जाती हैं। अगर आप लॉंग टर्म के लिए मछली पालन करना चाहते हैं, तो आपको विदेशी मछलियों की तरफ रुख करना पड़ सकता है। उसके लिए आपके गांव या शहर की जयवायु अनुकूल होगी या नहीं, यह मतस्य विशेषज्ञ ही आपको बता सकेंगे।
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शुरुआत ऐसे करें

सबसे पहले आप पता करें कि बेस्ट क्वालिटी का जीरा (मछली का बीज) कहां मिलता है। राष्ट्रीय स्तर पर कई संस्थान हैं, जो मछली का जीरा तैयार करते हैं, इनमें एक संस्थान आंध्र प्रदेश में भी है। आपको जब तसल्ली हो जाए कि रेट और क्वालिटी के हिसाब से इस संस्थान या मार्केटिंग कंपनी का जीरा उत्तम है, तो उससे संपर्क करें। नमूने के एक एक सीमित संख्या में उसे मंगवा लें और मतस्य अधिकारी को जरूर दिखाएं, उनकी रजामंदी के बाद ही उसे इस्तेमाल करें।

जीरा डालना और चारे की व्यवस्था

मतस्य अधिकारी की संस्तुति के बाद आप तालाब में जीरा डाल दें, जीरा डालने के साथ ही आपको उनके लिए प्रचुर मात्रा में भोजन की व्यवस्था करनी होगी। कई लोग आटा भी खिला देते हैं, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। आप मछली को चारे में सरसों की खली और चावल के टुकड़े ही खिलाएं, बाकी मछलियां अपना भोजन तालाब से खुद ही ले लेती हैं।

साफ-सफाई

जिस तालाब में आप जीरा डाल रहे हैं, उसकी समय-समय पर साफ-सफाई बहुत जरूरी है, यह सफाई दो तरीके से करें। पहला, हर मछली पर नजर रखें, जो मछली मर जाए, उसे तुरंत बाहर निकाल फेंके अन्यथा वह तालाब की शेष मछलियों को भी प्रभावित कर देंगी। दूसरा, जब आपको तालाब के पानी का रंग हल्का धूसर या फिर हरा दिखने लगे, तब समस्त मछलियों को निकाल कर पूरा तालाब खाली कर दें और उसमें नया पानी डालें, ̣फिर मछलियों को उसमें डालें। पानी का रंग बदलने का अर्थ यह हुआ कि अब उसमें ऑक्सीजन की मात्रा कम हो गई, इससे मछलियां मर भी सकती हैं।

मछली तैयार होने में वक्त

जिस दिन आप मछली को तालाब या पोखरे में डाल कर भोजन की व्यवस्था करते हैं, उसके 30 दिनों के भीतर एक से सवा किलो वजन की मछली तैयार हो जाती है। यह आपके ऊपर निर्भर करता है, कि आप किस वजन की मछलियां चाहते हैं। आप जिस वजन की मछलियां चाहते हैं, उसके अनुरूप ही आपको वेट करना चाहिए।
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मोदी सरकार का काम

मोदी सरकार ने मछली पालन को एक कृषि से संबंधित व्यवसाय मान लिया है और केसीसी(किसान क्रेडिट कार्ड) में इसके लिए व्यवस्था की गई है। अर्थात, आप केसीसी का इस्तेमाल मछली पालन के लिए भी कर सकते हैं। आप एक बार में 1 लाख 60 हजार रुपये मछली पालन के लिए लोन ले सकते हैं।

बिक्री

मछली तो तैयार हो गई, अब इसे बेचें कहां, यह एक सवाल होता है। वेल, मछली बेचने के लिए आपको बस थोड़ा सा अपने मोबाइल की तरफ जाना होगा। डिलिशियस और बिग बास्केट जैसी कई कंपनियां हैं, जो सीधे आपके घर या तालाब से जिंदा मछली उठा कर ले जाएंगी और आपके खाते में 100 प्रतिशत पेमेंट ऑन द स्पॉट कर देंगी। तो, यह काम आप मोबाइल से कर सकते हैं, दूसरा तरीका यह है कि आप लोकल मार्केट में किसी मछली डीलर को पकड़ें। वह भी आपकी मछलियां तुरंत ले लेगा। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=2ysIRtt6xno[/embed]
छत्तीसगढ़ में मिला मछली पालन को कृषि का दर्जा, जाने किसानों के लिए कैसे है सुहाना अवसर

छत्तीसगढ़ में मिला मछली पालन को कृषि का दर्जा, जाने किसानों के लिए कैसे है सुहाना अवसर

छत्तीसगढ़ तालाबों और जलाशयों की भूमि है, इसलिए छत्तीसगढ़ में फसलों के साथ-साथ मछली पालन भी व्यवसाय एक अहम हिस्सा बन गया है। इसी के चलते हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार की एक घोषणा ने यहां पर मत्स्य पालन करने वाले लोगों को काफी राहत की सांस दी है। आंकड़ों की माने तो छत्तीसगढ़ भारत में मत्स्य पालन में आठवें नंबर पर आता है और माना जा रहा है, कि इस घोषणा के बाद इसके 6th नंबर पर आने की संभावना है। मछली पालन से यहां के लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो सकती हैं और इसे ही देखते हुए सरकार ने मत्स्य पालन को कृषि का दर्जा दिया है। प्रशासन की मानें तो यह है राज्य के लोगों को आर्थिक तौर पर मजबूत करने और उन्हें आजीविका के और साधन देने के लिए लिया गया एक बेहतरीन फैसला है।

अब मछली पालन में क्या होंगे फायदे

अब मछली पालन के लिए लोन लेने की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं, क्योंकि यहां पर कृषि की तरह ही बिना ब्याज के लोन देने का प्रावधान किया गया है। ऐसे में मछली पालन के व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा और साथ ही किसानों की आर्थिक समस्या का हल भी मिलेगा। ये भी पढ़े: जानिये PMMSY में मछली पालन से कैसे मिले लाभ ही लाभ आजकल हमें यह भी देखने को मिल रहा है, कि सामान्य कृषि में लोगों का रुझान भी कम हो रहा है और साथ ही उसमें आमदनी भी कम होती जा रही है। बारिश के कम ज्यादा होने का मौसम के जरा सा इधर-उधर होने पर कृषि में किसानों की पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो जाती हैं। जिससे उन्हें काफी तंगी का सामना करना पड़ता है, ऐसे में इन सब चीजों को देखते हुए लोगों का रुझान मछली पालन की ओर ज्यादा बढ़ा है।

किस तरह से होगा लोन की दर में बदलाव

पहले की बात करें तो किसानों को 100000 के मूल्य पर 1% और 300000 तक के मूल्य पर 3% ब्याज की दर के साथ लोन दिया जाता था। लेकिन अब जबसे मत्स्य पालन को कृषि की तरह ही दर्जा मिल गया है, तो सरकारी विभाग से यह लोन बिना किसी ब्याज के किसानों को दिया जाएगा। साथ ही यहां पर भी किसान कृषि क्रेडिट कार्ड बनवा सकते हैं और उसका फायदा उठा सकते हैं।

मत्स्य पालकों को दी जाने वाली अन्य सुविधाएं और लाभ

वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ में 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई बांधों एवं जलाशयों से नहर के माध्यम से जलापूर्ति की आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए मत्स्य कृषकों एवं मछुआरों को प्रति 10 हजार घन फीट पानी के बदले 4 रुपए का शुल्क अदा करना पड़ता था, जो अब फ्री में मिलेगा। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=stwIUBJpMGE&t=4s[/embed] मत्स्य पालक कृषकों एवं मछुआरों को प्रति यूनिट 4.40 रुपए की दर से विद्युत शुल्क भी अदा नहीं करना होगा। ये भी पढ़े: 66 लाख किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड जारी करेगी यह राज्य सरकार, मिलेगी हर प्रकार की सुविधा
  • राज्य सरकार मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए अनुदान (सब्सिडी) उपलब्ध कराती है।
  • मत्स्य पालकों को 5 लाख रुपए तक का बीमा दिया जाता है।
  • मछुआ सहकारी समितियों को मत्स्य पालन के लिए जाल, मत्स्य बीज एवं आहार के लिए 3 सालों में 3 लाख रुपए तक की सहायता दी जाती है।
झींगा पालन करके कमाएं बम्पर मुनाफा, मिलती है सब्सिडी, जानें कैसे

झींगा पालन करके कमाएं बम्पर मुनाफा, मिलती है सब्सिडी, जानें कैसे

आप अगर व्यवसाय शुरू करके बढ़िया लाभ कमाना चाहते हैं, तो झींगा पालन जरूर करें। झींगा का व्यपार करके लोग बढ़िया मुनाफा अर्जित कर रहे हैं। घरेलू बाजार में ताजा झींगा की तुलना में जमे हुए झींगा की बहुत ज्यादा मांग हैं। व्यवसाय करने वालों के लिए झींगा पालन करना बहुत ही अधिक लाभदायक है। जलीय कृषि क्षेत्र में झींगा पालन एक फलता-फूलता व्यवसाय है। यह एक मल्टीबिलियन-डॉलर का उद्योग है, और सबसे अच्छी बात यह है, कि कोई भी व्यक्ति छोटे पैमाने पर भी झींगा फार्म को चला सकता है और बेहतर मुनाफा अर्जित कर सकता है।

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यदि आप इस व्यापार को करके बेहतर मुनाफा के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले झींगा का उत्पादन करना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको प्रशिक्षण लेना आवश्यक है। नई तकनीक के साथ आपको आवश्यक उपकरण जिससे झींगा पालन करने मे आसानी हो उसे जानना और समझना चाहिए। इस व्यापार में भारी निर्यात क्षमता है, विशेष रूप से घरेलू बाजार में जहां ताजा झींगा की तुलना में जमी हुई झींगा बेचना अधिक लाभदायक है।

झींगा की खेती शुरू करने से पहले इन बातों का रखे विशेष ध्यान:

झींगा की कितनी विभिन्न प्रजातियाँ हैं? किस प्रजाति के झींगा का पालन करने से बेहतर मुनाफा अर्जित करना आसान होगा?

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झींगा पालन करने से पहले आपको स्थानीय झींगा बाजार की प्रतिस्पर्धा और मांग के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी होगी। नजदीकी कृषि अनुसंधान कार्यालय से जानकारी प्राप्त करनी होगी और पता करना होगा कि झींगा पालन के लिए कौन से लाइसेंस की आवश्यकता होती है। एक व्यावसायिक झींगा फार्म चलाने के लिए, अधिकांश राज्यों को आपको एक्वाकल्चर परमिट खरीदने की आवश्यकता होती है। अपने झींगा फार्म को स्थापित करने के लिए आपके पास कई प्रकार के विकल्प हैं। तालाब, विशाल टैंक, स्विमिंग पूल, और कोई भी अन्य जल भंडारण सुविधाएं शामिल हैं। झींगा मछली पालन की एक एकड़ जमीन पर खोदे गए तालाब से करीब 4 हजार किलोग्राम झींगा पैदा किया जा सकता है। जिनका खुले बाजार में मूल्य 350 से 400 रूपये प्रतिकिलों तक होता है, जो मछलियों के मूल्य से अधिक है। एक एकड़ भूमि में झींगा मछली पालन से एक बार में 5 लाख तक की शुद्ध आय हो सकती है। झींगा मछली औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसमें काफी मात्रा में विटामिन और खनिज लवण पाए जाते हैं। झींगा मछली विटामिन डी से भरपूर होने के कारण इसका उपयोग त्वचा संबंधी रोगियों के लिए बहुत लाभदायक होता है। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=stwIUBJpMGE&t=8s[/embed] झींगा पालन मे रुचि रखने वाले किसान अपने नजदीकी जिले के मछली पालन, पशुपालन और डेयरी विकास मंत्रालय के कार्यालय में संपर्क करके और भी अधिक जानकारी प्राप्त करके इस व्यवसाय को शुरू करके बेहतर मुनाफा अर्जित कर सकते है।
जानें भारत में पौराणिक काल से की जाने वाली कृषि के बारे में, कमाएं कम खर्च में अधिक मुनाफा

जानें भारत में पौराणिक काल से की जाने वाली कृषि के बारे में, कमाएं कम खर्च में अधिक मुनाफा

परमाकल्चर' कृषि को 'कृषि का स्वर्ग' कहा जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, इसकी वजह फसल, मवेशी, पक्षी, मछलियां, झाड़ी, पेड़ एक पारितंत्र का निर्माण कर देते हैं। न्यूनतम व्यय करके किसानों की आमदनी बढ़ोत्तरी करने की उम्दा रणनीति है। खेती-किसानी में हुए समय समय पर नवीन परिवर्तन देखे जा रहे हैं। इस क्षेत्र में प्रयासरत कृषि वैज्ञानिकों के आविष्कार एवं कुछ किसानों के नवाचार का परिणाम है। वर्तमान में भारत भी कृषि के क्षेत्र में बहुत मजबूती से उभर कर सामने आ रहा है, यहां कृषि संबंधित काफी दिक्कतें तो हैं, साथ ही समाधान भी निकल लिया जाता है। आजकल कृषकों के समक्ष सबसे बड़ी दिक्क्त यह है कि उनको किसी भी फसल के उत्पादन हेतु काफी खर्च करना पड़ता है, जिसकी वजह से किसान समुचित लाभ अर्जित नहीं कर पते हैं। लेकिन किसानों की खेती में दिलचस्पी होने के लिए लाभ अहम भूमिका निभाता है। विदेशी किसानों के समक्ष यह चुनौती नहीं है, क्योंकि विदेशी किसान 'परमाकल्चर' कृषि पर कार्यरत हैं। इस इको-सिस्टम के अंतर्गत पशु, पक्षी, मछली, फसल, झाडियां, पेड़-पौधे आपस में ही एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। एक तरह से देखें तो भारत की एकीकृत कृषि प्रणाली के समरूप, जिसके अंतर्गत खेती-किसानी सहित पशु चारा उत्पादन, सिंचाई, बागवानी, वानिकी, पशुपालन, मुर्गी पालन, मछली पालन, खाद निर्माण इत्यादि का कार्य एक स्थाई भूमि पर किया जाता है। इसको स्थाई कृषि अथवा परमाकल्चर के नाम से जाना जाता है। एक बार आरंभ में व्यय करना आवश्यक होता है, उसके उपरांत इस इकोसिस्टम के माध्यम से आपस में प्रत्येक वस्तु की आपूर्ति होती रहती है एवं न्यूनतम व्यय में अत्यधिक पैदावार अर्जित कर सकते हैं।

परमाकल्चर फार्मिंग से हो सकता है अच्छा मुनाफा

यदि किसान चाहे तो स्वयं के खेत को परमाकल्चर में परिवर्तित कर सकता है। लघु किसानों हेतु तो यह उपाय वरदान वरदान के समरूप है। कम भूमि द्वारा बेहद लाभ अर्जित करने हेतु परमाकल्चर द्वारा बेहतरीन लाभ कमाया जा सकता है क्योंकि यह काफी अच्छा विकल्प होता है। इस कृषि पद्धति के अंतर्गत सर्वाधिक ध्यान जल के प्रबंधन एवं मृदा की संरचना को अच्छा बनाने हेतु रहता है। मृदा की संरचना यदि उत्तम रही तो 1 एकड़ भूमि द्वारा भी लाखों में लाभ लिया जा सकता है। परमाकल्चर कृषि आमदनी का बेहतरीन स्त्रोत होने के साथ साथ पर्यावरण संरक्षण एवं जैवविविधता हेतु भी बहुत ज्यादा लाभदायक होती है।
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परमाकल्चर के सबसे बेहतरीन बात यह है, कि इसके लिए किसी प्रकार का अतिरिक्त निवेश नहीं किया जाता है। विशेषरूप से किसानों के समीप गांव में हर तरह के संसाधन उपलब्ध होते हैं। परमाकल्चर की सहायता से किसान को कम व्यय में भिन्न-भिन्न प्रकार का उत्पादन (उत्पादन में विविधता) एवं अधिकाँश मात्रा में उत्पादन अर्जन करने में काफी सहायता प्राप्त होती है। परमाकल्चर को पैसा बचाकर, पैसा कमाने वाला सिस्टम भी कहा जाता है, क्योंकि पशुओं के अवशिष्ट द्वारा खाद-उर्वरक निर्मित किए जाते हैं, जिससे कि रसायनिक उर्वरकों पर किए जाने वाला व्यय बच जाता है। जिससे पशुओं को खेत से बहुत सारी फसलों के अवशेष खाने हेतु मिल जाते हैं, जो दूध के उत्पादन में भूमिका निभाता है। जल का समुचित प्रबंधन करने से सिंचाई हेतु किए जाने वाला व्यय बच जाता है। साथ ही, इसी जल के अंदर मछली पालन भी किया जा सकता है। जिसके हेतु खेत के एक भाग में तालाब निर्मित किया जाता है, जहां बारिश का जल इकत्रित किया जाता है। इस कृषि पद्धति से कोई हानि नहीं होती है। अगर किसान खेत को परमाकल्चर के जरिए सृजन करें तो पर्यावरण सहित किसान की प्रत्येक जरूरत खेत की चारदीवारी में ही पूर्ण हो सकती है।

भारत एक ऐसा देश है जहां परमाकल्चर कृषि पौराणिक काल से की जाती है

वर्तमान के आधुनिक दौर में मशीन, तकनीक एवं विज्ञान द्वारा खेती के ढ़ांचे को परिवर्तित करके रख दिया है, परंतु आज भी भारत ने अपनी परंपरागत विधियों द्वारा विश्वभर में अपना लोहा मनवाने का कार्य किया है। वर्तमान में भी देश कृषि उत्पादन में सबसे आगे है, साथ ही, भारत अनेकों देशों की खाद्य आपूर्ति को पूर्ण करने में अहम भूमिका निभाता है। देश द्वारा उच्च स्तरीय पैमाने पर कृषि खाद्य उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है। आज हम भले ही कृषि क्षेत्र में एडवांस रहने हेतु विदेशी कल्चर एवं विधियों का प्रयोग कर रहे हों। परंतु, बहुत से ऐसी चीजें भी मौजूद हैं, जिनको विदेश में रहने वाले लोगों ने भी भारत से प्रेरित होकर आरंभ किया है। उन्हीं में से एक परमाकल्चर भी है। हो सकता है, आपको यह सुनने में अजीब सा अनुभव हो, परंतु भारत के लिए परमाकल्चर किसी नई विधि का का नाम नहीं है। देश में इस कृषि पद्धति को वैदिक काल से ही उपयोग में लिया जा रहा है। क्योंकि भारत ने आरंभ से ही जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण का कार्य करते हुए खाद्य आपूर्ति को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि मध्य के कुछ दशकों में कृषि के क्षेत्र में तीव्रता से बहुत ज्यादा परिवर्तन देखने को मिले हैं, परिणामस्वरूप हम अपने ही महत्त्व को विस्मृत करते जा रहे हैं।
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आपको जानकारी के लिए बतादें कि परमाकल्चर की भाँति कृषि भारत में युगों-युगों से चलती आ रही है। इस कृषि में किसान परंपरागत विधि से उत्पादन करते हैं। पर्यावरण संतुलन हेतु खेत के चारों तरफ वृक्ष लगाए जाते हैं। पशुओं को पाला जाता है, जिनसे खेतों में जुताई की जा सके। इन पशुओं को खेतों से उत्पन्न चारा खिलाया जाता है, बदले में पशु दूध व गोबर प्रदान करते हैं। दूध का किसान अपने व्यक्तिगत कार्य में उपयोग करते हैं अथवा बेचकर धन कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ गोबर का उपयोग खेती करने हेतु खाद निर्माण में किया जाता है। इस प्रकार से एक-दूजे की जरूरतें पूर्ण होती रहती हैं, वो भी किसी बाहरी अतिरिक्त व्यय के बिना ही। साथ ही, आपस में संतुलन भी कायम रहता है। आजकल कृषि करने हेतु बीज खरीदने के चलन में वृद्धि हुई है, जो कि जलवायु परिवर्तन के अनुरूप है। जबकि प्राचीन काल में फसल द्वारा बीजों को बचाकर आगामी बुवाई हेतु एकत्रित करके रखा जाता था, यही वजह है, कि पौराणिक काल से ही कृषि एक संतुलन का कार्य था ना कि किसी खर्च का।
प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना से जुड़कर कमाएं मुनाफा, सरकार कर रही है बढ़-चढ़कर मदद

प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना से जुड़कर कमाएं मुनाफा, सरकार कर रही है बढ़-चढ़कर मदद

हाल ही में मछली पालन से जुड़ी एक स्कीम मोदी सरकार ने शुरू की है, जिसे नीली क्रांति का नाम दिया गया है। इस स्कीम के टाट जलीय कृषि करने वाले किसानों को बैंक ऋण, बीमा आदि अनेक प्रकार की सुविधाएं मिल रही हैं। अगर आप भी मछली पालन शुरू करना चाहते हैं तो यह योजना आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सरकार द्वारा अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। मछली पालकों को आत्मनिर्भरता की तरफ अग्रसर करने के लिए सरकार द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना चलाई जा रही है। इसमें आर्थिक सहायता के साथ-साथ निशुल्क प्रशिक्षण का भी प्रावधान है। सबसे पहले यह योजना उत्तर प्रदेश में लागू की गई है।

क्या है यह योजना?

अगर आप मछली पालन से जुड़ा हुआ किसी भी तरह का व्यवसाय करना चाहते हैं। लेकिन आपके पास पैसा नहीं है, तो सरकार आपकी पूरी तरह से मदद कर रही है। अगर आप चाहते हैं, कि आप अपनी जमीन को तालाब में बदलकर मछली पालन करना चाहते हैं। तब इसके लिए भी सरकार सब्सिडी दे रही है। विशेषज्ञ की मानें तो एक हेक्टेयर तालाब के निर्माण में लगभग 5 लाख रुपये का खर्च आता है। जिसमें से कुल राशि का 50 प्रतिशत केंद्र सरकार, 25 प्रतिशत राज्य सरकार अनुदान देती है। शेष 25 प्रतिशत मछली पालक को देना होता है। पहले से बने तालाब में यदि तालाब मछली पालन के लिए उसमें सुधार की आवश्यकता है। तो ऐसे तालाबों के लिए भी सरकार खर्च के हिसाब से केंद्र और राज्य सरकार अनुदान देती है, जिसमें से 25 फीसदी मछली पालक को देना होता है।
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कैसे और कौन कर सकता है आवेदन?

कोई भी मछली पालक, मछली बेचने वाले, स्वयं सहायता समूह, मत्स्य उद्यमी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाएं, निजी फर्म, फिश फार्मर प्रोड्यूसर आर्गेनाइजेशन / कंपनीज आदि लोन के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस व्यवसाय से जुड़ा लोन लेने के लिए आपको किसी भी विशेष पात्रता की आवश्यकता नहीं है। मत्स्य पालन व्यवसाय से पहले आपको मत्स्य विभाग द्वारा दिए जाने वाले प्रशिक्षण को प्राप्त करना आवश्यक है। प्रशिक्षण के दौरान 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से प्रशिक्षण भत्ता भी मिलता है।

ऑनलाइन करें आवेदन

अगर आप भी इस योजना का लाभ प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, (PMMSY) के अन्तर्गत ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश से शुरू की गई यह योजना देश के कई राज्यों में लागू हो चुकी है और मछली पालकों का सहयोग कर रही है। पीएमएमएसवाई ने 2024-25 के अंत तक 68 लाख रोजगार लाने की कल्पना की जा रही है।