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हल्दी

बिहार के आशीष कुमार अपने गांव में काली हल्दी की खेती कर मध्य प्रदेश तक सप्लाई कर रहे हैं।

बिहार के आशीष कुमार अपने गांव में काली हल्दी की खेती कर मध्य प्रदेश तक सप्लाई कर रहे हैं।

किसान आशीष कुमार का कहना है, कि उन्होंने एक लेख में पढ़ा था कि बिहार में काली हल्दी विलुप्त हो चुकी है। अब कोई काली हल्दी की खेती नहीं करता है। ऐसे में मैंने काली हल्दी की खेती करना चालू किया। जैसा कि हम जानते हैं, कि हल्दी एक औषधीय मसाला होता है। इसका इस्तेमाल खाना निर्मित करने के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है। हल्दी के बिना हम स्वादिष्ट दाल एवं सब्जी की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। अधिकांश लोगों का मानना है, कि हल्दी का रंग केवल पीला ही हो होता है। परंतु, इस प्रकार की कोई बात नहीं है, आज भी भारत में किसान काली हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही किसान के विषय में बताएंगे, जिन्होंने काली हल्दी की खेती चालू कर लोगों के समक्ष मिसाल प्रस्तुत की है। वर्तमान में अन्य दूसरे किसान भी उनसे काली हल्दी की खेती करने का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

आशीष अपने गांव में लगभग 3 वर्ष से काली हल्दी की खेती कर रहे हैं

एनबीटी की एक खबर के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम आशीष कुमार सिंह है। आशीष कुमार बिहार राज्य के गया जनपद के अंतर्गत आने वाले टिकारी गांव के निवासी हैं। आशीष कुमार अपने निज गांव में 3 साल से काली हल्दी की खेती कर रहे हैं। आशीष कुमार सिंह का कहना है, कि उनको कृषि से जुड़े लेख एवं खबरें पढ़ने का अत्यधिक शौक है। एक दिन उन्होंने अखबार में काली हल्दी के विषय में एक लेख पढ़ा था। इसके पश्चात आशीष ने काली हल्दी की खेती करने की योजना बनाई है। मुख्य बात यह है, कि आशीष विलुप्त होने की स्थिति पर पहुंच चुकी विभिन्न फसलों की खेती कर रहे हैं। यह भी पढ़ें: जानिए नीली हल्दी की खेती से कितना मुनाफा कमाया जा सकता है

काली हल्दी से आयुर्वेदिक औषधियां निर्मित की जाती हैं

आशीष कुमार ने बताया कि उन्होंने लेख में पढ़ा था कि बिहार में काली हल्दी बिल्कुल खो चुकी है। अब इसकी खेती कोई नहीं करता है। ऐसे में मैंने इसकी खेती करना चालू कर दिया। उनके द्वारा उत्पादित हल्दी की सप्लाई सर्वाधिक मध्य प्रदेश में होती है। उनके अनुसार मध्य प्रदेश में बहुत सारे किसान उनसे जुड़े हुए हैं। आशीष काली हल्दी की मांग आते ही आपूर्ति कर देते हैं। दरअसल, मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के लोग अपना कोई भी शुभ कार्य आरंभ करने से पूर्व काली हल्दी का इस्तेमाल करते हैं। इसके अतिरिक्त इससे विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियाँ भी तैयार की जाती हैं।

काली हल्दी की बुवाई हेतु कितना बीज उपयोग होता है

आशीष डेढ़ कट्ठे भूमि में काली हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनको लगभग डेढ़ क्विंटल काली हल्दी की पैदावार मिलती है। बतादें, कि डेढ़ कट्ठे भूमि में काली हल्दी की बुवाई करने हेतु 10 किलो बीज की आवश्यकता होती है। उनका कहना है, कि काली हल्दी की खेती आप गमले में भी चालू कर सकते हैं। काली हल्दी की खेती में जल की काफी कम आवश्यकता है। अशीष कुमार सिंह से प्रेरणा लेकर दर्जनों की संख्या में किसानों ने काली हल्दी की खेती शुरू कर दी है। वह काली हल्दी के बीज 300 रुपये किलो के हिसाब से बेचते हैं। काली हल्दी में कुरकुमीन पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा पाई जाती है। कृषि वैज्ञानिक देवेंद्र मंडल का कहना है, कि काली हल्दी का ओषधि के तौर पर सेवन करने से विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। वर्तमान में बाजार के अंदर एक किलो काली हल्दी की कीमत 1000 से 5000 रुपये के मध्य है।
पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि काली हल्दी की खेती करने पर पानी की खपत कम होती है। यदि आप एक एकड़ में काली हल्दी की खेती करते हैं, तो आपको 50 से 60 क्विंटल तक पैदावार मिलेगा। साथ ही, एक एकड़ से 10 से 12 क्विंटल तक सूखी हल्दी का उत्पादन होगा। ऐसे में काली हल्दी की खेती करने पर काफी अच्छी खासी आमदनी होती है। लोगों का मानना है, कि हल्दी केवल पीले रंग की ही होती है। परंतु, इस तरह की कोई बात नहीं है। दरअसल, हल्दी काले रंग की भी होती है। विशेष बात यह है, कि काली हल्दी का भाव भी पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा होता है। इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियां बनाने में किया जाता है। इसमें पीली हल्दी की तुलना में विटामिन्स और मिनिरल्स भी ज्यादा पाए जाते हैं। यही कारण है, कि अब बिहार में एक किसान ने इसकी खेती भी चालू कर दी है। इससे किसान की काफी मोटी आमदनी हो रही है।

काली हल्दी की खेती करने वाला किसान कमलेश

जानकारी के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम कमलेश चौबे है। वे पूर्वी चम्पारण के नरकटियागंज प्रखंड स्थित मुशहरवा गांव के मूल निवासी हैं। उन्होंने अभी एक कट्ठे भूमि पर काली हल्दी की खेती चालू की है। उन्होंंने एक कट्ठे जमीन में 25 किलो काली हल्दी की बुवाई की थी, जिससे लगभग डेढ़ क्विंटल हल्दी का उत्पादन हुआ है। इससे उन्हें काफी अच्छी आमदनी हो रही है। यह भी पढ़ें: Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

किसान हल्दी विक्रय से कितना कमा सकते हैं

विशेष बात यह है, कि कमलेश ने काली हल्दी का उत्पादन करने के लिए नागालैंड से इसके बीज इंपोर्ट किए थे। बतादें, कि एक किलो बीज 500 रुपये में आए थे। ऐसी स्थिति में 25 किलो बीज खरीदने के लिए उन्हें साढ़े 12 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ा। वर्तमान में बाजार के अंदर काली हल्दी की कीमत 500 से 5000 रुपये किलो के मध्य है। यदि कमलेश 1000 रुपये किलो भी काली हल्दी बेचते हैं, तो 150 किलो हल्दी विक्रय के उपरांत उन्हें डेढ़ लाख रुपये की आमदनी होगी।

काली हल्दी में कितने तत्व विघमान होते हैं

कृषि वैज्ञानिक अभिक पात्रा के अनुसार काली हल्दी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है। इससे बहुत सारी औषधीय दवाइयां निर्मित की जाती हैं। पीली हल्दी की अपेक्षा में इसकी कीमत बहुत गुना अधिक होती है। वर्तमान में उत्तराखंड के किसान भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं। काली हल्दी में एंथोसायनिन ज्यादा मात्रा में विघमान होता है। इस वजह से यह गहरे बैंगनी रंग की दिखती है। साथ ही, काली हल्दी में एंटी अस्थमा, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीफंगल, एंटी- कॉन्वेलसेंट, एनाल्जेसिक, एंटीबैक्टीरियल और एंटी-अल्सर जैसे विशेष गुण मौजूद होते हैं।
गर्मियों में हल्दी की खेती कर किसान शानदार उत्पादन उठा सकते हैं

गर्मियों में हल्दी की खेती कर किसान शानदार उत्पादन उठा सकते हैं

रबी की फसलों की कटाई का समय आ गया है। अब कुछ दिनों के बाद हल्दी उत्पादक किसान हल्दी की खेती के लिए बुवाई शुरू करेंगे। संपूर्ण भारत के करीब हर घर में सामान्यतः हल्दी का उपयोग किया जाता है। यह एक काफी ज्यादा महत्वपूर्ण मामला है। भारत के अंदर इसकी खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। 

बहुत सारे राज्यों में इसका उत्पादन किया जाता है। हल्दी की खेती करने के दौरान किसान भाइयों को कुछ विशेष बातों का खास ध्यान रखना होता है। ताकि उनको हल्दी उत्पादन से तगड़ा मुनाफा प्राप्त हो एवं उन्हें बेहतरीन उपज हांसिल हो सके।

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि हल्दी की खेती के लिए रेतीली दोमट मृदा या मटियार दोमट मृदा काफी अच्छी होती है। हल्दी की बिजाई का समय भिन्न-भिन्न किस्मों के आधार पर 15 मई से लेकर 30 जून के मध्य होता है। 

वहीं, हल्दी की बुवाई के लिए कतार से कतार का फासला 30-40 सेमी और पौध से पौध की दूरी 20 सेमी रखनी चाहिए। हल्दी की बुवाई के लिए 6 क्विंटल प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।

हल्दी की फसल कितने समय में तैयार होती है ?

हल्दी की खेती के लिए खेत में जल निकासी की बेहतरीन व्यवस्था होनी चाहिए। हल्दी की फसल 8 से 10 माह के अंदर तैयार हो जाती है। सामन्यतः फसल की कटाई जनवरी से मार्च के दौरान की जाती है। फसल के परिपक्व होने पर पत्तियां सूख जाती हैं और हल्के भूरे से पीले रंग में बदल जाती हैं। 

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हल्दी की खेती काफी सुगमता से की जा सकती है और इसे छाया में भी आसानी से उगाया जा सकता है। किसानों को इसकी खेती करते समय नियमित तौर पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे खरपतवारों की वृद्धि रुकती है और फसल को पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। 

हल्दी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु  

दरअसल, हल्दी गर्म एवं उमस भरी जलवायु में बेहतरीन ढंग से उगती है। इसके लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है। हल्दी के लिए अच्छी जल निकासी वाली, दोमट अथवा बलुई दोमट मृदा अच्छी होती है। 

मिट्टी का पीएच 6.5 से 8.5 के मध्य होना चाहिए। हल्दी की अच्छी पैदावार के लिए खाद का उचित इस्तेमाल करना आवश्यक है। गोबर की खाद, नीम की खली और यूरिया का इस्तेमाल काफी लाभदायक होता है। कटाई की बात की जाए तो हल्दी की फसल 9-10 माह के अंदर पककर तैयार हो जाती है। कटाई होने के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है। 

हल्दी को तैयार होने में कितना समय लगता है ? 

हल्दी की बुवाई जून-जुलाई महीने के दौरान की जाती है। बुवाई के लिए स्वस्थ और रोग मुक्त कंदों का चुनाव करना बेहद आवश्यक है। सिंचाई की बात की जाए तो इसे नियमित तौर पर सिंचाई की जरूरत होती है। 

किसान भाइयों को इसकी खेती करने के दौरान नियमित रूप से निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे खरपतवारों का खतरा समाप्त एवं फसल को पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है। फसल कटाई की बात की जाए तो हल्दी की फसल 9-10 महीने के अंदर पककर तैयार हो जाती है।

हल्दी की बेहतरीन किस्में इस प्रकार हैं ?

समयावधि के आधार पर इसकी किस्मों को तीन भागों में विभाजित की गई हैं 

  1. शीघ्र काल में तैयार होने वाली ‘कस्तुरी’ वर्ग की किस्में - रसोई में उपयोगी, 7 महीने में फसल तैयार, शानदार उपज। जैसे-कस्तुरी पसुंतु।
  2. मध्यम समय में तैयार होने वाली केसरी वर्ग की किस्में - 8 महीने में तैयार, अच्छी उपज, अच्छे गुणों वाले कंद। जैसे-केसरी, अम्रुथापानी, कोठापेटा।
  3. दीर्घ काल में तैयार होने वाली किस्में - 9 महीने में तैयार, सबसे अधिक उपज, गुणों में सर्वेश्रेष्ठ। जैसे दुग्गीराला, तेकुरपेट, मिदकुर, अरमुर। व्यवसायिक स्तर पर दुग्गीराला व तेकुपेट की खेती इनकी उच्च गुणवत्ता की वजह से की जाती है। इसके अतिरिक्त सुगंधम, सुदर्शना, रशिम, मेघा हल्दी-1, मीठापुर और राजेन्द्र सोनिया हल्दी की अन्य किस्में है। 

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जैविक ढंग से खेती करना सर्वोत्तम विकल्प है 

विशेषज्ञों की मानें तो हल्दी की खेती के लिए जैविक विधि का इस्तेमाल करना बेहद आवश्यक है। इसकी फसल को मिश्रित खेती के रूप में भी उगाया जा सकता है। हल्दी की उन्नत किस्मों की खेती करके किसान भाई अधिक उपज हांसिल कर सकते हैं। 

Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

हल्दी (Haldi (Turmeric)) का मसाला फसलों में विशेष स्थान है. अपने औषधिय गुणों के कारण इसकी अलग पहचान है. हल्दी से रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर की इम्युनिटी बढ़ती है. कोरोना काल में घरेलु इम्यूनिटी बूस्टर काढ़े के अलावा हल्दी को औषधी के रूप में काफी उपयोग किया गया था.

हल्दी की खेती

इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में, पेट दर्द व एंटीसेप्टिक व चर्म रोगों के उपचार में किया जाता है. यह रक्त शोधक होती है. चोट सूजन को ठीक करने का काम कच्ची हल्दी करती है. जीवाणु नाशक गुण होने के कारण इसके रस का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन में भी होता है. प्राकृतिक एवं खाद्य रंग बनाने में भी हल्दी का उपयोग होता है।

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हल्दी का धार्मिक महत्व भी है. हिंदू धर्म में हर शुभ कार्य में हल्दी का प्रयोग किया जाता है. तांत्रिक पूजा में भी महत्व बताया गया है. इसी कारण से हल्दी की बाजार में बहुत मांग रहती है और अच्छे भाव मिलते हैं. खरीफ सीजन में अन्य फसलों के साथ हल्दी की खेती करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. हल्दी को खेत की मेड़ों पर भी लगाया जा सकता है.

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हल्दी के प्रकार

हल्दी दो प्रकार की होती है, पीली हल्दी और काली हल्दी. पीली हल्दी का प्रयोग मसालों के रूप में सब्जी बनाने में किया जाता है, वहीं काली हल्दी का प्रयोग पूजन में किया जाता है.

हल्दी की उन्नत किस्में

आर एच 5

आर एच 5 किस्म के हल्दी के पौधे की ऊँचाई करीब ८० से १०० सेंटीमीटर होती है। इसके तैयार होने में करीब २१० से २२० दिन लगते है. इसकी पैदावार २०० से २२० क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त की जा सकती है.

राजेंद्र सोनिया

इसके पौधे की ऊंचाई ६० से ८० सेंटीमीटर होती है. फसल तैयार होने में १९५ से २१० दिन लगता है. १६० से १८० क्विंटल तक प्रति एकड़ के हिसाब से उपज प्राप्त की जा सकती है।

पालम पीताम्बर

यह अधिक पैदावार देने वाली हल्दी की किस्मों में से एक है. गहरे पीले रंग के इसके कांड होते हैं. इस किस्म से १३२ क्विंटल/एकड़ तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

सोनिया

इसके तैयार होने में २३० दिन का समय लगता है. इससे उपज ११० से ११५ क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है.

सुगंधम

सुगंधम किस्म २१० दिनों में तैयार हो जाती है और करीब ८० से ९० क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. इसके कंद आकर में लंबे और हल्की लाली लिए हुए पीले रंग के होते हैं.

सोरमा

सोरमा किस्म की हल्दी के कंद अंदर से नारंगी रंग के होते हैं. यह २१० दिन में तैयार हो जाता है. इस किस्म से प्रति एकड़ करीब ८० से ९० क्विंटल तक उपज प्राप्त हो सकती है.

सुदर्शन

इसके कंद आकर में छोटे होते हैं. १९० दिनों बाद इसकी खुदाई की जा सकती है.

अन्य किस्में

हल्दी की कई ओर उन्नत किस्में भी होती हैं. जिनमें सगुना, रोमा, कोयंबटूर, कृष्णा, आर. एच 9/90, आर.एच- 13/90, पालम लालिमा, एन.डी.आर 18, बी.एस.आर 1, पंत पीतम्भ आदि किस्में शामिल हैं. ये भी देखें: घर पर उगाने के लिए ग्रीष्मकालीन जड़ी बूटियां 

बुवाई का तरीका

१५ मई से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी की बुआई की जा सकती है. सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर हल्दी की बुआई अप्रैल, मई माह में भी की जा सकती है.
  • करीबन २५०० किलोग्राम प्रकंदों की आवश्यकता प्रति हेक्टेयर बुआई के लिए होती है.
  • बुआई से पहले हल्दी के कंदों को बोरे में लपेट कर रखने से अंकुरण आसानी से होता है.
  • बुआई के लिए मात्र कंद एवं बाजू कंद प्रकंद का उपयोग किया जा सकता है.
  • ध्यान रहे की प्रत्येक प्रकंद पर दो या तीन ऑंखें हों.
  • बुआई से पहले कंदों को ०.२५ प्रतिशत एगालाल घोल में ३० मिनट तक उपचार करना चाहिए.
  • हल्दी की बुआई समतल चार बाई तीन मीटर आकार की क्यारियों में मेड़ों पर करना चाहिए.
  • लाइन से लाइन की दूरी ४५ से.मी. व पौधों से पौधों की दूरी २५ से.मी. रखें.
  • रेतीली भूमि में इसकी बुआई ७ से १० से.मी. ऊंची मेड़ों पर करनी चाहिए.
सहफसली तकनीक से किसान अपनी कमाई कर सकते हैं दोगुना

सहफसली तकनीक से किसान अपनी कमाई कर सकते हैं दोगुना

किसानों को परंपरागत खेती में लगातार नुकसान होता आ रहा है, जिसके कारण जहाँ किसानों में आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही है, वहीं किसान खेती से विमुख भी होते जा रहे हैं. इसको लेकर सरकार भी चिंतित है. लगातार खेती में नुकसान के कारण किसानों का खेती से मोहभंग होना स्वभाविक है, इसी के कारण सरकार आर्थिक तौर पर मदद करने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है. सरकार की तरफ से किसानों को खेती में सहफसली तकनीक (multiple cropping or multicropping or intercropping) अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. विशेषज्ञों की मानें, तो ऐसा करने से जमीन की उत्पादकता बढ़ती है, साथ ही एकल फसली व्यवस्था या मोनोक्रॉपिंग (Monocropping) तकनीक की खेती के मुकाबले मुनाफा भी दोगुना हो जाता है.


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सहफसली खेती के फायदे

परंपरागत खेती में किसान खरीफ और रवि के मौसम में एक ही फसल लगा पाते हैं. किसानों को एक फसल की ही कीमत मिलती है. जो मुनाफा होता है, उसी में उनकी मेहनत और कृषि लागत भी होता है. जबकि, सहफसली तकनीक में किसान मुख्य फसल के साथ अन्य फसल भी लगाते हैं. स्वाभाविक है, उन्हें जब दो या अधिक फसल एक ही मौसम में मिलेगा, तो आमदनी भी ज्यादा होगी. किसानों के लिए सहफसली खेती काफी फायदेमंद होता है. कृषि वैज्ञानिक लंबी अवधि के पौधे के साथ ही छोटी अवधि के पौधों को लगाने का प्रयोग करने की सलाह किसानों को देते हैं. किसानों को सहफसली खेती करनी चाहिए, ऐसा करने से मुख्य फसल के साथ-साथ अन्य फसलों का भी मुनाफा मिलता है, जिससे आमदनी दुगुनी हो सकती है.


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धान की फसल के साथ लगाएं कौन सा पौधा

सहफसली तकनीक के बारे में कृषि विशेषज्ञ डॉक्टर दयाशंकर श्रीवास्तव सलाह देते हैं, कि धान की खेती करने वाले किसानों को खेत के मेड़ पर नेपियर घास उगाना चाहिए. इसके अलावा उसके बगल में कोलस पौधों को लगाना चाहिए. नेपियर घास पशुपालकों के लिए पशु आहार के रूप में दिया जाता है, जिससे दुधारू पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ता है और उसका लाभ पशुपालकों को मिलता है, वहीं घास की अच्छी कीमत भी प्राप्त की जा सकती है. बाजार में भी इसकी अच्छी कीमत मिलती है.


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गन्ना, मक्की, अरहर और सूरजमुखी के साथ लगाएं ये फसल

पंजाब हरियाणा और उत्तर भारत समेत कई राज्यों में किसानों के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है और इसका कारण लगातार खेती में नुकसान बताया जाता है. इसका कारण यह भी है की फसल विविधीकरण नहीं अपनाने के कारण जमीन की उत्पादकता भी घटती है और साथ हीं भूजल स्तर भी नीचे गिर जाता है. ऐसे में किसानों के सामने सहफसली खेती एक बढ़िया विकल्प बन सकता है. इस विषय पर दयाशंकर श्रीवास्तव बताते हैं कि सितंबर से गन्ने की बुवाई की शुरुआत हो जाएगी. गन्ना एक लंबी अवधि वाला फसल है. इसके हर पौधों के बीच में खाली जगह होता है. ऐसे में किसान पौधों के बीच में लहसुन, हल्दी, अदरक और मेथी जैसे फसलों को लगा सकते हैं. इन सबके अलावा मक्का के फसल के साथ दलहन और तिलहन की फसलों को लगाकर मुनाफा कमाया जा सकता है. सूरजमुखी और अरहर की खेती के साथ भी सहफसली तकनीक को अपनाकर मुनाफा कमाया जा सकता है. कृषि वैज्ञानिक सह्फसली खेती के साथ-साथ इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम (Integrated Farming System) यानी ‘एकीकृत कृषि प्रणाली’ की भी सलाह देते हैं. इसके तहत खेतों के बगल में मुर्गी पालन, मछली पालन आदि का भी उत्पादन और व्यवसाय किया जा सकता है, ऐसा करने से कम जगह में खेती से भी बढ़िया मुनाफा कमाया जा सकता है.
घर पर करें बीजों का उपचार, सस्ती तकनीक से कमाएं अच्छा मुनाफा

घर पर करें बीजों का उपचार, सस्ती तकनीक से कमाएं अच्छा मुनाफा

एक किसान होने के नाते यह बात तो आप समझते ही हैं कि किसी भी प्रकार की फसल के उत्पादन के लिए सही बीज का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है और यदि बात करें सब्जी उत्पादन की तो इनमें तो बीज का महत्व सबसे ज्यादा होता है। स्वस्थ और उन्नत बीज ही अच्छी सब्जी का उत्पादन कर सकता है, इसीलिए कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा आपको हमेशा सलाह दी जाती है कि बीज को बोने से पहले अनुशंसित कीटनाशी या जीवाणु नाशी बीज का ही इस्तेमाल करना चाहिए। इसके अलावा कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा समय समय पर किसान भाइयों को बीज के उपचार की भी सलाह दी जाती है।


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आज हम आपको बताएंगे ऐसे ही कुछ बीज-उपचार करने के तरीके, जिनकी मदद से आप घर पर ही अपने साधारण से बीज को कई रसायनिक पदार्थों से तैयार होने वाले लैब के बीज से भी अच्छा बना सकते है। बीज उपचार करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसे स्टोर करना काफी आसान हो जाता है और सस्ता होने के साथ ही कई मृदा जनित रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। यह बात तो किसान भाई जानते ही होंगे कि फसलों में मुख्यतः दो प्रकार के बीज जनित रोग होते है, जिनमें कुछ रोग अंतः जनित होते हैं, जबकि कुछ बीज बाह्य जनित होते है।अंतः जनित रोगों में आलू में लगने वाला अल्टरनेरिया और प्याज में लगने वाली अंगमारी जैसी बीमारियों को गिना जा सकता है। बीज उपचार करने की भौतिक विधियां प्राचीन काल से ही काफी प्रचलित है। इसकी एक साधारण सी विधि यह होती है कि बीज को सूर्य की धूप में गर्म करना चाहिए, जिससे कि उसके भ्रूण में यदि कोई रोग कारक है तो उसे आसानी से नष्ट किया जा सकता है। इस विधि में सबसे पहले पानी में 3 से 4 घंटे तक बीज को भिगोया जाता है और फिर 5 से 6 घंटे तक तेज धूप में रखा जाता है।


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दूसरी साधारण विधि के अंतर्गत गर्म जल की सहायता से बीजों का उपचार किया जाता है। बीजों को पानी में मिलाकर उसे 50 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर 20 से 25 मिनट तक गर्म किया जाता है, जिससे कि उसके रोग नष्ट हो जाते है। इस विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें बीज के अंकुरण पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है, जैसे कि यदि आप आलू के बीच को 50 डिग्री सेल्सियस पर गर्म करते हैं तो इसमें लगने वाला अल्टरनेरिया रोग पूरी तरीके से नष्ट हो सकता है। बीज उपचार की एक और साधारण विधि गरम हवा के द्वारा की जाती है, मुख्यतया टमाटर के बीजों के लिए इसका इस्तेमाल होता है। इस विधि में टमाटर के बीज को 5 से 6 घंटे तक 30 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है, जिससे कि इसमें लगने वाले फाइटोप्थोरा इंफेक्शन का असर कम हो जाता है। इससे अधिक डिग्री सेल्सियस पर गर्म करने पर इस में लगने वाला मोजेक रोग का पूरी तरीके से निपटान किया जा सकता है। इसके अलावा कृषि वैज्ञानिक विकिरण विधि के द्वारा बीज उपचार करते है, जिसमें अलग-अलग समय पर बीजों के अंदर से पराबैगनी और एक्स किरणों की अलग-अलग तीव्रता गुजारी जाती है। इस विधि का फायदा यह होता है कि इसमें बीज के चारों तरफ एक संरक्षक कवच बन जाता है, जो कि बीज में भविष्य में होने वाले संक्रमण को भी रोकने में सहायता प्रदान करता है।


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इसके अलावा सभी किसान भाई अपने घर पर फफूंदनाशक दवाओं की मदद से मटर, भिंडी, बैंगन और मिर्ची जैसी फलदार सब्जियों की उत्पादकता को बढ़ा सकते है। इसके लिए एक बड़ी बाल्टी में पानी और फफूंदनाशक दवा की उपयुक्त मात्रा मिलाई जाती है, इसे थोड़ी देर घोला जाता है,जिसके बाद इसे मिट्टी के घड़े में डालकर 10 मिनट तक रख दिया जाता है। इस प्रकार तैयार बीजों को निकालकर उन्हें आसानी से खेत में बोया जा सकता है। हाल ही में यह विधि आलू, अदरक और हल्दी जैसी फसलों के लिए भी कारगर साबित हुई है। इसके अलावा फफूंद नाशक दवा की मदद से ही स्लरी विधि के तहत बीज उपचार किया जा सकता है, इस विधि में एक केमिकल कवकनाशी की निर्धारित मात्रा मिलाकर उससे गाढ़ा पेस्ट बनाया जाता है, जिसे बीज की मात्रा के साथ अच्छी तरीके से मिलाया जाता है। इस मिले हुए पेस्ट और बीज के मिश्रण को खेत में आसानी से बोया जा सकता है।


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सभी किसान भाई अपने खेतों में जैविक बीज उपचार का इस्तेमाल भी कर सकते है, इसके लिए एक जैव नियंत्रक जैसे कि एजोटोबेक्टर को 4 से 5 ग्राम मात्रा को अपने बीजों के साथ मिला दिया जाता है, सबसे पहले आपको थोड़ी सी पानी की मात्रा लेनी होगी और उसमें लगभग दो सौ ग्राम कल्चर मिलाकर एक लुगदी तैयार करनी होगी। इस तैयार लुगदी और बोये जाने वाले बीजों को एक त्रिपाल की मदद से अच्छी तरह मिला सकते है और फिर इन्हें किसी पेड़ की ठंडी छाया में सुखाकर बुवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हम आशा करते है कि हमारे किसान भाइयों को जैविक और रासायनिक विधि से अपने बीजों के उपचार करने के तरीके की जानकारी मिल गई होगी। यह बात आपको ध्यान रखनी होगी कि महंगे बीज खरीदने की तुलना में, बीज उपचार एक कम लागत वाली तकनीक है और इसे आसानी से अपने घर पर भी किया जा सकता है। वैज्ञानिकों की राय के अनुसार इससे आपकी फ़सल उत्पादन में लगभग 15 से 20% तक मुनाफा हो सकता है।
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कठिन मेहनत से हासिल बैंकिंग की नौकरी छोड़, कृषि में स्टार्टअप की राह पर चला बिहार का यह किसान

आजादी के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि और जीडीपी में कृषि का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है। हालांकि,
हरित क्रांति की सफलता के बाद एक समय आयात पर निर्भर रहने वाली भारतीय कृषि इतनी सफल तो हो पायी, कि देश के लोगों की मांग पूरी करने के अलावा कुछ स्तर पर निर्यात में भी हिस्सेदारी बंटा पाई। 2011 की जनगणना के अनुसार, 78 मिलियन प्रवासी मजदूर कृषि क्षेत्रों में सक्रिय रहने के अलावा, अतिरिक्त आय के लिए प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी काम करते हैं और इसी वजह से कृषि से होने वाली उत्पादकता में निरंतर कमी देखने को मिली है। बिहार के औरंगाबाद जिले के बरौली गांव में रहने वाले एक किसान की कहानी कुछ ऐसे ही शुरू हुई थी, जब उन्होंने कृषि और किसानी में सफल हुए कई विदेशी और भारतीय किसानों की केस स्टडी (case study) के बारे में पढ़ा। मैनेजमेंट प्रोफेशनल के रूप में काम करते हुए ही 2011 में बिहार के अभिषेक कुमार ने अच्छी सैलरी देने वाली जॉब को छोड़ने का निर्णय लिया और आज अभिषेक कुमार के खेतों में तुलसी (Tulsi), हल्दी (Turmeric), गिलोय (giloy) तथा मोरिंगा (Drumstick) और गेंदा (मेरीगोल्ड, Marygold) जैसी, आयुर्वेदिक औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधों की खेती की जाती है। अभिषेक को परिवारिक जमीन के रूप में 20 एकड़ का क्षेत्र मिला था, जिनमें से 15 एकड़ के क्षेत्र में वह इसी तरह कम समय में तैयार होने वाली आयुर्वेदिक औषधियों का उत्पादन कर बड़ी मार्केटिंग कंपनियों से जुड़ते हुए अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।


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अभिषेक ने बताया कि धान, गेहूं और मक्का से होने वाली बचत इन फसलों की तुलना में आधी भी नहीं होती है, लेकिन वैज्ञानिकों के द्वारा सुझाई गई आधुनिक विधियों और कृषि विभाग के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी का सही तरीके से पालन कर, इंटरनेट की मदद से कई सफल किसानों तक पहुंच बनाकर, बेहतर कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ ऐसे गुण सीखे, जो आज अभिषेक को अच्छा मुनाफा दे रहे हैं। बिहार में एक प्रॉफिटेबल कृषि मॉडल बनाने की सोच को लेकर काम कर रहे अभिषेक, खेत से होने वाली उत्पादकता पर ज्यादा ध्यान देते हैं। खुद अभिषेक ही बताते हैं कि एक कृषि परिवार से संबंध रखने के बावजूद भी खेती में कम आमदनी होने की वजह से, अपने परिवार को सहायता प्रदान करने और खुद का गुजारा करने के लिए वह पुणे में एक बैंक में कंसलटेंट के रूप में काम करने लगे थे। अभिषेक ने बताया कि जब उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड और चपरासी जैसे पदों पर काम करते वाले लोगों को देखा और उनसे मुलाकात हुई, तो पता चला कि इन लोगों के गांव में बहुत ज्यादा जमीन खाली पड़ी है और खेती में मुनाफा ना होने की वजह से ही वह अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहरों में मुश्किल भरी जिंदगी जी रहे हैं। इन्हीं घटनाओं से प्रेरणा लेते हुए अभिषेक ने अपनी नौकरी को छोड़ वापस गांव में ही रहते हुए कृषि में इनोवेशन (Innovation) करने की सोच के साथ एक नई शुरुआत करने की सोची। आज अभिषेक को उनके गांव में ही नहीं बल्कि पूरे जिले में एक अलग पहचान मिल चुकी है और बिहार के कई बड़े एनजीओ (NGOs) तथा किसान भाई समय-समय पर उनसे जाकर मिलते हैं और अभिषेक के कृषि मॉडल की तरह ही अपने खेत की जमीन की उर्वरता और उत्पादन बढ़ाने के लिए राय लेते है।


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जब अभिषेक ने अपनी खेती की शुरुआत की तभी उन्होंने मन बना लिया था कि वह केवल किताबी ज्ञान को किसानों को बताने की बजाय पहले उसे अपने खेत में अपना कर देखेंगे और यदि अच्छा मुनाफा होगा तभी दूसरे किसान भाइयों को भी नई तकनीकों को सलाह देंगे, उन्हीं प्रयोगों का अभिषेक को इतना फायदा हुआ कि वर्तमान में वह लगभग 95 से अधिक कृषि उत्पादन संगठनों (Farmers producer organisation) से जुड़े हुए है और इन संगठनों से जुड़े हुए लगभग 2 लाख से अधिक किसान भाइयों को साल 2011 से मार्केटिंग और खेती से जुड़ी समस्त जानकारियां उपलब्ध करवा रहे है। किसी भी शहरी परिवेश से वापस ग्रामीण क्षेत्र में आकर कृषि कार्यों की शुरुआत करने में अनेक प्रकार की समस्याएं होती है और ऐसी ही समस्या अभिषेक के सामने भी बिहार में एक अच्छा मुनाफा कमाने वाले किसान बनने की राह में अड़चन पैदा कर रही थी। हालांकि जब अभिषेक शहर से अपनी नौकरी छोड़ वापस गांव में आए, तो उन्हें कई लोगों के द्वारा विरोध झेलना पड़ा और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा इस विचार को पूरी तरीके से गलत ठहरा दिया गया, लेकिन जब अभिषेक ने अपने पिता को आधुनिक और समोच्च तरीके से होने वाली वैज्ञानिक विधियों की मदद से खेती करने की बात बताई, तो उनके परिवार ने भी हामी भरदी। वैज्ञानिक विधि का पालन करते हुए अभिषेक ने सबसे पहले अपने खेत में मिट्टी की जांच करवाई, जिससे उन्हें उनके खेत में पाई जाने वाली मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के बारे में पता चला, कौन से पोषक तत्वों की कितनी मात्रा खेत में पहले से उपलब्ध है और किन पोषक तत्वों की खेत की मिट्टी में कमी है।


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अभिषेक ने अपने किसानी करियर में पहली शुरुआत सामान्य खेती से ही की थी, लेकिन जब उन्होंने बागवानी कृषि को अपनाया तो उनके द्वारा किए गए सभी प्रयास सफल हुए और पहली साल में ही 6 लाख रुपए से अधिक की कमाई हुई। अभिषेक बताते हैं कि 2011 से ही वह रोज सुबह एक घंटे साइबर कैफे में जाकर इंटरनेट और यूट्यूब की मदद से विदेशी और पूशा के वैज्ञानिकों के द्वारा बताई गई नई विधियों को अपने खेत में आजमाकर देखते थे। जरबेरा की फसल का उत्पादन करने वाले वह बिहार के पहले व्यक्ति थे। इसके लिए उन्होंने बेंगलुरु और पुणे में काम कर रही कृषि से जुड़ी कई बड़ी साइंटिफिक लाइब्रेरी में जाकर रिसर्च करने वाले लोगों से बात कर उच्च गुणवत्ता वाले बीजों (High yield variety seeds) को उगाया तो पहले ही उत्पादन के बाद अच्छा मुनाफा दिखाई दिया। आज उनके खेतों में एक चौथाई से ज्यादा हिस्सों पर इसी प्रकार के औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधे उगाए जाते है। अभिषेक बताते हैं कि औषधीय पौधों (Medicine Plants) को एक बार लगाने के बाद कुछ समय तक बिना निराई गुड़ाई के भी रखा जा सकता है और उत्पादन में होने वाली लागत को कम किया जा सकता है, क्योंकि ऐसे प्लांट्स के पौधे और पत्तियां अधिक बारिश और तेज धूप तथा भयंकर ठंड में भी वृद्धि दर को बरकरार रख सकते हैं, जिससे उर्वरकों पर होने वाली लागत कम आती है। औषधीय पौधों में एक बार पानी देने के बाद वे आसानी से 20 से 25 दिन तक बिना पानी के रह सकते है। अभिषेक ने बताया कि मेडिसिन पौधों का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि इनमें आवारा पशु और जानवरों से होने वाले नुकसान पूरी तरीके से कम किए जा सकते है, क्योंकि नीलगाय जो कि बिहार के खेतों में सबसे ज्यादा क्रॉप डेमेज (Crop damage) करती है, वह इन पौधों को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाती।


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अफ्रीका और आसाम में काम कर रही चाय के बागान से जुड़ी कंपनियों के अनुसंधानकर्ताओं की मदद से अभिषेक ने बिहार में रहते हुए ही 'ग्रीन टी' का उत्पादन भी शुरू किया है। ग्रीन टी बनाने के लिए तुलसी, लेमन घास (Lemongrass) और मोरिंगा के पौधों की पत्तियों की आवश्यकता होती है, जिन्हें बारीक तरीके से काटकर एक सोलर ड्रायर विधि की मदद से अभिषेक के द्वारा ही स्थापित गांव की ही एक विपणन इकाई में मशीन की मदद से तैयार किया जाता है और कई बड़ी भारतीय और इंटरनेशनल मार्केटिंग कंपनियों को बेचा जाता है। बैंक में काम करने वाले एक कर्मचारी से लेकर खेती में सफलता प्राप्त करने वाले अभिषेक कई किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनने के बाद अब कृषि के क्षेत्र में एक नई स्टार्टअप की योजना बना रहे है, हालांकि पिछले कुछ समय से बेंगलुरु से संचालित हो रही एक एग्रीटेक स्टार्टअप (Agritech startup) के साथ वह पहले से ही बिजनेस डेवलपर के रूप में जुड़े हुए हैं।


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अभिषेक प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (PACs) में होने वाली विपणन की विधियों में भी कुछ सुधार की उम्मीद करते है, क्योंकि वह मानते है कि मंडियों में होने वाले बिचौलिए की जॉब को पूरी तरीके से खत्म कर देना ही किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा। स्टार्टअप की राय पर अभिषेक का मानना है कि वह किसानों और कृषि उत्पादन संगठन (FPOs) के मध्य कम शुल्क पर काम करने वाले एक माध्यम के रूप में भूमिका निभाने वाली स्टार्टअप की शुरुआत करना चाहते है और उनकी कोशिश है कि किसानों को उगाई गई उपज की सरकार के द्वारा तय किए गए मिनिमम सपोर्ट प्राइस (Minimum Support Price -MSP) से कुछ ज्यादा ही राशि मिले। अपनी इस स्टार्टअप यात्रा के दौरान अभिषेक एम.एस.स्वामीनाथन समिति के द्वारा दिए गए सुझावों को मध्य नजर रखते हुए अपने स्तर पर भारतीय कृषि में कुछ बदलाव करने की सोच भी रखते है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर से अभिषेक को 2014 में सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके अलावा भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के द्वारा दिया जाने वाला भारतीय कृषि रत्न पुरस्कार जीतने वाले अभिषेक प्राकृतिक खेती को ज्यादा प्राथमिकता देते है और हमेशा घर पर तैयार की हुई प्राकृतिक गोबर खाद से ही अधिक उत्पादन प्राप्त करने की कोशिश करते है। अभिषेक का मानना है कि भारतीय किसान जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग ( Zero budget natural farming) और समोच्च कृषि (Sustainable development) जुताई विधियों की मदद से आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही विदेशी मार्केट में भी अपनी पकड़ बना पाएंगे। आशा करते हैं कि Merikheti.com के द्वारा बिहार के अवॉर्ड विजेता किसान अभिषेक की कृषि क्षेत्र में प्राप्त सफलताओं और उनके नए विचारों से जुड़ी यह जानकारी आपको पसंद आई होगी और आने वाले समय में आप भी ऐसी ही भविष्यकारी नीतियों को अपनाकर एक सफल किसान बनने की राह पर जरूर अपना लक्ष्य प्राप्त करेंगे।
इस फार्मिंग के जरिये एक स्थान पर विभिन्न फसल उगा सकते हैं

इस फार्मिंग के जरिये एक स्थान पर विभिन्न फसल उगा सकते हैं

मल्टीलेयर फार्मिंग(Multilayer Farming) में एक स्थान पर विभिन्न फसलों का उत्पादन किया जा सकता है। किसान सोच समझ के फसलों का चयन कर काफी कम भूमि में से भी लाखों रुपये की आमंदनी कर सकते हैं। कृषि देश की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है, क्योंकि देश की बहुत बड़ी जनसँख्या कृषि पर ही आश्रित रहती है। किसानों को अच्छी आय वाली खेती के लिए कृषि विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक अपने-अपने स्तर से शोध करते रहते हैं। एक खेती में ही अन्य फसल का भी उत्पादन कर किसान दोगुना मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। परंतु आज हम आपको उस खेती के सम्बन्ध में जानकारी देने वाले हैं। जिसके अंतर्गत एक, दो नहीं कृषि की विभिन्न परतें (Layer) होती हैं। सभी परतों पर फसल उत्पादन कर अच्छा खासा मुनाफा अर्जित किया जा सकता है। इसलिए ही इसका नाम मल्टीलेयर फार्मिंग (Multilayer Farming) है। मल्टीलेयर फार्मिंग(Multilayer Farming), नाम से ही पता चलता है, कि एक ही जगह पर विभिन्न प्रकार की खेती करना। इसमें 3, 4 ही नहीं 5 प्रकार की कृषि भी की जा सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसमें मृदा के प्रयोग को देखा जाता है। हालाँकि कुछ फसलें भूमि के अंदर दबी हों, कुछ ऊपर, कुछ अधिक बड़े स्तर पर एवं कुछ अन्य किस्मों की कृषि की जा सकती है। फसल चक्र के संदर्भ में बात करें तो कुछ कम, कुछ मध्यम एवं कुछ पकने में ज्यादा वक्त लगा सकती हैं।


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मल्टीलेयर फार्मिंग (Multilayer Farming) में फसलों का बेहतर चुनाव करने में सतर्कता अत्यंत आवश्यक है। प्रथम परत में बड़े पौधे लगाने पर अन्य परत खराब हो जाएंगी। विशेषज्ञों ने बताया है, कि पहली परत में छोटे पौधे के रूप में अदरक एवं हल्दी का उत्पादन कर सकते हैं। दूसरी परत में भी कम ऊंचाई एवं कम गहराई साग-सब्जियों की फसलों का चुनाव करें। तीसरी परत में बड़े पेड या पौधे, पपीता अथवा अन्य फलदार पौधे उगाये जा सकते हैं। चौथी परत में किसी भी बेल फसल उगा सकते हैं। यह पोषक तत्व भूमि से लेती रहेगी, परंतु इसका विस्तार अत्यधिक सीमित होगा।

क्यों आवश्यक है, मल्टीलेयर फार्मिंग का परीक्षण

मल्टीलेयर फार्मिंग (Multilayer Farming) से उचित मुनाफा अर्जित करने हेतु इसका प्रशिक्षण लेना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए कृषि विशेषज्ञ अथवा कृषि वैज्ञानिक या फिर किसी कृषि अधिकारी से सलाह ली जा सकती है। दरअसल, फसलों के उत्पादन हेतु पर्यावरण का अनुकूल होना अति आवश्यक है। देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में तापमान अलग अलग रहता है। ऐसे में जिस स्थान पर मल्टीलेयर फार्मिंग की जाए, वहाँ फसलों का बेहतर चुनाव उसी के अनुकूल हो, इससे किसान 4 से 5 गुना अधिक बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

मल्टीलेयर फार्मिंग छत पर भी कर सकते हैं।

मल्टीलेयर फार्मिंग (Multilayer Farming) भूमि ही बल्कि छत पर भी उत्पादित की जा सकती है, परंतु इसके उत्पादन हेतु छत पर भूमि की तरह अवस्था निर्मित होगी। देसी खाद युक्त मृदा की मोटी परत छत पर बिछा दीजिए। अगर पौधे ज्यादा गहराई वाले हैं, तो मृदा की परत एवं ज्यादा मोटी हो। बैंगन, टमाटर, भिंडी, गाजर, मूली, पालक आदि फसलें छत पर उत्पादित की जा सकती हैं।


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इसके अंतर्गत 70 प्रतिशत कम जल की आवश्यकता है।

मल्टीलेयर फार्मिंग (Multilayer Farming) का विशेष फायदा यह है, कि इसमें जल की न्यूनतम आवश्यकता होती है। दरअसल, एक ही मृदा की परत में समस्त फसलें उगायी जाती हैं। जब एक फसल को जल दिया जाता है, तो अन्य फसलों की भी सिंचाई हो जाती है। इस प्रकार लगभग 70 फीसदी कम जल की आवश्यकता होती है।
उत्तर प्रदेश के उत्कृष्ट ने CRPF की सरकारी नौकरी छोड़ बने सफल किसान

उत्तर प्रदेश के उत्कृष्ट ने CRPF की सरकारी नौकरी छोड़ बने सफल किसान

उत्तर प्रदेश राज्य के उत्कृष्ट पांडेय व उनके पिता जी ने एकसाथ मिलकर के 60 हजार चंदन की नर्सरी तैयार कर डाली है। सरकारी नौकरी को त्याग उन्होंने सफेद चंदन एवं काली हल्दी की फसल उत्पादन करने का निर्णय लिया है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल मतलब CAPF's के एक अधिकारी ने स्वयं की अच्छी खाशी नौकरी छोड़ सफेद चंदन एवं काली हल्दी का उत्पादन आरंभ किया है। इस कदम का एक उद्देश्य उत्तर भारत में इन उत्पादों की कृषि आरंभ कर ग्रामीण युवाओं हेतु रोजगार के नवीन अवसर प्रदान करना भी है। उत्तर प्रदेश राज्य के उत्कृष्ट पांडेय ने 2016 में सशस्त्र सीमा बल यानी SSB में Assistant Commandant की स्वयं की नौकरी छोड़ दी। लखनऊ से लगभग 200 किलोमीटर दूरस्थ प्रतापगढ़ के भदौना गांव में स्वयं की कंपनी मार्सेलोन एग्रोफार्म प्रारंभ की।


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उत्कृष्ट पांडेय ने बताया है, कि मैं चाहता हूं कि युवा देश को आत्मनिर्भर करने में सहायता करें। उन्होंने 2016 में नौकरी त्याग दी एवं विभिन्न विकल्पों पर विचार विमर्श करने के उपरांत सफेद चंदन एवं काली हल्दी का उत्पादन करने का निर्णय लिया गया है।

उत्कृष्ट पांडेय ने कहाँ से की है अपनी पढ़ाई

उत्कृष्ट पांडेय ने बताया है, कि सब सोचते थे, कि चंदन का उत्पादन केवल दक्षिण भारत में ही किया जा सकता है। लेकिन मैंने अत्यधिक गहनता से अध्ययन कर पाया कि हम उत्तर भारत में भी इसका उत्पादन कर सकते हैं। इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ वुड साइंस एंड टेक्नोलॉजी (Institute of Wood Science and Technology ) में पढ़ाई की। उत्कृष्ट का दावा है, कि एक किसान तकरीबन 250 पेड़ों को 14-15 वर्ष में पूर्ण रूप से तैयार होने पर दो करोड़ रुपये से ज्यादा आय कर सकता है। इसी प्रकार काली हल्दी का भाव 1,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक बढ़ गया है।

किसकी सहायता से की उत्कृष्ट ने नर्सरी

उत्कृष्ट पांडेय स्वयं के पिता के साथ साझा तौर पर 60 हजार चंदन की नर्सरी तैयार करदीं हैं। साथ ही, 300 चंदन के पौधे अब पेड़ में तब्दील हो चुके हैं। फिलहाल चंदन का वृक्ष तकरीबन 7, 8 फीट तक के हो गए हैं। सेवानिवृत्त असिस्टेंट कमांडेंट द्वारा काली हल्दी की भी कई बीघे में की जा रही है। काली हल्दी का उपयोग औषधियाँ बनाने के लिए किया जाता है, इसी वजह से इसका अच्छा खासा मूल्य मिल जाता है। पूर्व अफसर ने नौकरी छोड़के बेहद कीमती चंदन एवं हल्दी का बड़े स्तर पर उत्पादन करने की वजह से प्रत्येक व्यक्ति उनकी सराहना करता हुआ नजर आ रहा है।
बाजारी गुलाल को टक्कर देंगे हर्बल गुलाल, घर बैठे आसानी से करें तैयार

बाजारी गुलाल को टक्कर देंगे हर्बल गुलाल, घर बैठे आसानी से करें तैयार

होली के त्यौहार की रौनक बाजारों में दिखने लगी हैं. हर तरफ जश्न का मौहाल और खुशियों के रंग में डूब जाने की हर किसी की तैयारी है. तो ऐसे में बाजारी गुलाल रंग में भंग न डालें, इसलिये हर्बल गुलाल की डिमांड बाजार में सबसे ज्यादा देखने को मिल रही है. हालांकि पिछले साल की तरह इस साल भी होली के सीजन में हर्बल गुलाल तेजी से तैयार किये जा रहे  हैं. को पालक, लाल सब्जियों, हल्दी, फूलों और कई तरह की जड़ी बूटियों से तैयार किये जा रहे हैं. ये हर्बल गुलाल बाजारी गुलाल को मात देने के लिए काफी हैं. विहान यानि की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की महिलाएं होली के त्यौहार को देखते हुए हर्ब गुलाल बनाने में जुट चुकी हैं. हर्बल गुलाल लगाने से स्किन में किसी तरह का कोई भी इन्फेक्शन या साइड इफेक्ट होने का डर नहीं होता. क्योनी ये गुलाल पूरी तरह से केमिकल फ्री होते हैं.

प्रदेश में बढ़ रही हर्बल गुलाल की डिमांड

अच्छे गुणों की वजह से हर्बल गुलाल की डिमांड पूरे प्रदेश के साथ साथ स्थानीय बाजारों में बढ़ रही है. जिसे देखते हुए विहान की महिलाओं को घर बैठे बैठे ही रोजगार मिल रहा है और अच्छी कमाई हो रही है. इसके अलावा महासमुंद के फ्राम पंचायत डोगरीपाली की जय माता दी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं भी तैयारियों में जुट गयी हैं और हर्बल गुलाल बना रही गौब. समूह की सदस्यों की मानें तो पिछले साल की होली में लगभग 50 किलो तक हर्बल गुलाल के पैकेट तैयार किये थे. जिसकी डिमांड ज्यादा रही. महिलाओं ने बताया कि, हर्बल गुलाल के पैकेट 10 रुपये से लेकर 20 और 50 रुपये के हर्बल गुलाल के पैकेट बनाए गये थे. इस बार ज्यादा मात्रा में गर्ब्ल और गुलाल तैयार किया जा रहा है. बात इस हर्बल गुलाल की तैयारी की करें तो इसे पालक, लाल सब्जी, हल्दी, जड़ी-बूटी, फूल और पत्तियों को सुखाकर प्रोसेसिंग यूनिट में पीसकर तैयार किया जाता है. ये भी देखें: बागवानी के साथ-साथ फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर हर किसान कर सकता है अपनी कमाई दोगुनी

हरी पत्तियां भी होती हैं प्रोसेस

हरी पत्तियों में गुलाब, चुकंदर, अमरूद, आम और स्याही फूल की पत्तियों को प्रोसेस किया जाता है. करीब 150 रुपये तक का खर्च एक किलो गुलाल बनाने में आता है. सिंदूर के अलावा पालक और चुकंदर का इस्तेमाल गुलाल बनाने में किया जाता है. बाजार में हर्बल गुलाल की कीमत बेहद कम होती है. गर्ब्ल गुलाल बनाने से न सिर्फ महिलाओं को घर बोथे रोजगार मिल रहा है, बल्कि अच्छी कमाई भी हो रही है. जिले की ग्राम पंचायत मामा भाचा महिला स्व सहायता समूह की महिलाएं इस साल पालक, लाल सब्जी, फूलों और हल्दी से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं. जिससे पीला, नारंगी, लाल और चंदन के कलर के गुलाल बनाए जा रहे हैं. जिसे स्व सहायता समूह की महिलाएं गौठान परिसर और दुकानों के जरिये बेच रही हैं. इतना ही नहीं समूह को हर्बल गुलाल के ऑर्डर भी मिलने लगे हैं. हर्बल गुलाल बनाने में हल्दी, इत्र, पाल्स का फूल समेत कई तरह की साग सब्जियों और खाने वाले चूने का इस्तेमाल किया जाता है.
किसान अप्रैल माह में उगाई जाने वाली इन फसलों से कर पाएंगे अच्छी आय

किसान अप्रैल माह में उगाई जाने वाली इन फसलों से कर पाएंगे अच्छी आय

आज हम बात करने वाले हैं, अप्रैल माह में उगाई जाने वाली अच्छी फसलों के बारे में जिनसे किसानों को अच्छी आय हो सके। जैसा कि हम जानते हैं, कि अप्रैल माह तक तकरीबन समस्त रबी फसलें कट जाती हैं। किसान अपनी पैदावार को भी प्रबंधन करके मंडी पहुंचाने लग जाते हैं। अब जायद सीजन की फसलें बोई जानी हैं। ये फसलें मुनाफे के सहित मृदा की उपजाऊ शक्ति को भी बढ़ा देती हैं।

अप्रैल माह में उगाई जाने वाली फसलें

रबी फसलों की कटाई और खरीफ सीजन से पूर्व कुछ महीनों के मध्य में खाली बच जाते हैं, जिसे जायद सीजन भी कहा जाता है। इसके दौरान बहुत सी तिलहनी एवं दलहनी फसलों की बुवाई की जाती है, जो धान मक्का की खेती से पूर्व ही तैयार हो जाती है। जायद सीजन के तहत खास बागवानी फसलों की भी बुवाई की जाती है। इसके अतिरिक्त अधिकाँश किसान मृदा की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने हेतु जायद सीजन में लोबिया, मूंग और ढेंचा का उत्पादन भी किया जाता है। इससे मृदा में नाइट्रोजन का स्तर काफी बढ़ जाता है।

बुवाई से पहले बीजोपचार अत्यंत जरुरी है

रबी फसलों की कटाई के उपरांत सर्वप्रथम खेत में गहरी जुताई कर खेत को तैयार कर लें। जायद सीजन की फसलों की बुवाई करने से पूर्व मृदा की जांच जरूर करवा लें। क्योंकि मृदा परिक्षण से समुचित मात्रा में खाद-उर्वरक का इस्तेमाल करने की राहत मिल सकेगी। गैर जरुरी चीजों पर होने वाले खर्चों से छुटकारा मिल पाएगा। हर फसल सीजन के उपरांत मृदा परीक्षण करवाने से इसकी खामियों की भी जानकारी मिल जाती है। जिनका समयानुसार उपचार किया जा सकता है।

बेबी कॉर्न और साठा मक्का का उत्पादन

यह समय साठी मक्का और बेबी कॉर्न की खेती के लिए उपयुक्त है। इन दोनों फसलों को पककर तैयार होने में लगभग 60 से 70 दिन का समय लगता है। फिर कटाई के उपरांत सुगमता से धान की बिजाई का कार्य भी किया जा सकता है। वर्तमान में बेबी कॉर्न भी काफी चलन में है। बतादें, कि इस मक्का को कच्चा ही बेचा जा सकता है। इतना ही नही भोजनालयों में भी बेबी कॉर्न के पकौड़े, सूप, सलाद, सब्जी, अचार आदि बेहद प्रसिद्ध हैं। ये भी पढ़े: बेबी कॉर्न की खेती (Baby Corn farming complete info in hindi)

बागवानी फसलों की बुवाई

अप्रैल माह में किसान भाई बागवानी फसलों का उत्पादन करके अच्छी आय कर सकते हैं। अप्रैल माह करेला, तोरई, बैंगन, लौकी और भिंडी की खेती के लिए काफी अच्छा होता है। बेमौसम बारिश की मार से जायद सीजन की फसलों को संरक्षित करने के लिए किसान भाई ग्रीन हाउस, लो टनल और पॉलीहाउस की व्यवस्था कर लें। इन संरक्षित ढांचों को तैयार करने के लिए राज्य सरकारें किसानों को अनुदान भी उपलब्ध करवाती हैं।

उड़द की बुवाई

अप्रैल माह उड़द की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। दरअसल, जलभराव वाले क्षेत्रों में इसका उत्पादन करने से बचना चाहिए। उड़द का उत्पादन करने के लिए प्रति एकड़ 6-8 किलो बीजदर का उपयोग करें। साथ ही, किसान अपने खेत में उड़द की बुवाई करने से पूर्व थीरम अथवा ट्राइकोडर्मा से उपचारित जरूर कर लें।

अरहर की बुवाई

किसान दलहन उत्पादन के संबंध में आत्मनिर्भर होने के तरफ अग्रसर होने के लिए अरहर की फसल उगा सकते हैं। जल निकासी वाली मृदा में कतारों में अरहर का बीजारोपण किया जाता है। यह फसल 60 से 90 दिनों के समयांतराल में पककर कटाई हेतु तैयार हो जाती है। अगर आप चाहें, तो अरहर की कम समयावधि वाली किस्मों का बीजारोपण कर जल्दी उत्पादन हांसिल कर सकते हैं।

सोयाबीन की बुवाई

अप्रैल माह में बोई जाने वाली सोयाबीन की फसल में संक्रमण और बीमारियों की आशंका काफी कम ही रहती है। यह फसल वातावरण में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का कार्य करती है। जलभराव वाले स्थानों में सोयाबीन की बुवाई करना ठीक नहीं होता है। सोयाबीन की बेहतरीन पैदावार लेने के लिए बुवाई से पूर्व खेत की 3 गहरी जुताईयां करना काफी अच्छा माना जाता है। ये भी पढ़े: Soyabean Tips: लेट मानसून में भी पैदा करना है बंपर सोयाबीन, तो करें मात्र ये काम

मूँगफली की बुवाई

अप्रैल माह के आखिरी सप्ताह तक मतलब कि गेहूं की कटाई के शीघ्र उपरांत मूंगफली की फसल का बीजारोपण किया जा सकता है। यह फसल अगस्त-सितंबर तक पककर तैयार हो सकती है। परंतु, जलनिकासी वाले क्षेत्रों में ही मूंगफली की बुवाई करना उचित रहता है। किसान मूँगफली का बेहतर उत्पादन लेने हेतु हल्की दोमट मिट्टी में बीजोपचार के उपरांत ही मूंगफली के दानों की खेत में बिजाई कर दें।

ढेंचा की बुवाई

खरीफ सीजन की धान-मक्का की बुवाई से पूर्व किसान बाई ढेंचा मतलब कि हरी खाद की फसल उठा सकते हैं। इससे खाद-उर्वरकों पर खर्च किए जाने वाली धनराशि को सुगमता से बचाया जा सकता है। ढेंचा की फसल 45 दिन के समयांतराल में लगभग 5 से 6 सिंचाईयों में पककर तैयार हो जाती है। अब इसके उपरांत धान का उत्पादन करने पर फसलीय गुणवत्ता एवं पैदावार बेहतरीन मिलती है। गेहूं की कटाई करने के उपरांत कृषि वैज्ञानिकों से जानकारी एवं अपने स्थान-जलवायु के मुताबिक गन्ना एवं कपास की बिजाई भी कर सकते हैं। साथ ही, फसलीय कीट एवं रोगिक संक्रमण की आशंकाओं को समाप्त करने हेतु पूर्व से ही बीजोपचार पर कार्य जरूर कर लें।
इस तरह से खेती करके किसान एक ही खेत में दो फसलें उगा सकते हैं

इस तरह से खेती करके किसान एक ही खेत में दो फसलें उगा सकते हैं

आजकल उपलब्ध आधुनिक कृषि तकनीकों से जोखिम को कम किया जा सकता है। इतना ही नहीं कुछ तकनीकें तो कम वक्त में फसलों से ज्यादा आमदनी कराने में भी सहयोग करती हैं। वर्तमान में किसान एक ही भूमि पर एक साथ 2 से अधिक फसलें उत्पादित कर सकता है। आधुनिकता के जमाने में फिलहाल हमारा कृषि क्षेत्र भी सुपर एडवांस होने की दिशा में तेजी से बढ़ता जा रहा है। किसान आजकल यंत्रों और नई तकनीकों के माध्यम से फसल का बेहतरीन उत्पादन कर रहे हैं। इसी कड़ी में जोखिम को कम करके कृषकों की आमदनी बढ़ाने हेतु वैज्ञानिक भी नित नई तरकीबें पेश कर रहे हैं। अंतरवर्तीय खेती भी इन तरकीबों में शामिल है। यह तरीका बढ़ती आबादी की खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने एवं कम खेती-कम वक्त में ज्यादा पैदावार लेने में सहायक भूमिका निभा रहा है। अगर किसान को फसल चक्र की सटीक जानकारी है, तो वह अंतरवर्तीय खेती के जरिए अपनी आमदनी को दोगुनी कर सकता है। आजकल जायद सीजन की फसलों की बुवाई का कार्य चल रहा है। बहुत सारे किसान भाई अपने खेत में ग्रीष्मकालीन मूंग सहित विभिन्न दलहनी फसलों का उत्पादन ले सकते हैं। अगर कतारों में दलहन की बुवाई की गई है, तो मध्य में हल्दी, अदरक की भांति औषधी और मसाला फसलों का उत्पादन करके दोगुना उत्पादन ले सकते हैं। अंतरवर्तीय खेती की सर्वाधिक विशेष बात यही है, कि कतारों में 2 से ज्यादा फसलों की बुवाई की जा सकती हैं। इसमें अलग से खाद-उर्वरक का खर्चा नहीं आता है। किसान को केवल भिन्न-भिन्न बीज डालने होते हैं, जिसके उपरांत एक ही फसल में लगाए जाने वाले इनपु्ट्स से सारी फसलों की उन्नति हो सकती है।

अरहर और हल्दी की अंतरवर्तीय खेती से अच्छा मुनाफा हांसिल किया जा सकता है

अरहर एक प्रमुख दलहनी फसल मानी जाती है, तो वहीं मसाला एवं औषधी के रूप में बाजार में हल्दी की काफी मांग रहती है। एक ही भूमि पर कतारों में इन दोनों फसलों को बोया जा सकता है। हालांकि, हल्दी को छायादार जगह पर उत्पादित किया जाता है, इस वजह से अरहर समेत इसकी फसल लेना काफी फायदेमंद रहेगा। यह भी पढ़ें: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में एक साथ बुवाई करके दोनों फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। अरहर जैसी दलहनी फसलों के साथ अंतरवर्तीय खेती करने का सबसे बड़ा लाभ यह है, कि यह फसलें वातावरण से नाइट्रोजन को सोखकर भूमि तक पहुंचाती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरकता में वृद्धि होती है। वहीं साथ-साथ में उगने वाली फसल को इसका प्रत्यक्ष तौर पर फायदा मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, दलहनी फसलों की खेती सहित अथवा इसके उपरांत बोई जाने वाली फसलों की पैदावार में वृद्धि हो जाती है। दलहनी फसलों की कटाई करने के उपरांत अलग से खाद-उर्वरक का इस्तेमाल नहीं करना होता है।

मृदा में कटाव होने से भी बचता है

जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव साफ तौर पर खेती-किसानी पर देखने को मिल रहा है। कभी बेमौसम बारिश तो कभी सूखा जैसी परिस्थितियों से फसलें चौपट होती जा रही हैं। भूजल स्तर में गिरावट आने से मृदा में कटाव काफी बढ़ रहा है। अंतरवर्तीय खेती को इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान माना जाता है। एक सहित विभिन्न फसलों को लगाने से मृदा में जल को बांधने की क्षमता बढ़ जाती है। इससे वर्षा के समय में कटाव की समस्या नहीं रहती एवं मिट्टी में भी नमी बरकरार रहती है। अगर किसी कारणवश एक फसल को हानि पहुँच भी जाए तब भी किसान पर जीवनयापन करने हेतु दूसरी फसल का सहारा मिल जाता है। औषधीय फसलों की अंतरवर्तीय खेती करने अथवा फसल विविधता के चलते फसल में कीट-रोगों का प्रकोप नहीं रहता है। इससे कीटनाशकों का खर्चा बच जाता है। फसल की गुणवत्ता को उत्तम बनी रहने के साथ बाजार में उत्पादन को अच्छा खासा भाव मिल जाता है।

जानें इन फसलों को एकसाथ उगाया जाता है

भारत के तकरीबन समस्त क्षेत्रों में रबी फसलों की कटाई का कार्य पूर्ण हो चुका है। कुछ किसान जायद सीजन की फसल उगा रहे हैं, तो वहीं कुछ खरीफ सीजन के लिए भूमि को तैयार कर रहे हैं। किसान यदि चाहें तो खरीफ सीजन के दौरान अंतरवर्तीय पद्धति से उत्पादन कर सकते हैं। खरीफ सीजन के समय एक साथ उत्पादित की जाने वाली फसलों के अंतर्गत सोयाबीन + मक्का, मूंगफली + बाजरा, मूंगफली + तिल, मूंग + तिल, अरहर + मक्का,अरहर + सोयाबीन, अरहर + तिल, अरहर + मूंगफली आती हैं।