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किसानों के लिए जैविक खेती करना बेहद फायदेमंद, जैविक उत्पादों की बढ़ रही मांग

किसानों के लिए जैविक खेती करना बेहद फायदेमंद, जैविक उत्पादों की बढ़ रही मांग

जैविक खेती से कैंसर दिल और दिमाग की खतरनाक बीमारियों से लड़ने में भी सहायता मिलती है। प्रतिदिन कसरत और व्यायाम के साथ प्राकृतिक सब्जी और फलों का आहार आपके जीवन में बहार ला सकता है।

ऑर्गेनिक फार्मिंग मतलब जैविक खेती को पर्यावरण का संरक्षक माना जाता है। कोरोना महामारी के बाद से लोगों में स्वास्थ्य के प्रति काफी ज्यादा जागरुकता पैदा हुई है। बुद्धिजीवी वर्ग खाने पीने में रासायनिक खाद्य से उगाई सब्जी के स्थान पर जैविक खेती से उगाई सब्जियों को प्राथमिकता दे रहा है।

बीते 4 वर्षों में दो गुना से ज्यादा उत्पादन हुआ है

भारत में विगत चार वर्षों से जैविक खेती का क्षेत्रफल यानी रकबा बढ़ रहा है और दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। 2019-20 में रकबा 29.41 लाख हेक्टेयर था, 2020-21 में यह बढ़कर 38.19 लाख हेक्टेयर हो गया और पिछले साल 2021-22 में यह 59.12 लाख हेक्टेयर था।

कई गंभीर बीमारियों से लड़ने में बेहद सहायक

प्राकृतिक कीटनाशकों पर आधारित जैविक खेती से कैंसर और दिल दिमाग की खतरनाक बीमारियों से लड़ने में भी मदद मिलती है। प्रतिदिन कसरत और व्यायाम के साथ प्राकृतिक सब्जी और फलों का आहार आपके जीवन में शानदार बहार ला सकता है।

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भारत की धाक संपूर्ण वैश्विक बाजार में है 

जैविक खेती के वैश्विक बाजार में भारत तेजी से अपनी धाक जमा रहा है। इतनी ज्यादा मांग है कि सप्लाई पूरी नहीं हो पाती है। आने वाले वर्षों में जैविक खेती के क्षेत्र में निश्चित तौर पर काफी ज्यादा संभावनाएं हैं। सभी लोग अपने स्वास्थ को लेकर जागरुक हो रहे हैं। 

जैविक खेती इस प्रकार शुरु करें 

सामान्य तौर पर लोग सवाल पूछते हैं, कि जैविक खेती कैसे आरंभ करें ? जैविक खेती के लिए सबसे पहले आप जहां खेती करना चाहते हैं। वहां की मिट्टी को समझें। ऑर्गेनिक खेती शुरू करने से पहले किसान इसका प्रशिक्षण लेकर शुरुआत करें तो चुनौतियों को काफी कम किया जा सकता है। किसान को बाजार की डिमांड को समझते हुए फसल का चयन करना है, कि वह कौन सी फसल उगाए। इसके लिए किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों से मशवरा और राय अवश्य ले लें।

सेहत के लिए लाभकारी लहसुन फसल की विस्तृत जानकारी

सेहत के लिए लाभकारी लहसुन फसल की विस्तृत जानकारी

भारत के ज्यादातर राज्यों में लहसुन की खेती बड़े स्तर पर की जाती है। किसानो द्वारा इसकी खेती अक्टूबर से नवंबर माह के बीच में की जाती है। लहसुन की खेती में किसानो द्वारा कलियों को जमीन के अंदर बोया जाता हैं और मिट्टी से ढक दिया जाता हैं। बुवाई करने से पहले एक बार देख ले कंद खराब तो नहीं हैं,अगर कंद खराब हुई तो लहसुन की पूरी फसल खराब हो सकती हैं। 

लहसुन की बुवाई करते वक्त कलियों के बीच की दूरी समान होनी चाहिए। लहसुन की खेती के लिए बहुत ही कम तापमान की आवश्यकता रहती है। इसकी फसल के लिए न ही ज्यादा ठंड की आवश्कता होती हैं और न ही ज्यादा गर्मी की। लहसुन में एल्सिन नामक तत्व पाया जाता हैं, जिसकी वजह से लहसुन में से गंध आती हैं   

लहसुन की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु 

लहसुन की खेती के लिए हमे सामान्य तापमान की जरुरत रहती हैं। लहसुन की कंद का पकना उसके तापमान पर निर्भर करता है। ज्यादा ठंड और गर्मी की वजह से लहसुन की फसल खराब भी हो सकती हैं। 

लहसुन के खेत को कैसे तैयार किया जाये 

लहसुन के खेत की अच्छे से जुताई करने के बाद खेत  में गोबर खाद का प्रयोग करें ,और उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दे। खेत की फिर से जुताई करें ताकि गोबर के खाद को अच्छे से खेत में मिलाया जा सके। इसके बाद खेत में सिंचाई का काम कर सकते है। अगर खेत में खरपतवार जैसे कोई रोग देखने को मिलते हैं तो उसके लिए हम रासायनिक खाद का भी प्रयोग कर सकते है।

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लहसुन खाने से होने वाले फायदे क्या हैं:

  • इम्युनिटी को बढ़ाने में सहायक हैं 
लहसुन खाने से इम्युनिटी बढ़ती हैं ,इसमें एल्सिन नामक तत्व पाया जाता हैं।  जो की शरीर के अंदर इम्मुनिटी को बढ़ाने में सहायता करता है।  लहसुन में जिंक ,फॉस्फोरस और मैग्नीशियम पाया जाता हैं जो की हमारे शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होता हैं। 

  • केलेस्ट्रॉल कम करने में मदद करता हैं 
लहसुन बढ़ते हुए केलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होती हैं ,बढ़ता हुआ केलेस्ट्रॉल हमारे स्वस्थ्य के लिए हानिकारक होता हैं। ये बेकार कॉलेस्ट्रॉल को बहार निकालने में सहायक होता हैं। लहसुन खून को पतला करके  हृदय से जुडी परशानियों को कम करने में सहायक होता हैं। 

  • कैंसर जैसी बीमारियों में रोकथाम 
लहसुन कैंसर बीमारी के रोकथाम में भी सहायक हैं। लहसुन के अंदर पाए जाने वाले बहुत से तत्व ऐसे रहते हैं जो कैंसर के बढ़ते हुए सेल्स को फैलने से रोकता हैं। लहसुन को कैंसर से पीड़ित लोगो के लिए फायदेमंद माना गया है। 

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  • पाचन किर्या में सहायक 

लहसुन खाना पाचन किर्या के लिए सुलभ माना जाता हैं। लहसुन को आहार में लेने से,ये आंतो पर आयी सूजन को कम करता है। लहसुन खाने से पेट में पड़ने वाले कीड़े खत्म हो जाते है। साथ ही यह आंतो को लाभ पहुँचता है। लहसुन खाने से शरीर के अंदर पड़ने वाले बेकार बैक्टीरिया को नष्ट करता हैं। 

लहसुन खाने से होने वाले नुक्सान क्या हैं 

लहसुन खाने से बहुत से फायदे होते हैं ,लेकिन कभी कभी लहसुन का ज्यादा उपयोग करना हानिकारक होता हैं।  जानिए लहसुन के ज्यादा उपयोग करने से होने वाले नुक्सान :

  • लो ब्लड प्रेशर वालों के लिए हानिकारक 
लहसुन खाना ज्यादातर हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए बेहतर माना जाता हैं ,लेकिन यही इसका दुष्प्रभाव लो ब्लड प्रेशर वालो के व्यक्तियों के ऊपर पड सकता है। लहसुन का तासीर गर्म होता हैं जिसकी वजह से यह ,लो ब्लड प्रेशर वाले लोगो के लिए फायदेमंद नहीं  हैं। इसके खाने से जी मचलना और सीने पर जलन होना आदि हो सकता है। 

  • गैस और एसिडिटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं 
लहसुन खाने से पाचन किर्या से सम्बंधित बहुत सी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं , ज्यादा लहसुन खाने से डायरिया जैसी बीमारी भी हो सकती है। कमजोर पाचन किर्या वाले लोगो को ज्यादा लहसुन का पचाव अच्छे से नहीं हो पाता है ,जिसकी वजह से पेट में गैस ,दर्द और एसिडिटी जैसी बीमारियां भी उत्पन्न होती है।  

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  • रक्तश्राव और एलेर्जी जैसी समस्याओं को बढ़ावा देता हैं

जो रोजाना लहसुन का सेवन करते हैं उन्हें रक्तश्राव जैसे परेशानियां हो सकती हैं। लहसुन का उपयोग एलेर्जी से पीडित लोगो को नहीं करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को पहले से एलेर्जी हैं तो वो स्वास्थ्य परामर्श से सलाह लेकर लहसुन का प्रयोग कर सकते है। 

लहसुन का सेवन ज्यादातर सर्दियों के मौसम में किया जाता हैं, क्यूंकि लहसुन गर्म तासीर का रहता हैं। सर्दियों में ज्यादातर लोगो द्वारा भुना हुआ लहसुन खाया जाता है, क्यूंकि ये वजन कम करने और दिल को स्वस्थ्य रखने में मददगार रहता है। लेकिन जरुरत से ज्यादा लहसुन का उपयोग करने से शरीर को बहुत से नुकसान भी हो सकते है। लहसुन का खाली पेट सेवन करने से एसिडिटी जैसी समस्या भी हो सकती है। 

लहसुन में ब्लड को पतला करने वाले कुछ गुण विघमान होते हैं ,जो हृदय से संबंधित समस्याओं के लिए अच्छे होते हैं। अगर लहसुन का अधिक इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे ब्लीडिंग जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। लहसुन को खाने का सबसे सही तरीका यह है, कि आप सुबह खाली पेट एक गिलास गर्म पानी के साथ लहसुन का सेवन करें। ये स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को नियंत्रित करता है। साथ ही, त्वचा से जुड़े रोगो के लिए भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है। 

इस राज्य के किसान ने एक साथ विभिन्न फलों का उत्पादन कर रचा इतिहास

इस राज्य के किसान ने एक साथ विभिन्न फलों का उत्पादन कर रचा इतिहास

आज हम आपको गुरसिमरन सिंह नामक एक किसान की सफलता की कहानी बताने जा रहे हैं। बतादें, कि किसान गुरसिमरन ने अपने चार एकड़ के खेत में 20 से अधिक फलों का उत्पादन कर लोगों के समक्ष एक नजीर पेश की है। आज उनके फल विदेशों तक बेचे जा रहे हैं। पंजाब राज्य के मालेरकोटला जनपद के हटोआ गांव के युवा बागवान किसान गुरसिमरन सिंह अपनी समृद्ध सोच की वजह से जनपद के अन्य कृषकों के लिए भी प्रेरणा के स्रोत बन चुके हैं। यह युवा किसान गुरसिमरन सिंह अपनी दूरदर्शी सोच के चलते पंजाब के महान गुरुओं-पीरों की पवित्र व पावन भूमि का विस्तार कर रहे हैं। वह प्राकृतिक संसाधनों एवं पर्यावरण के संरक्षण हेतु अथक व निरंतर कोशिशें कर रहे हैं। साथ ही, समस्त किसानों एवं आम लोगों को प्रकृति की नैतिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के तौर पर प्राकृतिक संसाधनों को बचाने हेतु संयुक्त कोशिशें भी कर रहे हैं।

किसान गुरसिमरन ने टिश्यू कल्चर में डिप्लोमा किया हुआ है

बतादें, कि किसान गुरसिमरन सिंह ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना से टिश्यू कल्चर में डिप्लोमा करने के पश्चात अपनी चार एकड़ की भूमि पर जैविक खेती के साथ-साथ विदेशी
फलों की खेती शुरु की थी। गुरसिमरन अपनी निजी नौकरी के साथ-साथ एक ही जगह पर एक ही मिट्टी से 20 प्रकार के विदेशी फल पैदा करने के लिए विभिन्न प्रकार के फलों के पेड़ लगाए थे। इससे उनको काफी ज्यादा आमदनी होने लगी थी। किसान गुरसिमरन सिंह के अनुसार, यदि इंसान के मन में कुछ हटकर करने की चाहत हो तो सब कुछ संभव होता है।

विदेशों तक के किसान संगठनों ने उनके अद्भुत कार्य का दौरा किया है

किसान गुरसिमरन की सफलता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है, कि पीएयू लुधियाना से सेवानिवृत्त डाॅ. मालविंदर सिंह मल्ली के नेतृत्व में ग्लोबल फोकस प्रोग्राम के अंतर्गत आठ देशों (यूएसए, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, जर्मनी, न्यूजीलैंड, स्विटजरलैंड आदि) के बोरलॉग फार्मर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने किसान गुरसिमरन सिंह के अनूठे कार्यों का दौरा किया। यह भी पढ़ें: किसान इस विदेशी फल की खेती करके मोटा मुनाफा कमा सकते हैं

किसान गुरसिमरन 20 तरह के फलों का उत्पादन करते हैं

वह पारंपरिक फल चक्र से बाहर निकलकर जैतून, चीनी फल लोगान, नींबू, अमरूद, काले और नीले आम, जामुन, अमेरिकी एवोकैडो और अंजीर के साथ-साथ एल्फांजो, ब्लैक स्टोन, चोसा, रामकेला और बारामासी जैसे 20 तरह के फलों का उत्पादन करते हैं। किसान गुरसिमरन ने पंजाब में प्रथम बार सौ फल के पौधे लगाकर एक नई पहल शुरु की है। इसके अतिरिक्त युवा किसान ने जैविक मूंगफली, माह, चना, हल्दी, गन्ना, ज्वार,बासमती, रागी, सौंफ, बाजरा, देसी और पीली सरसों आदि की खेती कर स्वयं और अपने परिवार को पारंपरिक फसलों के चक्र से बाहर निकाला है। गुरसिमरन की इस नई सोच की वजह से जिले के किसानों ने भी अपने आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाया है। साथ ही, लोगों को पारंपरिक को छोड़ नई कार्यविधि से खेती करने पर आमंत्रित किया है।
लहसुन की पैदावार कितनी समयावधि में प्राप्त की जा सकती है

लहसुन की पैदावार कितनी समयावधि में प्राप्त की जा सकती है

किसान भाई अपने घर के अंदर ही बड़ी सहजता से लहसुन का उत्पादन कर सकते हैं। यह लगभग आठ महीने में तैयार हो जाता है। लहसुन एक ऐसा मसाला है, जो किसी भी व्यंजन के स्वाद और जायके को सुगमता से बढ़ा सकता है। साथ ही, स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लहसुन का महत्व किसी से छिपा नहीं है। आयुर्वेद में लहसुन को सौ मर्ज की एक औषधी बताया गया है। घर की थाली में यदि आप ताजा लहसुन को शम्मिलित करना चाहते हैं, तो इसे अपने घर में उगा सकते हैं। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखना जरूरी है। कुछ आसान टिप्स अपनाकर आप घर में उगे लहसुन का लुफ्त उठा सकते हैं।

किसान भाई बेहतर गुणवत्ता वाले लहसुन का ही चयन करें

अगर आप अपने घर के अंदर लहसुन उगाने की योजना तैयार कर रहे हैं, तो सदैव सुनिश्चित करें कि आप बेहतरीन गुणवत्ता वाले लहसुन को ही चुनें। इससे उत्पादन काफी अच्छा होगा। मजबूत और बेदाग बड़ी कलियां चुनें, जिससे कि बेहतरीन गुणवत्ता वाला लहसुन उगाने में सहायता मिलेगी।

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लहसुन उत्पादन के लिए मृदा कैसी होनी चाहिए

घर में लहसुन उगाना सुगम नहीं होता है। इसके लिए मृदा की पीएच वैल्यू 7.0 के आसपास ही रहनी चाहिए। मृदा अत्यधिक अम्लीय अथवा क्षारीय नहीं होनी चाहिए। मृदा में खाद के साथ गोबर मिलाना फायदेमंद रहेगा। मृदा की आधी मात्रा के बराबर गोबर मिलादें। ज्यादा नाइट्रोजन वाले उर्वरक पौध को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

लहसुन की फसल में कार्बनिक खाद का उपयोग लाभकारी

लहसुन की फसल आठ माह के अंदर पककर तैयार होती है। तब पत्तियां हरा रंग छोड़कर पीली पड़ने लगती हैं। लहसुन की फसल के लिए कार्बनिक खाद का इस्तेमाल अधिक अच्छा माना जाता है।

लहसुन का पौधरोपण इस प्रकार करें

लहसुन की कली को बड़ी ही सावधानी से निकालें। परतदार छिलके को बिल्कुल न हटाएं। कलियां अलग करते वक्त आप कंद को नुकसान न पहुंचाएं। बड़ी कली लगाना सबसे बेहतर होता है, जिसमें छोटे अंकुर दिखाई पड़ते हैं। रोपण के लिए पंक्तियों के मध्य 6 इंच की दूरी होनी चाहिए। रोपण के उपरांत सीमित मात्रा में ही पानी डालें साथ ही कली को मृदा से ढक दें।
सरकार टमाटर की तरह नही बढ़ने देगी प्याज के दाम

सरकार टमाटर की तरह नही बढ़ने देगी प्याज के दाम

आजकल टमाटर और अदरक के भाव बढ़ने से लोगों को लगता है, कि प्याज की कीमतों में भी इजाफा होगा। उपभोक्ता मामलों के सचिव रोहित कुमार सिंह ने रविवार को बताया है, कि सरकार ने 3 लाख टन प्याज खरीदा है, जो पिछले साल के बफर स्टॉक से 20 प्रतिशत ज्यादा है। प्याज की लाइफ बढ़ाने के लिए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के साथ प्याज पर रेडिएशन का परीक्षण भी किया जा रहा है। गगनचुंबी टमाटर की कीमतों ने संपूर्ण भारत को हिलाकर रख दिया है। ऐसे में प्याज को लेकर अभी से तैयारी करनी चालू कर दी है, जिससे आने वाले दिनों में प्याज की कीमतों में कोई बदलाव देखने को नहीं मिले। उपभोक्ता मामलों के सचिव रोहित कुमार सिंह ने रविवार को बताया है, कि सरकार ने 3 लाख टन प्याज खरीदी है, जो कि विगत वर्ष के बफर स्टॉक से 20 प्रतिशत ज्यादा है। साथ ही, प्याज की निजी जिंदगी बढ़ाने के लिए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) के साथ प्याज पर रेडिएशन का परीक्षण भी किया जा रहा है। वित्त वर्ष 2022-23 में सरकार ने बफर स्टॉक के रूप में 2.51 लाख टन प्याज रखा था।

प्याज का 3 लाख टन का भरपूर भंडारण

अगर कम आपूर्ति वाले मौसम में कीमतें बेहद बढ़ जाती हैं, तो किसी भी आपात परिस्थिति को पूरा करने के लिए प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड (पीएसएफ) के अंतर्गत बफर स्टॉक तैयार किया जाता है। रोहित सिंह का कहना है, कि त्योहारों के मौसम में किसी भी हालात से जूझने के लिए, सरकार ने इस वर्ष 3 लाख टन तक का मजबूत भंडारण विकसित किया है। प्याज को लेकर कोई परेशानी नहीं है। भरपूर भंडारण हेतु जो प्याज खरीदा गया है, वह वर्तमान में समाप्त हुए रबी सीजन का है। ये भी पढ़े: जानें टमाटर की कीमतों में क्यों और कितनी बढ़ोत्तरी हुई है

खरीफ सीजन में प्याज की बुवाई

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि भारत के विभिन्न इलाकों में प्याज की बुवाई शुरू हो चुकी है। जिसकी फसल की आवक अक्टूबर माह में आनी चालू हो जाएगी। वर्तमान दौर में प्याज की खरीद हाल ही में निकले रबी सीजन से की जा रही है। वर्तमान में खरीफ प्याज की बिजाई चल रही है। बतादें, कि अक्टूबर में इसकी आवक चालू हो जाएगी। सचिव ने बताया है, कि सामान्य तौर पर खुदरा बाजारों में प्याज का भाव 20 दिनों अथवा उसके समीपवर्ती दबाव में रहती हैं। जब तक कि ताजा खरीफ फसल बाजार में नहीं आ जाती। परंतु, इस बार कोई दिक्कत नहीं होगी।

इस तरह बढ़ जाएगी प्याज की जीवनावधि

परमाणु ऊर्जा विभाग एवं भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के साथ मिलकर उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय इस मध्य प्याज भंडारण के लिए एक तकनीक का परीक्षण कर रहा है। रोहित सिंह ने बताया है, कि पायलट बेस पर हम महाराष्ट्र के लासलगांव में कोबाल्ट-60 से गामा रेडिएशन के साथ 150 टन प्याज पर इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे प्याज की जीवनावधि बढ़ जाएगी। 2022-23 में सरकार ने पीएसएफ के अंतर्गत रबी-2022 फसल से रिकॉर्ड 2.51 लाख मीट्रिक टन प्याज की खरीद की थी। वहीं, इसे सितंबर 2022 और जनवरी 2023 के दौरान प्रमुख उपभोक्ता केंद्रों में जारी किया था। ये भी पढ़े: गर्मियों के मौसम में ऐसे करें प्याज की खेती, होगा बंपर मुनाफा

भारत में सबसे सस्ता प्याज मिलता है

भारत का 65 प्रतिशत प्याज उत्पादन अप्रैल-जून के दौरान काटी गई रबी प्याज से होता है। यह अक्टूबर-नवंबर में खरीफ फसल की कटाई होने तक उपभोक्ताओं की मांग को पूर्ण करता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 15 जुलाई को देश में सबसे सस्ता प्याज 10 रुपये प्रति किलोग्राम के साथ नीमच में मिल रहा था। साथ ही, नगालैंड के शेमेटर शहर में सबसे मंहगा प्याज 65 रुपये किलो पर मिल रहा है। भारत में प्याज का औसत भाव 26.79 रुपये प्रति किलोग्राम देखने को मिला था।
मुंबई में आज भी टमाटर की कीमतें सातवें आसमान पर हैं

मुंबई में आज भी टमाटर की कीमतें सातवें आसमान पर हैं

मुंबई में जून में, टमाटर की कीमतें 30 रुपये प्रति किलोग्राम के रेगुलर भाव से तकरीबन दोगुनी होकर 13 जून को 50-60 रुपये हो गईं। जून के समापन तक 100 रुपये को पार कर गईं।

मुंबई में टमाटर की कीमतें

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि कंज्यूमर अफेयर के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में टमाटर के मैक्सीमम प्राइस 200 रुपये से नीचे आ गए थे। साथ ही, बात यदि मुंबई की करें तो विभाग के मुताबिक टमाटर का खुदरा भाव 160 रुपये प्रति किलोग्राम था। परंतु, वीकेंड पर टमाटर के रिटेल भावों के सारे रिकॉर्ड तोड़ने की खबरें सामने आ रही हैं। जी हां, मुंबई में टमाटर का भाव 200 रुपये प्रति को पार करते हुए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। कीमतों में बढ़ोतरी के कारण खरीदारों की संख्या पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला है। यह अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ चुकी है, जिससे ग्राहकों की कमी की वजह से कुछ इलाकों में टमाटर की दुकानें बंद करनी पड़ीं।

टमाटर की कीमत विगत सात हफ्ते में 7 गुना तक बढ़ी है

मूसलाधार बारिश की वजह से कुल फसल की कमी एवं बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त होने की वजह से बहुत सारी जरूरी सब्जियों के अतिरिक्त टमाटर की कीमतें जून से लगातार बढ़ रही हैं। जून में, टमाटर की कीमतें 30 रुपये प्रति किलोग्राम के रेगुलर भाव से तकरीबन दोगुनी होकर 13 जून को 50-60 रुपये हो गईं। जून के आखिर तक 100 रुपये को पार कर गईं। 3 जुलाई को इसने 160 रुपये का एक नया रिकॉर्ड बनाया, सब्जी विक्रेताओं ने भविष्यवाणी की कि रसोई का प्रमुख उत्पाद अंतिम जुलाई तक 200 रुपये की बाधा को तोड़ देगा, जो उसने किया है। ये भी पढ़े: सरकार अब 70 रुपए किलो बेचेगी टमाटर

किस वजह से टमाटर के भाव में आया उछाल

टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एपीएमसी वाशी के डायरेक्टर शंकर पिंगले के मुताबिक टमाटर का थोक भाव 80 रुपये से 100 रुपये प्रति किलोग्राम के मध्य है। हालांकि, लोनावाला लैंडस्लाइड की घटना, उसके पश्चात ट्रैफिक जाम और डायवर्जन की वजह से वाशी मार्केट में प्रॉपर सप्लाई की बाधा खड़ी हो गई, जिसकी वजह से कीमतों में अस्थायी तौर पर इजाफा देखने को मिला। डायरेक्टर ने बताया है, कि कुछ दिनों के भीतर सप्लाई पुनः आरंभ हो जाएगी।

जानें भारत में कहाँ कहाँ टमाटर 200 से ऊपर है

बतादें, कि वाशी के एक और व्यापारी सचिन शितोले ने यह खुलासा किया है, कि टमाटर 110 से 120 रुपये प्रति किलोग्राम पर विक्रय किया जा रहा है। दादर बाजार में रोहित केसरवानी नाम के एक सब्जी विक्रेता ने कहा है, कि वहां थोक भाव 160 से 180 रुपये प्रति किलो है। अचंभित करने वाली बात यह है, कि उस मुख्य दिन पर वाशी बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले टमाटर मौजूद नहीं थे। माटुंगा, फोर बंगलोज, अंधेरी, मलाड, परेल, घाटकोपर, भायखला, खार मार्केट, पाली मार्केट, बांद्रा और दादर मार्केट में विभिन्न विक्रेताओं ने टमाटर की कीमतें 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक बताईं। लेकिन, कुछ लोग 180 रुपये किलो बेच रहे थे।

बहुत सारे विक्रेताओं ने बंद की अपनी दुकान

रविवार को ग्राहकों की कमी के चलते फोर बंगलों और अंधेरी स्टेशन इलाके में टमाटर की दोनों दुकानें बिल्कुल बंद रहीं। टमाटर विक्रेताओं का कहना है, कि जब टमाटर की कीमतें गिरेंगी तब ही वो दुकान खोलेंगे। वैसे कुछ विक्रेताओं ने यह कहा है, कि त्योहारी सीजन जैसे कि रक्षाबंधन अथवा फिर जन्माष्टमी के दौरान दुकान खोलेंगे। बाकी और भी बहुत सारे दूसरे सब्जी दुकानदारों ने अपने भंडार को कम करने अथवा इसे प्रति दिन मात्र 3 किलोग्राम तक सीमित करने जैसे कदम उठाए गए हैं। विक्रेताओं में से एक ने हताशा व्यक्त की क्योंकि ज्यादातर ग्राहक सिर्फ और सिर्फ कीमतों के बारे में पूछ रहे हैं और बिना कुछ खरीदे वापिस लौट रहे हैं।

पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि काली हल्दी की खेती करने पर पानी की खपत कम होती है। यदि आप एक एकड़ में काली हल्दी की खेती करते हैं, तो आपको 50 से 60 क्विंटल तक पैदावार मिलेगा। साथ ही, एक एकड़ से 10 से 12 क्विंटल तक सूखी हल्दी का उत्पादन होगा। ऐसे में काली हल्दी की खेती करने पर काफी अच्छी खासी आमदनी होती है। लोगों का मानना है, कि हल्दी केवल पीले रंग की ही होती है। परंतु, इस तरह की कोई बात नहीं है। दरअसल, हल्दी काले रंग की भी होती है। विशेष बात यह है, कि काली हल्दी का भाव भी पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा होता है। इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियां बनाने में किया जाता है। इसमें पीली हल्दी की तुलना में विटामिन्स और मिनिरल्स भी ज्यादा पाए जाते हैं। यही कारण है, कि अब बिहार में एक किसान ने इसकी खेती भी चालू कर दी है। इससे किसान की काफी मोटी आमदनी हो रही है।

काली हल्दी की खेती करने वाला किसान कमलेश

जानकारी के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम कमलेश चौबे है। वे पूर्वी चम्पारण के नरकटियागंज प्रखंड स्थित मुशहरवा गांव के मूल निवासी हैं। उन्होंने अभी एक कट्ठे भूमि पर काली हल्दी की खेती चालू की है। उन्होंंने एक कट्ठे जमीन में 25 किलो काली हल्दी की बुवाई की थी, जिससे लगभग डेढ़ क्विंटल हल्दी का उत्पादन हुआ है। इससे उन्हें काफी अच्छी आमदनी हो रही है। यह भी पढ़ें: Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

किसान हल्दी विक्रय से कितना कमा सकते हैं

विशेष बात यह है, कि कमलेश ने काली हल्दी का उत्पादन करने के लिए नागालैंड से इसके बीज इंपोर्ट किए थे। बतादें, कि एक किलो बीज 500 रुपये में आए थे। ऐसी स्थिति में 25 किलो बीज खरीदने के लिए उन्हें साढ़े 12 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ा। वर्तमान में बाजार के अंदर काली हल्दी की कीमत 500 से 5000 रुपये किलो के मध्य है। यदि कमलेश 1000 रुपये किलो भी काली हल्दी बेचते हैं, तो 150 किलो हल्दी विक्रय के उपरांत उन्हें डेढ़ लाख रुपये की आमदनी होगी।

काली हल्दी में कितने तत्व विघमान होते हैं

कृषि वैज्ञानिक अभिक पात्रा के अनुसार काली हल्दी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है। इससे बहुत सारी औषधीय दवाइयां निर्मित की जाती हैं। पीली हल्दी की अपेक्षा में इसकी कीमत बहुत गुना अधिक होती है। वर्तमान में उत्तराखंड के किसान भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं। काली हल्दी में एंथोसायनिन ज्यादा मात्रा में विघमान होता है। इस वजह से यह गहरे बैंगनी रंग की दिखती है। साथ ही, काली हल्दी में एंटी अस्थमा, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीफंगल, एंटी- कॉन्वेलसेंट, एनाल्जेसिक, एंटीबैक्टीरियल और एंटी-अल्सर जैसे विशेष गुण मौजूद होते हैं।
पशुपालक इस नस्ल की गाय से 800 लीटर दूध प्राप्त कर सकते हैं

पशुपालक इस नस्ल की गाय से 800 लीटर दूध प्राप्त कर सकते हैं

किसान भाइयों यदि आप पशुपालन करने का विचार कर रहे हो और एक बेहतरीन नस्ल की गाय की खोज कर रहे हैं, तो आपके लिए देसी नस्ल की डांगी गाय सबसे बेहतरीन विकल्प है। इस लेख में जानें डांगी गाय की पहचान और बाकी बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियां। किसान भाइयों के समीप अपनी आमदनी को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रकार के बेहतरीन पशु उपलब्ध होते हैं, जो उन्हें प्रति माह अच्छी आय करके दे सकते हैं। यदि आप पशुपालक हैं, परंतु आपका पशु आपको कुछ ज्यादा लाभ नहीं दे रहा है, तो चिंतित बिल्कुल न हों। आज हम आपको आगे इस लेख में ऐसे पशु की जानकारी देंगे, जिसके पालन से आप कुछ ही माह में धनवान बन सकते हैं। दरअसल, हम जिस पशु के विषय चर्चा कर रहे हैं, उसका नाम डांगी गाय है। बतादें कि डांगी गाय आज के दौर में बाकी पशुओं के मुकाबले में ज्यादा मुनाफा कमा कर देती है। इस वहज से भारतीय बाजार में भी इसकी सर्वाधिक मांग है। 

डांगी नस्ल की गाय कहाँ-कहाँ पाई जाती है

जानकारी के लिए बतादें, कि यह गाय देसी नस्ल की डांगी है, जो कि मुख्यतः गुजरात के डांग, महाराष्ट्र के ठाणे, नासिक, अहमदनगर एवं हरियाणा के करनाल एवं रोहतक में अधिकांश पाई जाती है। इस गाय को भिन्न-भिन्न जगहों पर विभिन्न नामों से भी जाना जाता है। हालाँकि, गुजरात में इस गाय को डांग के नाम से जाना जाता है। किसानों व पशुपालकों ने बताया है, कि यह गाय बाकी मवेशियों के मुकाबले में तीव्रता से कार्य करती है। इसके अतिरिक्त यह पशु काफी शांत स्वभाव एवं शक्तिशाली होते हैं। 

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डांगी गाय कितना दूध देने की क्षमता रखती है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि इस देसी नस्ल की गाय के औसतन दूध देने की क्षमता एक ब्यांत में तकरीबन 430 लीटर तक दूध देती है। वहीं, यदि आप डांगी गाय की बेहतर ढ़ंग से देखभाल करते हैं, तो इससे आप लगभग 800 लीटर तक दूध प्राप्त कर सकते हैं। 

डांगी गाय की क्या पहचान होती है

यदि आप इस गाय की पहचान नहीं कर पाते हैं, तो घबराएं नहीं इसके लिए आपको बस कुछ बातों को ध्यान रखना होगा। डांगी गाय की ऊंचाई अनुमान 113 सेमी एवं साथ ही इस नस्ल के बैल की ऊंचाई 117 सेमी तक होती है। इनका सफेद रंग होता है साथ ही इनके शरीर पर लाल अथवा फिर काले धब्बे दिखाई देंगे। साथ ही, यदि हम इनके सींग की बात करें, तो इनके सींग छोटे मतलब कि 12 से 15 सेमी एवं नुकीले सिरे वाले मोटे आकार के होते हैं। 

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इसके अतिरिक्त डांगी गायों का माथा थोड़ा बाहर की ओर निकला होता है और इनका कूबड़ हद से काफी ज्यादा उभरा हुआ होता है। गर्दन छोटी और मोटी होती है। अगर आप डांगी गाय की त्वचा को देखेंगे तो यह बेहद ही चमकदार व मुलायम होती है। इसकी त्वचा पर काफी ज्यादा बाल होते हैं। इनके कान आकार में छोटे होते है और अंदर से यह काले रंग के होते हैं।

जानें कैसे आप बिना पशुपालन के डेयरी व्यवसाय खोल सकते हैं

जानें कैसे आप बिना पशुपालन के डेयरी व्यवसाय खोल सकते हैं

किसान भाई बिना गाय-भैंस पालन के डेयरी से संबंधित व्यवसाय चालू कर सकते हैं। इस व्यवसाय में आपको काफी अच्छा मुनाफा होगा। अगर आप भी कम पैसे लगाकर बेहतरीन मुनाफा कमाने के इच्छुक हैं, तो यह समाचार आपके बड़े काम का है। आज हम आपको एक ऐसे कारोबार के विषय में जानकारी देंगे, जिसमें आपकी मोटी कमाई होगी। परंतु, इसके लिए आपको परिश्रम भी करना होगा। भारत में करोड़ो रुपये का डेयरी व्यवसाय है। यदि आप नौकरी छोड़कर व्यवसाय करना चाहते हैं, तो हमारा यह लेख आपके लिए बेहद फायदेमंद है। दरअसल, हम अगर नजर डालें तो डेयरी क्षेत्र में विभिन्न तरह के व्यवसाय होते हैं। इसमें आप डेयरी प्रोडक्ट का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं या गाय-भैंस पालकर दूध सप्लाई कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है। परंतु, आप गाय-भैंस नहीं पालना चाहते हैं और डेयरी बिजनेस करना चाहते हैं तो भी आपके लिए अवसर है। आप मिल्क कलेक्शन सेंटर खोल सकते हैं।

दूध कलेक्शन की विधि

बहुत सारे गांवों के पशुपालकों से दूध कंपनी पहले दूध लेती है। ये दूध भिन्न-भिन्न स्थानों से एकत्रित होकर कंपनियों के प्लांट तक पहुंचता है। वहां इस पर काम किया जाता है, जिसमें पहले गांव के स्तर पर दूध जुटाया जाता है। फिर एक स्थान से दूसरे शहर या प्लांट में भेजा जाता है। ऐसे में आप दूध कलेक्शन को खोल सकते हैं। कलेक्शन सेंटर गांव से दूध इकट्ठा करता है और फिर इसको प्लांट तक भेजता है। विभिन्न स्थानों पर लोग स्वयं दूध देने आते हैं। वहीं बहुत सारे कलेक्शन सेंटर स्वयं पशुपालकों से दूध लेते हैं। ऐसे में आपको दूध के फैट की जांच-परख करनी होती है। इसे अलग कंटेनर में भण्डारित करना होता है। फिर इसे दूध कंपनी को भेजना होता है।

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कीमत इस प्रकार निर्धारित की जाती है

दूध के भाव इसमें उपस्थित फैट और एसएनएफ के आधार पर निर्धारित होते हैं। कोऑपरेटिव दूध का मूल्य 6.5 प्रतिशत फैट और 9.5 प्रतिशत एसएनएफ से निर्धारित होता है। इसके उपरांत जितनी मात्रा में फैट कम होता है, उसी तरह कीमत भी घटती है।

सेंटर की शुरुआत इस प्रकार से करें

सेंटर खोलने के लिए आपको ज्यादा रुपयों की जरूरत नहीं होती है। सबसे पहले आप दूध कंपनी से संपर्क करें। इसके पश्चात दूध इकट्ठा कर के उन्हें देना होता है। बतादें, कि यह कार्य सहकारी संघ की ओर से किया जाता है। इसमें कुछ लोग मिलकर एक समिति गठित करते हैं। फिर कुछ गांवों पर एक कलेक्शन सेंटर बनाया जाता है। कंपनी की ओर से इसके लिए धनराशि भी दी जाती है।
लहसुन की खेती करे कमाल (Garlic Crop Cultivation Information )

लहसुन की खेती करे कमाल (Garlic Crop Cultivation Information )

लहसुन की खेती यूंतो समूचे देश में की जाती है लेकिन हर राज्य के कुछ चुनिंदा इलाके इसकी खेती के लिए जाने जाते हैं। यह एक कन्द वाली मसाला फसल है। इसकी कलियों को ही बीज के रूप में रोपा जाता है।  इसमें एलसिन नामक तत्व गंध और इसके स्वाद के लिए जिम्मेदार होता है। इसका इस्तेमाल गले तथा पेट सम्बन्धी बीमारियों में होता है। हर दिन लहसुन की एक कली खाने से रोग दूर रहते हैं। इसका उपयोग आचार,चटनी,मसाले तथा सब्जियों में किया जाता है। इसका उपयोग हाई ब्लड प्रेशर, पेट के विकारों, पाचन विकृतियों, फेफड़े के लिये, कैंसर व गठिया की बीमारी, नपुंसकता तथा खून की बीमारी के लिए होता है। इसमें एण्टीबैक्टीरियल तथा एण्टी कैंसरस गुणों के कारण बीमारियों में प्रयोग में लाया जाता है। इसकी खेती मुख्यत: तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश के मैनपुरी, गुजरात, मध्यप्रदेश के इन्दौर, रतलाम व मन्दसौर, में बड़े पैमाने पर होती है। 

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 लहसुन की खेती के लिए मध्यम तापमान ज्यादा अच्छा रहता है। छोटे दिन इसके कंद निर्माण के लिये अच्छे होते हैं। इसकी सफल खेती के लिये 29.35 डिग्री सेल्सियस तापमान 10 घंटे का दिन और 70% आद्रता उपयुक्त होती है 

भूमि का चयन

 

 किसी भी कंद वाली फसल के लिए भुरभुरी मिट्टी अच्छी रहती है। इसके लिये उचित जल निकास वाली दोमट भूमि अच्छी होती है।

लहसुन की उन्नत किस्में

 

 एग्रीफाउड व्हाईट किस्म करीब 150 दिन में तैयार होकर 140 कुंतल, यमुना सफेद 1 (जी-1) 150-160 दिनों में तैयार होकर 150-160 क्विन्टल, यमुना सफेद 2 (जी-50) 160—70 दिन में 140 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज देती हैं। जी 50 किस्म बैंगनी धब्बा तथा झुलसा रोग के प्रति सहनशील है। यमुना सफेद 3 (जी-282) किस्म 150 दिन में 200 कुंतल, यमुना सफेद 4 (जी-323) 175 दिन में 250 कुंतल तक उपज देती है। इनके अलावा भी अनेक किस्में क्षेत्रीय आधार पर ​विकसित हो चुकी हैं। इनके विषय में विस्तार से जानकारी हासिल कर किसान उन्हें लगा सकते हैं। लहसुन की बिजाई का उपयुक्त समय अक्टूबर से नवंबर माह होता है। 

बीज की बिजाई

 

 लहसुन की बुवाई हेतु स्वस्थ एवं बडे़ आकार की कलियों का उपयोग करें। इनका फफूंदनाशक दबा से उपचार अवश्य करें। ऐसा करने से कई तरह के रोग संक्रमण से फसल को प्रारंभिक अवस्था में बचाया जा सकता है। बीज 5-6 क्विंटल प्रति हैक्टेयर लगता है। शल्ककंद के मध्य स्थित सीधी कलियों का उपयोग बुआई के लिए न करें।  कलियों को मैकोजेब+कार्बेंडिज़म 3  ग्राम दवा के सममिश्रण के घोल से उपचारित करना चाहिए। लहसुन की बुआई कूड़ों में, छिड़काव या डिबलिंग विधि से की जाती है। कलियों को 5-7 से.मी. की गहराई में गाड़कर उपर से हलकी मिट्टी से ढकना चाहिए। बोते समय कलियों के पतले हिस्से को उपर ही रखते है। बोते समय कलियों से कलियों की दूरी 8 से.मी. व कतारों की दूरी 15 से.मी.रखना उपयुक्त होता है। 

खाद एवं उर्वरक

 

 लहसुन की खेती के लिए कम्पोस्ट खाद ​के अलावा  175 कि.ग्रा. यूरिया, 109 कि.ग्रा., डाई अमोनियम फास्फेट एवं 83 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश की जरूरत होती है। गोबर की खाद, डी.ए. पी. एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय भूमि मे मिला देनी चाहिए। शेष यूरिया की मात्रा को खडी फसल में 30-40 दिन बाद छिडकाव के साथ देनी चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति हेतु 20 से 25 किलोग्राम माइक्रोन्यूट्रियंट मिश्रण मिट्टी में मिलाएं। 

सिंचाई प्रबंधन

कंद वाली ज्यादातर फसलों का बीज बोने के तत्काल बाद अच्छे अंकुरण हेतुु हल्की सिंचाई करें। तदोपरांत जरूरत और जमीन की मांग के अनुरूप पानी लगाएंं। जड़ों में उचित वायु संचार हेतु खुरपी या कुदाली द्वारा बोने के 25-30 दिन बाद प्रथम निदाई-गुडाई एवं दूसरी निदाई-गुडाई 45-50 दिन बाद करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण हेतु प्लुक्लोरोलिन 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व बुआई के पूर्व या पेड़ामेंथिलीन 1 किग्रा. सक्रिय तत्व बुआई बाद अंकुरण पूर्व 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें।

संकट में फ्लोर मिल कारोबार

संकट में फ्लोर मिल कारोबार

इसबार आटा,सूजी मैदा जैसे उत्पादों को बनाने वाले कारोबारी परेशान हैं। कारण यह है कि भण्डारण के लिए यही समय उपयुक्त होता है। ज्यादातर कारोबारी यह तय नहीं कर पा रहे हैं आखिर आने वाले महीनों में क्या होने वाला है।मिलों में उत्पादन में 30 से 40 फीसदी उत्पादन प्रभावित हुआ है। इधर चुनिंदा कर्मचारियों को मिलों में ही कोरंटाइन करके रखना पड़ रहा है ताकि लोगों को आटे की आपूर्ति हो सके। माल के तैयार होने से लेकर पैकिंग मैटेरियल और उसके गंतब्यों तक पहुंचना भी दुश्कर हो गया है। 

इसके अलावा सरकारी दखल के चलते मिल संचालक खासे परेशान हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार देश में तकरीबन ढाई हजार मिल हैं। इनमें करीब ढाई करोड टन आटा, सूजी और मैदा तैयार करती हैं। इसमें से आधी खपता बेकरी, बिस्किट, ब्रैड, पाव आदि प्रसंस्कृत उत्पादों में होती है। लॉकाडाउन के चलते प्रसंस्करण इकाइयां बंद प्राय हैं। इनमें नतो माल की खपत है न ही पुराने भुगतान हो पा रहे हैं। 

इन हालात में नए सत्र में मिलों में आटे के आलवा कुछ भी नहीं बन पा रहा। मथुरा स्थित अलंकार मिल के संचालक प्रतुल गर्ग की मानें तो मिलों के संचालन का पूरा मैकेनिज्म है। आटा तो सामान्य चक्कियां पर भी बहुतायत में बन जाता है लेकिन सूजी और मैदा वहां नहीं बन पाता। मिलें देश में संकट की घड़ी में पीछे नहीं हट रही हैं लेकिन माल की आवाजाही के अलावा उसके बिकने के ठिकानों पर तालाबंदी ने काम को ठप कर दिया है। 

वह कहते हैं कि किसी मिल का बिस्क्टि उद्योग में माल जाता है। किसी का रिटेल मार्केट में तो किसी का मंडियों में जाता है। लाकडाउन के चलते पूरा तंत्र चरमराया हुआ हैं। अब लेवल मिलों के पास बेहद थोड़ा काम शासन प्रशासन की मांग के अनुरूप आटा बनाने का रह गया है। इन हालात में उद्योगों को पूरी रफ्तार से संचा​लित नहीं किया जा सकता। 

मिलों में आसान है सोस्यल डिस्टेंसिंग

मिल संचालकों की मानें तो उनके यहां सोस्यल डिस्टेंसिंग का पालन बेहद आसान है। मिलों में किसानों के माल की एक तौल धर्मकाटों पर होती है। चंद मिनटों में किसान का माल तुलकर काम खत्म हो जाता है जबकि मंडियों में किसानों को घण्टों इंतजार करना होता है। ऐसे में सरकार को मिलों को कुछ सहूलियत देनी चाहिए ताकि वह किसानों से सीधे माल खरीद सकें और आम जरूरत का आटा आदि बाजार में आसानी से उतार सकें। इसके अलावा यहां बोरों आदि की आवश्यक्ता भी किसानों को नहीं होती। किसी भी व्यक्ति से ज्यादा संपर्क भी नहीं होता।

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मैदा नहीं होती खराब

मिलरों की मानें तो आटा एवं सूजी जल्दी खराब हो जाते हैं जबकि मैदा लम्बे समय तक खराब नहीं होती। इसका कारण उसके पार्टिकल्स का बारीक होना है। बड़ी मिलों को केवल आटे के भरोसे नहीं चलाया जा सकता । इधर लॉकडाउन के चलते मैदा एवं सूजी की खपत बिल्कुल नहीं रही है। 

भरे हुए हैं गोदाम

मार्च 2020 तक एफसीआई के गोदामों में 275 लाख टन गेहूं रखा है जोकि पिछले साल के 239 लाख टन के सापेक्ष काफी अधिक है। इधर इस बार लम्बी ठंड के चलते गेहं की फसल भी अच्छी आई है।

कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

कपास की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

कपास की खेती को नगदी फसल के रूप में जाना जाता है. एक प्रश्न ये भी उठता है कि कपास की खेती कहाँ होती है? इसको भारत के लगभग सभी राज्यों में उगाया जाता है. मुख्य रूप से इसे गुजरात में सबसे ज्यादा उगाया जाता है. वैसे तो इसको उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटका आदि राज्यों में भी उगाया जाता है. कपास को सफेद सोना भी बोला जाता है. इसको सफेद सोना इस लिए बोला जाता है क्योंकि इसके उत्पादन से किसानों को अच्छी आय होती है तथा इससे उनके जीवन स्तर में सुधार आता है. आजकल कपास की भी कई उन्नत और नई प्रजातियां आ गई है इसलिए इसे किसी भी तरह की मिटटी में उगाया जा सकता है. लम्बे रेशे वाली कपास को सर्वोत्तम माना जाता है. इसकी पैदावार भी ज्यादा होती है.

कपास की खेती के लिए उपयुक्त मिटटी:

कपास की खेती के लिए मिटटी या कपास की खेती के लिए सबसे अच्छी मिटटी कौन सी होती है. इस पर हम चर्चा करेंगें. वैसे तो कपास के लिए दोमट, काली और बलुई मिटटी सर्वोत्तम होती है. इस मिटटी में इसकी फसल ज्यादा उपजाऊ होती है लेकिन आजकल इतनी प्रजातियां आ चुकी हैं की अपने खेत की मिटटी के हिसाब से आप प्रजाति का चुनाव कर सकते हैं और कपास की अच्छी पैदावार ले सकते हैं.

कपास की खेती कैसे होती है:

कपास की खेती के लिए ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती है कम पानी में भी इसकी अच्छी खेती की जा सकती है. इसकी फूल आने के समय बारिश से फसल ख़राब हो जाती है.ध्यान रखें की बुवाई में इतना समय हो की फूल आने के समय बारिश न हो नहीं तो इसका फूल ख़राब हो जाता है. इसके खेत को तैयार करने के बाद बोने से पहले एक रात का समय दिया जाना चाहिए और इसकी बुवाई शाम के समय में करनी चाहिए. कपास की खेती को तेज धूप की जरूरत होती है. इसके फूल जब अच्छे से खिल जाए तभी इनको तोडा जाए अन्यथा की स्थिति में इसके कच्चे फूल पूरे पके फूलों को भी ख़राब कर सकते हैं. [embed]https://www.youtube.com/watch?v=nuY7GkZJ4LY[/embed]

खेत की तैयारी:

खेत की तैयारी करते समय हमें पहली जोत गहरी लगानी चाहिए जिससे की नीचे की मिटटी ऊपर आ जाए और खेत की उपजाऊ मिटटी ऊपर आ जाए. इससे आपकी फसल को पोषक तत्व मिलेंगें. इसके बाद इसमें गोबर की सड़ी हुई खाद लगभग 40 से 60 क्विंटल पर एकड़ के हिसाब से मिलाना चाहिए. इसके बाद इसकी पलेवा करके जब मिटटी भुरभुरी होने लायक हो जाए तो कल्टीवेटर से जुताई कर के उस पर पाटा लगा देना चाहिए. जिससे की खेत समतल हो जाये. उसके बाद एक रात का समय देकर अगले दिन शाम को खेत की बुवाई कर देनी चाहिए.

कपास की खेती का इतिहास / कपास कितने प्रकार के होते हैं:

कपास सामान्यतः 3 प्रकार के होते हैं.

  1. लम्बे रेशे वाली कपास.
  2. मध्य रेशे वाली कपास.
  3. छटे रेशे वाली कपास.
1 - लम्बे रेशे वाली कपास: लम्बे रेशे वाली कपास को सबसे उत्तम कपास माना जाता है. इसके रेशों की लम्बाई लगभग 5 सेंटीमीटर से ज्यादा होती है. इस श्रेणी की कपास का इस्तेमाल उच्च कोटि या महगे कपड़ों को बनाने में किया जाता है. भारत में इस श्रेणी की किस्मों को दूसरे नंबर पर उगाया जाता है. कुल उत्पादन में इसका 40% हिस्सा होता है. इसकी खेती मुख्य रूप से गुजरात के तटीय हिस्सों में की जाती है. इस कारण इसे समुद्र द्वीपीय कपास भी कहा जाता है. 2 - मध्य रेशे वाली कपास: इस श्रेणी के कपास के रेशों की लम्बाई 3.5 से 5 सेंटीमीटर तक पाई जाती है. इसे मिश्रित श्रेणी की कपास भी कहा जाता है. इस श्रेणी की किस्मों को भारत के लगभग सभी राज्यों में उगाया जाता है. कुल उत्पादन में इसका सबसे ज्यादा 45% हिस्सा होता है. 3 - छोटे रेशे वाली कपास: इस श्रेणी की कपास के रेशों की लम्बाई 3.5 सेंटीमीटर से कम होती है. कपास की इन किस्मों को उत्तर भारत में ज्यादा उगाया जाता है. जिनमें असम, हरियाणा, राजस्थान, त्रिपुरा, मणिपुर, आन्ध्र प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मेघालय शामिल हैं. उत्पादन की दृष्टि से इस श्रेणी की कपास का उत्पादन कुल उत्पादन का 15% होता है.

कपास के बीज को क्या कहते हैं:

कपास की खेती सामान्यतः कपास के बीज को बिनोला कहा जाता है. इसके बीज को रुई से अलग करके दुधारू पशुओं को खिलाया जाता है जिससे की उनका दूध गाढ़ा और ताकतवर होता है. बिनोला खाने वाले पशु के दूध में घी की मात्रा बढ़ जाती है. कपास को ओषधि के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है. कपास स्वभाव वश प्रकृति से मधुर, थोड़ी गर्म तासीर की होती है। इसके अलावा यह पित्त को बढ़ाने वाली, वातकफ दूर करने वाली, रुचिकारक; प्यास, जलन, थकान, बेहोशी, कान में दर्द, कान से पीब निकलना, व्रण या घाव, कटने-छिलने जैसे शारीरिक समस्याओं के लिए औषधि के रुप में काम करती है। इसके बीज  (बिनोला ) मधुर, गर्म, स्निग्ध, वात दूर करने वाले,स्तन का आकार बढ़ाने वाले तथा वात कफ को बढ़ाने वाले होते हैं। कपास का अर्क या काढ़ा सिर और कान दर्द को कम करने के साथ-साथ शंखक रोग नाशक होता है। कपास के फल कड़वे, मधुर, गर्म, रुचिकारक तथा वातकफ कम करने वाले होते हैं। बीज रोपाई करने का तरीका: बीज रोपाई का तरीका आप पवेर ( बीज छिड़कना ) कर भी बोया जा सकता है. जो किसान भाई कई सालों से खेती करते आ रहे हैं तो वो अपने आप ही ऐसे पवेर करते हैं की हर बीज एक निश्चित दूरी पर गिरता है. अगर आपको पवेर करना नहीं आता है तो आप ट्रेक्टर द्वारा मशीन से भी इसकी बुबाई कर सकते हैं. इसमें पौधे से पौधे की दूरी करीब 50 सेंटी मीटर रखनी चाहिए जिससे की पौधे को फूलने का पर्याप्त जगह मिलें.

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फसल की तुड़ाई:

कपास की फसल की तुड़ाई जब इसका फूल पूरी तरह से खिल जाये और थोड़ा बहार की तरफ निकलने लगे तो समझो की इसको अब अलग कर लेना चाहिए. ध्यान रहे कि कच्चे या अधपके फूल को नहीं निकलना चाहिए. ये दूसरे फूलों को भी पीलापन दे देता है. इसको तोड़ते समय ध्यान रखने योग्य बातें है कि इसकी सुखी हुई पत्तियां कपास में नहीं मिलनी चाहिए. इसको तोड़ कर धूप में पूरी तरह से सूखा लेना चाहिए. इससे इसको रूई में पीलापन नहीं आता है. इसकी तुड़ाई ओस सूखने के बाद ही करनी चाहिए.

कपास की पैदावार से आमदनी:

किसानों को कपास की खेती से अच्छी आमदनी होती है. इसकी अलग-अलग किस्मों से अलग-अलग पैदावार मिलती हैं. जहां देसी किस्मों की खेती होती है, वहां लगभग 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और जहां अमेरिकन संकर किस्मों की खेती होती है, वहां लगभग 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार हो सकती है. बाजार में इसका भाव 5 हज़ार प्रति क्विंटल के हिसाब से होता है, इसलिए किसान एक हेक्टेयर से एक बार में लगभग 3 लाख से ज्यादा पैसा कमा कर सकते हैं.

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कपास में लगने वाले रोग:

सामान्यतः कपास में रोग काम ही आता है. लेकिन कभी कभी मौसम ख़राब या ज्यादा बारिश भी कपास में रोगों को बढाती है. 1 - हरा मच्छर: ये पौधों की पत्तियों पर निचे की तरफ चिपक के उनका रास चूसता रहता है तथा पत्ती को सुखा देता है. 2 - सफेद मक्खी: सफेद मक्खी भी इसी तरह निचे वाली सतह पर चिपक कर पत्ती का रास चूसती रहती है. 3 - चितकबरी सुंडी: इसका प्रकोप जब पेड़ पर फूल और टिंडे बनने के समय दिखाई देता है. इसके प्रकोप से टिंडे के अंदर ही फूल नष्ट हो जाता है. 4 - तेला: फसल पर तेला रोग भी कीटों की वजह से लगता हैं. इसके कीट का रंग काला होता है तथा ये तेल जैसा पदार्थ छोड़ता रहता है इस लिए इसको तेल भी बोला जाता है. जो आकर में छोटा दिखाई देता हैं. यह कीट नई आने वाली पत्तियों को ज्यादा नुकसान पहुंचता है. 5 - तम्बाकू लट: पौधे को ये कीट सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाता है. यह कीट एक लम्बे कीड़े के रूप में होता है. जो पत्तियों को खाकर उन्हें जालीनुमा बना देता हैं. इससे पत्तियां सूख जाती हैं तथा धीरे धीरे पेड़ ही नष्ट हो जाता है. 6 - झुलसा रोग: पौधों पर लगने वाला झुलसा रोग सबसे खरनाक रोग हैं. इसके लगने पर टिंडों पर काले रंग के चित्ते बनने लगते हैं. और टिंडे समय से पहले ही खिलने लग जाते हैं. जिनकी गुणबत्ता अच्छी नहीं होती तथा ये दूसरे फूलों को भी ख़राब कर देते हैं. 7 - पौध अंगमारी रोग: इस रोग के लगने पर कपास के टिंडों के पास वाले पत्तों पर लाल कलर दिखाई देने लगता है. इसके लगने पर खेत में नमी के होने पर भी पौधा मुरझाने लगता हैं. 8 - अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग: अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग बीज जनित रोग होता है. इसके लगने पर शुरुआत में पौधों की पत्तियों पर भूरें रंग के छोटे धब्बे बनने लगते हैं 9 - जड़ गलन रोग: जड़ गलन की समस्या पौधों में ज्यादा पानी की वजह से होता है. इसकी रोकथाम का सबसे अच्छा उपचार खेत में पानी जमा ना होने दें. जड़ गलन का रोग मुख्य रूप से बारिश के मौसम में देखने को मिलता है.