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मौसम की बेरुखी ने भारत के इन किसानों की छीनी मुस्कान

मौसम की बेरुखी ने भारत के इन किसानों की छीनी मुस्कान

बरसात की वजह से ओडिशा में फसलों को काफी क्षति का सामना करना पड़ा है। इस कारण से बहुत सारी सब्जियों की कीमत काफी कम हो गई हैं। खराब मौसम के चलते किसानों की चिंता ज्यों की त्यों बनी हुई है। बीते कई दिनों में भारत में मौसम ने अपना अलग-अलग मिजाज दिखाया है। बहुत सारे क्षेत्र कड़ाके की सर्दी की मार सहन कर रहे हैं तो बहुत सारे क्षेत्रों में बारिश के चलते फसल बर्बाद हो रही है।

ओडिशा के सुंदरगढ़ में बहुत दिनों से मौसम खराब था। नतीजतन बागवानी फसलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसकी वजह से किसानों की परेशानी भी बेहद बढ़ी है। खराब मौसम की वजह से टमाटर, पत्ता गोभी व फूल गोभी सहित बहुत सारी अन्य फसलें भी प्रभावित हुई हैं। इसकी मुख्य वजह किसान समय से पहले ही फसल की कटाई करने पर विवश हैं। इसके साथ - साथ किसान इन फसलों को कम भाव पर भी बेच रहे हैं।

इस वजह से हुई फसलों को हानि 

कई मीडिया एजेंसियों के मुताबिक, खराब मौसम और प्रचंड बारिश के चलते फसलों को बेहद क्षति पहुँची है। इस वजह से बहुत सारे स्थानों पर पूर्णतय कटने को तैयार खड़ी फसल भी बर्बाद हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सबसे ज्यादा हानि टमाटर की फसल को पहुंची है। बरसात के चलते टमाटर की फसल खराब होने लगी है। वहीँ, गोभी की फसल भी काफी हद तक खराब हो चुकी है।

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विवश होकर किसान समय से पहले कटाई करने पर मजबूर 

किसानों का जीवन अनेकों समस्याओं और मुश्किलों से भरा हुआ होता है। अब ऐसे में मौसम की बेरुखी से परेशान किसानों की बची हुई फसल भी काफी कम  कीमतों पर बिक रही है। किसानों को यह डर भी काफी सता रहा है, कि कहीं बची हुई शेष फसल भी बर्बाद ना हो जाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, किसान अपनी टमाटर की फसल को 10 रुपये किलो के भाव पर बेचने को विवश हैं। साथ ही, गोभी का मूल्य भी 15 रुपये किलो पर आ गया है। 

बहुत सारे किसानों की तो गोभी की फसल कम कीमत पर भी नहीं बिक पा रही है। इसके अतिरिक्त भिंडी, लौकी, करेला सहित अन्य फसलों में भी मौसम का असर देखने को मिला है। जिसकी वजह से किसान भाई निश्चित समय से पूर्व ही फसलों की कटाई कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो फसलों के दामों में काफी ज्यादा कमी आई है। टमाटर की कीमतें 10 रुपये से लेकर 20 रुपये के मध्य हैं। वहीँ, फूलगोभी की कीमत भी लगभग 50 रुपये से गिरकर 15 रुपये से 20 रुपये के आसपास पहुंच गईं हैं।

ज्वार की बुवाई, भूमि तैयारी व उन्नत किस्मों की जानकारी

ज्वार की बुवाई, भूमि तैयारी व उन्नत किस्मों की जानकारी

भारत के अंदर ज्वार की खेती आदि काल से होती आ रही है। भारत में ज्वार की खेती मोटे दाने वाली अनाज फसल और हरे चारे के रूप में की जाती है। 

पशुओं के चारे के तोर पर ज्वार के सभी भागों का उपयोग किया जाता है। यह एक तरह की जंगली घास है, जिसकी बाली के दाने मोटे अनाजों में शुमार किए जाते हैं। ज्वार (संस्कृत रूयवनाल, यवाकार या जूर्ण) एक प्रमुख फसल है। 

ज्वार की पैदावार कम बारिश वाले इलाकों में अनाज और चारा दोनों के लिए बोई जाती हैं। ज्वार जानवरों का एक विशेष महत्वपूर्ण एवं पौष्टिक चारा है। 

भारत में यह फसल का उत्पादन करीब सवा चार करोड़ एकड़ जमीन में किया जाता है। ज्वार भी बहुत तरह की होती है, जिनके पौधों में कोई खास भेद नजर नहीं पड़ता है। ज्वार की फसल दो तरह की होती है, एक रबी, दूसरी खरीफ। 

मक्का भी इसी का एक प्रकार है। इसलिए कहीं-कहीं मक्का भी ज्वार ही कहलाता है। ज्वार को जोन्हरी, जुंडी आदि नामों से भी जानते हैं। ज्वार की खेती सिंचित और असिंचित दोनों इलाकों पर आसानी से की जा सकती है। 

अगर हम अपने भारत की बात करें, तो ज्वार की खेती खरीफ की फसलों के साथ की जाती है। ज्वार के पौधे 10 से 12 फिट की लंबाई तक के हो सकते हैं। इनको हरे रूप में कई बार काटा जा सकता है। 

इसके पौधे को किसी खास तापमान की आवश्यकता नही होती। अधिकांश किसान भाई इसकी खेती हरे चारे के तोर पर ही करते हैं। परंतु, कुछ किसान भाई इसे व्यापारिक रूप से भी उगाते हैं। 

अगर आप भी ज्वार की व्यवसायिक खेती करने का मन बना रहे हैं। हम आपको इसकी बुवाई, भूमि तैयारी व उन्नत किस्मों से जुड़ी जरूरी जानकारी प्रदान करेंगे।

अच्छी उपज के लिए ज्वार की बुवाई कब करें ?

भारत के अंदर ज्वार की खेती खरीफ की फसलों के साथ की जाती है। अब ऐसे में ज्वार के बीज की रोपाई अप्रैल से मई माह के अंत तक की जानी चाहिए। भारत में ज्वार को सिंचाई करके वर्षा से पहले एवं वर्षा शुरू होते ही इसकी बोवाई की जाती है। 

अगर किसान बरसात से पहले सिंचाई करके यह बो दी जाए, तो फसल और अधिक तेजी से तैयार हो जाती है। ज्वार के बीजों को अंकुरण के समय सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है। 

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उसके बाद पौधों को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है। परंतु, इसके पूरी तरह से विकसित पौधे 45 डिग्री तापमान पर भी सहजता से विकास कर लेते हैं।

ज्वार की खेती के लिए कौन-सी मिट्टी सबसे अच्छी है ?

ज्वार एक खरीफ की मोटे आनाज वाली गर्मी की फसल है। यह फसल 45 डिग्री के तापमान को झेलकर बड़ी आसानी से विकास कर सकती है। वैसे तो ज्वार की फसल को किसी भी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। 

लेकिन, अधिक मात्रा में उपज प्राप्त करने के लिए इसकी खेती उचित जल निकासी वाली चिकनी मृदा में करें। इसकी खेती के लिए जमीन का पीएच मान 5 से 7 के बीच होना चाहिए। 

इसकी खेती खरीफ की फसल के साथ की जाती है। उस समय गर्मी का मौसम होता है, गर्मियों के मौसम में बेहतर ढ़ंग से सिंचाई कर शानदार उपज हांसिल की जा सकती है।

बेहतर उपज के लिए ज्वार की उन्नत किस्में 

आज के समय में ज्वार की महत्ता और खाद्यान्न की बढती हुई मांग को मद्देनजर रखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने ज्वार की ज्यादा पैदावार और बार-बार कटाई के लिए नवीनतम संकर और संकुल प्रजातियों को विकसित किया है। ज्वार की नवीन किस्में तुलनात्मक बौनी हैं एवं उनमें अधिक उपज देने की क्षमता है। 

अनुमोदित दाने के लिए ज्वार की उन्नतशील किस्में सी एस एच 5, एस पी वी 96 (आर जे 96), एस एस जी 59 -3, एम पी चरी राजस्थान चरी 1, राजस्थान चरी 2, पूसा चरी 23, सी.एस.एच 16, सी.एस.बी. 13, पी.सी.एच. 106 आदि ज्वार उन्नत किस्में है। इन किस्मों की खेती हरे चारे और दाने के लिए की जाती है। 

ज्वार की यह किस्में 100 से 120 दिन के समयांतराल में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इन किस्में से किसानों को 500 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के अनुरूप पशुओं के लिए हरा चारा हो जाता है। 

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90 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सूखा चारा प्राप्त हो जाता है। साथ ही, 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से दाने हांसिल हो सकते हैं।

ज्वार की बुवाई के लिए खेत की तैयारी 

ज्वार की खेती के लिए शुरुआत में खेत की दो से तीन गहरी जुताई कर उसमें 10 से 12 टन उचित मात्रा में गोबर की खाद डाल दें। उसके बाद फिर से खेत की जुताई कर खाद को मिट्टी में मिला दें। 

खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी चलाकर खेत का पलेव कर दे। पलेव के तीन से चार दिन बाद जब खेत सूखने लगे तब रोटावेटर चलाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरा बना लें। 

उसके बाद खेत में पाटा चलाकर उसे समतल बना लें। ज्वार के खेत में जैविक खाद के अलावा रासायनिक खाद के तौर पर एक बोरा डी.ए.पी. की उचित मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में दें। 

ज्वार की खेती हरे चारे के रूप में करने पर ज्वार के पौधों की हर कटाई के बाद 20 से 25 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से समय समय पर खेत में देते रहें।

तितली मटर (अपराजिता) के फूलों में छुपे सेहत के राज, ब्लू टी बनाने में मददगार, कमाई के अवसर अपार

तितली मटर (अपराजिता) के फूलों में छुपे सेहत के राज, ब्लू टी बनाने में मददगार, कमाई के अवसर अपार

रंगबिरंगी तितली किसके मन को नहीं भाती, लेकिन हम बात कर रहे हैं, प्रमुख दलहनी फसलों में से एक तितली मटर के बारे में। आमतौर पर इसे अपराजिता (butterfly pea, blue pea, Aprajita, Cordofan pea, Blue Tea Flowers or Asian pigeonwings) भी कहा जाता है। 

इंसान और पशुओं के लिए गुणकारी

बहुउद्देशीय दलहनी कुल के पौधोंं में से एक तितली मटर यानी अपराजिता की पहचान उसके औषधीय गुणों के कारण भी दुनिया भर में है। इंसान और पशुओं तक के लिए गुणकारी इस फसल की खेती को बढ़ावा देकर, किसान भाई अपनी कमाई को कई तरीके से बढ़ा सकते हैं। 

ब्लू टी की तैयारी

तितली मटर के फूल की चाय (Butterfly pea flower tea)

बात औषधीय गुणों की हो रही है तो आपको बता दें कि, चिकित्सीय तत्वों से भरपूर अपरजिता यानी तितली मटर के फूलों से अब ब्लू टी बनाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।

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ब्लू टी से ब्लड शुगर कंट्रोल

जी हां परीक्षणों के मुताबिक तितली मटर (अपराजिता) के फूलों से बनी चाय की चुस्की, मधुमेह यानी कि डायबिटीज पीड़ितों के लिए मददगार होगी। जांच परीक्षणों के मुताबिक इसके तत्व ब्लड शुगर लेवल को कम करते हैं।

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पशुओं का पोषक चारा

इंसान के स्वास्थ्य के लिए मददगार इसके औषधीय गुणों के अलावा तितली मटर (अपराजिता) का उपयोग पशु चारे में भी उपयोगी है। चारे के रूप में इसका उपयोग भूसा आदि अन्य पशु आहार की अपेक्षा ज्यादा पौष्टिक, स्वादिष्ट एवं पाचन शील माना जाता है। तितली मटर (अपराजिता) के पौधे का तना बहुत पतला साथ ही मुलायम होता है। इसकी पत्तियां चौड़ी और अधिक संख्या में होने से पशु आहार के लिए इसे उत्तम माना गया है।

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अनुभवों के मुताबिक अपेक्षाकृत रूप से दूसरी दलहनी फसलों की तुलना में इसकी कटाई या चराई के बाद अल्प अवधि में ही इसके पौधों में पुनर्विकास शुरू हो जाता है। 

एशिया और अफ्रीका में उत्पत्ति :

तितली मटर (अपराजिता) की खेती की उत्पत्ति का मूल स्थान मूलतः एशिया के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र एवं अफ्रीका में माना गया है। इसकी खेती की बात करें तो मुख्य रूप से अमेरिका, अफीका, आस्ट्रेलिया, चीन और भारत में इसकी किसानी का प्रचलन है। 

मददगार जलवायु

  • इसकी खेती मुख्यतः प्रतिकूल जलवायु क्षेत्रों में प्रचलित है। मध्यम खारी मृदा इलाकों में इसका पर्याप्त पोषण होता है।
  • तितली मटर प्रतिकूल जलवायु जैसे–सुखा, गर्मी एवं सर्दी में भी विकसित हो सकती है।
  • ऐसी मिट्टी, जिनका पी–एच मान 4.7 से 8.5 के मध्य रहता है में यह भली तरह विकसित होने में कारगर है।
  • मध्यम खारी मिट्टी के लिए भी यह मित्रवत है।
  • हालांकि जलमग्न स्थिति के प्रति यह बहुत संवेदनशील है। इसकी वृद्धि के लिए 32 डिग्री सेल्सियस तापमान सेहतकारी माना जाता है।

तितली मटर के बीज की अहमियत :

कहावत तो सुनी होगी आपने, बोए बीज बबूल के तो फल कहां से होए। ठीक इसी तरह तितली मटर (अपराजिता) की उन्नत फसल के लिए भी बीज अति महत्वपूर्ण है। कृषक वर्ग को इसका बीज चुनते समय अधिक उत्पादन एवं रोग प्रतिरोध क्षमता का विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए।

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तितली मटर की कुछ उन्नत किस्में :

तितली मटर की उन्नत किस्मों की बात करें तो काजरी–466, 752, 1433, जबकि आईजीएफआरआई की 23–1, 12–1, 40 –1 के साथ ही जेजीसीटी–2013–3 (बुंदेलक्लाइटोरिया -1), आईएलसीटी–249 एवं आईएलसीटी-278 इत्यादि किस्में उन्नत प्रजाति में शामिल हैं। 

तितली मटर की बुवाई के मानक :

अनुमानित तौर पर शुद्ध फसल के लिए बीज दर 20 से 25 किलोग्राम मानी गई है। मिश्रित फसल के लिए 10 से 15 किलोग्राम, जबकि 4 से 5 किलोग्राम बीज स्थायी चरागाह के लिए एवं 8 से 10 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर अल्पावधि चरण चरागाह के लिए आदर्श पैमाना माना गया है। तय मान से बुवाई 20–25 × 08 – 10 सेमी की दूरी एवं ढ़ाई से तीन सेमी की गहराई पर करनी चाहिए। कृषि वैज्ञानिक उपचारित बीजों की भी सलाह देते हैं। अधिक पैदावार के लिए गर्मी में सिंचाई का प्रबंधन अनिवार्य है। 

तितली मटर की कटाई का उचित प्रबंधन :

मटर के पके फल खेत में न गिर जाएं इसलिए तितली मटर की कटाई समय रहते कर लेना चाहिए। हालांकि इस बात का ध्यान भी रखना अनिवार्य है कि मटर की फसल परिपक्व हो चुकी हो। जड़ बेहतर रूप से जम जाए इसलिए पहले साल इससे केवल एक कटाई लेने की सलाह जानकार देते हैं।

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तितली मटर के उत्पादन का पैमाना :

उपज बरानी की दशा में स्थितियां अनुकूल रहने पर लगभग 1 से 3 टन सूखा चारा और 100 से 150 किलो बीज प्रति हेक्टेयर मिल सकता है। इतनी बड़ी ही सिंचित जमीन पर सूखा चारा 8 से 10 टन, जबकि बीज पांच सौ से छह सौ किलो तक उपज सकता है। 

पोषक तत्वों से भरपूर खुराक :

तितली मटर में प्रोटीन की मात्रा 19-23 फीसदी तक मानी गई है। क्रूड फ़ाइबर 29-38, एनडीफ 42-54 फीसदी तो फ़ाइबर 21-29 प्रतिशत पाया जाता है। पाचन शक्ति इसकी 60-75 फीसदी तक होती है।

जानिए सूरजमुखी की खेती कैसे करें

जानिए सूरजमुखी की खेती कैसे करें

अभी सूरजमुखी की खेती करने का सही समय है. सूरजमुखी की खेती खाद्य तेल के लिए की जाती है. वैसे भी हमारे देश को खाद्य तेलों का आयात करना पड़ता है। आयात को कम करने के लिए सरकार का भी ध्यान सरसों और सूरजमुखी जैसी फसलों पर अधिक है। मार्च के महीने में इसकी बुवाई की जाती है। इसकी बुवाई करते समय याद रखें की खेत में गोबर की खाद, नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए. इसको सूरजमुखी नाम देने के पीछे भी एक रोचक कारण है।एक तो इसका फूल सूरज की तरह दिखता है दूसरा इसका फूल सूरज के हिसाब से घूमता है। आप कह सकते है की इसके फूल का मुँह सूरज की तरफ ही रहता है। सूरजमुखी की खेती किसानों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है क्योंकि जब खेतों से सरसों, आलू, गेंहूं आदि से खेत खाली होते हैं तो इसकी खेती की जा सकती है। इसमें से जो तेल निकलता है वो बहुत ही पौष्टिक और स्वादिष्ट होता है। सूरजमुखी की खेती खरीफ, रबी एवं जायद तीनो ही मौसमों में की जा सकती है। लेकिन खरीफ में सूरजमुखी पर अनेक रोग कीटों का प्रकोप रहता है। फूल छोटे होते है, तथा उनमें दाना भी कम पड़ता है तथा इतना स्वस्थ भी नहीं होता है, जायद में सूरजमुखी की खेती से अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। इस मौसम की सूरजमुखी में मोटा दाना और उसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा होती है। ये भी पढ़ें : सरसों की खेती: कम लागत में अच्छी आय

खेत की तैयारी:

मार्च या अप्रैल के महीने में जब खेत दूसरी फसल से खाली होता है तो खेत में इतनी नमी नहीं होती की उसको दूसरी फसल के लिए तैयार कर दिया जाये। इसके लिए पहले खेत को सूखा ही 2 जोत हैंरों या कल्टीवेटर से लगा देनी चाहिए और अगर संभव हो सके तो उसमें प्लाऊ से 8 से 10 इंच गहरी जुताई लगा कर मिटटी को पलट देना चाहिए जिससे कि ऊपर की मिटटी नीचे और नीचे की मिटटी ऊपर आ जाये। उसके बाद उसमें पलेवा ( सूखे खेत में पानी देना) करके जुताई आने पर कल्टीवेटर से 2 से 3 जुताई लगाकर पाटा लगा देना चाहिए जिससे की खेत में नमी बनी रहे और समतल भी हो जाये।

उचित जलवायु और मिटटी:

सूरजमुखी के लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। इसको बोने का सही समय फ़रवरी से मार्च का दूसरा सप्ताह उचित होती हैं क्योंकि अगर इसके फूल को बीज पकते समय बारिश नहीं होनी चाहिए अगर पकते समय बारिश हो जाती है तो इसको बहुत नुकसान होता है तथा इसकी फसल की गुणबत्ता भी खराब हो जाती है। इसको किसी भी तरह की मिटटी में उगाया जा सकता है इसकी फसल को दोमट और रेतीली भुरभुरी वाली मिटटी में उगाना उचित होगा। सर्वप्रथम हमें ध्यान रखना चाहिए की जिस खेत में हम इसे लगा रहे हैं उसमे पानी निकासी की उचित व्यवस्था है की नहीं क्योंकि अगर इसके खेत में पानी भर जाता है तो इसके पेड़ ख़राब होने की संभावना होती है। ये भी पढ़ें : कहां कराएं मिट्टी के नमूने की जांच

उर्वरक की जरूरत:

हम जिस मिटटी में इसे लगा रहे हैं उसमें खाद की मात्रा कितनी है? उचित रहेगा की हम अपनी मिटटी का टेस्ट कराके उसमे जरूरत के हिसाब से ही नाइट्रोजन, फास्फोरस का प्रयोग करना चाहिए फिर भी हमें 80KG नाइट्रोजन और 60KG फास्फोरस का प्रति एकड़ के हिसाब से लेना चाहिए। नाइट्रोजन को खेत में बखेर देना चाहिए तथा जुताई लगा देनी चाहिए और फास्फोरस और पोटास को कुंडों में डालना चाहिए. अगर खेत में आलू की फसली की गई हो तो उसमे खाद की मात्रा 25 से 30 प्रतिशत तक काम की जा सकती है।

बुवाई का ठीक समय:

सूरजमुखी की फसल का सही समय फ़रवरी और मार्च के दूसरे सप्ताह तक होता है। इसकी फसल जून के दूसरे सप्ताह तक पक कर स्टोर हो जानी चाहिए या कहा जा सकता है कि जून के दूसरे सप्ताह तक फसल पक कर तैयार हो जानी चाहिए जिससे की बारिश शुरू होने से पहले घर आ जानी चाहिए। बारिश की वजह से इसमें बहुत नुकसान होता है।

बुवाई से पहले बीज की तैयारी:

बीज को बोने से 12 घंटे पहले भिगो देना चाहिए और बाद में निकाल कर इसे छाया में सुखा देना चाहिए। इसकी बुवाई दोपहर बाद करनी चाहिए जिससे कि इसके बीज को खेत में ठन्डे में उगने के लिए पर्याप्त माहौल मिल सके। गर्मी के मौसम में हमेशा याद रखें ज्यादातर बीजों  को भिगोकर बोने की सलाह दी जाती है क्योंकि गर्मी में तापमान दिन में बहुत ज्यादा होता है इस तापमान में बीज को अंकुरित होने के लिए पर्याप्त नमी नहीं मिल पाती है।

सूरजमुखी की निम्न उन्नत किस्में:

सूरजमुखी की निम्न उन्नत किस्में मार्डन :- इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 6 से 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। इसकी उपज समय अवधि 80 से 90 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 90 से 100 सेमी. तक होती है। इस प्रजाति की खेती बहुफसलीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है।  इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है। बी.एस.एच.–1 :- इस प्रजाति की उत्पादन 10 से 15 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 100 से 150 सेमी. तक होती है। इस प्रजाति में तेल की मात्र 41 प्रतिशत होती है। एम.एस.एच. :- इस प्रजाति की उत्पादन 15 से 18 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 170 से 200  सेमी. तक होती है। इस प्रजाति में तेल की मात्र 42 से 44 प्रतिशत होती है। सूर्या :– इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 100 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 130 से 135 सेमी. तक होती है। इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है। ई.सी. 68415 :- इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 110 से 115 दिन है। इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 180 से 200  सेमी. तक होती है। इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है।

कीड़े और  रोकथाम:

सूरजमुखी की खेती में कई प्रकार के कीट रोग लगते है, जैसे कि दीमक हरे फुदके (डसकी बग) आदि है। इनके नियंत्रण के लिए कई प्रकार के रसायनो का भी प्रयोग किया जा सकता है। मिथाइल ओडिमेंटान 1 लीटर 25 ईसी या फेन्बलारेट 750 मिली लीटर प्रति हैक्टर 900 से 1000 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए।

कटाई:

सूरजमुखी की फसल एक साथ कटाई के लिए नहीं आती है इसके फूलों को तोड़ने से पहले देखें की वो हलके पीले रंग के हो गए है, तभी इनको तोड़ कर किसी छाया वाली जगह में सूखा लें। इसकी गहाई के दो तरीके हैं एक तो इसको फूल से फूल रगड़ कर भी बीज अलग किया जा सकता है या डंडे से पीट पीट कर निकला जा सकता है या फिर ज्यादा फसल है तो इसको निकालने के लिए थ्रेसर की मदद भी ली जा सकती है।
6 महीने से भी ज्यादा खिलने वाला फूल है गैलार्डिया, जाने सम्पूर्ण जानकारी

6 महीने से भी ज्यादा खिलने वाला फूल है गैलार्डिया, जाने सम्पूर्ण जानकारी

गैलार्डिया को ब्लैंकेट फ्लावर के नाम से भी जाना जाता है। यह बारहमासी पौधा है , इसकी खेती किसी भी मौसम में की जा सकती है। गैलार्डिया एस्टरेसिया परिवार का एक पौधा है।  

इस फूल का नाम फ्रांस के 18 वी सदी के मजिस्ट्रैट maitre Gaillard de Charentonneau के नाम पर रखा गया है, जो की मजिस्ट्रैट होने के साथ भी बहुत ही काबिल वानस्पातिक शास्त्री थे। 

इस पौधे की ऊंचाई 45 -60 से मी होती है। इन पौधो का ज्यादातर उपयोग घर के लॉन और बालकनी को सजाने के लिए किया जाता है। 

गैलार्डिया फूल की उन्नत किस्में

गैलार्डिया की बहुत सी किस्में ऐसी है, जिन पर सूंदर मेहरून, लाल, पीले और नारंगी रंग के मिश्रण वाले फूल खिलते है। गैलार्डियन फूल की कुछ उन्नत किस्में इस प्रकार है: गैलार्डिया एस्टिवेलिस (वॉल्टेर) एच रॉक, गैलार्डिया एमब्लिओडोन ज गेय मैरून ब्लैंकेट फ्लॉवर, गैलार्डिया अरिस्टेटा पर्श, गैलार्डिया अरिज़ोनिका ऐ ग्रे। इन किस्मो का उत्पादन कर किसान भारी मुनाफा कमा सकता है। 

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गैलार्डिया फूल के बीज कब बोये 

गैलार्डिया की खेती का सही समय फरवरी और मार्च का होता है। इस माह में इस फूल के बीजो की बुवाई की जाती है। बीजो के अंकुरण के लिए सूर्य की रोशनी का उचित तापमान होना आवश्यक है। 

इन फूलो को ज्यादा देखभाल की आवश्यकता नहीं रहती है। 30 -40 के दिन के बाद यह बीज सीडलिंग के लिए तैयार हो जाते है। इन्हे गमलों या किसी अन्य पॉट वगेरा में ट्रांसप्लांट कर सकते है। 

बीज लगाने के लगभग तीन महीने बाद इनमे फूल आना शुरू हो जाते है , साथ ही ये पौधे 6 महीने से अधिक फूल देते रहते है। यानी ठंड के आने तक इन पौधो में फूल लगते रहते है। 

गैलार्डिया फूल की उपज के लिए उपयुक्त मिट्टी कौन सी है ?

गैलार्डिया फूल को वैसे किसी भी मिट्टी में उगाया जा सकता है, लेकिन क्षारीय, दोमट और अम्लीय मिट्टी को इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। 

बीज की बुवाई के लिए पहले खेत को अच्छे से तैयार कर ले, खेत की अच्छे से गुड़ाई करें। किसानों द्वारा खेत को तैयार करते वक्त गोबर या कम्पोस्ट खाद का भी प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए अच्छे जलनिकास वाली भूमि की आवश्यकता रहती है। 

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गैलार्डिया फूल के लिए उचित तापमान क्या है ? 

गैलार्डिया के फूल के लिए उचित तापमान की आवश्यकता रहती है। गैलार्डिया बीज के अच्छे अंकुरण के लिए 21 डिग्री तापमान की जरुरत रहती है। फूल की अच्छी ग्रोथ के लिए 20 -30 डिग्री के बीच के तापमान की आवश्यकता रहती है।

यह पौधे ज्यादा गर्मी के तापमान को सहन कर लेते है , लेकिन सर्दियों में 10 डिग्री टेम्परेचर से कम का तापमान इस पौधे की बढ़ोत्तरी पर बाधा डाल सकता है। 

गैलार्डिया फूल की देखभाल कैसे करें 

गैलार्डिया के फूल को ज्यादा देखभाल की जरुरत नहीं रहती है। बुवाई के बाद इसमें सिंचाई भी बहुत ही कम मात्रा में की जाती है। गैलार्डिया का पौधा सूखा सहनशील है, इसीलिए इसमें कम पानी की जरुरत पड़ती है। 

वसंत और गर्मियों में पौधे पर फूल आने लग जाते है , उस वक्त इस पौधे को पानी की जरुरत होती है।  सर्दियों में पौधे की सिंचाई की मात्रा कम कर दी जाती है। 

पौधे की अधिक उपज के लिए अन्य रासायनिक खाद की आवश्यकता नहीं रहती। खेत को तैयार करते समय कम्पोस्ट खाद का उपयोग करें, वो फसल और भूमि दोनों के लिए बेहतर होता है। 

साथ ही इस पौधे में कीट और रोग लगने की बहुत ही कम संभावनाएं रहती है। लेकिन गैलार्डिया फूल में रुट रॉट की समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। 

इस रोग से पौधे की जड़े सड़ने लगती है, यह ज्यादा पानी के प्रभाव से भी हो सकता है, इसीलिए इसकी खेती के लिए  जल निकासी का प्रबंध होना आवश्यक है। साथ ही भूमि सूखी होनी चाहिए उसमे ज्यादा नमी न हो , ज्यादा नमी भी पौधे को नुक्सान पहुँचाती है। 

गैलार्डिया फूल की प्रूनिंग 

गैलार्डिया फूल में 6 महीने तक फूल खिलते है। फूल खिलने के बाद इसके पेड़ सूख और मुरझा जाते है। इन फूलो की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए इसके तनो को काट दिया जाता है। 

साथ ही बढ़ते मौसम में फूलो को डेडहेड करते रहना चाहिए ताकि यह फूलो को निरंतर खिलने के लिए बढ़ावा दे सके। गैलार्डिया फ्लॉवर की प्रूनिंग का काम पतझड़ के मौसम में किया जाता है, ऐसा करने से पौधे सूंदर और स्वस्थ बने रहते है। 

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पिकता और लोरेंजिया ये भी गैलार्डिया फूल की किस्में है। गैलार्डिया पौधे  में बड़े आयकर के फूल लगते है। बुवाई के लिए इसमें 300 ग्राम बीज की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता रहती है। 

गैलार्डिया फूल की खेती के लिए , खेत की अच्छी से जुताई कर ले। मिट्टी के भुरभुरा होने पर बीज की बुवाई करें। बुवाई करते समय फॉस्फोरस और पोटास को भी खेत में दे देना चाहिए, इससे भूमि की उर्वरकता बनी रहती है। 

गैलार्डिया की खहेति करने के लिए, बीजो को बोने के लिए अलग से नर्सरी तैयार की जाती है। यह नर्सरी ऊंची और समतल जगहों पर बनाई जाती है, एक एकड़ खेत में लगभग चार क्यारियां बनाई जाती है 3 फ़ीट चौड़ी और 10 फ़ीट लम्बी होती है। बुवाई करने से पहले बीजउपचार कर लेना चाहिए। 

इस तरीके से रंगीन फूल गोभी की खेती कर बेहतरीन आय कर सकते हैं

इस तरीके से रंगीन फूल गोभी की खेती कर बेहतरीन आय कर सकते हैं

रंगीन फूलगोभियां दिखने में बेहद ही सुंदर और आकर्षक होती हैं। वहीं, इसके साथ-साथ यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी काफी अच्छी होती हैं। आज के इस वैज्ञानिक युग में हर चीजें आसान नजर आती हैं। विज्ञान ने सब कुछ करके रख दिया है। यहां पर कोई भी असंभव चीज भी संभव नजर आती है। अब चाहे वह खेती-किसानी से संबंधित चीज ही क्यों ना हों। बाजार के अंदर विभिन्न तरह की रंग बिरंगी फूल गोभियां आ गई हैं। दरअसल, आज हम आपको इस रंग बिरंगी फूल गोभियों की खेती के विषय में जानकारी देने जा रहे हैं। ताकि आप अपने खेत में सफेद फूल गोभी के साथ-साथ रंगीन फूल गोभी का भी उत्पादन कर सकें। बाजार में इन गोभियों की मांग दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसी स्थिति में आप इनको बाजार में बेचकर काफी शानदार मुनाफा कमा सकते हैं। रंगीन फूलगोभियां किसानों को काफी मुनाफा प्रदान करती हैं।

रंगीन फूल गोभी की खेती

भारत के कृषि वैज्ञानिकों ने रंगीन फूल गोभी की नवीन किस्म की खोज की है। यह गोभियां हरी, नीली, पीली एवं नारंगी रंग की होती हैं। इन विभिन्न तरह के रंगों की गोभी का सेवन करने से लोगों को बीमारियों से छुटकारा भी मिल रहा है। इसकी खेती किसी भी तरह की मिट्टी में आसानी से की जा सकती है। आपको इसके लिए पर्याप्त सिंचाई की आवश्यकता होती है। भारतीय बाजार में इन गोभियों की मांग बढ़ती जा रही है। इससे किसान भी इसका उत्पादन कर काफी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।

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रंगीन फूलगोभी की बिजाई

भारत में रंगीन फूलगोभी की अत्यधिक पैदावार झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में होती है। इसकी खेती करने का सबसे उपयुक्त समय शर्दियों का होता है। आप इसकी नर्सरी सितंबर एवं अक्टूबर में लगा सकते हैं। साथ ही, खेत की तैयारी के उपरांत इसे 20 से 30 दिन पश्चात खेतों में लगा सकते हैं। इसकी शानदार पैदावार के लिए 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान उपयुक्त माना गया है। वहीं, खेती की मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 6.5 के बीच रहना चाहिए। किसानों को

रंगीन फूलगोभी की खेती से कितनी आय अर्जित होती है

यह रंग-बिरंगी गोभियां खेतों में बिजाई के पश्चात 100 से 110 दिन में पककर तैयार हो जाती है। किसान भाई रंगीन फूल गोभी का एक एकड़ में उत्पादन कर 400 से 500 क्विंटल तक का उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। बाजार में लोग इस रंग को देखते ही बड़े जोर शोर से इसकी खरीदारी कर रहे हैं। साधारण गोभी की बाजार का बाजार में भाव 20 से 25 रुपये होता है। तो उधर इन रंग बिरंगी गोभियों की कीमत 40 से 45 रुपये तक की होती है। ऐसी स्थिति में किसान भाई इसकी खेती कर काफी शानदार मुनाफा कमा सकते हैं।
फूल गोभी की इन उन्नत किस्मों को उगाकर किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं

फूल गोभी की इन उन्नत किस्मों को उगाकर किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं

किसान भाई फूलगोभी की उन्नत किस्मों के माध्यम से किसी भी सीजन में बेहतरीन उत्पादन हांसिल कर सकते हैं। किसानों को इसकी खेती करने पर काफी अच्छी-खासी पैदावार अर्जित प्राप्त हो सकती है। 

बतादें, कि अच्छे उत्पादन के लिए जैविक खाद और खेत से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए। फूलगोभी की खेती के माध्यम से किसान कम समय में अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। 

शायद आपको जानकारी हो कि फूलगोभी की खेती किसान किसी भी सीजन में कर सकते हैं। साथ ही, लोगों के द्वारा फूल गोभी का उपयोग सब्जी, सूप एवं अचार इत्यादि तैयार करने के लिए किया जाता है। 

क्योंकि इस सब्जी के अंदर विटामिन-बी की मात्रा के साथ प्रोटीन भी बाकी सब्जियों से कई गुना ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। इसी वजह से बाजार के अंदर इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। 

वर्तमान में दिल्ली में फूल गोभी की कीमत 60 से 100 रुपये प्रति किलो तक है। साथ ही, फूलगोभी की खेती के लिए ठंडी एवं आर्द्र जलवायु जरूरी होती है। 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि फूलगोभी की फसल में रोग लगने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। इसके संरक्षण के लिए बीजों की बुवाई से पूर्व ही कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनुशंसित फफूंदनाशक से शोधन अवश्य करें।

फूलगोभी की अगेती, पिछेती और मध्यम किस्में

आईसीएआर, पूसा के वैज्ञानिकों ने किसानों को फूलगोभी की खेती से किसी भी सीजन में अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए कुछ बेहतरीन किस्मों को विकसित किया है, जिनमें पूसा अश्विनी, पूसा मेघना, पूसा कार्तिक और पूसा कार्तिक शंकर आदि शामिल हैं।

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वहीं, फूल गोभी की अन्य अगेती किस्मों में - पूसा दिपाली, अर्ली कुवारी, अर्ली पटना, पन्त गोभी- 2, पन्त गोभी- 3, पूसा कार्तिक, पूसा अर्ली सेन्थेटिक, पटना अगेती, सेलेक्सन 327 और सेलेक्सन 328 आदि शम्मिलित हैं। 

इसके अतिरिक्त फूलगोभी की पछेती किस्मों में- पूसा स्नोबाल-1, पूसा स्नोबाल-2, पूसा स्नोबॉल-16 आदि शम्मिलित हैं। फूलगोभी की मध्यम किस्मों में - पूसा सिंथेटिक, पंत सुभ्रा, पूसा सुभ्रा, पूसा अगहनी उयर पूसा स्नोबॉल आदि शम्मिलित हैं।

फूल गोभी की खेती के लिए आवश्यक बातें इस प्रकार हैं

  • फूलगोभी की खेती के लिए आपको पहले खेत को समतल बनाएं, ताकि मिट्टी जुताई योग्य बन जाए।
  • फिर आप जुताई दो बार मिट्टी पलटने वाले हल से करें।
  • इसके बाद खेत में दो बार कल्टीवेटर चलाएं।
  • प्रत्येक जुताई के उपरांत पाटा जरूर लगाएं।
  • मिट्टी का PH मान 5.5 से 7 के बीच होना चाहिए।
  • फूल गोभी की खेती के लिए बेहतरीन जल निकासी वाली बलुई दोमट मृदा और चिकनी दोमट मृदा उपयुक्त मानी जाती है।
  • बतादें, कि जिस मृदा में जैविक खाद की मात्रा ज्यादा हो वह फूलगोभी की पैदावार के लिए बेहद अच्छी होती है।

मई-जून में करें फूलगोभी की खेती मिलेगा शानदार मुनाफा

मई-जून में करें फूलगोभी की खेती मिलेगा शानदार मुनाफा

गोभी वर्गीय सब्जियों में फूलगोभी का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी खेती विशेष तोर पर श्वेत, अविकसित व गठे हुए पुष्प पुंज की पैदावार के लिए की जाती है। 

इसका इस्तेमाल सलाद, बिरियानी, पकौडा, सब्जी, सूप और अचार इत्यादि निर्मित करने में किया जाता है। साथ ही, यह पाचन शक्ति को बढ़ाने में बेहद फायदेमंद है। यह प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन ‘ए’ तथा ‘सी’ का भी बेहतरीन माध्यम है।

फूलगोभी की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

फूलगोभी की सफल खेती के लिए ठंडी और आर्द्र जलवायु सबसे अच्छी होती है। दरअसल, अधिक ठंड और पाला का प्रकोप होने से फूलों को काफी ज्यादा नुकसान होता है। 

शाकीय वृद्धि के दौरान तापमान अनुकूल से कम रहने पर फूलों का आकार छोटा हो जाता है। एक शानदार फसल के लिए 15-20 डिग्री तापमान सबसे अच्छा होता है।

फूलगोभी की प्रमुख उन्नत प्रजातियां 

फूलगोभी को उगाए जाने के आधार पर फूलगोभी को विभिन्न वर्गो में विभाजित किया गया है। इसकी स्थानीय तथा उन्नत दोनों तरह की किस्में उगाई जाती हैं। इन किस्मों पर तापमान और प्रकाश समयावधि का बड़ा असर पड़ता है। 

अत: इसकी उत्तम किस्मों का चयन और उपयुक्त समय पर बुआई करना बेहद जरूरी है। अगर अगेती किस्म को विलंब से और पिछेती किस्म को शीघ्र उगाया जाता है तो दोनों में शाकीय वृद्धि ज्यादा हो जाती है। 

नतीजतन, फूल छोटा हो जाता है और फूल देरी से लगते हैं। इस आधार पर फूलगोभी को तीन हिस्सों में विभाजित किया गया है – पहला –अगेती, दूसरा-मध्यम एवं तीसरा-पिछेती।

  • फूल गोभी की अगेती किस्में: अर्ली कुंआरी, पूसा कतिकी, पूसा दीपाली, समर किंग, पावस, इम्प्रूब्ड जापानी।
  • फूल गोभी की मध्यम किस्में: पंत सुभ्रा,पूसा सुभ्रा, पूसा सिन्थेटिक, पूसा स्नोबाल, के.-1, पूसा अगहनी, सैगनी, हिसार नं.-1 ।
  • फूल गोभी की पिछेती किस्में: पूसा स्नोबाल-1, पूसा स्नोबाल-2, स्नोबाल-16 ।

फूलगोभी के लिए जमीन की तैयारी

फूलगोभी की खेती ऐसे तो हर तरह की जमीन में की जा सकती। लेकिन, एक बेहतर जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट जमीन जिसमें जीवांश की भरपूर मात्रा उपलब्ध हो, इसके लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती है। 

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इसकी खेती के लिए बेहतर ढ़ंग से खेत को तैयार करना चाहिए। इसके लिए खेत को ३-४ जुताई करके पाटा मारकर एकसार कर लेना चाहिए।

फूलगोभी की खेती में खाद एवं उर्वरक

फूलगोभी की उत्तम पैदावार हांसिल करने के लिए खेत के अंदर पर्याप्त मात्रा में जीवांश का होना बेहद अनिवार्य है। खेत में 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट रोपाई के 3-4 सप्ताह पहले बेहतर ढ़ंग से मिला देनी चाहिए। 

इसके अतिरिक्त 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए। 

नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा एवं फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा आखिरी जुताई या प्रतिरोपण से पूर्व खेत में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। वहीं, शेष आधी नाइट्रोजन की मात्रा को दो बराबर भागों में बांटकर खड़ी फसल में 30 और 45 दिन बाद उपरिवेशन के तोर पर देना चाहिए।

फूलगोभी की खेती में बीजदर, बुवाई और विधि 

फूलगोभी की अगेती किस्मों का बीज डॉ 600-700 ग्राम और मध्यम एवं पिछेती किस्मों का बीज दर 350-400 ग्राम प्रति हेक्टेयर है। 

फूलगोभी की अगेती किस्मों की बुवाई अगस्त के अंतिम सप्ताह से 15 सितंबर तक कर देनी चाहिए। वहीं, मध्यम और पिछेती प्रजातियों की बुवाई सितंबर के बीच से पूरे अक्टूबर तक कर देनी चाहिए।

फूलगोभी के बीज सीधे खेत में नहीं बोये जाते हैं। अत: बीज को पहले पौधशाला में बुआई करके पौधा तैयार किया जाता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र में प्रतिरोपण के लिए लगभग 75-100 वर्ग मीटर में पौध उगाना पर्याप्त होता है। 

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पौधों को खेत में प्रतिरोपण करने के पहले एक ग्राम स्टेप्टोसाइक्लिन का 8 लीटर पानी में घोलकर 30 मिनट तक डुबाकर उपचारित कर लें। उपचारित पौधे की खेत में लगाना चाहिए।

अगेती फूलगोभी के पौधों कि वृद्धि अधिक नहीं होती है। अत: इसका रोपण कतार से कतार 40 सेंमी. पौधे से पौधे 30 सेंमी. की दूरी पर करना चाहिए। 

परंतु, मध्यम एवं पिछेती किस्मों में कतार से कतार की दूरी 45-60 सेंमी. और पौधे से पौधे की दूरी 45 सेंमी. तक रखनी चाहिए।

फूलगोभी की खेती में सिंचाई प्रबंधन 

पौधों की अच्छी बढ़ोतरी के लिए मृदा में पर्याप्त मात्रा में नमी का होना बेहद जरूरी है। सितंबर माह के पश्चात 10 या 15 दिनों के अंतराल पर जरूरत के अनुरूप सिंचाई करते रहना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में 5 से 7 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

फूलगोभी की खेती में खरपतवार नियंत्रण

फूलगोभी में फूल तैयार होने तक दो-तीन निकाई-गुड़ाई से खरपतवार का नियन्त्रण हो जाती है, परन्तु व्यवसाय के रूप में खेती के लिए खरपतवारनाशी दवा स्टाम्प 3.0 लीटर को 1000 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव रोपण के पहले काफी लाभदायक होता है।

फूलगोभी की खेती में निराई-गुड़ाई और मृदा चढ़ाना

पौधों कि जड़ों के समुचित विकास हेतु निकाई-गुड़ाई अत्यंत आवश्यक है। एस क्रिया से जड़ों के आस-पास कि मिटटी ढीली हो जाती है और हवा का आवागमन अच्छी तरह से होता है जिसका अनुकूल प्रभाव उपज पर पड़ता है। वर्षा ऋतु में यदि जड़ों के पास से मिटटी हट गयी हो तो चारों तरफ से पौधों में मिटटी चढ़ा देना चाहिए।

गेंदे की खेती के लिए इस राज्य में मिल रहा 70 % प्रतिशत का अनुदान

गेंदे की खेती के लिए इस राज्य में मिल रहा 70 % प्रतिशत का अनुदान

गेंदे के फूल का सर्वाधिक इस्तेमाल पूजा-पाठ में किया जाता है। इसके साथ-साथ शादियों में भी घर और मंडप को सजाने में गेंदे का उपयोग होता है। यही कारण है, कि बाजार में इसकी निरंतर साल भर मांग बनी रहती है। 

ऐसे में किसान भाई यदि गेंदे की खेती करते हैं, तो वह कम खर्चा में बेहतरीन आमदनी कर सकते हैं। बिहार में किसान पारंपरिक फसलों की खेती करने के साथ-साथ बागवानी भी बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। 

विशेष कर किसान वर्तमान में गुलाब एवं गेंदे की खेती में अधिक रूची एवं दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इससे किसानों की आमदनी पहले की तुलना में अधिक बढ़ गई है। 

यहां के किसानों द्वारा उत्पादित फसलों की मांग केवल बिहार में ही नहीं, बल्कि राज्य के बाहर भी हो रही है। राज्य में बहुत सारे किसान ऐसे भी हैं, जिनकी जिन्दगी फूलों की खेती से पूर्णतय बदल गई है।

बिहार सरकार फूल उत्पादन रकबे को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दे रही है

परंतु, वर्तमान में बिहार सरकार चाहती है, कि राज्य में फूलों की खेती करने वाले कृषकों की संख्या और तीव्र गति से बढ़े। इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने फूलों के उत्पादन क्षेत्रफल को राज्य में बढ़ाने के लिए मोटा अनुदान देने की योजना बनाई है। 

दरअसल, बिहार सरकार का कहना है, कि फूल एक नगदी फसल है। यदि राज्य के किसान फूलों की खेती करते हैं, तो उनकी आमदनी बढ़ जाएगी। ऐसे में वे खुशहाल जिन्दगी जी पाएंगे। 

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बिहार सरकार 70 % प्रतिशत अनुदान मुहैय्या करा रही है

यही वजह है, कि बिहार सरकार ने एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना के अंतर्गत फूलों की खेती करने वाले किसानों को अच्छा-खासा अनुदान देने का फैसला किया है। 

विशेष बात यह है, कि गेंदे की खेती पर नीतीश सरकार वर्तमान में 70 प्रतिशत अनुदान प्रदान कर रही है। यदि किसान भाई इस अनुदान का फायदा उठाना चाहते हैं, तो वे उद्यान विभाग के आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। 

किसान भाई अगर योजना के संबंध में ज्यादा जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो horticulture.bihar.gov.in पर विजिट कर सकते हैं।

बिहार सरकार द्वारा प्रति हेक्टेयर इकाई लागत तय की गई है

विशेष बात यह है, कि गेंदे की खेती के लिए बिहार सरकार ने प्रति हेक्टेयर इकाई खर्च 40 हजार निर्धारित किया है। बतादें, कि इसके ऊपर 70 प्रतिशत अनुदान भी मिलेगा। 

किसान भाई यदि एक हेक्टेयर में गेंदे की खेती करते हैं, तो उनको राज्य सरकार निःशुल्क 28 हजार रुपये प्रदान करेगी। इसलिए किसान भाई योजना का फायदा उठाने के लिए अतिशीघ्र आवेदन करें।

इस राज्य में कंदीय फूलों की खेती पर 50 प्रतिशत अनुदान मिलेगा, शीघ्र आवेदन करें

इस राज्य में कंदीय फूलों की खेती पर 50 प्रतिशत अनुदान मिलेगा, शीघ्र आवेदन करें

बिहार में राज्य सरकार की तरफ से कंदीय फूलों की खेती करने वाले किसानों को 50 प्रतिशत तक सबसिडी प्रदान की जा रही है। योजना का फायदा उठाने के लिए कृषक भाई आधिकारिक साइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। 

बिहार सरकार की ओर से किसानों को फूलों का उत्पादन करने के लिए निरंतर प्रोत्साहन दिया जा रहा है। राज्य सरकार ने फिलहाल एकीकृत बागवानी विकास मिशन योजना के अंतर्गत कंदीय फूल की खेती करने के लिए किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान देने का फैसला लिया है। 

योजना का फायदा उठाने के लिए किसान आधिकारिक साइट horticulture.bihar.gov.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं।

किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान किया जाऐगा

बतादें, कि बिहार सरकार ने प्रति हेक्टेयर कंदीय फूलों की खेती हेतु लागत 15 लाख रुपये रखी है। इस पर सरकार 50 प्रतिशत अनुदान प्रदान करेगी। इस हिसाब से किसानों को सात लाख 50 हजार रुपये मिलेंगे। 

सब्सिडी का फायदा उठाने के लिए किसान आज ही आधिकारिक वेबसाइट horticulture.bihar.gov.in पर जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त वह अपने निकटतम उद्यान कार्यालय में सम्पर्क कर सकते हैं। 

योजना के अंतर्गत फायदा लेने के लिए किसानों को अपना आधार कार्ड, बैंक पासबुक की प्रति, राशन कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट साइज फोटो, फोन आदि अपने पास जरूर रखने होंगे। 

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बाजार में फूलों की प्रचंड मांग है

बतादें, कि कंदीय फूल को गमले व जमीन दोनों में उगाया जा सकता है। इन फूलों की सजावट के काम में जरूरत पड़ती है। साथ ही बुके में भी इन फूलों का उपयोग किया जाता है। 

बाजार में ये फूल अच्छी-खासी कीमत में बिकते हैं। किसान भाई कंदीय फूलों की खेती कर कम समय में ज्यादा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। जानिए किन फूलों को कंदीय फूल कहा जाता है। 

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि ऑक्जेलिक, हायसिन्थ, ट्यूलिप, लिली, नर्गिसफ्रिजिआ, डेफोडिल, आइरिस, इश्किया, आरनिथोगेलम को कंदीय फूल कहा जाता है।

जाने मोगरा के फूल से मिलने वाले फायदे और नुकसान

जाने मोगरा के फूल से मिलने वाले फायदे और नुकसान

मोगरा की खेती ज्यादातर मार्च के महीने में की जाती हैं। मोगरा सफेद रंग का होता ,इसका प्रयोग गजरे बनाने में , इत्र बनाने और अगरबत्तियां बनाने में किया जाता हैं। मोगरा बहुत ही सुगन्धित पुष्प है। मोगरे में बहुत से औषिधीय गुण पाए जाने की वजह से इसका इस्तेमाल दवाइयों में भी किया जाता है। मोगरे के फूल में से रात के वक्त बहुत अच्छी खुशबू आती हैं। जिसके कारण ज्यादातर लोग मोगरे के फूल को घरों में लगाना पसंद करते है। मोगरा का इस्तेमाल पाठ पूजा में भी किया जाता है। मोगरे के फूल को शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता हैं। 

मोगरा कितने प्रकार का होता हैं 

मुख्य रूप से मोगरा तीन प्रकार का होता हैं। जिनमे अलग अलग प्रकार के ही फूल आते हैं जैसे पीले ,गुलाबी और सफ़े। पालमपुर मोगरा ,मोआत मोगरा ,जैस्मिनम मोगरा ये सब मोगरे की प्रजातियां है।  

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मोगरा के फूल से मिलने वाले फायदे 

मोगरा के फूल से बहुत से फायदे मिलते हैं इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाइयों में किया जाता हैं। साथ ही साथ इस फूल का चढ़ावा भगवान् विष्णु पर भी किया जाता है।मोगरे के फूल को ज्यादातर ऐसी जगहों पर लगाया जाता हैं जहाँ सूरज की रौशनी मोगरे के फूल पर कम पड़े। 

तनाव और चिंता में राहत दिलाता हैं 

मोगरा के फूल से तनाव और चिंता में राहत मिलती है। मोगरा के फूल से तेल भी बनाया जाता हैं जो की शरीर की मसाज के लिए बेहद लाभकारी माना जाता हैं इसके उपयोग से नशो में राहत मिलती हैं।  

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कीड़े मकोड़े से बचाव 

मोगरे के पेड़ को हम अपने घर में या बगीचे में लगा सकते हैं। इसकी महक से कीड़े मकोड़े दूर रहते है। मोगरे के फूल से बने डिफ़यूजर का भी हम इस्तेमाल कर सकते हैं इससे घर में खुशबू भी बनी रहती हैं साथ ही मूड को भी तरोताजा रखती है। 

मधुमेह के रोग में हैं फायदेमंद 

मोगरे के फूल का इस्तेमाल मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए भी लाभकारी हैं। मोगरे की फूल का चाय का सेवन करने से मधुमेह जैसे बीमारियों में आराम मिलता है। साथ ही ये ब्लड ग्लूकोस को भी संतुलित करता हैं। 

सर्दी जुखाम में राहत देता हैं 

मोगरे का सेवन करने से सर्दी और जुखाम में राहत मिलती हैं। मोगरे में एन्टीबैक्टेरिअल गुण होते हैं ,जो स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के जोखिम को कम करते हैं। इसके सेवन से पाचन किर्या भी संतुलित रहती हैं,और अन्य रोगो से भी बचाव किया जा सकता है।  

माँसपेशियों के दर्द में सहायक 

मोगरे का उपयोग माँसपेशियों के दर्द से छुटकारा पाने के लिए किया जाता हैं साथ ही ये पेट से जुड़े रोगो में भी सहायक होता हैं।  शोध के अनुसार बताया गया हैं मोगरा कैंसर से पीड़ित लोगो के लिए भी आरामदायक हैं। मासपेशियों के दर्द से बचने के लिए मसाज थेरेपी भी ले सकते है।  

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मोगरे का सेवन करने से होने वाले नुक्सान 

मोगरे के बहुत से फायदे हैं ,लेकिन मोगरे के बहुत से नुक्सान हैं। मोगरे का ज्यादा सेवन करने से शरीर को बहुत से नुक्सान हो सकते हैं जो की इस प्रकार हैं :

ज्यादा सेवन करने से ब्लड शुगर का स्तर हो सकता हैं कम 

मोगरा का ज्यादा सेवन से शरीर में ब्लड का शुगर लेवल कम हो सकता हैं ,जिससे चक्कर आना ,सर दर्द होना जैसी परेशानियां हो सकती है। ब्लड शुगर कम से होने से दिल की धड़कन बढ़ने लगती हैं .

बांझपन की समस्या 

महिलाओ द्वारा मोगरा का सेवन डॉक्टर के परामर्श द्वारा किया जाना चाहिए ,मोगरे का उपयोग औषिधि के रूप में किया जाता हैं। इसीलिए मोगरा का ज्यादा उपयोग करने से बांझपन जैसी समस्याएं आ सकती हैं। गर्भवती महिलाओ को इसका सेवन नहीं करना चाहिए। 

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कम शुगर लेवल वाले न करें मोगरा का उपयोग 

जिन व्यक्तियों का शुगर लेवल कम हैं उन्हें मोगरा का उपयोग नहीं करना चाहि। क्यूंकि मोगरा शरीर के अंदर ब्लड ग्लूकोस को कम करता हैं जिससे बहुत सी परेशानियां आ सकती हैं।  मोगरे का फूल सूंदर होने के साथ साथ बहुत से लाभ प्रदान करता हैं। इसका इस्तेमाल मुँह के छालो को दूर करने के लिए भी किया जाता हैं। ये कैंसर और मधुमेह से सम्बंधित रोगो में भी सहायक हैं। मोगरा के पेड़ का उपयोग हम तनाव को कम करने के लिए भी करते है।  मोगरे का उपयोग त्वचा से सम्बंधित रोगो के लिए भी किया जाता हैं ,इसका इस्तेमाल हम चेहरे के निखार के लिए भी कर सकते है।

हॉलीहॉक पौधे की जाने सम्पूर्ण जानकारी

हॉलीहॉक पौधे की जाने सम्पूर्ण जानकारी

हॉलीहॉक पौधा एक प्रकार का फूल है जिसका वैज्ञानिक नाम alcea rosea है। यह फूल लगभग 5 -6 फुट ऊँचा होता है। यह फूल रंग बिरंगी फूलो और अपनी मनमोहक शक्ति के लिए प्रसिद्ध है। इस फूल का उपयोग ज्यादातर वानस्पतिक बाग़, उद्यानों और पेयजल की सुंदरता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। 

हॉलीहॉक यूरोप और एशिया का सूंदर पुष्पी पौधा है , इसे मल्लिका और गुलखैरा के नाम से भी जाना जाता है। इस फूल के पत्ते सफ़ेद और हरे रंग के होते है , जो की हृदय के आकार के होते है। इन फूलो में बहुत से औषिधीय गुण भी पाए जाते है। हॉलीहॉक एक बहुत ही महत्पूर्ण पौधा है , जिसका उपयोग बगीचे की सुंदरता बढ़ाने के लिए भी आमतौर पर किया जाता है। 

हॉलीहॉक की खेती कैसे करें ?

हॉलीहॉक की खेती ज्यादातर बगीचों और बालकनियों की सुंदरता को बढ़ाने के लिए करते है। इसमें सबसे पहले बीज की जाँच कर ले ,सबसे अच्छे बीज का चयन करें।  हॉलीहॉक की अच्छी खेती के लिए रेतीली मिटटी की आवश्यकता रहती है। उसके बाद बीजो को अच्छे से समान दूरी पर बो दे , उसके बाद बीज को मिटटी से अच्छे तरीके से ढक दे। 

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यह फूल ज्यादातर शुष्क और उष्णकटिबंधीय जगहों पर उगाया जाता है। हॉलीहॉक के पौधे की अच्छी वृद्धि के लिए सूर्य की उचित रोशनी की भी आवश्यकता पड़ती है। 

हॉलीहॉक फूल के प्रकार क्या है ?

हॉलीहॉक फूल कई प्रकार का होता है और इन सब की अपनी अलग-अलग खासियत भी है। यह फूल रंगो के आधार पर भी अलग पाए जाते है। हॉलीहॉक फूल के मुख्य प्रकार ये है : मल्टीकलर हॉलीहॉक, मेसेंजर हॉलीहॉक, एलिगेंस हॉलीहॉक और अलस्विच हॉलीहॉक यह फूल दिखने में बहुत ही सूंदर और आकर्षक होते है। 

हॉलीहॉक का पौधा कहाँ पाया जाता है 

हॉलीहॉक का पौधा दुनिया भर में पाया जाता है, क्योंकि यह पौधा अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। यह फूल ज्यादातर सूखे इलाकों में पाया जाता है। यह एक वानस्पतिक प्रजाति है, जिसे गुड़हल के नाम से भी जाना जाता है। इस फूल का उत्पादन भारत के कई राज्यों में किया जाता है जैसे : झारखण्ड, ओड़िसा और छत्तीसगढ़। लेकिन यह फूल ज्यादातर पूर्वी भारत में पाया जाता है। हॉलीहॉक का पौधा बड़ी पत्तियों और फूलों के साथ काफी ऊँचा भी होता है। 

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हॉलीहॉक पौधे की देखभाल 

बुवाई के बाद पौधे की अच्छे से देखभाल की जाती है। इसमें समय पर पानी और खाद भी दिया जाता है, ताकि पौधे की अच्छे से वृद्धि की जा सके। बुवाई से पहले और बुवाई के बाद भी मिट्टी में उचित खाद का प्रयोग करना चाहिए। पौधे को नियमित पानी दे, ताकि भूमि की उर्वरकता बनी रहे। पौधे की उचित देखभाल से पौधा लम्बे समय तक सूंदर फूल प्रदान करेगा। समय पर पौधे में नराई का काम भी किया जाना चाहिए, ताकि पौधा का अच्छे से विकास हो सके। 

हॉलीहॉक पौधे के मुख्य चिकित्सक गुण 

हॉलीहॉक के पौधे का उपयोग बहुत से रोगों में भी किया जाता है। हॉलीहॉक के पौधे के बहुत से औषिधीय गुण भी है।  इसका इस्तेमाल हम चक्कर आने पर , हृदय रोग होने पर साथ ही कफ जैसे रोगों से छुटकारा पाने के लिए भी किया जाता है।

1- हॉलीहॉक के पौधे का इस्तेमाल रूखी त्वचा के लिए भी किया जाता है। साथ ही इसे त्वचा के उपचार के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। यह एक अमूल्य पौधा है जिसका उपयोग बहुत सी चीजों में किया जाता है। 

2 -हॉलीहॉक के पौधे में ग्लूकोसाइड नामक तत्व भी पाया जाता है, जो शरीर के अंदर रक्तचाप को संतुलित बनाये रखने में मदद करता है। साथ ही यह शरीर के अंदर अनीमिया की कमी को भी दूर करने में सहायक सिद्ध होता है।