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बिहार के आशीष कुमार अपने गांव में काली हल्दी की खेती कर मध्य प्रदेश तक सप्लाई कर रहे हैं।

बिहार के आशीष कुमार अपने गांव में काली हल्दी की खेती कर मध्य प्रदेश तक सप्लाई कर रहे हैं।

किसान आशीष कुमार का कहना है, कि उन्होंने एक लेख में पढ़ा था कि बिहार में काली हल्दी विलुप्त हो चुकी है। अब कोई काली हल्दी की खेती नहीं करता है। ऐसे में मैंने काली हल्दी की खेती करना चालू किया। जैसा कि हम जानते हैं, कि हल्दी एक औषधीय मसाला होता है। इसका इस्तेमाल खाना निर्मित करने के साथ-साथ आयुर्वेदिक औषधियाँ तैयार करने के लिए किया जाता है। हल्दी के बिना हम स्वादिष्ट दाल एवं सब्जी की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। अधिकांश लोगों का मानना है, कि हल्दी का रंग केवल पीला ही हो होता है। परंतु, इस प्रकार की कोई बात नहीं है, आज भी भारत में किसान काली हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही किसान के विषय में बताएंगे, जिन्होंने काली हल्दी की खेती चालू कर लोगों के समक्ष मिसाल प्रस्तुत की है। वर्तमान में अन्य दूसरे किसान भी उनसे काली हल्दी की खेती करने का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

आशीष अपने गांव में लगभग 3 वर्ष से काली हल्दी की खेती कर रहे हैं

एनबीटी की एक खबर के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम आशीष कुमार सिंह है। आशीष कुमार बिहार राज्य के गया जनपद के अंतर्गत आने वाले टिकारी गांव के निवासी हैं। आशीष कुमार अपने निज गांव में 3 साल से काली हल्दी की खेती कर रहे हैं। आशीष कुमार सिंह का कहना है, कि उनको कृषि से जुड़े लेख एवं खबरें पढ़ने का अत्यधिक शौक है। एक दिन उन्होंने अखबार में काली हल्दी के विषय में एक लेख पढ़ा था। इसके पश्चात आशीष ने काली हल्दी की खेती करने की योजना बनाई है। मुख्य बात यह है, कि आशीष विलुप्त होने की स्थिति पर पहुंच चुकी विभिन्न फसलों की खेती कर रहे हैं। यह भी पढ़ें: जानिए नीली हल्दी की खेती से कितना मुनाफा कमाया जा सकता है

काली हल्दी से आयुर्वेदिक औषधियां निर्मित की जाती हैं

आशीष कुमार ने बताया कि उन्होंने लेख में पढ़ा था कि बिहार में काली हल्दी बिल्कुल खो चुकी है। अब इसकी खेती कोई नहीं करता है। ऐसे में मैंने इसकी खेती करना चालू कर दिया। उनके द्वारा उत्पादित हल्दी की सप्लाई सर्वाधिक मध्य प्रदेश में होती है। उनके अनुसार मध्य प्रदेश में बहुत सारे किसान उनसे जुड़े हुए हैं। आशीष काली हल्दी की मांग आते ही आपूर्ति कर देते हैं। दरअसल, मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय के लोग अपना कोई भी शुभ कार्य आरंभ करने से पूर्व काली हल्दी का इस्तेमाल करते हैं। इसके अतिरिक्त इससे विभिन्न आयुर्वेदिक औषधियाँ भी तैयार की जाती हैं।

काली हल्दी की बुवाई हेतु कितना बीज उपयोग होता है

आशीष डेढ़ कट्ठे भूमि में काली हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनको लगभग डेढ़ क्विंटल काली हल्दी की पैदावार मिलती है। बतादें, कि डेढ़ कट्ठे भूमि में काली हल्दी की बुवाई करने हेतु 10 किलो बीज की आवश्यकता होती है। उनका कहना है, कि काली हल्दी की खेती आप गमले में भी चालू कर सकते हैं। काली हल्दी की खेती में जल की काफी कम आवश्यकता है। अशीष कुमार सिंह से प्रेरणा लेकर दर्जनों की संख्या में किसानों ने काली हल्दी की खेती शुरू कर दी है। वह काली हल्दी के बीज 300 रुपये किलो के हिसाब से बेचते हैं। काली हल्दी में कुरकुमीन पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा पाई जाती है। कृषि वैज्ञानिक देवेंद्र मंडल का कहना है, कि काली हल्दी का ओषधि के तौर पर सेवन करने से विभिन्न प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। वर्तमान में बाजार के अंदर एक किलो काली हल्दी की कीमत 1000 से 5000 रुपये के मध्य है।
पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

पीली हल्दी की जगह काली हल्दी की खेती कर किसान कम लागत में अधिक आय कर रहा है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि काली हल्दी की खेती करने पर पानी की खपत कम होती है। यदि आप एक एकड़ में काली हल्दी की खेती करते हैं, तो आपको 50 से 60 क्विंटल तक पैदावार मिलेगा। साथ ही, एक एकड़ से 10 से 12 क्विंटल तक सूखी हल्दी का उत्पादन होगा। ऐसे में काली हल्दी की खेती करने पर काफी अच्छी खासी आमदनी होती है। लोगों का मानना है, कि हल्दी केवल पीले रंग की ही होती है। परंतु, इस तरह की कोई बात नहीं है। दरअसल, हल्दी काले रंग की भी होती है। विशेष बात यह है, कि काली हल्दी का भाव भी पीली हल्दी की तुलना में ज्यादा होता है। इसका इस्तेमाल आयुर्वेदिक औषधियां बनाने में किया जाता है। इसमें पीली हल्दी की तुलना में विटामिन्स और मिनिरल्स भी ज्यादा पाए जाते हैं। यही कारण है, कि अब बिहार में एक किसान ने इसकी खेती भी चालू कर दी है। इससे किसान की काफी मोटी आमदनी हो रही है।

काली हल्दी की खेती करने वाला किसान कमलेश

जानकारी के अनुसार, काली हल्दी की खेती करने वाले किसान का नाम कमलेश चौबे है। वे पूर्वी चम्पारण के नरकटियागंज प्रखंड स्थित मुशहरवा गांव के मूल निवासी हैं। उन्होंने अभी एक कट्ठे भूमि पर काली हल्दी की खेती चालू की है। उन्होंंने एक कट्ठे जमीन में 25 किलो काली हल्दी की बुवाई की थी, जिससे लगभग डेढ़ क्विंटल हल्दी का उत्पादन हुआ है। इससे उन्हें काफी अच्छी आमदनी हो रही है। यह भी पढ़ें: Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

किसान हल्दी विक्रय से कितना कमा सकते हैं

विशेष बात यह है, कि कमलेश ने काली हल्दी का उत्पादन करने के लिए नागालैंड से इसके बीज इंपोर्ट किए थे। बतादें, कि एक किलो बीज 500 रुपये में आए थे। ऐसी स्थिति में 25 किलो बीज खरीदने के लिए उन्हें साढ़े 12 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ा। वर्तमान में बाजार के अंदर काली हल्दी की कीमत 500 से 5000 रुपये किलो के मध्य है। यदि कमलेश 1000 रुपये किलो भी काली हल्दी बेचते हैं, तो 150 किलो हल्दी विक्रय के उपरांत उन्हें डेढ़ लाख रुपये की आमदनी होगी।

काली हल्दी में कितने तत्व विघमान होते हैं

कृषि वैज्ञानिक अभिक पात्रा के अनुसार काली हल्दी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है। इससे बहुत सारी औषधीय दवाइयां निर्मित की जाती हैं। पीली हल्दी की अपेक्षा में इसकी कीमत बहुत गुना अधिक होती है। वर्तमान में उत्तराखंड के किसान भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं। काली हल्दी में एंथोसायनिन ज्यादा मात्रा में विघमान होता है। इस वजह से यह गहरे बैंगनी रंग की दिखती है। साथ ही, काली हल्दी में एंटी अस्थमा, एंटीऑक्सिडेंट, एंटीफंगल, एंटी- कॉन्वेलसेंट, एनाल्जेसिक, एंटीबैक्टीरियल और एंटी-अल्सर जैसे विशेष गुण मौजूद होते हैं।
Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

Turmeric Farming: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में

हल्दी (Haldi (Turmeric)) का मसाला फसलों में विशेष स्थान है. अपने औषधिय गुणों के कारण इसकी अलग पहचान है. हल्दी से रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर की इम्युनिटी बढ़ती है. कोरोना काल में घरेलु इम्यूनिटी बूस्टर काढ़े के अलावा हल्दी को औषधी के रूप में काफी उपयोग किया गया था.

हल्दी की खेती

इसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में, पेट दर्द व एंटीसेप्टिक व चर्म रोगों के उपचार में किया जाता है. यह रक्त शोधक होती है. चोट सूजन को ठीक करने का काम कच्ची हल्दी करती है. जीवाणु नाशक गुण होने के कारण इसके रस का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन में भी होता है. प्राकृतिक एवं खाद्य रंग बनाने में भी हल्दी का उपयोग होता है।

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हल्दी का धार्मिक महत्व भी है. हिंदू धर्म में हर शुभ कार्य में हल्दी का प्रयोग किया जाता है. तांत्रिक पूजा में भी महत्व बताया गया है. इसी कारण से हल्दी की बाजार में बहुत मांग रहती है और अच्छे भाव मिलते हैं. खरीफ सीजन में अन्य फसलों के साथ हल्दी की खेती करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं. हल्दी को खेत की मेड़ों पर भी लगाया जा सकता है.

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हल्दी के प्रकार

हल्दी दो प्रकार की होती है, पीली हल्दी और काली हल्दी. पीली हल्दी का प्रयोग मसालों के रूप में सब्जी बनाने में किया जाता है, वहीं काली हल्दी का प्रयोग पूजन में किया जाता है.

हल्दी की उन्नत किस्में

आर एच 5

आर एच 5 किस्म के हल्दी के पौधे की ऊँचाई करीब ८० से १०० सेंटीमीटर होती है। इसके तैयार होने में करीब २१० से २२० दिन लगते है. इसकी पैदावार २०० से २२० क्विंटल प्रति एकड़ प्राप्त की जा सकती है.

राजेंद्र सोनिया

इसके पौधे की ऊंचाई ६० से ८० सेंटीमीटर होती है. फसल तैयार होने में १९५ से २१० दिन लगता है. १६० से १८० क्विंटल तक प्रति एकड़ के हिसाब से उपज प्राप्त की जा सकती है।

पालम पीताम्बर

यह अधिक पैदावार देने वाली हल्दी की किस्मों में से एक है. गहरे पीले रंग के इसके कांड होते हैं. इस किस्म से १३२ क्विंटल/एकड़ तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

सोनिया

इसके तैयार होने में २३० दिन का समय लगता है. इससे उपज ११० से ११५ क्विंटल प्रति एकड़ तक होती है.

सुगंधम

सुगंधम किस्म २१० दिनों में तैयार हो जाती है और करीब ८० से ९० क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. इसके कंद आकर में लंबे और हल्की लाली लिए हुए पीले रंग के होते हैं.

सोरमा

सोरमा किस्म की हल्दी के कंद अंदर से नारंगी रंग के होते हैं. यह २१० दिन में तैयार हो जाता है. इस किस्म से प्रति एकड़ करीब ८० से ९० क्विंटल तक उपज प्राप्त हो सकती है.

सुदर्शन

इसके कंद आकर में छोटे होते हैं. १९० दिनों बाद इसकी खुदाई की जा सकती है.

अन्य किस्में

हल्दी की कई ओर उन्नत किस्में भी होती हैं. जिनमें सगुना, रोमा, कोयंबटूर, कृष्णा, आर. एच 9/90, आर.एच- 13/90, पालम लालिमा, एन.डी.आर 18, बी.एस.आर 1, पंत पीतम्भ आदि किस्में शामिल हैं. ये भी देखें: घर पर उगाने के लिए ग्रीष्मकालीन जड़ी बूटियां 

बुवाई का तरीका

१५ मई से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हल्दी की बुआई की जा सकती है. सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर हल्दी की बुआई अप्रैल, मई माह में भी की जा सकती है.
  • करीबन २५०० किलोग्राम प्रकंदों की आवश्यकता प्रति हेक्टेयर बुआई के लिए होती है.
  • बुआई से पहले हल्दी के कंदों को बोरे में लपेट कर रखने से अंकुरण आसानी से होता है.
  • बुआई के लिए मात्र कंद एवं बाजू कंद प्रकंद का उपयोग किया जा सकता है.
  • ध्यान रहे की प्रत्येक प्रकंद पर दो या तीन ऑंखें हों.
  • बुआई से पहले कंदों को ०.२५ प्रतिशत एगालाल घोल में ३० मिनट तक उपचार करना चाहिए.
  • हल्दी की बुआई समतल चार बाई तीन मीटर आकार की क्यारियों में मेड़ों पर करना चाहिए.
  • लाइन से लाइन की दूरी ४५ से.मी. व पौधों से पौधों की दूरी २५ से.मी. रखें.
  • रेतीली भूमि में इसकी बुआई ७ से १० से.मी. ऊंची मेड़ों पर करनी चाहिए.
बैंकिंग से कृषि स्टार्टअप की राह चला बिहार का यह किसान : एक सफल केस स्टडी

बैंकिंग से कृषि स्टार्टअप की राह चला बिहार का यह किसान : एक सफल केस स्टडी

कठिन मेहनत से हासिल बैंकिंग की नौकरी छोड़, कृषि में स्टार्टअप की राह पर चला बिहार का यह किसान

आजादी के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि और जीडीपी में कृषि का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है। हालांकि,
हरित क्रांति की सफलता के बाद एक समय आयात पर निर्भर रहने वाली भारतीय कृषि इतनी सफल तो हो पायी, कि देश के लोगों की मांग पूरी करने के अलावा कुछ स्तर पर निर्यात में भी हिस्सेदारी बंटा पाई। 2011 की जनगणना के अनुसार, 78 मिलियन प्रवासी मजदूर कृषि क्षेत्रों में सक्रिय रहने के अलावा, अतिरिक्त आय के लिए प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी काम करते हैं और इसी वजह से कृषि से होने वाली उत्पादकता में निरंतर कमी देखने को मिली है। बिहार के औरंगाबाद जिले के बरौली गांव में रहने वाले एक किसान की कहानी कुछ ऐसे ही शुरू हुई थी, जब उन्होंने कृषि और किसानी में सफल हुए कई विदेशी और भारतीय किसानों की केस स्टडी (case study) के बारे में पढ़ा। मैनेजमेंट प्रोफेशनल के रूप में काम करते हुए ही 2011 में बिहार के अभिषेक कुमार ने अच्छी सैलरी देने वाली जॉब को छोड़ने का निर्णय लिया और आज अभिषेक कुमार के खेतों में तुलसी (Tulsi), हल्दी (Turmeric), गिलोय (giloy) तथा मोरिंगा (Drumstick) और गेंदा (मेरीगोल्ड, Marygold) जैसी, आयुर्वेदिक औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधों की खेती की जाती है। अभिषेक को परिवारिक जमीन के रूप में 20 एकड़ का क्षेत्र मिला था, जिनमें से 15 एकड़ के क्षेत्र में वह इसी तरह कम समय में तैयार होने वाली आयुर्वेदिक औषधियों का उत्पादन कर बड़ी मार्केटिंग कंपनियों से जुड़ते हुए अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।


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अभिषेक ने बताया कि धान, गेहूं और मक्का से होने वाली बचत इन फसलों की तुलना में आधी भी नहीं होती है, लेकिन वैज्ञानिकों के द्वारा सुझाई गई आधुनिक विधियों और कृषि विभाग के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी का सही तरीके से पालन कर, इंटरनेट की मदद से कई सफल किसानों तक पहुंच बनाकर, बेहतर कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ ऐसे गुण सीखे, जो आज अभिषेक को अच्छा मुनाफा दे रहे हैं। बिहार में एक प्रॉफिटेबल कृषि मॉडल बनाने की सोच को लेकर काम कर रहे अभिषेक, खेत से होने वाली उत्पादकता पर ज्यादा ध्यान देते हैं। खुद अभिषेक ही बताते हैं कि एक कृषि परिवार से संबंध रखने के बावजूद भी खेती में कम आमदनी होने की वजह से, अपने परिवार को सहायता प्रदान करने और खुद का गुजारा करने के लिए वह पुणे में एक बैंक में कंसलटेंट के रूप में काम करने लगे थे। अभिषेक ने बताया कि जब उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड और चपरासी जैसे पदों पर काम करते वाले लोगों को देखा और उनसे मुलाकात हुई, तो पता चला कि इन लोगों के गांव में बहुत ज्यादा जमीन खाली पड़ी है और खेती में मुनाफा ना होने की वजह से ही वह अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहरों में मुश्किल भरी जिंदगी जी रहे हैं। इन्हीं घटनाओं से प्रेरणा लेते हुए अभिषेक ने अपनी नौकरी को छोड़ वापस गांव में ही रहते हुए कृषि में इनोवेशन (Innovation) करने की सोच के साथ एक नई शुरुआत करने की सोची। आज अभिषेक को उनके गांव में ही नहीं बल्कि पूरे जिले में एक अलग पहचान मिल चुकी है और बिहार के कई बड़े एनजीओ (NGOs) तथा किसान भाई समय-समय पर उनसे जाकर मिलते हैं और अभिषेक के कृषि मॉडल की तरह ही अपने खेत की जमीन की उर्वरता और उत्पादन बढ़ाने के लिए राय लेते है।


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जब अभिषेक ने अपनी खेती की शुरुआत की तभी उन्होंने मन बना लिया था कि वह केवल किताबी ज्ञान को किसानों को बताने की बजाय पहले उसे अपने खेत में अपना कर देखेंगे और यदि अच्छा मुनाफा होगा तभी दूसरे किसान भाइयों को भी नई तकनीकों को सलाह देंगे, उन्हीं प्रयोगों का अभिषेक को इतना फायदा हुआ कि वर्तमान में वह लगभग 95 से अधिक कृषि उत्पादन संगठनों (Farmers producer organisation) से जुड़े हुए है और इन संगठनों से जुड़े हुए लगभग 2 लाख से अधिक किसान भाइयों को साल 2011 से मार्केटिंग और खेती से जुड़ी समस्त जानकारियां उपलब्ध करवा रहे है। किसी भी शहरी परिवेश से वापस ग्रामीण क्षेत्र में आकर कृषि कार्यों की शुरुआत करने में अनेक प्रकार की समस्याएं होती है और ऐसी ही समस्या अभिषेक के सामने भी बिहार में एक अच्छा मुनाफा कमाने वाले किसान बनने की राह में अड़चन पैदा कर रही थी। हालांकि जब अभिषेक शहर से अपनी नौकरी छोड़ वापस गांव में आए, तो उन्हें कई लोगों के द्वारा विरोध झेलना पड़ा और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा इस विचार को पूरी तरीके से गलत ठहरा दिया गया, लेकिन जब अभिषेक ने अपने पिता को आधुनिक और समोच्च तरीके से होने वाली वैज्ञानिक विधियों की मदद से खेती करने की बात बताई, तो उनके परिवार ने भी हामी भरदी। वैज्ञानिक विधि का पालन करते हुए अभिषेक ने सबसे पहले अपने खेत में मिट्टी की जांच करवाई, जिससे उन्हें उनके खेत में पाई जाने वाली मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के बारे में पता चला, कौन से पोषक तत्वों की कितनी मात्रा खेत में पहले से उपलब्ध है और किन पोषक तत्वों की खेत की मिट्टी में कमी है।


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अभिषेक ने अपने किसानी करियर में पहली शुरुआत सामान्य खेती से ही की थी, लेकिन जब उन्होंने बागवानी कृषि को अपनाया तो उनके द्वारा किए गए सभी प्रयास सफल हुए और पहली साल में ही 6 लाख रुपए से अधिक की कमाई हुई। अभिषेक बताते हैं कि 2011 से ही वह रोज सुबह एक घंटे साइबर कैफे में जाकर इंटरनेट और यूट्यूब की मदद से विदेशी और पूशा के वैज्ञानिकों के द्वारा बताई गई नई विधियों को अपने खेत में आजमाकर देखते थे। जरबेरा की फसल का उत्पादन करने वाले वह बिहार के पहले व्यक्ति थे। इसके लिए उन्होंने बेंगलुरु और पुणे में काम कर रही कृषि से जुड़ी कई बड़ी साइंटिफिक लाइब्रेरी में जाकर रिसर्च करने वाले लोगों से बात कर उच्च गुणवत्ता वाले बीजों (High yield variety seeds) को उगाया तो पहले ही उत्पादन के बाद अच्छा मुनाफा दिखाई दिया। आज उनके खेतों में एक चौथाई से ज्यादा हिस्सों पर इसी प्रकार के औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधे उगाए जाते है। अभिषेक बताते हैं कि औषधीय पौधों (Medicine Plants) को एक बार लगाने के बाद कुछ समय तक बिना निराई गुड़ाई के भी रखा जा सकता है और उत्पादन में होने वाली लागत को कम किया जा सकता है, क्योंकि ऐसे प्लांट्स के पौधे और पत्तियां अधिक बारिश और तेज धूप तथा भयंकर ठंड में भी वृद्धि दर को बरकरार रख सकते हैं, जिससे उर्वरकों पर होने वाली लागत कम आती है। औषधीय पौधों में एक बार पानी देने के बाद वे आसानी से 20 से 25 दिन तक बिना पानी के रह सकते है। अभिषेक ने बताया कि मेडिसिन पौधों का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि इनमें आवारा पशु और जानवरों से होने वाले नुकसान पूरी तरीके से कम किए जा सकते है, क्योंकि नीलगाय जो कि बिहार के खेतों में सबसे ज्यादा क्रॉप डेमेज (Crop damage) करती है, वह इन पौधों को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाती।


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अफ्रीका और आसाम में काम कर रही चाय के बागान से जुड़ी कंपनियों के अनुसंधानकर्ताओं की मदद से अभिषेक ने बिहार में रहते हुए ही 'ग्रीन टी' का उत्पादन भी शुरू किया है। ग्रीन टी बनाने के लिए तुलसी, लेमन घास (Lemongrass) और मोरिंगा के पौधों की पत्तियों की आवश्यकता होती है, जिन्हें बारीक तरीके से काटकर एक सोलर ड्रायर विधि की मदद से अभिषेक के द्वारा ही स्थापित गांव की ही एक विपणन इकाई में मशीन की मदद से तैयार किया जाता है और कई बड़ी भारतीय और इंटरनेशनल मार्केटिंग कंपनियों को बेचा जाता है। बैंक में काम करने वाले एक कर्मचारी से लेकर खेती में सफलता प्राप्त करने वाले अभिषेक कई किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनने के बाद अब कृषि के क्षेत्र में एक नई स्टार्टअप की योजना बना रहे है, हालांकि पिछले कुछ समय से बेंगलुरु से संचालित हो रही एक एग्रीटेक स्टार्टअप (Agritech startup) के साथ वह पहले से ही बिजनेस डेवलपर के रूप में जुड़े हुए हैं।


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अभिषेक प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (PACs) में होने वाली विपणन की विधियों में भी कुछ सुधार की उम्मीद करते है, क्योंकि वह मानते है कि मंडियों में होने वाले बिचौलिए की जॉब को पूरी तरीके से खत्म कर देना ही किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा। स्टार्टअप की राय पर अभिषेक का मानना है कि वह किसानों और कृषि उत्पादन संगठन (FPOs) के मध्य कम शुल्क पर काम करने वाले एक माध्यम के रूप में भूमिका निभाने वाली स्टार्टअप की शुरुआत करना चाहते है और उनकी कोशिश है कि किसानों को उगाई गई उपज की सरकार के द्वारा तय किए गए मिनिमम सपोर्ट प्राइस (Minimum Support Price -MSP) से कुछ ज्यादा ही राशि मिले। अपनी इस स्टार्टअप यात्रा के दौरान अभिषेक एम.एस.स्वामीनाथन समिति के द्वारा दिए गए सुझावों को मध्य नजर रखते हुए अपने स्तर पर भारतीय कृषि में कुछ बदलाव करने की सोच भी रखते है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर से अभिषेक को 2014 में सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके अलावा भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के द्वारा दिया जाने वाला भारतीय कृषि रत्न पुरस्कार जीतने वाले अभिषेक प्राकृतिक खेती को ज्यादा प्राथमिकता देते है और हमेशा घर पर तैयार की हुई प्राकृतिक गोबर खाद से ही अधिक उत्पादन प्राप्त करने की कोशिश करते है। अभिषेक का मानना है कि भारतीय किसान जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग ( Zero budget natural farming) और समोच्च कृषि (Sustainable development) जुताई विधियों की मदद से आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही विदेशी मार्केट में भी अपनी पकड़ बना पाएंगे। आशा करते हैं कि Merikheti.com के द्वारा बिहार के अवॉर्ड विजेता किसान अभिषेक की कृषि क्षेत्र में प्राप्त सफलताओं और उनके नए विचारों से जुड़ी यह जानकारी आपको पसंद आई होगी और आने वाले समय में आप भी ऐसी ही भविष्यकारी नीतियों को अपनाकर एक सफल किसान बनने की राह पर जरूर अपना लक्ष्य प्राप्त करेंगे।
बाजारी गुलाल को टक्कर देंगे हर्बल गुलाल, घर बैठे आसानी से करें तैयार

बाजारी गुलाल को टक्कर देंगे हर्बल गुलाल, घर बैठे आसानी से करें तैयार

होली के त्यौहार की रौनक बाजारों में दिखने लगी हैं. हर तरफ जश्न का मौहाल और खुशियों के रंग में डूब जाने की हर किसी की तैयारी है. तो ऐसे में बाजारी गुलाल रंग में भंग न डालें, इसलिये हर्बल गुलाल की डिमांड बाजार में सबसे ज्यादा देखने को मिल रही है. हालांकि पिछले साल की तरह इस साल भी होली के सीजन में हर्बल गुलाल तेजी से तैयार किये जा रहे  हैं. को पालक, लाल सब्जियों, हल्दी, फूलों और कई तरह की जड़ी बूटियों से तैयार किये जा रहे हैं. ये हर्बल गुलाल बाजारी गुलाल को मात देने के लिए काफी हैं. विहान यानि की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की महिलाएं होली के त्यौहार को देखते हुए हर्ब गुलाल बनाने में जुट चुकी हैं. हर्बल गुलाल लगाने से स्किन में किसी तरह का कोई भी इन्फेक्शन या साइड इफेक्ट होने का डर नहीं होता. क्योनी ये गुलाल पूरी तरह से केमिकल फ्री होते हैं.

प्रदेश में बढ़ रही हर्बल गुलाल की डिमांड

अच्छे गुणों की वजह से हर्बल गुलाल की डिमांड पूरे प्रदेश के साथ साथ स्थानीय बाजारों में बढ़ रही है. जिसे देखते हुए विहान की महिलाओं को घर बैठे बैठे ही रोजगार मिल रहा है और अच्छी कमाई हो रही है. इसके अलावा महासमुंद के फ्राम पंचायत डोगरीपाली की जय माता दी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं भी तैयारियों में जुट गयी हैं और हर्बल गुलाल बना रही गौब. समूह की सदस्यों की मानें तो पिछले साल की होली में लगभग 50 किलो तक हर्बल गुलाल के पैकेट तैयार किये थे. जिसकी डिमांड ज्यादा रही. महिलाओं ने बताया कि, हर्बल गुलाल के पैकेट 10 रुपये से लेकर 20 और 50 रुपये के हर्बल गुलाल के पैकेट बनाए गये थे. इस बार ज्यादा मात्रा में गर्ब्ल और गुलाल तैयार किया जा रहा है. बात इस हर्बल गुलाल की तैयारी की करें तो इसे पालक, लाल सब्जी, हल्दी, जड़ी-बूटी, फूल और पत्तियों को सुखाकर प्रोसेसिंग यूनिट में पीसकर तैयार किया जाता है. ये भी देखें: बागवानी के साथ-साथ फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाकर हर किसान कर सकता है अपनी कमाई दोगुनी

हरी पत्तियां भी होती हैं प्रोसेस

हरी पत्तियों में गुलाब, चुकंदर, अमरूद, आम और स्याही फूल की पत्तियों को प्रोसेस किया जाता है. करीब 150 रुपये तक का खर्च एक किलो गुलाल बनाने में आता है. सिंदूर के अलावा पालक और चुकंदर का इस्तेमाल गुलाल बनाने में किया जाता है. बाजार में हर्बल गुलाल की कीमत बेहद कम होती है. गर्ब्ल गुलाल बनाने से न सिर्फ महिलाओं को घर बोथे रोजगार मिल रहा है, बल्कि अच्छी कमाई भी हो रही है. जिले की ग्राम पंचायत मामा भाचा महिला स्व सहायता समूह की महिलाएं इस साल पालक, लाल सब्जी, फूलों और हल्दी से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं. जिससे पीला, नारंगी, लाल और चंदन के कलर के गुलाल बनाए जा रहे हैं. जिसे स्व सहायता समूह की महिलाएं गौठान परिसर और दुकानों के जरिये बेच रही हैं. इतना ही नहीं समूह को हर्बल गुलाल के ऑर्डर भी मिलने लगे हैं. हर्बल गुलाल बनाने में हल्दी, इत्र, पाल्स का फूल समेत कई तरह की साग सब्जियों और खाने वाले चूने का इस्तेमाल किया जाता है.
इस तरह से खेती करके किसान एक ही खेत में दो फसलें उगा सकते हैं

इस तरह से खेती करके किसान एक ही खेत में दो फसलें उगा सकते हैं

आजकल उपलब्ध आधुनिक कृषि तकनीकों से जोखिम को कम किया जा सकता है। इतना ही नहीं कुछ तकनीकें तो कम वक्त में फसलों से ज्यादा आमदनी कराने में भी सहयोग करती हैं। वर्तमान में किसान एक ही भूमि पर एक साथ 2 से अधिक फसलें उत्पादित कर सकता है। आधुनिकता के जमाने में फिलहाल हमारा कृषि क्षेत्र भी सुपर एडवांस होने की दिशा में तेजी से बढ़ता जा रहा है। किसान आजकल यंत्रों और नई तकनीकों के माध्यम से फसल का बेहतरीन उत्पादन कर रहे हैं। इसी कड़ी में जोखिम को कम करके कृषकों की आमदनी बढ़ाने हेतु वैज्ञानिक भी नित नई तरकीबें पेश कर रहे हैं। अंतरवर्तीय खेती भी इन तरकीबों में शामिल है। यह तरीका बढ़ती आबादी की खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने एवं कम खेती-कम वक्त में ज्यादा पैदावार लेने में सहायक भूमिका निभा रहा है। अगर किसान को फसल चक्र की सटीक जानकारी है, तो वह अंतरवर्तीय खेती के जरिए अपनी आमदनी को दोगुनी कर सकता है। आजकल जायद सीजन की फसलों की बुवाई का कार्य चल रहा है। बहुत सारे किसान भाई अपने खेत में ग्रीष्मकालीन मूंग सहित विभिन्न दलहनी फसलों का उत्पादन ले सकते हैं। अगर कतारों में दलहन की बुवाई की गई है, तो मध्य में हल्दी, अदरक की भांति औषधी और मसाला फसलों का उत्पादन करके दोगुना उत्पादन ले सकते हैं। अंतरवर्तीय खेती की सर्वाधिक विशेष बात यही है, कि कतारों में 2 से ज्यादा फसलों की बुवाई की जा सकती हैं। इसमें अलग से खाद-उर्वरक का खर्चा नहीं आता है। किसान को केवल भिन्न-भिन्न बीज डालने होते हैं, जिसके उपरांत एक ही फसल में लगाए जाने वाले इनपु्ट्स से सारी फसलों की उन्नति हो सकती है।

अरहर और हल्दी की अंतरवर्तीय खेती से अच्छा मुनाफा हांसिल किया जा सकता है

अरहर एक प्रमुख दलहनी फसल मानी जाती है, तो वहीं मसाला एवं औषधी के रूप में बाजार में हल्दी की काफी मांग रहती है। एक ही भूमि पर कतारों में इन दोनों फसलों को बोया जा सकता है। हालांकि, हल्दी को छायादार जगह पर उत्पादित किया जाता है, इस वजह से अरहर समेत इसकी फसल लेना काफी फायदेमंद रहेगा। यह भी पढ़ें: कैसे करें हल्दी की खेती, जाने कौन सी हैं उन्नत किस्में एक साथ बुवाई करके दोनों फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। अरहर जैसी दलहनी फसलों के साथ अंतरवर्तीय खेती करने का सबसे बड़ा लाभ यह है, कि यह फसलें वातावरण से नाइट्रोजन को सोखकर भूमि तक पहुंचाती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरकता में वृद्धि होती है। वहीं साथ-साथ में उगने वाली फसल को इसका प्रत्यक्ष तौर पर फायदा मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, दलहनी फसलों की खेती सहित अथवा इसके उपरांत बोई जाने वाली फसलों की पैदावार में वृद्धि हो जाती है। दलहनी फसलों की कटाई करने के उपरांत अलग से खाद-उर्वरक का इस्तेमाल नहीं करना होता है।

मृदा में कटाव होने से भी बचता है

जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव साफ तौर पर खेती-किसानी पर देखने को मिल रहा है। कभी बेमौसम बारिश तो कभी सूखा जैसी परिस्थितियों से फसलें चौपट होती जा रही हैं। भूजल स्तर में गिरावट आने से मृदा में कटाव काफी बढ़ रहा है। अंतरवर्तीय खेती को इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान माना जाता है। एक सहित विभिन्न फसलों को लगाने से मृदा में जल को बांधने की क्षमता बढ़ जाती है। इससे वर्षा के समय में कटाव की समस्या नहीं रहती एवं मिट्टी में भी नमी बरकरार रहती है। अगर किसी कारणवश एक फसल को हानि पहुँच भी जाए तब भी किसान पर जीवनयापन करने हेतु दूसरी फसल का सहारा मिल जाता है। औषधीय फसलों की अंतरवर्तीय खेती करने अथवा फसल विविधता के चलते फसल में कीट-रोगों का प्रकोप नहीं रहता है। इससे कीटनाशकों का खर्चा बच जाता है। फसल की गुणवत्ता को उत्तम बनी रहने के साथ बाजार में उत्पादन को अच्छा खासा भाव मिल जाता है।

जानें इन फसलों को एकसाथ उगाया जाता है

भारत के तकरीबन समस्त क्षेत्रों में रबी फसलों की कटाई का कार्य पूर्ण हो चुका है। कुछ किसान जायद सीजन की फसल उगा रहे हैं, तो वहीं कुछ खरीफ सीजन के लिए भूमि को तैयार कर रहे हैं। किसान यदि चाहें तो खरीफ सीजन के दौरान अंतरवर्तीय पद्धति से उत्पादन कर सकते हैं। खरीफ सीजन के समय एक साथ उत्पादित की जाने वाली फसलों के अंतर्गत सोयाबीन + मक्का, मूंगफली + बाजरा, मूंगफली + तिल, मूंग + तिल, अरहर + मक्का,अरहर + सोयाबीन, अरहर + तिल, अरहर + मूंगफली आती हैं।
Turmeric Cultivation: हल्दी की खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

Turmeric Cultivation: हल्दी की खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

हल्दी का बड़े स्तर पर उपयोग होने से इसकी बाजार में लगातार मांग बनी रहती है। इसी वजह से हल्दी की खेती करना किसान भाइयों के लिए मुनाफा का सौदा है। हल्दी की खेती से लगभग 100 से 150 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन लेकर इससे अच्छी आमदनी की जा सकती है। भारत में हल्दी की खेती केरल, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल और कर्नाटक आदि राज्यों में बड़े पैमाने पर की जा रही है। यदि आप भी हल्दी की खेती करना चाहते हैं, तो आप इस लेख के माध्यम से इसकी जानकारी अर्जित कर सकते हैं।

हल्दी की प्रमुख प्रजातियां कौन-कौन सी हैं

भारत में हल्दी की तकरीबन 30 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सुकर्ण, कस्तूरी, सुवर्णा, सुरोमा और सुगना, पन्त पीतम्भ, लकाडोंग, अल्लेप्पी, मद्रास, इरोड, सांगली, सोनिया, गौतम, रश्मि, सुरोमा, रोमा, कृष्णा, गुन्टूर, मेघा आदि प्रमुख प्रजातियां हैं।

हल्दी की खेती हेतु कैसी जलवायु अनुकूल होती है

हल्दी की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की जरूरत होती है। इसकी खेती करने के लिए 20 से.ग्रे. से कम तापमान बेहतर माना जाता है। बेहतर बारिश वाले गर्म एवं आर्द्र इलाके को इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। ये भी देखें: वैज्ञानिक तरीके से करें हल्दी की खेती और लाखों कमाएं

हल्दी की खेती हेतु उपयुक्त मृदा

हल्दी की खेती को समस्त प्रकार की मिट्टी में आसानी से किया जा सकता है। लेकिन, उर्वराशक्ति से परिपूर्ण दोमट, जलोढ़ एवं लैटेराइट मृदा सबसे अच्छी मानी जाती है। इसकी खेती के लिए मृदा का पी.एच. मान 5 से 7.5 के मध्य होना ही चाहिए।

हल्दी की खेती हेतु खेत को किस तरह तैयार करें

हल्दी की बुवाई करने के लिए खेत की मृदा को भुरभुरी एवं एकसार करने के पश्चात उसमें अपनी सुविधानुसार बैड बना लें। सामान्यतः बैड 15 सेमी ऊँचे, 1 मीटर चौड़े एवं बैड से बैड का फासला 50 सेमी पर तैयार करें। इसके अतिरिक्त हल्दी की बुवाई मेड अथवा क्यारियों में की जा सकती है। मेड बुवाई हेतु मेड से मेड का फासला 45-60 सेमी और पौधों के मध्य 15-20 सेमी का फासला रखना चाहिए।

हल्दी की बिजाई हेतु बीज की मात्रा

हल्दी की खेती करने के लिए 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से बीज की जरुरत होती है। मिश्रित फसल हेतु 4-6 क्विंटल प्रति एकड़ बीज पर्याप्त रहता है। हल्दी की बुवाई करने हेतु 7-8 सेंटीमीटर लंबाई वाले कंद का चुनाव करें, जिसमें कम से कम दो आंखे होनी चाहिए। ये भी देखें: इस तरह से खेती करके किसान एक ही खेत में दो फसलें उगा सकते हैं

हल्दी की बिजाई से पूर्व बीजोपचार

प्रति लीटर पानी में 2.5 ग्राम थीरम अथवा मैंकोजेब का घोल बनाकर बुवाई से पूर्व हल्दी के बीज को 30 से 35 मिनट तक भिगोकर रखें। उसके उपरांत उसको छांव में सूखा कर बुवाई कर दें।

हल्दी की बिजाई समुचित समय क्या है

हल्दी की बिजाई जलवायु, प्रजाति एवं सिंचाई सुविधा पर भी आश्रित रहती है। परंतु, हल्दी की बिजाई का सर्वाधिक उपयुक्त वक्त 15 मई लेकर 15 जून तक है।

हल्दी की बिजाई का सबसे अच्छा तरीका

हल्दी को तैयार खेत में बुवाई कर दें। बुवाई करने के दौरान कतार से कतार का फासला 30 सेंटीमीटर कंद से कंद का फासला 20 सेंटीमीटर रखना चाहिए। साथ ही, कंद की गहराई 20 सेंटीमीटर से ज्यादा ना हो वर्ना पैदावार प्रभावित हो सकती है।

हल्दी की फसल में सिंचाई की आवश्यकता

हल्दी की सिचाई मृदा और जलवायु पर भी निर्भर करती है। हल्दी की फसल को कम सिचाई की जरूरत पड़ती है। गर्मी के मौसम में हल्दी की सिचाई 7-8 दिनों की समयावधि पर करनी चाहिए। तो वहीं ठण्ड के दिनों में 15-16 दिन के अंतराल पर सिचाई करनी चाहिए। वर्षा के मौसम में आवश्यकतानुसार सिचाई करें। फसल से जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।

हल्दी की फसल में उर्वरक प्रबंधन

हल्दी की फसल से बेहतरीन उत्पादन और उच्च गुणवत्ता फसल तैयार करने के लिए खाद एवं उर्वरक को उपयुक्त मात्रा में देना चाहिए। खेत तैयार करने के दौरान 4-5 टन/एकड़ की दर से गोबर का खाद डालें। रासायनिक उर्वरक के रूप में एक हेक्टेयर खेती हेतु 100 किलो ग्राम पोटाश, 20 किलो ग्रा. जिंक सल्फेट, 100 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस (स्फूर) की जरूरत होती है। जिसमें नाइट्रोजन की मात्रा को तीन समतुल्य हिस्सों में बाँट कर एक बुवाई के दौरान दूसरा हिस्सा बुवाई के लगभग 40 से 45 दिनोपरांत तथा तीसरा भाग 80 से 90 दिन पश्चात दे सकते हैं।

हल्दी की फसल में खरपतवार की रोकथाम हेतु क्या करें

हल्दी की फसल में खरपतवार की रोकथाम के लिए वक्त-वक्त पर आवश्यकतानुसार निराई-गुड़ाई करें।

हल्दी की फसल में कीट एवं रोग की रोकथाम हेतु क्या किया जाए

हल्दी की फसल में कीट, रोग, कंद मक्खी, तना भेदक, बारुथ, कंद सड़न, पर्णचित्ती आदि का प्रकोप रहता है। इसका निदान करने हेतु आप अपने यहाँ के कृषि विशेषज्ञ से संपर्क साध सकते हैं।

हल्दी की खुदाई कब की जाती है

सामान्य रूप से हल्दी की खुदाई जनवरी से मार्च-अप्रैल तक होती है। अगेती किस्में 7-8 महीनों में तो वहीं मध्यम किस्में 8-9 महीनों में पककर तैयार हो जाती है। जब फसल की पत्तियॉँ पीली पड़नी शुरू होने लगें एवं सूखने लगे तो समझ जाना चाहिए कि फसल कटाई हेतु तैयार है।
जानिए नीली हल्दी की खेती से कितना मुनाफा कमाया जा सकता है

जानिए नीली हल्दी की खेती से कितना मुनाफा कमाया जा सकता है

पीली हल्दी की तुलना में नीली हल्दी की खेती करना थोड़ा सा कठिन होता है। यह हर प्रकार की मिट्टी में उत्पादित नहीं की जा सकती है। इसकी खेती के लिए सबसे अच्छी भुरभुरी दोमट मृदा होती है। हमारे घर में सदैव पीली हल्दी ही उपयोग में ली जाती है। परंतु, इसका अर्थ यह कतई नहीं है, कि विश्व में केवल पीली हल्दी ही होती है। इस विश्व में एक नीली हल्दी या ब्लू हल्दी (Blue Turmeric) भी होती है, जो कि अब भारत में काफी तीव्रता से उत्पादित की जा रही है। यह हल्दी पीली हल्दी की तुलना में अधिक गुणकारी होती है। साथ ही, बाजार में इसका भाव भी काफी ज्यादा मिलता है। नीली हल्दी सेवन के लिए नहीं होती है। इस इस्तेमाल दवाओं के लिए किया जाता है। विशेष तौर पर आयूर्वेद में इसके कई इस्तेमाल बताए गए हैं। आइए आपको बतादें कि भारत के किसान किस तरह नीली हल्दी से मुनाफा अर्जित कर रहे हैं।

नीली हल्दी की खेती किस प्रकार की जाती है

पीली हल्दी की तुलना में नीली हल्दी की खेती थोड़ी अधिक कठिन होती है। यह हर प्रकार की मृदा में उत्पादित नहीं की जा सकती। इसकी खेती के लिए भुरभुरी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। इस हल्दी की खेती करने के दौरान इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, कि इसके खेत में पानी ना लगे। क्योंकि, यदि इसके खेत में जल सिंचाई हुई हो तो यह पीली हल्दी से भी तीव्र सड़ती है। इस वजह से नीली हल्दी की खेती अधिकांश लोग ढलान वाले इलाकों में किया करते हैं। जहां पानी रुकने की कोई संभावना ही ना रहती हो।

किसान भाइयों को इससे कितना लाभ अर्जित होता है।

किसानों को इस हल्दी से दो प्रकार से लाभ होगा, पहला तो बाजार में इसका भाव अधिक मिलेगा। वहीं, दूसरा यह कि यह हल्दी पीली हल्दी की तुलना में कम जमीन में अधिक उत्पादन देती है। कीमत की बात की जाए तो बाजार में नीली हल्दी मांग के मुताबिक से 500 रुपये से 3000 रुपये किलो तक बेची जाती है।

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वहीं, उत्पादन की बात की जाए तो एक एकड़ में नीली हल्दी की पैदावार 12 से 15 कुंटल के आसपास रहती है। जो पीली हल्दी की तुलना में काफी अधिक है। इसलिए यदि आप हल्दी की खेती किया करते हैं, तो आपको अब से पीली छोड़ कर नीली हल्दी का उत्पादन करना चाहिए। कुछ लोग इस नीली हल्दी को काली हल्दी भी बुलाते हैं, ऐसे में यदि आपसे कोई काली हल्दी कहे तो समझ लीजिए कि वह नीली हल्दी के विषय में ही बात कर रहा है। दरअसल, यह ऊपर से दिखने में काली होती है। हालांकि, अंदर से इस हल्दी का रंग नीला होता है, जो कि सूखने के पश्चात काला पड़ जाता है। इस वजह से कुछ लोग इसे काली हल्दी के नाम से भी जानते हैं।
सब्जियों के साथ-साथ मसालों के बढ़ते दामों से लोगों की रसोई का बिगड़ा बजट

सब्जियों के साथ-साथ मसालों के बढ़ते दामों से लोगों की रसोई का बिगड़ा बजट

बेमौसम बारिश के चलते राजस्थान और गुजरात में जीरे की फसल को काफी क्षति पहुंची थी। ऐसी स्थिति में पैदावार प्रभावित होने से इसकी कीमतों में निरंतर वृद्धि हो रही है। भारत में महंगाई से हड़कंप मचा हुआ है। हरी सब्जियों से लगाकर खाने- पीने के ज्यादातर चीजें महंगाई की चरम सीमा पर हैं। परंतु, लोगों की निगाह सिर्फ टमाटर पर ही अटकी हुई है। आम जनता को को ऐसा लग रहा है, कि केवल टमाटर ही महंगा हुआ है। अन्य खाद्य पदार्थ पहले के भाव पर ही बिक रहे हैं। परंतु, इस तरह की कोई बात नहीं है। टमाटर के अलावा भी बहुत सारे ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जिनकी कीमतों में अच्छी खासी बढ़ोत्तरी हुई है। ये खाद्य पदार्थ ऐसे हैं, जिसके बिना स्वादिष्ट एवं लजीज व्यंजन बन ही नहीं सकते हैं। अर्थात भोजन स्वादहीन हो जाएगा।

अदरक, टमाटर और हरी मिर्च के बढ़ते दामों से लोग परेशान

दरअसल, हम मसालों की बात कर रहे हैं।
अदरक, टमाटर और हरी मिर्च के बढ़ते दामों की वजह से महंगे हो रहे मसालों पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है। जबकि, मसालों के भाव में भी काफी ज्यादा वृद्धि होने से रसोई का बजट ड़गमगा गया है। विशेष बात यह है, कि मसालों के अंतर्गत सर्वाधिक जीरा महंगा हो गया है। इसकी कीमत थोक भाव से लेकर रिटेल बाजार में भी महंगी हो गई है। इससे सब्जी एवं दाल में तड़का लगाने वालों का बजट ड़गमगा गया है। ये भी पढ़े: जानें अदरक की कीमत में इतना ज्यादा उछाल किस वजह से आया है

लोगों ने सब्जी व दाल में जीरे का तड़का लगाना तक बंद कर दिया है

हालांकि, जीरे के अतिरिक्त अजवाइन एवं सौंफ की कीमतें भी बढ़ गई हैं। ऐसी स्थिति में लोग इनकी खरीदारी करने से पूर्व एक बार भाव जरूर पूछ रहे हैं। वहीं, महंगाई की वजह से कई लोगों ने सब्जी और दाल में जीरे का तड़का लगाना भी बंद कर दिया है। जानकारों ने बताया है, कि विगत मार्च माह में हुई बेमौसम बारिश के चलते राजस्थान और गुजरात में जीरे की फसल को हानि पहुंची था। अब ऐसी स्थिति में पैदावार प्रभावित होने से इसकी कीमतों में निरंतर वृद्धि हो रही है। इसके अतिरिक्त काजू और बादाम भी काफी महंगे हो गए हैं।

मसाले कितने महंगे हो गए हैं

बतादें, कि पहले जीरे की कीमत 500 से 600 रुपये किलो थी। जो अब बढ़कर 700 से 750 रुपये हो गया है। इसी प्रकार अजवाइन 250 से 300 रुपये किलो बिकता था। लेकिन, फिलहाल इसकी कीमत 400 रुपये तक पहुँच गई है। साथ ही, सौंफ भी 100 रुपये तक महंगा हो गया है। अब एक किलो सौंफ का भाव 360 रुपये किलो तक पहुँच गया है, जो कि पहले 250 रुपये था।
Spices or Masala price hike: पहले सब्जी अब दाल में तड़का भी हो गया महंगा, मसालों की कीमतों में हुई रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी

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जैसा कि हम जानते हैं, कि चरम सीमा पर महंगाई होने की वजह से आम जनता की रसोई का बजट खराब हो गया है। टमाटर और हरी सब्जियों के उपरांत फिलहाल मसालों ने भी लोगों की परेशानियां बढ़ाना शुरू कर दिया है। इनकी कीमतों में कई गुना इजाफा दर्ज किया गया है। बारिश के चलते देश में महंगाई सातवें आसमान पर पहुंच गई है। इससे आम जनता के साथ- साथ खास लोगों के किचन का भी बजट डगमगा चुका है। हरी सब्जियों के पश्चात यदि किसी खाद्य पदार्थ की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़वार हुई है, तो वो हैं मसालें। पिछले एक महीने में मसालों के भाव में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष बात यह है, कि विगत 15 दिन में ही कुछ मसालों की कीमत में दोगुनी वृद्धि हुई है। इससे प्रत्येक वर्ग की जेब पर बोझ बढ़ गया है।

दूध, मसाले, हरी सब्जियों सहित कई सारे खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ी हैं

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बारिश की वजह से केवल हरी सब्जियां ही नहीं बल्कि दूध, मसाले और अन्य खाद्य उत्पाद की कीमतें भी बढ़ गई हैं। महंगाई का आंकलन इस बात से किया जा सकता है, कि जो जीरा थोक भाव में विगत वर्ष 300 रुपये किलो था, अब उसकी कीमत 700 रुपये से भी ज्यादा हो गई है। साथ ही, खुदरा बाजार में यह 1000 रुपये लेकर 1200 रुपये किलो बिक रहा है। इससे ग्राहक के साथ-साथ व्यापारी भी चिंता में आ गए हैं।

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लाल मिर्च की कीमतों में दोगुना उछाल

इसी संदर्भ में व्यापारियों का कहना है, कि जीरा इतना ज्यादा महंगा हो जाएगा, उन्हें ऐसी कभी आशंका ही नहीं थी। साथ ही, कृषि विशेषज्ञ की माने तो इस वर्ष फरवरी और मार्च महीने में हुई बेमौसम बारिश ने जीरे की फसल को काफी ज्यादा प्रभावित किया है। यही वजह है, कि 2 महीने की समयावधि में जीरा बहुत ज्यादा महंगा हो गया। परंतु, मानसून के आगमन के पश्चात अचानक दूसरे मसाले भी महंगे हो गए। विशेष कर हल्दी एवं लाल मिर्च की कीमत दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ गई है।

मसालों की कीमत में एक वर्ष दौरान कितना उछाल आया (मसालों की कीमत किलो में है)

मसाले बीते वर्ष का रेट होलसेल रेट रिटेल प्राइस
जीरा ₹300 ₹700 ₹1000-1200
हल्दी ₹80-90 ₹160 ₹300
लाल मिर्च ₹110-120 ₹260 ₹400
लौंग ₹600 ₹1100 ₹1500-1800
दालचीन ₹500  ₹700 ₹1100-1400
सौंठ ₹130 ₹500 ₹700-800
हल्दी की खेती को कमाई वाली फसल कहने के पीछे की वजह

हल्दी की खेती को कमाई वाली फसल कहने के पीछे की वजह

कृषक भाई हल्दी की खेती कर काफी शानदार मुनाफा हांसिल कर सकते हैं। हल्दी की मांग विदेशों में बेहद अधिक है। हल्दी की खेती करने से कृषकों को काफी लाभ होगा। भारत के तकरीबन हर घर में हल्दी का उपयोग किया जाता है। इसकी खेती कर कृषक भाई काफी शानदार धन अर्जित कर सकते हैं, जिसकी संपूर्ण जानकारी नीचे दी गई है। जानकारी के लिए बतादें, कि हल्दी की खेती को आमदनी वाली फसल के नाम से जाना जाता है। बतादें कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये विभिन्न कार्यों में उपयोग होने वाली फसल है। इसकी मांग सदैव बनी रहती है। हल्दी का उपयोग मसाले, औषधि, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और अन्य बहुत सारे उत्पादों में होता है। इसके साथ ही हल्दी की खेती के दौरान ज्यादा पानी अथवा फिर सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। यह एक ऐसी फसल है, जो कम खर्चा में उग सकती है। साथ ही, इससे काफी बेहतरीन आमदनी की जा सकती है।

हल्दी की खेती में आने वाली लागत

अगर आप एक हेक्टेयर भूमि में हल्दी की खेती करने के बारे में सोच रहे हैं, तो लगभग 10,000 रुपये के बीज, 10,000 रुपये की खाद एवं मजदूरी शुल्क जो उस वक्त लागू हो वह आपको देना पड़ेगा। हल्दी की खेती से होने वाली आमदनी विशेष रूप से उत्पादन पर निर्भर होती है। एक हेक्टेयर भूमि में हल्दी का औसत उत्पादन 20-25 क्विंटल तक का होता है। अगर हल्दी की कीमत 200 रुपये किलो है, तो एक हेक्टेयर में हल्दी की खेती से लगभग 5 लाख तक की आमदनी की जा सकती है।

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हल्दी की जल निकासी व बाजार में मांग

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि हल्दी की खेती करने के लिए शानदार जल निकासी वाली मृदा को चुनें। हल्दी की खेती करने के लिए जैविक खाद का उपयोग करें। हल्दी की खेती के दौरान कीटों एवं बीमारियों से संरक्षण के लिए समुचित उपाय करें। फसल को सही वक्त पर खेत से निकाल लें। बाजार के अंदर हल्दी की काफी मांग है। भारत ही नहीं बल्कि विदेश में भी हल्दी की बेहद मांग है। आप हल्दी को ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से भी अच्छी कीमतों में बेच सकते हैं।