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चन्दन की खेती : लाखों कमाएं

चन्दन की खेती : लाखों कमाएं

चन्दन की खेती: चन्दन है इस देश की माटी, तपो भूमि हर ग्राम है. ये गीत लोगों के जेहन में जब भी आता है तो चन्दन की भी हमें याद दिलाता है. चन्दन को हिन्दू धर्म में तो बहुत ही ऊँचा स्थान प्राप्त है. भारत में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ किसी न किसी रूप में चन्दन मौजूद न हो. चन्दन को माथे पर लगाया जाता है, मंदिर में भगवान जी को लगाया जाता है तथा इसकी लकड़ी को अंतिम संस्कार में भी प्रयोग में लाया जाता है.जो की हिन्दू धर्म में इसकी महत्ता को दर्शाता है. इसके अलावा इसका प्रयोग औषधीय रूप में भी किया जाता है, चहरे की सुंदरता बढ़ने के लिए या त्वचा में निखार लेन के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है.  इसका प्रयोग इत्र बनाने में भी किया जाता है, सबसे खास बात ये है की इसका प्रयोग जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी रूप में होता है. चन्दन की खेती: चन्दन की खेती करने को अभी तक कोई खास योजना नहीं आई या कह सकते हैं की किसी किसान या सरकार ने अपनी इच्छा शक्ति नहीं दिखाई. इससे ये हुआ की किसी ने भी आगे बढ़कर किसी भी औषधीय पौधे की खेती नहीं की. चन्दन की लकड़ी की बाजार में मांग: चन्दन की लकड़ी चन्दन की लकड़ी की मांग और उपलब्धता में बहुत अंतर है यही कारण है की इसकी लकड़ी 8000 से 12000 प्रति किलो के हिसाब से जाती है. इसकी मांग भारत ही नहीं पूरे विश्व में इसकी मांग होती है. चन्दन जितना महॅगा है उतना ही इसमें अपराध भी पनपा है. बीरप्पन को 90 के दशक में चन्दन और हाथी दांत ने अपराध की दुनियां में मशहूर कर दिया था. अकेले हिन्दुस्थान में ही चन्दन की खपत सप्लाई से ज्यादा है. इसमें समझने वाली बात है की भारत में ही इतनी मांग और उत्पादन है या विश्व के दूसरे देशों में भी तो चन्दन होता होगा न ? फिर भारत के चन्दन की ही इतनी मांग क्यों है? विश्व में भारत के चन्दन का सर्वोच्च स्थान है. इस लिए भारतीय चन्दन की मांग सबसे ज्यादा है. चन्दन की प्रजातियां: सेंत्लम एल्बम प्रजातियाँ चन्दन की 16 प्रजातियां पाई जाती है. जिनमे सेंत्लम एल्बम प्रजातियाँ सबसे सुगन्धित तथा औषधीय गुणों से भरपूर है | इसके अलवा सफ़ेद चन्दन, सेंडल, अबेयाद, श्रीखंड, सुखद संडालो प्रजाति की चन्दन भी पाया जाता है. चन्दन के हरे पेड़ में खुशबू नहीं होती है इसकी सुखी लकड़ी में ही खुशबू होती है. इसका प्रयोग खिलोने, घर के फर्नीचर बनाने में भी किया जाता है. इसका पेड़ सामान्यतः १० से १२ साल में पूरा पेड़ बन जाता है. इस पेड़ की ऊँचाई 18 से लेकर 20 मीटर तक होती है। यह परोपजीवी पेड़, सैंटेलेसी कुल का सैंटेलम ऐल्बम लिन्न (Santalum album linn.) है। वृक्ष की आयुवृद्धि के साथ ही साथ उसके तनों और जड़ों की लकड़ी में सौगंधिक तेल का अंश भी बढ़ने लगता है। इसकी पूर्ण परिपक्वता में 8 से लेकर 12वर्ष तक का समय लगता है। इसके लिये ढालवाँ जमीन, जल सोखनेवाली उपजाऊ चिकनई  मिट्टी तथा 500 से लेकर 625 मिमी. तक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। गुण और प्रयोग: चन्दन की खेती श्वेत चंदन कडवा, शीतल, रुक्ष, दाहशामक, पिपासाहर, ग्राही, ह्रदय संरक्षक, विषघ्न, वण्र्य, कण्डूघ्न, वृष्य, आहादकारक, रक्तप्रसादक, मूत्रल, दुर्गंधहर एवंं अंगमर्द-शामक है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त विकार, तृषा, दाह, वमन, मूत्रकृच्छू, मूत्राघात, रक्तमेह, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, उष्णवात (सोजाक), रक्तातिसार तथा अनेक चर्मरोगों में किया जाता है। १. पित्तज्वर, तीव्रज्वर एवं जीर्णज्वर में चंदन के प्रयोग से दहा एवं तृषा की शांती होती है तथा स्वेद उत्पन्न होकर ज्वर भी कम होता है। ज्वर के कारण हृदय पर जो विषैला परिणाम होता है वह भी इसके देने से नहीं होता है। २. नारियल के जल में चंदन घिसकर २ तो० की मात्रा में पिलाने से प्यास कम होती है। ३. चंदन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री एवं मधु मिलाकर पिलाने से रक्ततिसार, दाह, तृष्णा एवं प्रमेह आदि में लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्रदाह, मूत्राघात, रक्तमेह एवं सोजाक में चंदन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री मिलाकर पिलाते हैं। ४. आंवले के रस के साथ चंदन देने से वमन बंद होता है। ५. दुर्गंध युक्त श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर एवं प्रमेह आदि में चंदन का काथ उपयोगी है। चन्दन की खेती के लिए मिट्टी: चन्दन की खेती के लिए मिट्टी सामान्यतः चन्दन का पेड़ किसी भी तरह की उपजाऊ जमीन में उगाया जा सकता है लेकिन इसको जैसा हमने ऊपर बताया है न ज्यादा गर्मी और न ही ज्यादा ठण्ड बर्दाश्त होती है. जैसे इसको राजस्थान के रेतीले और गर्म स्थान पर नहीं उगाया जा सकता ऐसे ही इसे पहाड़ के बर्फीले इलाके में भी नहीं उगाया जा सकता है. इसके लिए ज्यादा पानी वाली मिट्टी भी मुफीद नहीं है इसको शुष्क और सामान्य मौसम और मिट्टी वाले क्षेत्र में उगाया जा सकता है. पेड़ लगाने का तरीका: चन्दन के पेड़ लगाने का तरीका किसान के ऊपर निर्भर करता है वो उसे खेत की मेड पर भी लगा सकता है और पूरे खेत में भी लगा सकता है. चन्दन का पेड़ अर्धपरजीवी पेड़ है अर्थात ये आधा भोजन खुद तैयार करता है तथा आधा दूसरे पौधे से लेता है तो इसके साथ किसी दूसरे पौधे को भी लगाया जाता है नहीं तो चन्दन का पौधा सुख जायेगा. आप सहायक पौधे के रूप में नीम, मीठा नीम , सहजन , या किसी अन्य पौधे को भी लगा सकते है. बशर्ते वो भी पौधा बारहमासी होना चाहिए. पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 फुट की दूरी होनी चाहिए. चंदन के पौधे मिलने की जगह: चंदन की खेती के लिए बीज तथा पौधे दोनों खरीदे जा सकते हैं। इसके लिए केंद्र सरकार की लकड़ी विज्ञान तथा तकनीक (Institute of wood science & technology) संस्थान बैंगलोर में है। यहां से आप चंदन की पौध प्राप्त कर सकते हैं। पता इस प्रकार है : Tree improvement and genetics division Institute of wood science and technology o.p. Malleshwaram Bangalore – 506003 (India) E-mail – tip_iwst@icfre.org tel no. – 00 91-80 – 22-190155 fax number – 0091-80-23340529 चन्दन के पौधे के रोग: सैंडल स्पाइक (Sandle spike) नामक रहस्यपूर्ण और संक्रामक वानस्पतिक रोग इस वृक्ष का शत्रु है। इससे संक्रमित होने पर पत्तियाँ ऐंठकर छोटी हो जाती हैं और वृक्ष विकृत हो जाता है। इस रोग की रोकथाम के सभी प्रयत्न विफल हुए हैं। चन्दन को लेकर भ्रांतियां: चन्दन के पेड़ चन्दन को लेकर लोगों में बहुत भ्रांतियां हैं जैसे " चन्दन विष ब्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग" इससे तात्पर्य यह है की चन्दन के पेड़ से यदि विषधर भी लिपटे रहें तो भी वो अपने गुण नहीं छोड़ता और चन्दन की खेती के लिए सरकार से कोई अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं होती. हाँ जब आपको पेड़ कटाने हों तो तभी आपको सरकार से अनुमति की जरूरत होती है जो और भी तरह के पौधों के लिए लेनी होती है और ये आसानी से मिल भी जाती है.    
अरंडी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

अरंडी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

किसान भाइयों, अरंडी एक औषधीय वानस्पतिक तेल का उत्पादन करने वाली खरीफ की मुख्य व्यावसायिक फसल है। कम लागत में होने वाली अरंडी के तेल का व्यावसायिक महत्व होने के कारण इसको नकदी फसल भी कहा जा सकता है। किसान भाइयों अरंडी की फसल का आपको दोहरा लाभ मिल सकता है। इसकी फसल से पहले आप तेल निकाल कर बेच सकते हैं। उसके बाद बची हुई खली से खाद बना सकते हैं। इस तरह से आप अरंडी के खेती करके दोहरा लाभ कमा सकते हैं। आइये जानते हैं कि अरंडी की खेती कैसे की जाती है।

भूमि व जलवायु

अरंडी की फसल के लिए दोमट व बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है लेकिन इसकी फसल पीएच मान 5 से 6 वाली सभी प्रकार की मृदाओं में उगाई जा सकती है। अरंडी की फसल ऊसर व क्षारीय मृदा में नहीं की जा सकती। इसकी खेती के लिए खेत में जलनिकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिये अन्यथा फसल खराब हो सकती है।
अरंडी की खेती विभिन्न प्रकार की जलवायु में भी की जा सकती है। इसकी फसल के लिए 20 से 30 सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता होती है। अरंडी के पौधे की बढ़वार और बीज पकने के समय उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। अरंडी की खेती के लिए अधिक वर्षा यानी अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि इसकी जड़ें गहरी होतीं हैं और ये सूखा सहन करने में सक्षम होतीं हैं। पाला अरंडी की खेती के लिए नुकसानदायक होता है। इससे बचाना चाहिये।

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खेत की तैयारी कैसे करें

अरंडी के पौधे की जड़ें काफी गहराई तक जातीं हैं , इसलिये इसकी फसल के लिए गहरी जुताई करनी आवश्यक होती है। जो किसान भाई अरंडी की अच्छी फसल लेना चाहते हैं वे पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें। उसके बाद दो तीन जुताई कल्टीवेटर या हैरों से करें तथा पाटा लगाकर खेत को समतल बना लें। किसान भाइयों सबसे बेहतर तो यही होगा कि खेत में उपयुक्त नमी की अवस्था में जुताई करें। इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जायेगी और खरपतवार भी नष्ट हो जायेगा। इस तरह खेत को तैयार करके एक सप्ताह तक खुला छोड़ देना चाहिये। जिससे पूर्व फसल के कीट व रोग धूप में नष्ट हो सकते हैं ।

अरंडी की मुख्य उन्नत किस्में

अरंडी की मुख्य उन्नत किस्मों मे जीसीएच-4,5, 6, 7 व डीसीएच-32, 177 व 519, ज्योति, हरिता, क्रांति किरण, टीएमवी-6, अरुणा, काल्पी आदि हैं। Aranki ki plant

कब और कैसे करें बुआई

अरंडी की फसल की बुआई अधिकांशत: जुलाई और अगस्त में की जानी चाहिये। किसान भाई अरंडी की फसल की खास बात यह है कि मानसून आने पर खरीफ की सभी फसलों की खेती का काम निपटाने के बाद अरंडी की खेती आराम से कर सकते हैं। अरंडी की बुआई हल के पीछे हाथ से बीज गिराकर की जा सकती है तथा सीड ड्रिल से भी बुआई की जा सकती है। सिंचाई वाले क्षेत्रोंं अरंडी की फसल की बुआई करते समय किसान भाइयों को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि लाइन से लाइन की दूरी एक मीटर या सवा मीटर रखें और पौधे से पौधे की दूरी आधा मीटर रखें तो आपकी फसल अच्छी होगी। असिंचित फसल के लिए लाइन और पौधों की दूरी कम रखनी चाहिये। इस तरह की खेती के लिए लाइन से लाइन की दूरी आधा मीटर या उससे थोड़ी ज्यादा होनी चाहिये और पौधों से पौधों की दूरी भी लगभग इतनी ही रखनी चाहिये।

कितना बीज चाहिये

किसान भाइयों अरंडी की फसल के लिए बीज की मात्रा , बीज क आकार और बुआई के तरीके और भूमि के अनुसार घटती-बढ़ती रहती है। फिर भी औसतन अरंडी की फसल के लिए प्रति हेक्टेयर 12 से 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। छिटकवां बुआई में बीज अधिक लगता है यदि इसे हाथ से एक-एक बीज को बोया जाता है तो प्रतिहेक्टेयर 8 किलोग्राम के लगभग बीज लगेगा। किसान भाइयों को चाहिये कि अरंडी की अच्छी फसल लेने के लिए उन्नत किस्म का प्रमाणित बीज लेना चाहिये। यदि बीज उपचारित नहीं है तो उसे उपचारित अवश्य कर लें ताकि कीट एवं रोगों की संभावना नहीं रहती है। भूमिगत कीटों और रोगों से बचाने के लिए बीजों को कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रतिकिलोग्राम पानी से घोल बनाकर बीजों को बुआई से पहले  भिगो कर उपचारित करें।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

किसान भाइयों खाद और उर्वरक काफी महंगी आती हैं इसलिये किसी भी तरह की खेती के लिए आप अपनी भूमि का मृदा परीक्षण अवश्य करवा लें और उसके अनुसार आपको खाद और उर्वरक प्रबंधन की अच्छी जानकारी मिल सकेगी। इससे आपका पैसा व समय दोनों ही बचेगा। खेती की लागत कम आयेगी। इसी तरह अरंडी की खेती के लिए जब आप खाद व उर्वरकों का प्रबंधन करें तो मिट्टी की जांच के बाद बताई गयी खाद व उर्वरक की मात्रा का प्रयोग करें। अरंडी की खेती के लिए उर्वरक का अच्छी तरह से प्रबंधन करना होता है। अच्छे खाद व उर्वरक प्रबंधन से अरंडी के दानों में तेल का प्रतिशत काफी बढ़ जाता है। इसलिये इस खेती में किसान भाइयों को कम से कम तीन बार खाद व उवर्रक देना होता है। अरंडी चूंकि एक तिलहन फसल है, इसका उत्पादन बढ़ाने व बीजों में तेल की मात्रा अधिक बढ़ाने के लिए बुआई से पहले 20 किलोगाम सल्फर को 200 से 250 किलोग्राम जिप्सम मिलाकर प्रति हेक्टेयर डालना चाहिये। इसके बाद अरंडी की सिंचित  खेती के लिए 80 किलो ग्राम नाइट्रोजन और 40 किलो फास्फोरस  प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिये तथा असिंचित खेती के लिए 40 किलोग्राम नाइट्रोजन और 20 किलोग्राम फास्फोरस का इस्तेमाल किया जाना चाहिये। इसमें से खेत की तैयारी करते समय आधा नाइट्रोजन और आधा किलो फास्फोरस का प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालना चाहिये। शेष आधा भाग 30 से 35  दिन के बाद वर्षा के समय खड़ी फसल पर डालना चाहिये। Arandi ki kheti

सिंचाई प्रबंधन

अरंडी खरीफ की फसल है, उस समय वर्षा का समय होता है। वर्षा के समय में बुआई के डेढ़ से दो महीने तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। इस अवधि में पानी देने से जड़ें कमजोर हो जाती है, जो सीधा फसल पर असर डालती है। क्योंकि अरंडी की जड़ें गहराई में जाती हैं जहां से वह नमी प्राप्त कर लेतीं हैं। जब अरंडी के पौधों की जड़ें अच्छी तरह से विकसित हो जायें और जमीन पर अच्छी तरह से पकड़ बना लें और जब खेती की नमी आवश्यकता से कम होने लगे तब पहला पानी देना चाहिये। इसके बाद प्रत्येक 15 दिन में वर्षा न होने पर पानी देना चाहिये। यदि सिंचाई के लिए टपक पद्धति हो तो उससे इसकी सिंचाई करना उत्तम होगा।

खरपतवार प्रबंधन

अरंडी की फसल में खरपतवार का प्रबंधन शुरुआत में ही करना चाहिये। जब तक पौधे आधे मीटर के न हो जायें तब तक समय-समय पर खरपतवार को हटाना चाहिये तथा गुड़ाई भी करते रहना चाहिये। इसके अलावा खरपतवार नियंत्रण के लिए एक किलोग्राम पेंडीमेथालिन को 600 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के दूसरे या तीसरे दिन छिड़काव करने से भी खरपतवार का नियंत्रण होता  है। लेकिन 40 दिन बाद एक बार अवश्य ही निराई गुड़ाई करवानी चाहिये।

कीट-रोग एवं उपचार

अरंडी की फसल में कई प्रकार के रोग एवं कीट लगते हैं। उनका समय पर उपचार करने से फसल को बचाया जा सकता है। आईये जानते हैं कि कौन से कीट या रोग का किस प्रकार से उपचार किया जाता है:- 1. जैसिड कीट: अरंडी की फसल में जैसिड कीट लगता है। इसका पता लगने पर किसान भाइयों को मोनोक्रोटोफाँस 36 एस एल को एक लीटर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव कर देना चाहिये। इससे फसल का बचाव हो जाता है। 2. सेमीलूपर कीट: इसकीट का प्रकोप सर्दियों में अक्टूबर-नवम्बर के बीच होता है। इस कीट को नियंत्रित करने के लिए 1 लीटर क्यूनालफॉस 25 ईसी , लगभग 800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रतिहेक्टेयर में फसल पर छिड़काव करने से कीट पर नियंत्रण हो जाता है। 3. बिहार हेयरी केटरपिलर: यह कीट भी सेमीलूपर की तरह सर्दियों में लगता है और इसके नियंत्रण के लिए क्यूनालफॉस का घोल बनाकर खड़ी फसल पर छिड़काव करना चाहिये। 4. उखटा रोग: उखटा रोग से बचाव के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडि 10 ग्राम प्रतिकिलोग्राम बीज का बीजोपचार करना चाहिये तथा 2.5 ट्राइकोडर्मा को नम गोबर की खाद के साथ बुवाई से पूर्व खेत में डालना अच्छा होता है।

पाले सें बचाव इस तरह करें

अरंडी की फसल के लिए पाला सबसे अधिक हानिकारक है। किसान भाइयों को पाला से फसल को बचाने के लिए भी इंतजाम करना चाहिये। जब भी पाला पड़ने की संभावना दिखाई दे तभी किसान भाइयों को एक लीटर गंधक के तेजाब को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रतिहेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करा चाहिये। यदि पाला पड़ जाये और फसल उसकी चपेट में आ जाये तो 10 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से यूरिया के साथ छिड़काव करें। फसल को बचाया जा सकता है।

कब और कैसे करें कटाई

अरंडी की फसल को पूरा पकने का इंतजार नहीं करना चाहिये। जब पत्ते व उनके डंठल पीले या भूरे दिखने लगें तभी कटाई कर लेनी चाहिये क्योंकि फसल के पकने पर दाने चिटक कर गिर जाते हैं। इसलिये पहले ही इनकी कटाई करना लाभदायक रहेगा। अरंडी की फसल में पहली तुड़ाई 100 दिनों के आसपास की जानी चाहिये। इसके बाद हर माह आवश्यकतानुसार तुड़ाई करना सही रहता है।

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पैदावार

अरंडी की फसल सिंचित क्षेत्र में अच्छे प्रबंधन के साथ की जाये तो प्रतिहेक्टेयर इसकी पैदावार 30 से 35 क्विंटल तक हो सकती है जबकि  असिंचित क्षेत्र में 15 से 23 क्विंटल तक प्रतिहेक्टेयर पैदावार मिल सकती है।
Drumstick: कच्चा, सूखा, हरा हर हाल में बेशकीमती है मुनगा

Drumstick: कच्चा, सूखा, हरा हर हाल में बेशकीमती है मुनगा

बहु उपयोगी पेड़ सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा आदि कई स्थानीय नामों से पुकारे पहचाने जाने वाले इस फलीदार वृक्ष की खासियतों के राज यदि आप जानेंगे तो आपके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहेगा। किसान मित्र औषधीय एवं खाद्य उपयोगी कम लागत की इस पेड़ की खेती कर लाखों रुपए का लाभ हासिल कर सकते हैं। ड्रमस्टिक ट्री (Drumstick tree) यानी कि सहजन या मुनगा का वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा (Moringa oleifera) है। जड़ से लेकर पत्तियों तक कई पोषक तत्वों से भरपूर इस पौधे का उपयोग रसोई से लेकर औषधीय गुणों के कारण प्रयोगशालाओं तक विस्तृत है।

उपयोग इतने सारे

सहजन या मुनगे की पत्तियों और फली की सब्जी को चाव से खाया जाता है। मुनगे की पत्तियां जल को स्वच्छ करने में भी उपयोग की जाती हैं।



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मुनगे की पहचान

एक हाथ या उससे अधिक लंबी आकार वाली मुनगे की फलियां खाद्य एवं औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं। आम तौर पर बरवटी, सेम जैसी फलीदार सब्जियां बेलों पर पनपती हैं। जबकि मुनगे की फलियां वृक्ष पर लगती हैं। मुनगे के पेड़ के तने में काफी मात्रा में पानी होता है। सहजन के पेड़ की शाखाएं काफी कमजोर होती हैं। सहजन के फल-फूल-पत्तियों की बाजार में खासी डिमांड रहती है। इसकी पत्तियों के क्रय एवं निर्जलीकरण के लिए सरकार द्वारा कई तरह की योजनाएं संचालित की जाती हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में मुनगे की खेती को प्रोत्साहित करने कृषि विभाग ने पत्तियों और फलों की खरीद से जुड़ी कई प्रोत्साहन योजनाओं को लागू किया है। उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण के अधीन मुनगा पत्‍ती रोपण के बारे में किसान कल्याण मंत्री से मुनगा पत्‍ती मूल्‍य अनुबंध खेती, किसानों के लिए इसमें समाहित अनुदान, प्रावधान से संबंधित सवाल किए जा चुके हैं।



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गौरतलब है कि बैतूल जिले में वर्ष 2018-19 में मुनगा की खेती के लिए किसानों के लिए प्रोत्साहन योजना लागू की गई थी। इसका लक्ष्य किसान से मुनगा पत्‍ती खरीदकर उन्हें लाभान्वित करना था। हालांकि सदन में यह भी आरोप लगा था कि, बैतूल के किसानों को 10 रुपए प्रति पौधे की दर से घटिया गुणवत्ता के पौधे प्रदान किए गए। यह पौधे मृत हो जाने से किसानों को लाभ के बजाए नुकसान उठाना पड़ा।

कटाई का महत्व

पौधे की ऊंचाई की बात करें, तो आम तौर पर सहजन का पौधा लगभग 10 मीटर तक वृद्धि करता है। चूंकि जैसा हमने बताया कि इसके तने कमजोर होते हैं, इस कारण इस पर चढ़कर फल, पत्तियों की तुड़ाई करना खतरनाक हो सकता है। इसलिए लगभग 10 से 12 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचने पर इसकी पैदावार करने वाले किसान इसकी हर साल इसकी कटाई कर डेढ़ से दो मीटर की ऊंचाई को कम कर देते हैं। इसके फल-फूल-पत्तियों की आसान तुड़ाई के लिए यह प्रक्रिया अपनाई जाती है।

स्टोरेज कैपिसिटी

अपनी फलियों के आकार के कारण ड्रमस्टिक ट्री (Drumstick tree) कहे जाने वाले मुनगा पेड़ में उगने वाली फलियां ड्रम (पाश्चात्य वाद्य) बजाने वाली स्टिक (डंडी/छड़ी) की तरह दिखती हैं। मुनगा की कच्ची-हरी फलियां भारतीय लोग रसम, सांबर, दाल में डालकर या सब्जी आदि बनाकर खाते हैं। लगभग एक बांह लंबी डंडी के आकार वाली सहजन या मुनगा की फलियां तुड़ाई के बाद 10 से 12 दिनों तक उचित देखरेख में घरेलू उपयोग में लाई जा सकती हैं। साथ ही सूखने के बाद भी इसकी फलियों का चूर्ण आदि कई तरह के उपयोग में लाया जाता है।



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कितने गुणों से भरपूर

सहजन की पत्तियों से लेकर फलियां, छाल, जड़ तक बहुआयामी उपयोगों से परिपूर्ण हैं। मुनगा के बीज से तेल निकालकर भी उसे खाद्य एवं औषधीय उपयोग में लाया जाता है। सहजन की कच्ची हरी पत्तियों में पोषक मूल्य की मात्रा महत्वपूर्ण होती है।

USDA Nutrient database के अनुसार

सहजन में उर्जा, कार्बोहाइड्रेट, आहारीय रेशा, वसा, प्रोटीन की मात्रा ही इसे खास बनाती है। इसमें पानी, विटामिन, कैल्शियम, लोहतत्व से लेकर अन्य पोषक पदार्थ बहुतायत में पाए जाते हैं। एशिया और अफ्रीका में मुनगा के पेड़ प्राकृतिक रूप से स्वतः पनप जाते हैं। ड्रमस्टिक (Drumstick) एवं इसकी पत्तियां कम्बोडिया, फिलीपाइन्स, दक्षिणी भारत, श्री लंका और अफ्रीका के नागरिक खाने में उपयोग में लाते हैं। दक्षिण भारत के तमाम व्यंजनों में इसका अनिवार्यता से प्रयोग होता है। स्वाद की बात करें तो मुनगा का टेस्ट, मशरूम सरीखा महसूस होता है। छाल, रस, पत्तियों, बीजों, तेल, और फूलों से पारम्परिक दवाएँ बनायी जाती है। जमैका में इसके रस से नीली डाई (रंजक) के रूप में उपयोग किया जाता है। दक्षिण भारतीय व्यंजनों में इसका प्रयोग बहुत किया जाता है।



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सहजना, सुजना, सेंजन, मुनगा, मोरिंगा या ड्रमस्टिक (Drumstick) औषधीय गुणों से भरपूर है। इसके औषधीय अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि, तकरीबन तीन सैकड़ा से अधिक रोगों की रोकथाम के साथ ही इनके उपचार की ताकत मुनगा में होती है। मुनगा में मौजूद 90 से अधिक किस्मों के मल्टीविटामिन्स, कई तरह के एंटी आक्सीडेंट, दर्द निवारक गुण और कई प्रकार के एमिनो एसिड इसके प्राकृतिक महत्व को जाहिर करने के लिए काफी हैं।

कम लागत, कम देखभाल, मुनाफा पर्याप्त

स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या प्राइवेट फल-पौधों की नर्सरी से सहजना, सुजना, सेंजन, मुनगा, मोरिंगा या ड्रमस्टिक (Drumstick) के उपचारित बीज एवं पौधे क्रय किए जा सकते हैं। किसान मित्र मुनगा के पुराने पौधों की फलियों को संरक्षित करके भी उसके बीजों को बोकर पौध तैयार कर सकते हैं। हालांकि नर्सरी आदि में तैयार बीज एवं पौधे ज्यादा मुनाफा प्रदान करने में सहायक होते हैं, क्योंकि इस पर प्रतिकूल मौसम का प्रभाव कम होता है। इसके साथ ही नर्सरी या शासकीय विक्रय केंद्रों से बीज एवं पौधे खरीदने पर किसानों को मुनगे की पैदावार से जुड़़ी महत्वपूर्ण जानकारियां एवं सुझाव भी मुफ्त में प्राप्त होते हैं।



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बारिश अनुकूल मौसम

किसान मित्रों के लिए जुलाई-अगस्त का महीना मुनगा की खेती करने के लिए हितकारी होता है। बारिश का मौसम पौध एवं बीजारोपण के लिए अनुकूल माना जाता है। आमतौर पर वर्षाकाल बागवानी के लिए सबसे मुफीद होता है क्योंकि इस दौरान किसी भी पौधे को तैयार किया जा सकता है। https://youtu.be/s5PUiHTe82Q

बीज का ऑनलाइन मार्केट

ऑनलाइन मार्केट में भी कृषि सेवा प्रदान करने वाली कई कंपनियां मुनगा के बीज एवं पौधे रियायती दर पर उपलब्ध कराने के दावे करती हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मोरिंगा (सफेद) बीज के 180 ग्राम वजनी पैकेट की कीमत 2 अगस्त 2022 को सभी टैक्स सहित ₹499.00 दर्शाई जा रही थी।

सहजन के लाभ एवं नुकसान

मुनगा के अंश का सेवन करने से मानव की रोग प्रत‍िरोधक क्षमता में वृद्धि होती है। इसमें भरपूर रूप से उपलब्ध कैल्‍श‍ियम की मात्रा साइटिका, गठिया के इलाज में कारगर है। हल्का एवं सुपाच्य भोज्य होने के कारण इसका खाद्य उपयोग लि‍वर की सेहत के लिए फायदेमंद है। पेट दर्द, गैस बनना, अपच और कब्ज की बीमारी भी मुनगा के फूलों का रस या फिर इसकी फलियों की सब्जी के सेवन से काफूर हो जाती है।



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हालांकि मुनगा जहां मानव स्वास्थ्य के लिए अति गुणकारी है वहीं इसके सेवन के कई नुकसान भी हो सकते हैं। मोरिंगा (सहजन) का असंतुलित सेवन शरीर में आंतरिक जलन का कारक हो सकता है। मासिक धर्म में महिलाओं को इसके सेवन से बचना चाहिए। प्रसव के फौरन बाद भी इसका सेवन वर्जित माना गया है।

मुनगा का बाजार महत्व

जैसा कि इसकी उपयोगिता से स्पष्ट है कि कच्चे फल, पत्तियों से लेकर उसके उपोत्पाद तक के मामले में सहजना, सुजना, सेंजन, मुनगा, मोरिंगा या ड्रमस्टिक (Drumstick) की तूती बोलती है। दैनिक, साप्ताहिक हाट बाजार, शासकीय निर्धारित मूल्य पर खरीद से लेकर शॉपिंग मॉल्स में भी इसकी डिमांड बनी रहती है। तो यह हुई कच्चे फल, पत्तियों के बाजार से जुड़़ी मांग की बात, अब इसके बाय प्राडक्ट पर नजर डालते हैं। दरअसल ऑर्गेनिक खेती से जुड़े उत्पाद की सेल करने वाली कंपनियां मोरिंगा (मुनगा) के उपोत्पाद भी रिटेल सेंटर्स के साथ ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर मुहैया कराती हैं। ऑनलाइन मार्केट में 100 ग्राम मोरिंगा पाउडर 2 सौ रुपए से अधिक की कीमत पर बेचा जा रहा है। ऐसे में समझा जा सकता है कि, मुनगा की किसानी में कृषक को कितना मुनाफा मिल सकता है।

जीरे की खेती कैसे की जाती है?

जीरे की खेती कैसे की जाती है?

जीरा एक मसाला फसल है, जिसकी खेती मसाले के रूप में की जाती है। यह जीरा देखने में बिल्कुल सोंफ की तरह ही होता है, किन्तु यह रंग में थोड़ा अलग होता है | जीरे का उपयोग कई तरह के व्यंजनों में खुशबु उत्पन्न करने के लिए करते है।  

इसके अलावा इसे खाने में कई तरह से उपयोग में लाते है, जिसमे से कुछ लोग इससे पॉउडर या भूनकर खाने में इस्तेमाल करते है। जीरे का सेवन करने से पेट संबंधित कई बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। जीरे का पौधा शुष्क जलवायु वाला होता है, तथा इसके पौधों को सामान्य बारिश की आवश्यकता होती है भारत में जीरे की खेती सबसे अधिक राजस्थान और गुजरात में की जाती है, यहाँ पर पूरे देश का कुल 80% जीरा उत्पादित किया जाता है, जिसमे 28% जीरे का उत्पादन अकेले राजस्थान राज्य में होता है, इसके पश्चिमी क्षेत्र में राज्य का कुल 80% जीरा उत्पादन होता है | वही पड़ोसी राज्य गुजरात में राजस्थान की अपेक्षा अधिक पैदावार होती है | वर्तमान समय में जीरे की उन्नत किस्मो को ऊगा कर उत्पादन क्षमता को 25% से 50% तक बढ़ाया जा सकता है | अधिकतर किसान भाई जीरे की उन्नत किस्मो को उगाकर अच्छा लाभ भी कमा रहे है | यदि आप भी जीरे की खेती करना चाहते है, तो इस लेख में आपको जीरा की खेती कैसे करें (Cumin Farming in Hindi) तथा जीरा का भाव इसके बारे में जानकारी दी जा रही है।   

जीरे की खेती के लिए मिटटी की आवश्यकता                     

जीरे की अच्छी पैदावार के लिए बलुई दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है | इसकी खेती में भूमि उचित जल निकासी वाली होनी चाहिए, तथा भूमि का P.H. मान भी सामान्य होना चाहिए | जीरे की फसल रबी की फसल के साथ की जाती है, इसलिए इसके पौधे सर्द जलवायु में अच्छे से वृद्धि करते है | इसके पौधों को सामान्य बारिश की आवश्यकता होती है, तथा अधिक गर्म जलवायु इसके पौधों के लिए उपयुक्त नहीं होती है | जीरे के पौधों को रोपाई के पश्चात् 25 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है, तथा पौधों की वृद्धि के समय 20 डिग्री तापमान उचित होता है | इसके पौधे अधिकतम 30 डिग्री तथा न्यूनतम 20 डिग्री तापमान को आसानी से सहन कर सकते है |

जीरे की किस्में 

वर्तमान समय में जीरे की कई तरह की उन्नत किस्मो को तैयार किया गया है, जो अलग-अलग जलवायु के हिसाब से अधिक पैदावार देने के लिए उगाई जाती है। आर. जेड. 19 , जी. सी. 4 , आर. जेड. 209 , जी.सी. 1

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जीरे की बुवाई के लिए भूमि की तैयारी        

जीरे की फसल करने से पहले उसके खेत को अच्छी तरह से तैयार कर लिया जाता है। इसके लिए सबसे पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हलो से गहरी जुताई कर दी जाती है। जुताई के बाद खेत को कुछ समय के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दिया जाता है। इसके बाद खेत में प्राकृतिक खाद के तौर पर 10 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद डालकर जुताई कर दी जाती है, इससे खेत की मिट्टी में खाद अच्छी तरह से मिल जाती है।  खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है। जुताई के बाद खेत में पानी लगाकर पलेव कर दिया जाता है। 

फसल में उर्वरक और खाद प्रबंधन 

पलेव के बाद खेत की आखरी जुताई के समय 65 किलो डी.ए.पी. और 9 किलो यूरिया का छिड़काव खेत में करना होता है | इसके बाद खेत में रोटावेटर लगाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरा कर दिया जाता है | मिट्टी के भुरभुरा हो जाने के बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है| इससे खेत में जलभराव की समस्या नहीं उत्पन्न होती है | इसके अतिरिक्त 20 से 25 KG यूरिया  की मात्रा को पौधों के विकास के समय तीसरी सिंचाई के दौरान पौधों को देना होता है |

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जीरे की बुवाई के लिए बीज दर                

जीरे के बीजों की रोपाई बीज के रूप में की जाती है| इसके लिए छिड़काव और ड्रिल तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है | ड्रिल विधि द्वारा रोपाई करने के लिए एक एकड़ के खेत में 8 से 10 KG बीजो की आवश्यकता होती है | वही छिड़काव विधि द्वारा बीजो की रोपाई के लिए एक एकड़ के खेत में 12 KG बीज की आवश्यकता होती है | बीजो को खेत में लगाने से पूर्व उन्हें कार्बनडाजिम की उचित मात्रा से उपचारित कर लिया जाता है | छिड़काव विधि के माध्यम से रोपाई के लिए खेत में 5 फ़ीट की दूरी रखते हुए क्यारियों को तैयार कर लिया जाता है |

बीज की बुवाई 

इन क्यारियों में बीजो का छिड़काव कर उन्हें हाथ या दंताली से दबा दिया जाता है| इससे बीज एक से डेढ़ CM नीचे दब जाता है | इसके अलावा यदि आप ड्रिल विधि द्वारा बीजो की रोपाई करना चाहते है, तो उसके लिए आपको खेत में पंक्तियो को तैयार कर लेना होता है, तथा प्रत्येक पंक्ति के मध्य एक फ़ीट की दूरी रखी जाती है | पंक्तियों में बीजो की रोपाई 10 से 15 CM की दूरी पर की जाती है | चूंकि जीरे की फसल रबी की फसल के साथ लगाई जाती है, इसलिए इसके बीजो को नवंबर माह के अंत तक लगाना उचित होता है। 

फसल में सिचांई प्रबंधन  

जीरे के पौधों को सिंचाई की सामान्य जरुरत होती है।  इसकी प्रारंभिक सिंचाई बीज रोपाई के तुरंत बाद कर दी जाती है, तथा प्रारंभिक सिंचाई को पानी के धीमे बहाव के साथ करना होता है, ताकि बीज पानी के तेज बहाव से बहकर किनारे न आ जाये। इसके पौधों को अधिकतर 5 से 7 सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई के बाद बाकी की सिंचाई को 10 से 12 दिन के अंतराल में करना होता है |

फसल में खरपतवार नियंत्रण 

जीरे के खेत में खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक और प्राकृतिक दोनों ही विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। रासायनिक विधि में आक्साडायर्जिल की उचित मात्रा को पानी के साथ मिलाकर घोल बना लिया जाता है, जिसे बीज रोपाई के तत्पश्चात खेत में छिड़क दिया जाता है| प्राकृतिक विधि में पौधों की निराई-गुड़ाई की जाती है। इसकी पहली गुड़ाई बीज रोपाई के तक़रीबन 20 दिन बाद की जाती है, तथा बाकी की गुड़ाई को 15 दिन के अंतराल में करना होता है। इसके पौधों को अधिकतम दो से तीन गुड़ाई की ही आवश्यकता होती है। 

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फसल की उपज 

जीरे की उन्नत किस्में बीज रोपाई के तक़रीबन 100 से 120 दिन पश्चात् पैदावार देने के लिए तैयार हो जाती है। जब इसके पौधों में लगे बीजो का रंग हल्का भूरा दिखाई देने लगे उस दौरान पुष्प छत्रक को काटकर एकत्रित कर खेत में ही सूखा लिया जाता है। इसके बाद सूखे हुए पुष्प छत्रक से मशीन द्वारा दानो को निकल लिया जाता है। उन्नत किस्मो के आधार पर जीरे के एक हेक्टेयर के खेत से लगभग 7 से 8 क्विंटल की पैदावार प्राप्त हो जाती है।  जीरा का बाज़ारी भाव 200 रूपए प्रति किलो तक होता है, जिस हिसाब से किसान भाई जीरे की एक बार की फसल से 40 से 50 हज़ार तक की कमाई कर अच्छा मुनाफा कमा सकते है। 

सतावर की खेती से बदली तकदीर

सतावर की खेती से बदली तकदीर

उत्तर प्रदेश के कासगंज में जन्मे श्याम चरण उपाध्याय अच्छी खासी नौकरी छोड़कर किसान बन गए। किसानी यूंतो कांटों भरी डगर ही होती है लेकिन उन्होंने इसके लिए कांटों वाली सतावर की खेती को ही चुना। सीमैप लखनऊ से प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने एक दशक पूर्व खेती शुरू की और पहले ही साल एक एकड़ की सतावर को पांच लाख में बेच दिया। उनकी शुरूआत और जानकारी ठीक ठाक होने के कारण वह सफलता की सीढिंयां चढ़ते गए। आज वह एक सैकड़ा किसानों के लिए मार्ग दर्शक का काम कर रहे हैं। उन्होंने एक फार्मर प्रोड्यूशर कंपनी बनाई है। मेडी एरोमा एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी प्राईवेट लिमिटेड नामक इस किसान कंपनी में 517 सदस्य हैं। विषमुक्त खेती, रोग मुक्त जीवन के मंत्र पर काम करने वाले उपाध्याय आज अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। कासंगज की पटियाली तहसील के बहोरा गांव में जन्मे श्याम चरण उपाध्याय रीसेंट इंश्योरेंस कंपनी में एक्जीक्यूटिव आफीसर थे। उन्हें वेतन भी 50 हजार के पार मिलता था लेकिन उनकी आत्मा गांव में बसी थी। वह नौकरी के दौरान भी गांव से अपना मोह नहीं छोड़ पाए। उन्होंने यहां  2007 तक काम किया। इसके बाद नौकरी छोड़कर गांव चले आए। गांव आकर उन्होंने खेती में कुछ लीक से हटकर करने का मन बनाया। उन्होंने परंपरागत खेती के अलावा कुछ नया करने की धुन को साकार करने की दिशा में काम शुरू कर दिया। इस काम में उनकी मदद उनकी शिक्षा बायो से बीएससी एवं बाराबंकी के जेपी श्रीवास्तव ने की। वह ओषधीय पौधों की खेती का गुड़ा भाग लगाकर मन पक्का कर चुके थे। सगंधीय पौध संस्थान, सीमैप लखनउू से प्रशिक्षण प्राप्त कर वक काम में जुट गए।

क्या है सतावर की खेती का गणित

श्री उपाध्याय ने बाताया कि एक एकड में सतावर के 11 हजार पौधे लगते हैं। हर पौधे में गीली जड़ दो से पांच किलोग्राम निकलती है। सूखने के बाद यह न्यूनतम 15 प्रतिशत बजनी रहने पर भी 300 ग्राम प्रति पौधे के हिसाब से बैठ जाती है। उनकी एक एकड़ जमीन में उन्हें करीब 30 कुंतल सूखी सतावर प्राप्त हुई। सतावर की कीमत 200 से 500 रुपए प्रति किलोग्राम तक बिक जाती है। उन्होंने पहले साल अपनी पूूरी फसल एक औषधीय फसलों की खरीद करने वाले को पांच लाख में बेच दी। खुदाई से लेकर प्रोसेसिंग का सारा जिम्मा उन्हीं का था।

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इसके बाद उन्होंने खस बटीवर, पामारोजा, सतावर, स्टीविया, अश्वगंधा, केमोमाइल, लेमनग्रास आदि की खेती कर रहे हैं। किसी भी औषधीय फसल को लगाने से पूर्व वह बाजार की मांग का विशेष ध्यान रखते हैं। बाजार में जिन चीजों की मांग ठीक ठाक हो उन्हें ही वह प्राथमिकता से लगाते हैं।  अब वह कृषक शसक्तीकरण परियोजना में अन्य किसानों को जोड रहे हैं। बंजर में चमन खिलाएंगे श्री उपाध्याय का सपना है कि धान-गेहूं फसल चक्र के चलते जमीन खराब हो रही है। बंजर होते खेतों से भी वह किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। बंजर में खस अच्छी लगती है। वह किसानों को खस की खेती करना सिखा रहे हैं। इससे उनकी आय होगी। साथ ही खेती की जमीन भी धीरे धीरे सुधर जाएगी। वह बताते हैं कि ज्यातार किसान जिस खेती को करते हैं उससे अच्छी आय नहीं हो सकता। इस लिए किसानों को लीक से हटकर नई खेती को अपनाना चाहिए। पहली बार में इसे ज्यादा न करें। बाजार आदि की पूरी जानकारी होने के बाद ही काम को धीरे धीरे बढ़ाएं।
खरीफ के सीजन में यह फसलें देंगी आप को कम लागत में अधिक फायदा, जानिए इनसे जुड़ी बातें

खरीफ के सीजन में यह फसलें देंगी आप को कम लागत में अधिक फायदा, जानिए इनसे जुड़ी बातें

हम जानते हैं कि खरीफ की फसल बोने का समय चल रहा है। इस मौसम में किसान खरीफ की विभिन्न फसलों से काफी लाभ कमाते हैं और बारिश के मौसम में किसान सिंचाई की लागत से बच सकते हैं। जून का आधा महीना बीत चुका है और जुलाई आने वाला है। ऐसे में यह समय खरीफ की फसलें बोने के लिए उपयुक्त माना जाता है। किसान इस समय में औषधीय पौधों की खेती करके भी अधिक लाभ कमा सकते हैं। क्योंकि यह मौसम औषधि पौधों के लिए उपयुक्त माना जाता है। अभी खरीफ की फसलें बोने का समय चल रहा है। इसमें किसान धान, मक्का, कपासबाजरा और सोयाबीन जैसी विभिन्न फसलों की खेती में करते हैं। मानसून आने के साथ ही इन फसलों की रोपाई बुवाई में तेजी आई है। ऐसे में कुछ किसान उपरोक्त खरीफ की फसलें उगा रहे हैं और कुछ किसान इससे हटकर कई औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। ऐसा करने का किसानों का उद्देश्य केवल कम लागत में अधिक मुनाफा प्राप्त करना है। औषधीय पौधों की खेती करने से किसान को अधिक लाभ मिलता है। वही सरकार के द्वारा किसानों को मदद भी दी जाती है। इस वजह से किसानों का ध्यान औषधीय पौधों की खेती करने की और अग्रसर हो रहा है।

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देश के किसान इस समय मेडिसिनल प्लांट्स की खेती भी कर रहे हैं। इनकी मांग बाजार में अधिक होने के कारण किसानों को इनकी अच्छे दाम मिलते हैं। वहीं किसानों को सरकारी मदद भी मिलती है। इस समय जिन औषधीय पौधों की खेती की जा सकती है, उनमें सतावर, लेमन ग्रास, कौंच, ब्राह्मी और एलोवेरा प्रमुख रूप से हैं।

कौंच की खेती करने से फायदा :-

कौंच एक झाड़ीनुमा पौधा होता है, जो कि मैदानी क्षेत्र में पाया जाता है। इस पौधे की खेती किसान 15 जून से लेकर 15 जुलाई के बीच में कर सकते हैं। 1 एकड़ में कौंच की खेती करने में करीब 50 से 60 हजार रुपए का खर्च आता है जबकि कमाई प्रति एकड़ 2 से 3 लाख रुपए तक होती है। इसकी बुवाई के लिए प्रति एकड़ 6 से 8 किलो बीज की जरूरत होती है।

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ब्राह्मी की खेती की जानकारी :

ब्राह्मी का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की दवाएं बनाने में किया जाता है। यह एक लोकप्रिय औषधीय पौधा है। इसकी खेती करने के लिए बारिश कम समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। यह एक ऐसा पौधा है जिसकी डिमांड हाल ही के वर्षों में काफी बढ़ी है। किसान इस वक्त ब्राह्मी के साथ एलोवेरा की खेती भी कर सकते हैं। इसकी खेती जुलाई से लेकर अगस्त के बीच में की जाती है। कई कंपनियां इस पौधे की खेती करने के लिए किसानों को सीधे कॉन्ट्रैक्ट देती हैं।

सतावर की खेती से किसानों को लाभ :

खरीफ के मौसम में किसान सतावर और लेमनग्रास जैसे औषधीय पौधों की खेती कर सकते हैं। दोनों की खेती अलग अलग समय पर की जाती है। लेमनग्रास की खेती के लिए फरवरी से लेकर जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। लेकिन शतावर के लिए अगला पखवाड़ा सबसे उपयुक्त माना जाता है। सतावर की खेती से किसान काफी अधिक फायदा कमाते हैं। वहीं लेमनग्रास की खेती करने से यह फायदा होता है कि इसे एक बार लगाने पर किसान इससे कई साल तक पैदावार प्राप्त कर सकते हैं।
कीचड़ में ही नहीं खेत में भी खिलता है कमल, कम समय व लागत में मुनाफा डबल !

कीचड़ में ही नहीं खेत में भी खिलता है कमल, कम समय व लागत में मुनाफा डबल !

कम लागत में ज्यादा मुनाफा कौन नहीं कमाना चाहता ! लेकिन कम लागत में खेत पर कमल उगाने की बात पर चौंकना लाजिमी है, क्योंकि आम तौर पर सुनते आए हैं कि कमल कीचड़ में ही खिलता है। जी हां, कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो कम लागत में ज्यादा उत्पादन, संग-संग ज्यादा कमाई के लिए कृषकों को खेतों में कमल की खेती करनी चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों ने कमल को कम लागत में भरपूर उत्पादन और मुनाफा देने वाली फसलों की श्रेणी में शामिल किया है। 

लेकिन यह बात भी सच है -

जमा तौर पर माना जाता है कि तालाब झील या जल-जमाव वाले गंदे पानी, दलदल आदि में ही कमल पैदा होता, पनपता है। लेकिन आधुनिक कृषि विज्ञान का एक सच यह भी है कि, खेतों में भी कमल की खेती संभव है। न केवल कमल को खेत में उगाया जा सकता है, बल्कि कमल की खेती में समय भी बहुत कम लगता है। अनुकूल परिस्थितियों में महज 3 से 4 माह में ही कमल के फूल की पैदावार तैयार हो जाता है।

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कमल के फूल का राष्ट्रीय महत्व -

भारत के संविधान में राष्ट्रीय पुष्प का दर्जा रखने वाले कमल का वैज्ञानिक नाम नेलुम्बो नुसिफेरा (Nelumbo nucifera, also known as Indian lotus or Lotus) है। भारत में इसे पवित्र पुष्प का स्थान प्राप्त है। भारत की पौराणिक कथाओं, कलाओं में इसे विशिष्ट स्थान प्राप्त है। प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति के शुभ प्रतीक कमल को उनके रंगों के हिसाब से भी पूजन, अनुष्ठान एवं औषथि बनाने में उपयोग किया जाता है। सफेद, लाल, नीले, गुलाबी और बैंगनी रंग के कमल पुष्प एवं उसके पत्तों, तनों का अपना ही महत्व है। भारतीय मान्यताओं के अनुसार कमल का उद्गम भगवान श्री विष्णु जी की नाभि से हुआ था। बौद्ध धर्म में कमल पुष्प, शरीर, वाणी और मन की शुद्धता का प्रतीक है। दिन में खिलने एवं रात्रि में बंद होने की विशिष्टता के अनुसार मिस्र की पौराणिक कथाओं में कमल को सूर्य से संबद्ध माना गया है।

कमल का औषधीय उपयोग -

अत्यधिक प्यास लगने, गले, पेट में जलन के साथ ही मूत्र संबंधी विकारों के उपचार में भी कमल पुष्प के अंश उत्तम औषधि तुल्य हैं। कफ, बवासीर के इलाज में भी जानकार कमल के फूलों या उसके अंश का उपयोग करते हैं।

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खेत में कमल कैसे खिलेगा ?

हालांकि जान लीजिये कमल की खेती के लिए कुछ खास बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है। खास तौर पर नमीयुक्त मिट्टी इसकी पैदावार के लिए खास तौर पर अनिवार्य है। यदि भूमि में नमी नहीं होगी तो कमल की पैदावार प्रभावित हो सकती है। मतलब साफ है कि खेत में भी कमल की खेती के लिए पानी की पर्याप्त मात्रा जरूरी है। ऐसे में मौसम के आधार पर भी कमल की पैदावार सुनिश्चित की जा सकती है। खास तौर पर मानसून का माह खेत में कमल उगाने के लिए पुूरी तरह से मददगार माना जाता है। मानसून में बारिश से खेत मेें पर्याप्त नमी रहती है, हालांकि खेत में कम बारिश की स्थिति में वैकल्पिक जलापूर्ति की व्यवस्था भी रखना जरूरी है।

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खेत में कमल खिलाने की तैयारी :

खेत में कमल खिलाने के लिए सर्व प्रथम खेत की पूरी तरह से जुताई करना जरूरी है। इसके बाद क्रम आता है जुताई के बाद तैयार खेतों में कमल के कलम या बीज लगाने का। इस प्रक्रिया के बाद तकरीबन दो माह तक खेत में पानी भर कर रखना जरूरी है। पानी भी इतना कि खेत में कीचड़ की स्थिति निर्मित हो जाए, क्योंकि ऐसी स्थिति में कमल के पौधों का तेजी से सुगठित विकास होता है। भारत के खेत में मानसून के मान से पैदा की जा रही कमल की फसल अक्टूबर माह तक तैयार हो जाती है। जिसके बाद इसके फूलों, पत्तियों और इसके डंठल ( कमलगट्टा ) को उचित कीमत पर विक्रय किया जा सकता है। मतलब मानसून यानी जुलाई से अक्टूबर तक के महज 4 माह में कमल की खेती किसान के लिए मुनाफा देने वाली हो सकती है।

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कमल के फूल की खेती की लागत और मुनाफे का गणित :

एक एकड़ की जमीन पर कमल के फूल उगाने के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत भी नहीं। इतनी जमीन पर 5 से 6 हजार पौधे लगाकर किसान मित्र वर्ग भरपूर मुनाफा कमा सकते हैं। बीज एवं कलम आधारित खेती के कारण आंकलित जमीन पर कमल उपजाने, खेत तैयार करने एवं बीज खर्च और सिंचाई व्यय मिलाकर 25 से 30 हजार रुपयों का खर्च किसान पर आता है।

1 एकड़ जमीन, 25 हजार, 4 माह -

पत्ता, फूल संग तना (कमलगट्टा) और जड़ों तक की बाजार में भरपूर मांग के कारण कमल की खेती हर हाल में मुुनाफे का सौदा कही जा सकती है। कृषि के जानकारों के अनुसार 1 एकड़ जमीन में 25 से 30 हजार रुपयों की लागत आती है। इसके बाद 4 महीने की मेहनत मिलाकर कमल की पैदावार से अनुकूल स्थितियों में 2 लाख रुपयों तक का मुनाफा कमाया जा सकता है।

श्रावण मास में उगाएंगे ये फलफूल, तो अच्छी आमदनी होगी फलीभूत

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श्रावण मास में रहती है इन चीजों की मांग : उद्यान/किसान कमा सकते हैं तगड़ा मुनाफा

भगवान
शिव की सेवा में समर्पित श्रावण मास के दौरान खास किस्म के पुष्पों, पौधों, प्रसाद की मांग बढ़ जाती है। ऐसे में कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra) के लिए पूर्व नियोजित तैयारी की मदद से, सावन की रिमझिम फुहार के बीच, किसान आमदनी की बौछार में तरबतर हो सकते हैं।

कांवड़ यात्रा के दौरान रहेगी इनकी मांग

भगवान शिव को अर्पित होने वाली फूल व पौधों की खेती के बारे में जानकारी, जिससे श्रावण मास (Shraavana) में कांवड़ यात्रा के माह में फलीभूत होती है तगड़ी कमाई। सावन के महीने में भगवान शिव को बिल्व (Indian bael) या बेल पत्र, भांग-धतूरा, आंकड़ा या मदार के पुष्प एवं पत्ते आदि चढ़ाना शुभ माना जाता है। इन फूल पौधों की खेती व दूध-दही के उत्पाद से किसानों के साथ-साथ पशु पालकों को भी श्रावण मास में आमदनी का प्रसाद मिल जाता है।

क्या उगाएं किसान

भगवान शिव को फल-फूल-सब्जी एवं अनाज चढ़ाने के अपने महत्व हैं। भगवान भोले को शमी एवं बिल्व के पत्र, बेला का फूल विशिष्ट रूप से अर्पित किया जाता है। भगवान शिव की आराधना में अलसी के फूलों का भी खास महत्व है। कनेर का फूल भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं को भी अर्पित किया जा सकता है। भगवान शिव को प्रिय चमेली के फूलों की खेती करके भी किसान बेहतर कमाई का जरिया तलाश सकते हैं। बेला, कनेर, चमेली के पुष्प ऐसे फूल हैं जिनकी मांग साल भर धार्मिक अनुष्ठानों एवं पुष्प प्रेमियों के बीच बनी रहती है। भगवान शिव को हरसिंगार का पुष्प भी चढ़ाया जाता है। हरसिंगार को पारिजात या शिउली के पुष्प के नाम से भी पुकारा जाता हैा। नारंगी डंडी वाला सफेद रंग का यह पुष्प रात्रि में खिलता है। अपराजिता का फूल भी भोलेनाथ को चढ़ाया जाता है, अपराजिता के फूलों यानी तितली मटर (butterfly pea, blue pea, Aprajita, Cordofan pea, Blue Tea Flowers or Asian pigeonwings) की पहचान, उसके औषधीय गुणों के कारण दुनिया भर में है। यह तो हुई सुगंध एवं सुंदरता से लैस पुष्पों से जुड़े किसानों के लिए कमाई के अवसर की बात, अब बात करते हैं भगवान वैद्यनाथ को अर्पित की जाने वाली उन चीजों की, जो अपनी प्रकृति के कारण औषधीय गुणों से भी भरपूर हैं।


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अकौआ, आंकड़ा या मदार

अकौआ जिसे आंकड़ा या मदार भी कहा जाता है, इसके लाल एवं सफेद रंग के पुष्प भगवान शिव की उपासना में अर्पित किए जाते हैं। इसके पुष्प एवं पत्ते भी भगवान शिव को चढ़ाने का विधान है। मान्यताओं के अनुसार आंकड़े के पुष्प चढ़ाने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके फूलों का इलाज में भी उपयोग होता है। खांसी आदि में इसका लौंग आदि से वैद्य द्वारा तैयार मिश्रण खासा मददगार साबित होता है।

बिल्व पत्र एवं फल

भगवान शिव को बिल्व पत्र एवं बिल्व फल चढ़ाकर शिवभक्त पूजन करते हैं। किसान मित्र, नर्सरी में मिलने वाले बिल्व जिसे आम बोलचाल की भाषा में बेल भी कहते हैं, का पौधा खेत या बगीचे में लगाकर सावन के अलावा अन्य माह में भी अपनी आय सुनिश्चित कर सकते हैं। बिल्व पत्र की मांग जहां साल भर रहती है, वहीं इसके फल खाने के साथ ही शरबत के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। कृषि उत्पाद के तौर पर बेल की जैली, मुरब्बा की भी बाजार में खासी मांग है।

शिव प्रिय फल के रामबाण इलाज

औषधीय उपयोग में भी बेल के फल, छाल, जड़ों को उपयोग में लाया जाता है। कब्ज आदि के उपचार में शिव प्रिय बेल का फल रामबाण इलाज माना जाता है।


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इन चीजों की जरूरत

शिवभक्त भगवान शिव की आराधना के दौरान भांग, धतूरा, ऋतुफल भी चढ़ाए जाते हैं।

भांग-धतूरा

भांग की खेती जहां, सरकारी अनुमति से की जाती है, वहीं धतूरे की खेती करते समय किसान को कुछ सावधानियां बरतना अनिवार्य है। आम तौर पर दोनों ही चीजें मानवीय मस्तिष्क तंत्र को प्रभावित करती हैं। इसका प्रयोग एलोपेथिक दवाओं के साथ ही आयुर्वेद आदि में प्रचुरता से किया जाता है। इनकी शासकीय नियमानुसार खेती कर किसान न केवल श्रावण मास, बल्कि साल के अन्य दिनों में भी अपना लाभ पक्का कर सकते हैं। (लेख में वर्णित भांग, धतूरा आदि के बगैर चिकित्सक की सलाह के प्रयोग से बचें। इनका गलत मात्रा में प्रयोग प्राणघातक हो सकता है।)
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कठिन मेहनत से हासिल बैंकिंग की नौकरी छोड़, कृषि में स्टार्टअप की राह पर चला बिहार का यह किसान

आजादी के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि और जीडीपी में कृषि का योगदान निरंतर कम होता जा रहा है। हालांकि,
हरित क्रांति की सफलता के बाद एक समय आयात पर निर्भर रहने वाली भारतीय कृषि इतनी सफल तो हो पायी, कि देश के लोगों की मांग पूरी करने के अलावा कुछ स्तर पर निर्यात में भी हिस्सेदारी बंटा पाई। 2011 की जनगणना के अनुसार, 78 मिलियन प्रवासी मजदूर कृषि क्षेत्रों में सक्रिय रहने के अलावा, अतिरिक्त आय के लिए प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी काम करते हैं और इसी वजह से कृषि से होने वाली उत्पादकता में निरंतर कमी देखने को मिली है। बिहार के औरंगाबाद जिले के बरौली गांव में रहने वाले एक किसान की कहानी कुछ ऐसे ही शुरू हुई थी, जब उन्होंने कृषि और किसानी में सफल हुए कई विदेशी और भारतीय किसानों की केस स्टडी (case study) के बारे में पढ़ा। मैनेजमेंट प्रोफेशनल के रूप में काम करते हुए ही 2011 में बिहार के अभिषेक कुमार ने अच्छी सैलरी देने वाली जॉब को छोड़ने का निर्णय लिया और आज अभिषेक कुमार के खेतों में तुलसी (Tulsi), हल्दी (Turmeric), गिलोय (giloy) तथा मोरिंगा (Drumstick) और गेंदा (मेरीगोल्ड, Marygold) जैसी, आयुर्वेदिक औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधों की खेती की जाती है। अभिषेक को परिवारिक जमीन के रूप में 20 एकड़ का क्षेत्र मिला था, जिनमें से 15 एकड़ के क्षेत्र में वह इसी तरह कम समय में तैयार होने वाली आयुर्वेदिक औषधियों का उत्पादन कर बड़ी मार्केटिंग कंपनियों से जुड़ते हुए अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।


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अभिषेक ने बताया कि धान, गेहूं और मक्का से होने वाली बचत इन फसलों की तुलना में आधी भी नहीं होती है, लेकिन वैज्ञानिकों के द्वारा सुझाई गई आधुनिक विधियों और कृषि विभाग के द्वारा जारी की गई एडवाइजरी का सही तरीके से पालन कर, इंटरनेट की मदद से कई सफल किसानों तक पहुंच बनाकर, बेहतर कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुछ ऐसे गुण सीखे, जो आज अभिषेक को अच्छा मुनाफा दे रहे हैं। बिहार में एक प्रॉफिटेबल कृषि मॉडल बनाने की सोच को लेकर काम कर रहे अभिषेक, खेत से होने वाली उत्पादकता पर ज्यादा ध्यान देते हैं। खुद अभिषेक ही बताते हैं कि एक कृषि परिवार से संबंध रखने के बावजूद भी खेती में कम आमदनी होने की वजह से, अपने परिवार को सहायता प्रदान करने और खुद का गुजारा करने के लिए वह पुणे में एक बैंक में कंसलटेंट के रूप में काम करने लगे थे। अभिषेक ने बताया कि जब उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड और चपरासी जैसे पदों पर काम करते वाले लोगों को देखा और उनसे मुलाकात हुई, तो पता चला कि इन लोगों के गांव में बहुत ज्यादा जमीन खाली पड़ी है और खेती में मुनाफा ना होने की वजह से ही वह अपने परिवार को गांव में छोड़कर शहरों में मुश्किल भरी जिंदगी जी रहे हैं। इन्हीं घटनाओं से प्रेरणा लेते हुए अभिषेक ने अपनी नौकरी को छोड़ वापस गांव में ही रहते हुए कृषि में इनोवेशन (Innovation) करने की सोच के साथ एक नई शुरुआत करने की सोची। आज अभिषेक को उनके गांव में ही नहीं बल्कि पूरे जिले में एक अलग पहचान मिल चुकी है और बिहार के कई बड़े एनजीओ (NGOs) तथा किसान भाई समय-समय पर उनसे जाकर मिलते हैं और अभिषेक के कृषि मॉडल की तरह ही अपने खेत की जमीन की उर्वरता और उत्पादन बढ़ाने के लिए राय लेते है।


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जब अभिषेक ने अपनी खेती की शुरुआत की तभी उन्होंने मन बना लिया था कि वह केवल किताबी ज्ञान को किसानों को बताने की बजाय पहले उसे अपने खेत में अपना कर देखेंगे और यदि अच्छा मुनाफा होगा तभी दूसरे किसान भाइयों को भी नई तकनीकों को सलाह देंगे, उन्हीं प्रयोगों का अभिषेक को इतना फायदा हुआ कि वर्तमान में वह लगभग 95 से अधिक कृषि उत्पादन संगठनों (Farmers producer organisation) से जुड़े हुए है और इन संगठनों से जुड़े हुए लगभग 2 लाख से अधिक किसान भाइयों को साल 2011 से मार्केटिंग और खेती से जुड़ी समस्त जानकारियां उपलब्ध करवा रहे है। किसी भी शहरी परिवेश से वापस ग्रामीण क्षेत्र में आकर कृषि कार्यों की शुरुआत करने में अनेक प्रकार की समस्याएं होती है और ऐसी ही समस्या अभिषेक के सामने भी बिहार में एक अच्छा मुनाफा कमाने वाले किसान बनने की राह में अड़चन पैदा कर रही थी। हालांकि जब अभिषेक शहर से अपनी नौकरी छोड़ वापस गांव में आए, तो उन्हें कई लोगों के द्वारा विरोध झेलना पड़ा और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा इस विचार को पूरी तरीके से गलत ठहरा दिया गया, लेकिन जब अभिषेक ने अपने पिता को आधुनिक और समोच्च तरीके से होने वाली वैज्ञानिक विधियों की मदद से खेती करने की बात बताई, तो उनके परिवार ने भी हामी भरदी। वैज्ञानिक विधि का पालन करते हुए अभिषेक ने सबसे पहले अपने खेत में मिट्टी की जांच करवाई, जिससे उन्हें उनके खेत में पाई जाने वाली मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के बारे में पता चला, कौन से पोषक तत्वों की कितनी मात्रा खेत में पहले से उपलब्ध है और किन पोषक तत्वों की खेत की मिट्टी में कमी है।


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अभिषेक ने अपने किसानी करियर में पहली शुरुआत सामान्य खेती से ही की थी, लेकिन जब उन्होंने बागवानी कृषि को अपनाया तो उनके द्वारा किए गए सभी प्रयास सफल हुए और पहली साल में ही 6 लाख रुपए से अधिक की कमाई हुई। अभिषेक बताते हैं कि 2011 से ही वह रोज सुबह एक घंटे साइबर कैफे में जाकर इंटरनेट और यूट्यूब की मदद से विदेशी और पूशा के वैज्ञानिकों के द्वारा बताई गई नई विधियों को अपने खेत में आजमाकर देखते थे। जरबेरा की फसल का उत्पादन करने वाले वह बिहार के पहले व्यक्ति थे। इसके लिए उन्होंने बेंगलुरु और पुणे में काम कर रही कृषि से जुड़ी कई बड़ी साइंटिफिक लाइब्रेरी में जाकर रिसर्च करने वाले लोगों से बात कर उच्च गुणवत्ता वाले बीजों (High yield variety seeds) को उगाया तो पहले ही उत्पादन के बाद अच्छा मुनाफा दिखाई दिया। आज उनके खेतों में एक चौथाई से ज्यादा हिस्सों पर इसी प्रकार के औषधियों में इस्तेमाल होने वाले पौधे उगाए जाते है। अभिषेक बताते हैं कि औषधीय पौधों (Medicine Plants) को एक बार लगाने के बाद कुछ समय तक बिना निराई गुड़ाई के भी रखा जा सकता है और उत्पादन में होने वाली लागत को कम किया जा सकता है, क्योंकि ऐसे प्लांट्स के पौधे और पत्तियां अधिक बारिश और तेज धूप तथा भयंकर ठंड में भी वृद्धि दर को बरकरार रख सकते हैं, जिससे उर्वरकों पर होने वाली लागत कम आती है। औषधीय पौधों में एक बार पानी देने के बाद वे आसानी से 20 से 25 दिन तक बिना पानी के रह सकते है। अभिषेक ने बताया कि मेडिसिन पौधों का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि इनमें आवारा पशु और जानवरों से होने वाले नुकसान पूरी तरीके से कम किए जा सकते है, क्योंकि नीलगाय जो कि बिहार के खेतों में सबसे ज्यादा क्रॉप डेमेज (Crop damage) करती है, वह इन पौधों को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाती।


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अफ्रीका और आसाम में काम कर रही चाय के बागान से जुड़ी कंपनियों के अनुसंधानकर्ताओं की मदद से अभिषेक ने बिहार में रहते हुए ही 'ग्रीन टी' का उत्पादन भी शुरू किया है। ग्रीन टी बनाने के लिए तुलसी, लेमन घास (Lemongrass) और मोरिंगा के पौधों की पत्तियों की आवश्यकता होती है, जिन्हें बारीक तरीके से काटकर एक सोलर ड्रायर विधि की मदद से अभिषेक के द्वारा ही स्थापित गांव की ही एक विपणन इकाई में मशीन की मदद से तैयार किया जाता है और कई बड़ी भारतीय और इंटरनेशनल मार्केटिंग कंपनियों को बेचा जाता है। बैंक में काम करने वाले एक कर्मचारी से लेकर खेती में सफलता प्राप्त करने वाले अभिषेक कई किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनने के बाद अब कृषि के क्षेत्र में एक नई स्टार्टअप की योजना बना रहे है, हालांकि पिछले कुछ समय से बेंगलुरु से संचालित हो रही एक एग्रीटेक स्टार्टअप (Agritech startup) के साथ वह पहले से ही बिजनेस डेवलपर के रूप में जुड़े हुए हैं।


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अभिषेक प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (PACs) में होने वाली विपणन की विधियों में भी कुछ सुधार की उम्मीद करते है, क्योंकि वह मानते है कि मंडियों में होने वाले बिचौलिए की जॉब को पूरी तरीके से खत्म कर देना ही किसानों के लिए फायदेमंद रहेगा। स्टार्टअप की राय पर अभिषेक का मानना है कि वह किसानों और कृषि उत्पादन संगठन (FPOs) के मध्य कम शुल्क पर काम करने वाले एक माध्यम के रूप में भूमिका निभाने वाली स्टार्टअप की शुरुआत करना चाहते है और उनकी कोशिश है कि किसानों को उगाई गई उपज की सरकार के द्वारा तय किए गए मिनिमम सपोर्ट प्राइस (Minimum Support Price -MSP) से कुछ ज्यादा ही राशि मिले। अपनी इस स्टार्टअप यात्रा के दौरान अभिषेक एम.एस.स्वामीनाथन समिति के द्वारा दिए गए सुझावों को मध्य नजर रखते हुए अपने स्तर पर भारतीय कृषि में कुछ बदलाव करने की सोच भी रखते है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर से अभिषेक को 2014 में सर्वश्रेष्ठ किसान पुरस्कार भी मिल चुका है। इसके अलावा भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के द्वारा दिया जाने वाला भारतीय कृषि रत्न पुरस्कार जीतने वाले अभिषेक प्राकृतिक खेती को ज्यादा प्राथमिकता देते है और हमेशा घर पर तैयार की हुई प्राकृतिक गोबर खाद से ही अधिक उत्पादन प्राप्त करने की कोशिश करते है। अभिषेक का मानना है कि भारतीय किसान जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग ( Zero budget natural farming) और समोच्च कृषि (Sustainable development) जुताई विधियों की मदद से आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही विदेशी मार्केट में भी अपनी पकड़ बना पाएंगे। आशा करते हैं कि Merikheti.com के द्वारा बिहार के अवॉर्ड विजेता किसान अभिषेक की कृषि क्षेत्र में प्राप्त सफलताओं और उनके नए विचारों से जुड़ी यह जानकारी आपको पसंद आई होगी और आने वाले समय में आप भी ऐसी ही भविष्यकारी नीतियों को अपनाकर एक सफल किसान बनने की राह पर जरूर अपना लक्ष्य प्राप्त करेंगे।
मिल गई किसानों की समृद्धि की संजीवनी बूटी, दवाई के साथ कमाई, भारी सब्सिडी दे रही है सरकार

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भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि प्रधान देश होने के बावजुद भारत के किसानों की आय बेहतर नहीं हो पाती। प्रधानमंत्री भी किसानों की आय को लेकर हर संभव प्रयास कर रहे हैं, जिसका लाभ किसानों को भी मिल रहा है। केंद्र सरकार किसानों के लिए बहुत सारी योजना चला रही है, ताकि किसान की आय को बढाया जा सके। इसी दिशा में जड़ी बूटी की खेती करने वाले किसानों के लिए सरकार एक खास योजना लेकर आई है। सरकार ऐसे किसानों को 75% की सब्सिडी देगी। पूरी दुनिया आज भारत की आयुर्वेद विज्ञान, जड़ी-बूटियां और आयुष पद्धतियों को अपना रही है। इसका कारण यह है कि देश-विदेश में औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। जाहिर है, यह भारत के किसानों के लिए सुनहरा मौका है, क्योंकि भारत की धरती औषधीय पौधे या जड़ी-बूटियों की खेती के लिये सबसे उपयुक्त है। यहां पौराणिक काल से ही जड़ी-बूटियों के भंडार मौजूद रहे हैं।
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किसानों को औषधीय खेती के प्रति प्रोत्साहित करने के लिये केंद्र और राज्य सरकार मिलकर कई योजनाओं पर काम कर रही हैं। इन योजनाओं के तहत किसानों को अलग-अलग जड़ी-बूटियां उगाने के लिये 75 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है। भारत में औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों का उत्पादन बढ़ाने के लिये राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम; National AYUSH Mission - NAM) एक योजना चला रही है। इस योजना के तहत 140 जड़ी-बूटियां और हर्बल प्लांट्स की खेती के लिये किसानों को अलग-अलग हिसाब से सब्सिडी प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत आवेदन करने वाले लाभार्थी किसानों को औषधीय पौधों की खेती की लागत पर 30 प्रतिशत से लेकर 50 और 75 फीसदी तक आर्थिक अनुदान दिया जा रहा है। आयुष मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय आयुष मिशन के तहत औषधीय पौधों और जड़ी-बूटी उत्‍पादन के लिये करीब 59,350 से ज्यादा किसानों को आर्थिक सहायता मिल चुकी है।

बड़े काम का ई-चरक ऐप

राष्ट्रीय आयुष मिशन पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा दे रहा है। साथ ही यह किसानों को भी कम लागत में औषधीय खेती करने के लिये प्रोत्साहित करता है ताकि किसानों की आय बढ़ सके। योजना के तहत आर्थिक अनुदान का तो प्रावधान है ही, खेती के साथ-साथ उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने में भी सरकार इन किसानों की मदद करती है।


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भारत में ज्यादातर किसान औषधीय पौधों की खेती के लिये दवा कंपनियों के साथ कांट्रेक्ट करते हैं। दरअसल औषधीय पौधों की उपज और इनकी बिक्री के बाजार की जानकारी ना होने के कारण किसान कांट्रेक्ट फार्मिंग करना पसंद करते हैं। अब किसान चाहें तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिये भी जड़ी-बूटियों की खरीद-बिक्री कर सकते हैं। इसके लिये केंद्र सरकार ने ई-चरक मोबाइल एपलिकेशन भी लॉन्च किया है। इस ऐप का कमाल यह है कि अब किसान सीधे ई-चरक ऐप से आसानी से जड़ी-बूटियों की खरीदारी और बिक्री कर सकते हैं। जाहिर है, भारत की परंपरागत जड़ी-बूटी की खेती कर के किसान प्रधानमंत्री मोदी का वह सपना पूरा कर सकते हैं, जिसमें उन्होंने किसानों की ये दोगुनी करने की बात कही थी।
खुशखबरी: २०० करोड़ के निवेश से इस राज्य में बनने जा रहा है अनुसंधान केंद्र

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डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आयुष मंत्रालय बदरवाह में अनुसंधान केंद्र निर्माण हेतु २०० करोड़ रुपये स्वीकृत हो चुके हैं। यह जम्मू-कश्मीर के कृषकों के लिए हर्ष की बात है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया है, कि जम्मू-कश्मीर में कृषि-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप का केंद्र बनने के असीमित अवसर हैं। इसी संबंध में उनका यह भी कहना है, कि जम्मू में उत्पादित होने वाले बांसों का प्रयोग अगरबत्ती समेत विभिन्न प्रकार के आवश्यक उत्पादों के निर्माण हेतु हो सकता है। इस वजह से बांस की खेती के क्षेत्रफल में बढ़ोत्तरी तो होगी ही साथ में किसानों की आय में भी वृद्धि होगी। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि स्ट्रॉबेरी व सेब एवं ऐसे अन्य फलों की जीवनावधि को कोल्ड-चेन की उत्तम व्यवस्था के जरिये बढ़ाया जाना संभव है।

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उन्होंने कहा कि जम्मू और कश्मीर में गैर-इमारती वन उत्पाद (NTFP) में आने वाले पौधे जिनमें मशरूम, गुच्ची एवं अन्य औषधीय पौधे काफी संख्या में मिल जाते हैं। चिनाब घाटी अथवा पीर पंजाल क्षेत्र (राजौरी, पुंछ) उच्च गुणवत्ता वाले शहद एवं एनटीएफपी का केंद्र है। दरअसल, इनकी उचित तरीके से विपणन नहीं हो पाती है। केंद्रीय मंत्री ने बताया है, कि प्रदेश के जम्मू-कश्मीर औषधीय पादप बोर्ड एवं वन विभाग को साम्मिलित किया, क्योंकि एक सहायक पद्धति के जरिये से उत्पादन, बिक्री और विपणन की आवश्यकता है। 

कृषि संबंधित औघोगिक क्रांति से बेहद मुनाफा हो सकता है

उपरोक्त में जैसा बताया गया है, कि डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आयुष मंत्रालय बदरवाह में अनुसंधान केंद्र निर्माण हेतु २०० करोड़ रुपये स्वीकृत हो चुके हैं।. इसी दौरान मंत्री का कहना है, कि कृषि, बागवानी एवं ग्रामीण विकास की भाँति अनेकों प्रगतिशील क्षेत्रों में कार्यरत सरकारी संगठनों हेतु निरंतर सहायता की आवश्यकता है। साथ ही उनका कहना है, कि शेर-ए-कश्मीर कृषि विश्वविद्यालय (SKUAST) कश्मीर, को उद्यमिता विकास संस्थान (EDI) के साथ मिलकर भेड़पालन व पशुपालन विभागों को सहायता प्रदान करनी चाहिए। 

किसानों को (एफपीओ) व सहकारी समितियों के जरिये संस्थागत होना चाहिए

बतादें कि, मंत्री जितेंद्र सिंह का कहना है, कि किसानों को सहकारी समितियों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से संस्थागत होना महत्वपूर्ण है। कृषि एवं बागवानी क्षेत्रों में स्थानीय मांगो पर ध्यान केंद्रित हो, एवं ऐैसे नौजवानों को तैयार करना होगा जिनकी इस क्षेत्र में कार्य करने की रूचि हो। साथ ही, एनजीओ किसानों को फसल बीमा अर्जन हेतु संवेदनशील बनाना अति आवश्यक है, क्योंकि इसकी जम्मू और कश्मीर में बेहद जरूरत है। केंद्रीय मंत्री के अनुसार, इस प्रकार के सरकारी संगठनों द्वारा समर्थन हेतु कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में कार्यशील प्रमुख गैर सरकारी संगठनों व अनुसंधान संस्थानों का सम्मिलित होना अति आवश्यक है। बाजार में अच्छी पकड़ हेतु, अधिकारियों द्वारा कोई ऐसी नीति जारी होनी जरूरी है, जो स्थानीय कृषि और बागवानी उत्पादों जैसे अखरोट, सेब व राजमा आदि के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की जिम्मेदारी उठा सके।

जिमीकंद की खेती से जीवन में आनंद ही आनंद

जिमीकंद की खेती से जीवन में आनंद ही आनंद

जिमीकंद को सूरन या बिहार जैसे राज्य में ओल भी कहा जाता है, यह असला में गर्म जलवायु में उगाया जाने वाला पौधा है। जिसकी सब्जी से ले कर अचार तक बनाई जाती है और उत्तर भारत से ले कर दक्षिण भारत तक में इसका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है। यानी, अगर किसान इसकी खेती करे तो निश्चित ही उनके जीवन में आनंद आ जाएगा।


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कैसी हो मिट्टी

ओल के लिए सबसे अच्छी मिट्टी भूरभुरी दोमट मिट्टी मानी जाती है, ओल को अधिक जल जमाव वाले क्षेत्र में नहीं उगाया जाना चाहिए, इससे किसानों को नुकसान हो सकता है। ओल की खेती के लिए 5.5 से 7.2 तक की पीएचमान वाली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। ओल की कई किस्में बाजार में आजकल उपलब्ध हैं, किसान अपनी जरूरत के हिसाब से इसमें से कोई एक किस्म का चुनाव कर सकते हैं। जैसे, गजेन्द्र, एम -15, संतरागाछी, कोववयूर आदि। किसान भाइयों को अपने क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु को ध्यान में रखते हुए ओल की किस्म का चुनाव करना चाहिए ताकि वे ओल की खेती से बेहतर कमाई कर सके।


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सूरन यानी जिमीकंद की खेती बारिश के मौसम से पहले और बाद में की जानी चाहिए, फिर भी इसकी खेती के लिए अप्रैल से जून के बीच का समाया सबसे बेहतर माना जाता है। किसान भाई ध्यान रखे कि, इसकी बुवाई से पहले इसके बीजों का उपचार अच्छी तरह से कर लिया गया है। खेत की अच्छे से गहरी जुताई कर कुछ दिनों के लिए ऐसे ही खुला छोड़ दें, ताकि खेत की मिट्टी में अच्छे से धूप लग सके। आप चाहे तो जुटे हुए खेत में पुरानी गोबर की खाद को डाल सकते हैं। आप ओल बोने से पहले अपने खेत में पोटाश 50 KG, 40 KG यूरिया और 150 KG डी.ए.पी. का इस्तेमाल अवश्य करें ताकि आपको बेहतर उपज मिल सके। बीजों को क्यारी बना कर लगाए क्योंकि ओल के पौधे होते हैं, जो अगर क्यारी में लगे हो और एक निश्चित दूरी बना कर रोप गए हो तो आपको ओल का फल अच्छे आकार का मिल सके।


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इसकी खेती में यह ध्यान रखना है, कि बरसात के समय सिंचाई नहीं करनी है। हां, सर्दी के मौसम में इसके पौधों को 15-20 दिन सिंचाई की आवश्यकता होती है। एक अच्छी बात यह है, कि इसके पौधे के बीच बहुत अधिक मात्रा में खर-पतवार नहीं उगते। लेकिन, फिर भी आपको इसका ध्यान रखना चाहिए, ऐसा करने से पौधों में रोग लगाने की संभावना कम हो जाती है। ओल के खेत के लिए आपको दस से पंद्रह क्विंटल गोबर की सड़ी खाद, यूरिया, फास्फोरस और पोटाश 80:60:80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिए।

बेहतर कमाई

ओल का बाजार भाव तकरीबन 30 से 50 रुपए प्रति किलो तक होता है। एक हेक्टयर में आप 70 से 80 टन ओल उगा सकते है, इस हिसाब से देखे तो किसान भाइयों को एक बेहतर कमाई का जरिया ओल के रूप में मिल सकता है। तो देर किस बात की, सर्दी का मौसम है, तब भी आप सिंचाई के बेहतर प्रबंधन के साथ ओल की खेती शुरू कर सकते हैं।