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पालक

पालक की खेती के लिए इन किस्मों का चयन करना लाभकारी साबित होगा

पालक की खेती के लिए इन किस्मों का चयन करना लाभकारी साबित होगा

किसान भाई बेहतरीन मुनाफा पाने के लिए पालक की खेती कर सकते हैं। बतादें, कि भारत में पालक की खेती रबी, खरीफ एवं जायद तीनों फसल चक्र में की जाती है। इसके लिए खेत में बेहतर जल निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही, हल्की दोमट मृदा में पालक के पत्तों का शानदार उत्पादन होता है।

किसान भाई इन बातों का विशेष रूप से ख्याल रखें

एक हेक्टेयर भूमि पर
पालक की खेती करने के लिए 30 किग्रा बीज की जरूरत पड़ती है। वहीं, छिटकवां विधि के माध्यम से खेती करने पर 40 से 45 किग्रा बीज की जरूरत होती है। बुवाई से पूर्व 2 ग्राम कैप्टान प्रति किलोग्राम बीजों का उपचार करें, जिससे पैदावार अच्छी हो। पालक की बुवाई के लिए कतार से कतार की दूरी 25–30 सेंटीमीटर और पौध से पौध की 7–10 सेंटीमीटर की दूरी रखें। पालक की खेती के लिए जलवायु एवं मिट्टी के अनुसार ज्यादा उत्पादन वाली उन्नत किस्मों का चयन कर सकते हैं।

ऑल ग्रीन

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि 15 से 20 दिन में हरे पत्तेदार पालक की किस्म तैयार हो जाती है। एक बार बुवाई करने के उपरांत यह छह से सात बार पत्तों को काट सकता है। यह किस्म बेशक ज्यादा उत्पादन देती है। परंतु, सर्दियों के दौरान खेती करने पर 70 दिनों में बीज और पत्तियां लगती हैं।

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पूसा हरित

साल भर की खपत को सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे किसान पूसा हरित से खेती करते हैं। पालक की बढ़वार सीधे ऊपर की ओर होती है। साथ ही, इसके पत्ते गहरे हरे रंग के बड़े आकार वाले होते हैं। क्षारीय जमीन पर इसकी खेती करने के बहुत सारे फायदे हैं।

देसी पालक

देसी पालक बाजार के अंदर बेहद अच्छे भाव में बिकता है। देसी पालक की पत्ती छोटी, चिकनी और अंडाकार होती हैं। यह बेहद शीघ्रता से तैयार हो जाती है। इस वजह से ज्यादातर किसान भाई इसकी खेती करते हैं।

विलायती पालक

विलायती पालक के बीज गोल एवं कटीले होते हैं। कटीले बीजों को पहाड़ी एवं ठंडे स्थानों में उगाना ज्यादा फायदेमंद होता है। गोल किस्मों की खेती भी मैदानों में की जाती है।
सर्दियों में पालक की जबरदस्त मांग होती है, किसान इसकी उन्नत किस्मों का चयन करें

सर्दियों में पालक की जबरदस्त मांग होती है, किसान इसकी उन्नत किस्मों का चयन करें

पालक की प्रमुख किस्मों में सम्पूर्ण हरा, पूसा हरित, पूसा ज्योति, जोबनेर ग्रीन एवं हिसार सेलेक्शन-23 सर्वाधिक उगाई जाने वाली प्रजाति होती हैं। आज हम आपको इन किस्मों के साथ-साथ इनकी ज्यादा मांग के विषय में जानकारी देंगे। सर्दियों का आगमन होते ही सबसे ज्यादा जो चीजें खाई जाने वाली होती हैं, उनमें हरी सब्जियों का नाम सर्व प्रथम आता है। इनमें सोया-मेथी, पालक, बथुआ एवं सरसों का साग सबसे विशेष होता है। इन्हीं में से आज हम आपको पालक की कुछ प्रमुख किस्मों के विषय में बताने जा रहे हैं। दरअसल, किसान पालक की खेती इसकी अधिक मांग के चलते भी करते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, पालक में सर्वाधिक आयरन की मात्रा होती है। जो हमारे स्वास्थ्य में हीमोग्लोबिन को संयमित करने में सहायता करती है। इसके चलते लोगों में इस सब्जी की सर्वाधिक मांग रहती है।

पालक की किस्म सम्पूर्ण हरा

पालक की इस प्रजाति के पौधे सामान्यतः हरे रंग के होते हैं। 5 से 20 दिन के समयांतराल पर इसकी पत्तियाँ मुलायम होकर कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। बतादें कि इसकी 6 से 7 बार कटाई की जा सकती है। पालक की यह प्रमुख किस्म ज्यादा उत्पादन देती है। ठंड के मौसम में तकरीबन ढाई माह उपरांत बीज और डंठल आते हैं।

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पालक की किस्म पूसा ज्योति

यह पालक की एक और उन्नत किस्म होती है, जिसकी पत्तियाँ हद से ज्यादा मुलायम और बिना रेशे वाली होती हैं। इस प्रजाति के पौधे काफी तेजी से बढ़ते हैं। साथ ही, पत्तियां कटाई के लिए भी तैयार हो जाती हैं, जिससे पैदावार भी ज्यादा होती है।


पालक की किस्म जोबनेर ग्रीन

जोबनेर ग्रीन प्रजाति की मुख्य विशेषता यह है, कि इसे अम्लीय मृदा में भी पैदा किया जा सकता है। पालक की इस किस्म की समस्त पत्तियाँ एक समान हरी, मोटी, मुलायम और रसदार होती हैं। इसकी पत्तियाँ पकाने पर बड़ी आसानी से गल जाती हैं।


 

पालक की किस्म पूसा हरित

पालक की यह शानदार किस्म पहाड़ी इलाकों के लिए उपयुक्त होती है। साथ ही, इसको यहाँ संपूर्ण वर्षभर उगाया जा सकता है। इसके पौधे ऊपर की तरफ बढ़ते हैं। साथ ही, पत्तियों का रंग गहरा हरा होता है। इसके पत्ते आकार में भी काफी बड़े होते हैं। इस किस्म की विशेषता यह है, कि इसे विभिन्न प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। इसकी खेती अम्लीय मिट्टी में भी सुगमता से की जा सकती है।

पालक की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

पालक की खेती की सम्पूर्ण जानकारी

पालक का नाम सुनते ही हमारे जेहन में एक हरे और चौड़े पत्ते वाली सब्जी आती है. जो की सर्दियों में हरा साग बना के खाई जाती है. पालक की सब्जी लोह और दूसरे विटामिन्स का बहुत अच्छा स्रोत है. इससे कैंसर-रोधक और ऐंटी ऐजिंग दवाइयां भी बनाई जाती है. इसके बहुत सारे अन्य फायदे भी हैं. यह हमारे पाचन, बाल, त्वचा आदि में भी बहुत महत्वपूर्ण है. अक्सर डॉक्टर्स हमें हरी सब्जी खाने की सलाह देते हैं इसके पीछे कारण यह है की इन हरी सब्जियों से हमें बहुत सारे विटामिन्स एंड मिनरल्स मिलते हैं जिससे की हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.

मिटटी:

पालक के लिए दोमट एवं मिक्स बलुई मिटटी उपयुक्त रहती है. इसको मिटटी से मिलने वाले पोषक तत्व अगर सही से मिलें तो इसके पत्ते चौड़े और चमकदार होते है. पत्ते देख कर भी कोई बता सकता है की पालक को मिटटी से मिलने वाले पोषक तत्व कैसे हैं. कहने का तात्पर्य है की चमकदार हरा रंग और चौड़े पत्ते भरपूर पोषक तत्वों का सूचक है.

खेत की तैयारी:

पालक के लिए खेत की तैयारी करते समय ध्यान रहे की इसके खेत की जुताई अच्छे तरीके से कि जाये. खेत में खरपतवार न हो तथा खेत समतल होना चाहिए जिससे की उसमें पानी भरने कि संभावना न हो. इससे पालक कि फसल ख़राब न हो. पालक की फसल कच्ची फसल होती है यह ज्यादा पानी भरने पर गल जाती है. खेत की अंतिम जुताई करने से पहले अच्छे से गोबर का बना हुआ खाद मिला देना चाहिए. इससे रासायनिक खाद की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है. पालक की खेती के साथ-साथ इसको सर्दियों में पशुओ को भी खिलाते हैं. क्योकि यह लोह और विटामिन्स का बहुत अच्छा स्रोत है. इसलिए
पशुओं के लिए बोने वाले चारे में पालक और मेथी मिला देते हैं. इससे पशुओं को भरपूर विटामिन्स मिलते हैं तथा सर्दियों में उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है.

बुवाई :

पालक के बीज की बुवाई या तो मशीन के द्वारा कराइ जानी चाहिए या फिर किसी विशेषज्ञ किसान द्वारा पवेर के करनी चाहिए. इसके पौधों में एक निश्चित दूरी रखनी चाहिए. जिससे की पौधे को फैलने की पर्याप्त जगह मिले.

पालक की उन्नत किस्में:

पालक की खेती इसकी पत्तियों के लिए की जाती है. इसकी पट्टी जीतनी चमकदार और हरी, चौड़ी होंगी उतनी ही अच्छी फसल मणि जाती है. इसकी फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए क्षेत्र विशेष की जलवायु व भूमि के अनुसार किस्मों का चयन करना भी एक आवश्यक कदम है। साथ ही पालक की सफल खेती के लिए चयनित किस्मों की विशेषताओं का भी ध्यान रखना चाहिए। पालक की खेती के लिए कुछ निम्नलिखित किस्मों में से किसी एक किस्म का चयन कर किसान अपनी आय को बढ़ा सकते हैं- ऑलग्रीन, पूसा ज्योति, पूसा हरित, पालक नं. 51-16, वर्जीनिया सेवोय, अर्ली स्मूथ लीफ आदि।

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पालक की फसल के रोग:

जैसा की हम पहले बता चुके हैं कि पालक की फसल कच्ची फसल होती है तो इसमें रोग भी जल्दी ही लगते हैं. इसके रोग कीड़े के रूप में और अन्य बीमारी भी इसमें जल्दी लगाती हैं. जैसे: चेंपा: चेंपा रोग इसमें बहुत जल्दी लगता है. तथा इसके छोटे छोटे कीड़े पत्ती पर बैठ कर उसका रास चूस लेते हैं जिससे कि इसकी पत्तियां मुरझा जाती है. इसके इलाज के लिए अगर आप देसी इलाज देना चाहते हैं तो नीम कि पत्ती का घोल और उपले की राख बखेर देनी चाहिए. चिट्टेदार पत्ते: इस रोग में पालक के पत्ते पर लाल रंग का घेरा जैसा बन जाता है. उससे पत्तियां ख़राब होने लगती हैं जिससे ये बाजार में बेचने लायक नहीं होता है. मोज़ेक वायरस: यह वायरस लगभग 150 विभिन्न प्रकार की सब्जियों और पौधों को संक्रमित कर सकता है। हम पत्तियों के उतरे हुए रंग को देखकर इसकी पहचान कर सकते हैं। संक्रमित पत्तियों में पीले और सफेद धब्बे होते हैं। पौधों का आकार बढ़ना बंद हो जाता है और वे धीरे-धीरे मर जाते हैं। कोमल फफूंदी: यह बीमारी पेरोनोस्पोरा फेरिनोसा रोगाणु के कारण होती है। हम पत्तियों को देखकर इसकी पहचान कर सकते हैं। वे अक्सर मुड़ी हुई होती हैं और उसमें फफूंदी और काले धब्बे लगे होते हैं। स्पिनच ब्लाइट:  यह वायरस पत्तियों को प्रभावित करता है। संक्रमित पत्तियां बढ़ना बंद कर देती हैं और उनका रंग पीलापन लिए हुए भूरे रंग का होने लगता है।
गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल कैसे करें (Plant Care in Summer)

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल कैसे करें (Plant Care in Summer)

आज हम बात करेंगे गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों की पैदावार कैसे करते हैं और उनकी देखभाल कैसे करनी चाहिए। ताकि गर्मी के प्रकोप से इन सब्जियों और पौधों को किसी भी प्रकार की हानि ना हो। यदि आप भी अपने पेड़ पौधों और हरी सब्जियों को इन गर्मी के मौसम से बचाना चाहते हैं तो हमारी इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहे। जैसा कि हम सब जानते हैं गर्मियों का मौसम शुरू हो गया है। सब्जियों के देखभाल और उनको उगाने के लिए मार्च और फरवरी का महीना सबसे अच्छा होता है। बागवानी करने वाले इन महीनों में सब्जी उगाने का कार्य शुरू कर देते हैं। इस मौसम में जो सब्जियां उगती है। उनके बीजों को पौधों या किसी अन्य भूमि पर लगाना शुरू कर देते हैं। गर्मी के मौसम में आप हरी मिर्च, पेठा, लौकी, खीरा ,ककड़ी, भिंडी, तुरई, मक्का, टिंडा बैगन, शिमला मिर्च, फलिया, लोबिया, बरबटी, सेम आदि सब्जियां उगा सकते हैं। यदि आप मार्च, फरवरी में बीज लगा देते हैं तो आपको अप्रैल के आखिरी तक सब्जियों की अच्छी पैदावार प्राप्त हो सकती है। गर्मियों के मौसम में ज्यादातर हरी सब्जियां और बेल वाली सब्जी उगाई जाती हैं। सब्जियों के साथ ही साथ अन्य फलियां, पुदीना धनिया पालक जैसी सब्जियां और साथ ही साथ खरबूज तरबूज जैसे फल भी उगाए जाते हैं।

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल और उगाने की विधि:

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जी के पौधों की देखभाल करना बहुत ही आवश्यक होता है। ऐसा करने से पौधे सुरक्षित रहेंगे,उन्हें किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं होगा। यदि आप गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों को उगाना चाहते है, तो आप हरी सब्जी उगाने के लिए इन प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकते हैं यह प्रक्रिया कुछ निम्न प्रकार है;

मक्का

मक्का जो आजकल स्वीट कॉर्न के रूप में लोगों के बीच बहुत ही प्रचलित है।आप इसको घर पर भी लगा सकते हैं। मक्का उगाने के लिए आपको कुछ मक्के के दाने लेने हैं उन्हें रात भर पानी में भिगोकर रखना है और फिर उन्हें किसी प्रकार के साफ कपड़े से बांधकर रख देना है। आप को कम से कम 2 दिन के बाद जब उनके छोटे-छोटे अंकुरित आ जाए , तब उन्हें किसी  क्यारी या मिट्टी की भूमि पर लगा देना है। मक्के का पौधा लगाने के लिए आपको अच्छी गहराई को नापना होगा। मिट्टी में आपको खाद ,नीम खली, रेत मिट्टी मिलानी होगी। खाद तैयार करने के बाद दूरी को बराबर रखते हुए, आपको बीज को मिट्टी में बोना होगा। मक्के के बीज केवल एक हफ्ते में ही अंकुरित होने लगते हैं।

मक्के के पौधे की देखभाल के लिए:

मक्के के पौधों की देखभाल के लिए पोलीनेशन  बहुत अच्छा होना चाहिए। कंकड़ वाली हवाओं से पौधों की सुरक्षा करनी होगी। 2 महीने पूर्ण हो जाने के बाद मक्का आना शुरू हो जाते हैं। इन मक्के के पौधों को आप 70 से 75 दिनों के अंतराल में तोड़ सकते हैं।

टिंडे के पौधे की देखभाल:

टिंडे की देखभाल के लिए आपको इनको धूप में रखना होगा। टिंडे लगाने के लिए काफी गहरी भूमि की खुदाई की आवश्यकता होती है।इनकी बीज को आप सीधा भी बो  सकते हैं।इनको कम से कम आप दो हफ्तों के भीतर गमले में भी लगा सकते हैं। टिंडे को आपको लगातार पानी देते रहना है। इनको प्रतिदिन धूप में रखना अनिवार्य है जब यह टिंडे अपना आकार 6 इंच लंबा कर ले , तो आपको इनमें खाद या पोषक तत्व को डालना होगा। कम से कम 70 दिनों के भीतर आप टिंडों  को तोड़ सकते हैं

फ्रेंच बीन्स पौधे की देखभाल

फ्रेंच बीन्स पौधे की देखभाल के लिए अच्छी धूप तथा पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जिससे पौधों की अच्छी सिंचाई और उनकी उच्च कोटि से देखभाल हो सके।

फ्रेंच बींस के पौधे लगाने के लिए आपको इनकी  बीज को कम से कम रात भर पानी में भिगोकर रखना चाहिए। फ्रेंच बींस के पौधे एक हफ्ते में तैयार हो जाते। 2 हफ्ते के अंतराल के बाद आप इन पौधों को गमले या अन्य बगीचा या भूमि में लगा सकते हैं। मिट्टी  खाद ,रेत और नीम खली जैसे खादों का उपयोग इनकी उत्पादकता के लिए इस्तेमाल कर सकते है।फलियां लगभग ढाई महीनों के बाद तोड़ने लायक हो जाती है।

भिंडी के पौधों की देखभाल

भिंडी के पौधों की देखभाल के लिए पौधों में नमी की बहुत ही आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में आप को पर्याप्त मात्रा में पानी और धूप दोनों का उचित ध्यान रखना होगा। भिंडी के पौधों के लिए सामान्य प्रकार की खाद की आवश्यकता होती है। भिंडी के बीज को बराबर दूरी पर बोया जाता है भिंडी के अंकुर 1 हफ्तों के बीज अंकुरित हो जाते हैं। पौधों के लिए पोषक तत्वों की भी काफी आवश्यकता होती है। पानी के साथ पोषक तत्व का भी पूर्ण ख्याल रखना होता है। भिंडी के पौधे 6 इंच होने के बाद हल्की-हल्की मिट्टियों के  पत्तो  को हटाकर इनकी जड़ों में उपयुक्त खाद  या गोबर की खाद को डालें। भिंडी के पौधों में आप तरल खाद का भी इस्तेमाल कर सकते हैं , ढाई महीने के बाद पौधों में भिंडी आना शुरू हो जाएंगे।

गर्मियों के मौसम में हरी मिर्च के पौधों की देखभाल

भारत में सबसे लोकप्रिय मसाला कहे जाने वाली मिर्च ,और सबसे तीखी मिर्च गर्मियों के मौसम में उगाई जाती है। बीमारियों के संपर्क से बचने के लिए तीखी हरी मिर्च बहुत ही अति संवेदनशील होती है। इन को बड़े ही आसानी से रोपण कर बोया या अन्य जगह पर उगाया जा सकता है। इन पौधों के बीच की दूरी लगभग 35 से 45 सेंटीमीटर होने चाहिए। और गहराई मिट्टी में कम से कम 1 से 2 इंच सेंटीमीटर की होनी चाहिए , इन दूरियों के आधार पर मिर्च के पौधों की बुवाई की जाती है। 6 से 8 दिन के भीतर  इन बीजों में अंकुरण आना शुरू हो जाते हैं। हरी मिर्ची के पौधे 2/3 हफ्तों में पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं।

लौकी गर्मी की फसल है;

लौकी गर्मियों के मौसम में उगाई जाने वाली सब्जी है। लौकी एक बेल कहीं जाने वाले सब्जी है, लौकी में बहुत सारे पौष्टिक तत्व मौजूद होते हैं। लौकी को आप साल के 12 महीनों में खा सकते हैं।लौकी के बीज को आप मिट्टी में बिना किसी अन्य देखरेख के सीधा बो सकते हैं। गहराई प्राप्त कर लौकी के बीजों को आप 3 एक साथ बुवाई कर सकते हैं। यह बीज  6 से 8 दिन के भीतर अंकुरण हो जाते है। लौकी की फसल के लिए मिट्टियों का तापमान लगभग 20 और 25 सेल्सियस के उपरांत होना जरूरी है।

गोभी

गर्मियों के मौसम में गोभी बहुत ही फायदेमंद सब्जियों में से एक होती है।और इसकी देखरेख करना भी जरूरी होता हैं।गर्मियों के मौसम में गोभी की सब्जी आपके पाचन तंत्र में बेहद मददगार साबित होती है ,तथा इसमें मौजूद पोषक तत्व आप को कब्ज जैसी शिकायत से भी राहत पहुंचाते हैं। गोभी फाइबर वह पोषक तत्वों से पूर्ण रूप से भरपूर होते हैं।

पालक के पौधों की देखभाल

पालक की जड़ें बहुत छोटी होती है और इस वजह से यह बहुत ज्यादा जमीन के नीचे नहीं जा पाती हैं। इस कारण पालक की अच्छी पैदावार के लिए इसमें ज्यादा मात्रा की सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। पालक के पौधों की देखभाल करने के लिए किसानों को पालक के पौधों की मिट्टी को नम रखना चाहिए। ताकि पालक की उत्पादकता ज्यादा हो।

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल : करेले के पौधे की देखभाल

गर्मी के मौसम में करेले के पौधों को सिंचाई की बहुत ही आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए इसकी सिंचाई का खास ख्याल रखना चाहिए। हालांकि सर्दी और बारिश के मौसम में इसे पानी या अन्य सिंचाई की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ती है। गर्मी के मौसम में करेले के पौधों को 5 दिन के अंदर पानी देना शुरू कर देना चाहिए।

बीज रोपण करने के बाद करेले के पौधों को छायादार जगह पर रखना आवश्यक होगा, पानी का छिड़काव करते रहना है ,ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। 5 से 10 दिन के भीतर बीज उगना  शुरू हो जाती हैं ,आपको करेले के पौधों को हल्की धूप में रखना चाहिए।

शिमला मिर्च के पौधों की देखभाल

शिमला मिर्च के पौधे की देखभाल के लिए उनको समय-समय पर विभिन्न प्रकार के कीट, फंगल या अन्य संक्रमण से बचाव के लिए उचित दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए। फसल बोने के बाद आप 40 से 50 दिनों के बाद शिमला मिर्ची की फसल की तोड़ाई कर सकते हैं। पौधों में समय-समय पर नियमित रूप से पानी डालते रहें। बीज के अंकुरित होने तक आप पौधों को ज्यादा धूप ना दिखाएं। शिमला मिर्च के पौधों की खेती भारत के विभिन्न विभिन्न हिस्सों में खूब की जाती है। क्योंकि यह बहुत ही फायदेमंद होता है साथ ही साथ लोग इसे बड़े चाव के साथ खाते हैं।

चौलाई के पौधों की देखभाल :

चौलाई की खेती गर्मियों के मौसम में की जाती है।शीतोष्ण और समशीतोष्ण दोनों तरह की जलवायु में चौलाई का उत्पादन होता है।

चौलाई की खेती ठंडी के मौसम में नहीं की जाती ,क्योंकि चौलाई अच्छी तरह से नहीं  उगती ठंडी के मौसम में। चौलाई लगभग 20 से 25 डिग्री के तापमान उगना शुरू हो जाती है और अंकुरित फूटना शुरू हो जाते हैं।

गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों के पौधों की देखभाल : सहजन का साग के पौधों की देखभाल

सहजन का साग बहुत ही फायदेमंद होता है इसके हर भाग का आप इस्तेमाल कर सकते हैं। और इसका इस्तेमाल करना उचित होता है।सहजन के पत्ते खाने के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं, तथा सहजन की जड़ों से विभिन्न विभिन्न प्रकार की औषधि बनती है। सहजन के पत्ते कटने के बाद भी इसमें  प्रोटीन मौजूद होता है। सभी प्रकार के आवश्यक तत्व जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स, खनिज,अमीनो एसिड, विटामिंस उचित मात्रा में पाए जाते हैं।

टमाटर गर्मियों के मौसम में

सब्जियों की पैदावार के साथ-साथ गर्मी के मौसम में टमाटर भी शामिल है।टमाटर खुले आसमान के नीचे धूप में अच्छी तरह से उगता है। टमाटर के पौधों के लिए 6 से 8 घंटे की धूप काफी होती है इसकी उत्पादकता के लिए।

टमाटर की बीज को आप साल किसी भी महीने में बोया जा सकते हैं।डायरेक्ट मेथर्ड या फिर ट्रांसप्लांट मेथर्ड द्वारा भी टमाटर की फसल को उगाया जा सकता है। टमाटर की फसल को खासतौर की देखभाल की आवश्यकता होती है। टमाटर की बीजों को अंकुरित होने के लिए लगभग 18 से 27 सेल्सियस डिग्री की आवश्यकता होती है। 80 से 100 दिन के अंदर आपको अच्छी मात्रा में टमाटर की फसल की प्राप्ति होगी। टमाटर के पौधों की दूरी लगभग 45 से 60 सेंटीमीटर की होनी चाहिए। 


दोस्तों हमने अपनी  इस पोस्ट में गर्मियों के मौसम में हरी सब्जियों और उनकी देखभाल किस प्रकार करते हैं। सभी प्रकार की पूर्ण जानकारी अपनी इस पोस्ट में दी है और उम्मीद करते हैं ,कि आपको हमारी या पोस्ट पसंद  आएगी।यदि आप हमारी इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा अपने दोस्तों और सोशल मीडिया पर शेयर करे। हम और अन्य टॉपिक पर आपको अच्छी अच्छी जानकारी देने की पूरी कोशिश करेंगे।

ऑफ-सीजन पालक बोने से होगा मुनाफा दुगना : शादियों के सीजन में बढ़ी मांग

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दोस्तों, आज हम पालक (Spinach) के विषय में जरूरी चर्चा करेंगे। पालक भी उन हरी सब्जियों में से एक हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद ही आवश्यक होती है। पालक के विभिन्न फायदे लोगों में इसकी मांग को बढ़ाते हैं और यहां तक कि लोग पालक को ऑफ-सीजन में भी खाने की इच्छा रखते हैं। पालक की खेती, इसे बोने तथा पालक से होने वाले मुनाफे की पूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारी इस पोस्ट के अंत तक जरूर बने रहें। 

पालक की खेती

सबसे पहले हम आपको पालक के विषय में कुछ जरूरी बात बताना चाहेंगे। पालक की खेती सबसे पहले ईरान में उगाई गई थी। पालक की उत्पत्ति का राज सबसे पहला ईरान को माना जाता है। उसके बाद यह भारत में अनेक राज्यों में विभिन्न विभिन्न तरह से उगाई जाती है। हरी सब्जियों में पालक सबसे गुणकारी सब्जी है। आयरन काफी मात्रा में पालक में पाया जाता है। इनके गुणकारी होने से शरीर में रक्त की मात्रा को बढ़ावा मिलता है। लोग साल भर पालक को बड़े चाव के साथ खाना पसंद करते हैं। सर्दियों के मौसम में इनको और अधिक पसंद किया जाता है। पालक की खेती कर किसान काफी अच्छे धन की प्राप्ति करते हैं। 

ऑफ-सीजन में पालक की खेती

सबसे अच्छा मौसम सर्दियों का होता है पालक की खेती के लिए जो पालक सर्दियों में उगते हैं वह बहुत ही उत्तम किस्म के होते हैं। पालक के पौधे सर्दियों में गिरने वाले पाले को बिना किसी परेशानी के आसानी से सहन करने की क्षमता रखते हैं। इनका विकास भी काफी अच्छे से होता है। किसान पालक की फसल के लिए बलुई दोमट मिट्टी का उपयोग कर करते हैं। सर्दियों के मौसम में सामान्य तापमान पालक की खेती को बढ़ाता है तथा इसका उत्पादन भी होता है। 

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पालक की खेती के लिए मिट्टी का चयन

वैसे तो पालक के लिए औसत मिट्टी काफी होती है।अगर यह जैविक पदार्थों से भरपूर मिट्टी में उगाया जाए, तो और भी अच्छी तरह से विकसित होते हैं। किसानों के अनुसार मिट्टी का प्रकार और उसका पीएच भरी प्रकार से जांच लेना आवश्यक होता है। पालक के अच्छे विकास और उत्पत्ति के लिए उसका पीएच 6.5 से लेकर 6.8 तक पीएच होना चाहिए। रेतीली दोमट मिट्टी पालक की खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। पौधे को रोपण करने से पहले मिट्टी को भली प्रकार से विश्लेषण करना आवश्यक होता है। 

पालक की फसल के लिए खेत को तैयार

किसान पालक की अलग-अलग किस्मों को उगाने के लिए और फसलों से पालक ही अच्छी पैदावार करने के लिए मिट्टी को भली प्रकार से भुरभुरा करते हैं। पहली जुताई के दौरान खेतों को गहरा जोता जाता है और ध्यान रखने योग्य बातें इनकी पुराने बचे हुए अवशेषों को नष्ट कर दिया जाता है। खेतों को कुछ टाइम के लिए जुताई करने के बाद ऐसे ही खुला छोड़ देते हैं।  

इस प्रक्रिया द्वारा मिट्टियों में भली प्रकार से धूप लग जाती है। पालक के पौधों को उवर्रक की आवश्यकता होती है क्योंकि पालक की फ़सल की कई बार कटाई की जाती है। पालक की फसल के लिए 15 से 17 पुरानी गोबर की खाद की आवश्यकता होती है। यहां प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेतों में डाला जाता है। पालक के खेत में जलभराव की समस्या से छुटकारा पाने के लिए खेतों को समतल कर दिया जाता है। भूमि में पाटा लगाकर उसे पूर्ण रुप से समतल करते है इससे जलभराव नहीं होते। 

किसान कुछ रसायनिक खाद का भी इस्तेमाल करते हैं जैसे: रासायनिक खाद के स्वरूप में 40 केजी फास्फोरस, 30केजी नाइट्रोजन और 40 केजी पोटाश की मात्रा इत्यादि को यह आखरी जुताई के दौरान खेतों में छिड़ककर मिट्टी में मिक्स कर दिया जाता है। पौधों को तेजी से उत्पादन करने और कटाई के लिए 20 केजी की मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है खेतों में छिड़क दिया जाता है। 

पालक के बीजों की रोपाई

पालक उन हरी सब्जियों में से एक है जिनको भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में साल भर बीजों द्वारा उगाया जाता है। लेकिन किसान पालक की रोपाई करने के लिए जो सबसे अच्छा और उपयुक्त महीना मानते हैं वह सितंबर और नवंबर के बीच का है। तथा पालक के पौधे जुलाई के महीने में और भी अच्छी तरह से उगते हैं। क्योंकि इस माह में बारिश होती है जो फसल के लिए बहुत ही लाभदायक साबित होती है। पालक के बीजों का रोपण किसान छिड़काव  और कुछ रोपण विधि द्वारा करते हैं। इन बीजों को लगभग 2 से 3 घंटे गोमूत्र में भिगोकर रखा जाता है। बीजों को अच्छी तरह से अंकुरित होने के लिए इनका रोपण लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर की दूरी पर किया जाता है। 

पालक के पौधों की सिंचाई

पालक के बीजों की रोपाई करने के बाद भूमि को भली प्रकार से गीला रहना बहुत ही ज्यादा आवश्यक होता है। क्योंकि पौधों की अच्छी उत्पादकता प्राप्त करने के लिए अच्छी सिंचाई की आवश्यकता होती है। 

 भूमि में बीज रोपण करने के बाद पानी देने की प्रक्रिया को आरंभ कर देना चाहिए। किसान पालक की फसल में लगभग 5 से 7 दिन के बाद सिंचाई करते हैं। इन सिंचाई से अंकुरण अच्छे से होता है। तथा वर्षा ऋतु के मौसम में जब जरूरत दिखाई दे तभी खेतों में पानी दे। 

दोस्तों हम उम्मीद करते हैं हमारा यह आर्टिकल पालक की बढ़ती मांग, ऑफ-सीजन पालक बोने, सर्दियों के सीजन में पालक की बुवाई तथा पालक से होने वाले मुनाफे इत्यादि की जानकारी हमारे इस आर्टिकल में मौजूद है। जो आपके बहुत काम आएगी हम यह आशा करते हैं कि हमारे इस आर्टिकल को आप ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया और अपने दोस्तों के साथ शेयर करें । धन्यवाद।

इस तकनीक का प्रयोग कर बिना मुर्गीफार्म, मुर्गीपालक कमा सकते हैं बेहतर मुनाफा

इस तकनीक का प्रयोग कर बिना मुर्गीफार्म, मुर्गीपालक कमा सकते हैं बेहतर मुनाफा

अभी के समय में किसान खेती के साथ साथ अब पशुपालन में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और आपको जान कर हैरानी होगी कि आज के समय में किसानों के बीच पशु पालन में मुर्गी पालन सबसे ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है। लेकिन आज भी किसान इस बात से बहुत हैरान हैं कि इस व्यवसाय में काफी लागत है, जैसे की मुर्गी फार्म बनाने के लिए जमीन और पैसा। लेकिन आज इस लेख में जो मैं बताने जा रहा हूं उसको जान कर आप हैरान हो जाएंगे, अब आप कम लागत में भी अपने घर के पास बैकयार्ड में भी मुर्गी पालन कर सकते हैं और अच्छा मुनाफा कमा सकते है। यह किसानों के लिए काफी किफायती साबित हो रहा है।

अगर आप भी अभी तक परेशान थे कि मुर्गीपालन के लिए बहुत जगह और पैसे की आवश्यकता है, तो अब इस बात को दिमाग से निकाल दें। अब कम जगह में मुर्गी पालन कर भी कमा सकते हैं पैसा। अगर आपके घर के बगल में है खाली जगह, तो वहाँ पर आप मुर्गियों के लिए बेड़े बना सकते हैं और उसमें मुर्गी पालन कर सकते हैं।

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आपको यह भी बता दें की घर के आस पास जगह होने से घरेलू लोग भी आसानी से उसमे काम कर सकते हैं और इससे आपका मजदूरी भी बचेगा जिससे आपको मुनाफा होगा। लेकिन इन सब बातों के अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह है मुर्गी के सही नस्लों को चुनना, जो आपके बेड़े में आसानी से रह सकें व उसको आसानी से पाला जा सके। गौरतलब है की पुरे भारत में मुर्गी के सैकड़ो प्रकार की नस्ल पाली जाती हैं। लेकिन आज कल जो सबसे प्रचलित और सबसे जयादा मुनाफा देने वाली नस्ल कड़कनाथ, केरी श्याम, स्वरनाथ, ग्रामप्रिये, वनराज आदि हैं। अगर आप भी मुर्गी पालन से कमाना चाहते हैं तो इसी सब नस्ल के मुर्गी का पालन करें। आपको यह भी बता दें की मुर्गीपालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार के तरफ से बहुत सारे ऋण की भी सुविधा उपलब्ध है। साथ ही आपको यह जान कर हैरानी होगी की ये जो ऋण है उसका दर भी बहुत कम है और उसमे अनेक प्रकार के सब्सिडी की भी सुविधा सरकार के तरफ से किसानों को दी जा रही है।

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क्या क्या है सब्सिडी

आपको बता दें की मुर्गी पालन पे नेशनल लाइवस्टॉक मिशन स्कीम के तहत किसानो को 50 प्रतिशत तक का अनुदान दिया जाता है। इसके आलावा नाबार्ड के द्वारा भी मुर्गी पालन के लिए किसानों को बेहतर सब्सिडी की सुविधा दी जाती है। इस सब्सिडी के अंतर्गत मुर्गी के स्वास्थ से लेकर मुर्गीफार्म के सुरक्षा तक पर सरकार के द्वारा बेहतर सब्सिडी दी जाती है।

कम लागत में बम्पर मुनाफा कम सकते हैं किसान

उपरोक्त सभी नस्लों के अलावा देसी मुर्गीपालन पर भी किसानों को काफी ध्यान है, जिसमें किसान देसी मुर्गी के एक चूजे को लगभग 50 रूपए में खरीदते हैं और वह मुर्गी साल भर बाद लगभग 200 अंडे देती है। अभी एक अंडे का कीमत कम से कम 7 रूपए है, अगर किसान इस तरीके से अच्छी खासी संख्या में मुर्गीपालन करते हैं, तो सालाना लाखों कमा सकते हैं। जब वह अंडा देना बंद कर दे तो इसके मांस को बेचकर भी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

लम्पी स्किन डिजीज (Lumpy Skin Disease)

लम्पी स्किन डिजीज (Lumpy Skin Disease)

- ये लेख हमारे मेरीखेती डॉटकॉम-१४ व्हाट्सएप्प ग्रुप मैं पियूष शर्मा ने दिया है

डॉ योगेश आर्य (पशुचिकित्सा विशेषज्ञ)

'
लम्पी स्किन डिजीज' या एलएसडी (LSD - Lumpy Skin Disease) नई चुनौती के रूप में उभरकर सामने आ रही है। यह एक संक्रामक बीमारी है जिसमें दुधारू पशुओं व मवेशियों में गाँठदार त्वचा रोग या फफोले बनने शुरू हो जाते हैं और दुधारू पशुओं का दूध कम होने लगता है। इस बीमारी की वैक्सीन भी बाजार में उपलब्ध नही है और गॉट-पॉक्स (बकरी-पॉक्स) वैक्सीन को वैकल्पिक रूप में काम मे ली जा रही है। लंपी का ईलाज करना भी पशुपालक के लिए महंगा साबित हो रहा है ऐसे में कुछ देशी इलाज मिल जाये तो पशुपालकों के लिए काफी राहत वाली बात होगी। 'नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड' और 'इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसडिसिप्लिनरी हेल्थ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी' ने प्रो. एन. पुण्यमूर्थी के मार्गदर्शन में कुछ पारंपरिक पद्दति द्वारा देशी ईलाज सुझाए हैं।


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लम्पी स्किन डिजीज का देशी उपचार:-

  • पहली विधि- एक खुराक के लिए
  • पान का पत्ता- 10 पत्ते
  • काली मिर्च- 10 ग्राम
  • नमक- 10 ग्राम
  • गुड़ आवश्यकतानुसार
विधि- उपरोक्त वर्णित सामग्री को पीसकर सबसे पहले पेस्ट बना लेना है, अब इसमे गुड़ मिला लेवें। इन तैयार मिश्रण को पशु को थोड़ी थोड़ी मात्रा में खिलाएं।


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पहले दिन ये खुराक हर 3 घण्टे में देवें और उसके बाद दिनभर में तैयार तीन ताजा तैयार खुराकें 2 हफ्ते तक देवें।

दूसरी विधि- दो खुराक के लिए

  • लहसुन- 2 कली
  • धनियां- 10 ग्राम
  • जीरा- 10 ग्राम
  • तुलसी- 1 मुठ्ठी पत्ते
  • तेज पत्ता- 10 ग्राम
  • काली मिर्च- 10 ग्राम
  • पान का पत्ता- 5 पत्ते
  • छोटा प्याज - 2 नग
  • हल्दी पॉवडर- 10 ग्राम
  • चिरायता के पत्ते का पॉवडर- 30 ग्राम
  • बेसिल का पत्ता- 1 मुठ्ठी
  • बेल का पत्ता- 1 मुठ्ठी
  • नीम का पत्ता- 1 मुठ्ठी
  • गुड़- 100 ग्राम
विधि- उपरोक्त वर्णित सामग्री को पीसकर पेस्ट बना लो, इसमे गुड़ मिला लेवें। थोड़ी थोड़ी मात्रा में पशु को खिलाओ। पहले दिन इसकी खुराक हर 3 घण्टे में खिलाओ। दूसरे दिन से प्रतिदिन ताजा तैयार एक-एक खुराक सुबह शाम पशु को आराम आने तक देवें।

यदि घाव हो तो घाव पर लगाने हेतु मिश्रण:-



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सामग्री-

  • कुप्पी का पत्ता- 1 मुठ्ठी
  • लहसुन- 10 कलियाँ
  • नीम का पत्ता- 1 मुठ्ठी
  • नारियल/तिल का तेल- 500 मिली
  • हल्दी पॉवडर- 20 ग्राम
  • मेहंदी का पत्ता- 1 मुठ्ठी
  • तुलसी का पत्ता- 1 मुठ्ठी
विधि- उपरोक्त वर्णित सामग्री को पीसकर पेस्ट बना लेवें फिर इसमें 500 मिली नारियल/तिल का तेल मिलाकर उबाल लेवें और ठंडा कर लेवें। लगाने की विधि:- घाव को साफ करने के बाद इस मिश्रण को घाव पर लगाएं।

यदि घाव में कीड़े दिखाई दे तो-

पहले दिन नारियल तेल में कपूर मिलाकर लगाएं या सीताफल की पत्तियों को पीसकर पेस्ट बनाकर लगाएं।
अगस्त में ऐसे लगाएं गोभी-पालक-शलजम, जाड़े में होगी बंपर कमाई, नहीं होगा कोई गम

अगस्त में ऐसे लगाएं गोभी-पालक-शलजम, जाड़े में होगी बंपर कमाई, नहीं होगा कोई गम

मानसून सीजन में भारत में इस बार बारिश का मिजाज किसानों की समझ से परे है। मानसून के देरी से देश के राज्यो में आमद दर्ज कराने से धान, सोयाबीन जैसी प्रतिवर्ष ली जाने वाली फसलों की तैयारी में देरी हुई, वहीं अगस्त माह में अतिवर्षा के कारण कुछ राज्यों में फसलों को नुकसान होने के कारण किसान मुआवजा मांग रहे हैं। लेकिन हम बात नुकसान के बजाए फायदे की कर रहे हैं। 

अगस्त महीने में कुछ बातों का ध्यान रखकर किसान यदि कुछ फसलों पर समुचित ध्यान देते हैं, तो आगामी महीनों में किसानों को भरपूर कृषि आय प्राप्त हो सकती है। जुलाई महीने तक भारत में कई जगह सूखा, गर्मी सरीखी स्थिति रही। ऐसे में अगस्त माह में किसान सब्जी की फसलों पर ध्यान केंद्रित कर अल्पकालिक फसलों से मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। अगस्त के महीने को साग-सब्जियों की खेती की तैयारी के लिहाज से काफी मुफीद माना जाता है। मानसून सीजन में सब्जियों की खेती से किसान बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं, हालांकि उनको ऐसी फसलों से बचने की कृषि वैज्ञानिक सलाह देते हैं, जो अधिक पानी की स्थिति में नुकसान का सौदा हो सकती हैं।

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 ऐसे में अगस्त के महीने में समय के साथ ही किसान को सही फसल का चुनाव करना भी अति महत्वपूर्ण हो जाता है। अगस्त में ऐसी कुछ सब्जियां हैं जिनकी खेती में नुकसान के बजाए फायदे अधिक हैं। एक तरह से अगस्त के मौसम को ठंड की साग-सब्जियों की तैयारी का महीना कहा जा सकता है। अगस्त के महीने में बोई जाने वाली सब्जियां सितंबर माह के अंत या अक्टूबर माह के पहले सप्ताह तक बाजार में बिकने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाती हैं।

शलजम (Turnip) की खेती

जड़ीय सब्जियों (Root vegetables) में शामिल शलजम ठंड के मौसम में खाई जाने वाली पौष्टिक सब्जियों में से एक है। कंद रूपी शलजम की खेती (Turnip Cultivation) में मेहनत कर किसान जाड़े के मौसम में बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं। गांठनुमा जड़ों वाली सब्जी शलजम या शलगम को भारतीय चाव से खाते हैं। अल्प समय में पचने वाली शलजम को खाने से पेट में बनने वाली गैस आदि की समस्या का भी समाधान होता है। कंद मूल किस्म की इस सब्जी की खासियत यह है कि इसे पथरीली अथवा किसी भी तरह की मिट्टी वाले खेत में उपजाया जा सकता है। हालांकि किसान मित्रों को शलजम की बोवनी के दौरान इस बात का विशेष तौर पर ध्यान रखना होगा कि, खेत में जल भराव न होता हो एवं शलजम बोए जाने वाली भूमि पर जल निकासी का समुचित प्रबंध हो।

शलजम की किस्में :

कम समय में तैयार होने वाली शलजम की प्रजातियों में एल वन (L 1) किस्म भारत में सर्वाधिक रूप से उगाई जाती है। महज 45 से 60 दिनों के भीतर खेत में पूरी तरह तैयार हो जाने वाली यह सब्जी अल्प समय में कृषि आय हासिल करने का सर्वोत्कृष्ट उपाय है। इस किस्म की शलजम की जड़ें गोल और पूरी तरह सफेद, मुलायम होने के साथ ही स्वाद में कुरकुरी लगती हैं। अनुकूल परिस्थितियों में किसान प्रति एकड़ 105 क्विंटल शलजम की पैदावार से बढ़िया मुनाफा कमा सकता है। इसके अलावा पंजाब सफेद फोर (Punjab Safed 4) किस्म की शलजम का भी व्यापक बाजार है। जैसा कि इसके नाम से ही जाहिर है, खास तौैर पर पंजाब और हरियाणा में इस प्रजाति की शलजम की खेती किसान करते हैं।

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शलजम की अन्य किस्में :

शलजम की एल वन (L 1) एवं पंजाब सफेद फोर (Punjab Safed 4) किस्म की प्रचलित किस्मों के अलावा, भारत के अन्य राज्यों के किसान पूसा कंचन (Pusa Kanchan), पूसा स्वेति (Pusa Sweti), पूसा चंद्रिमा (Pusa Chandrima), पर्पल टॉप व्हाइट ग्लोब (Purple top white globe) आदि किस्म की शलजम भी खेतों में उगाते हैं।

गाजर की खेती (Carrot farming)

जमीन के भीतर की पनपने वाली एक और सब्जी है गाजर। अगस्त के महीने में गाजर (Carrot) की बोवनी कर किसान ठंड के महीने में बंपर कमाई कर सकते हैं। मूल तौर पर लाल और नारंगी रंग वाली गाजर की खेती भारत के किसान करते हैं। भारत के प्रसिद्ध गाजर के हलवे में प्रयुक्त होने वाली लाल रंग की गाजर की ठंड में जहां तगड़ी डिमांड रहती है, वहीं सलाद आदि में खाई जाने वाली नारंगी गाजर की साल भर मांग रहती है। गाजर का आचार आदि में प्रयोग होने से इसकी उपयोगिता भारतीय रसोई में किसी न किसी रूप मेें हमेशा बनी रहती है। अतः गाजर को किसान के लिए साल भर कमाई प्रदान करने वाला जरिया कहना गलत नहीं होगा। अगस्त का महीना गाजर की फसल की तैयारी के लिए सर्वाधिक आदर्श माना जाता है। हालांकि किसान को गाजर की बोवनी करते समय शलजम की ही तरह इस बात का खास ख्याल रखना होता है कि, गाजर की बोवनी की जाने वाली भूमि में जल भराव न होता हो एवं इस भूमि पर जल निकासी के पूरे इंतजाम हों।

फूल गोभी (Cauliflower) की तैयारी

सफेद फूल गोभी की खेती अब मौसम आधारित न होकर साल भर की जाने वाली खेती प्रकारों में शामिल हो गई है। आजकल किसान खेतों में साल भर फूल गोभी की खेती कर इसकी मांग के कारण भरपूर मुनाफा कमाते हैं। हालांकि ठंड के मौसम में पनपने वाली फूल गोभी का स्वाद ही कुछ अलग होता है। विंटर सीजन में कॉलीफ्लॉवर की डिमांड पीक पर होती है। अगस्त महीने में फूल गोभी के बीजों की बोवनी कर किसान ठंड के मौसम में तगड़ी कमाई सुनिश्चित कर सकते हैं। चाइनीज व्यंजनों से लेकर सूप, आचार, सब्जी का अहम हिस्सा बन चुकी गोभी की सब्जी में कमाई के अपार अवसर मौजूद हैं। बस जरूरत है उसे वक्त रहते इन अवसरों को भुनाने की।

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पर्ण आधारित फसलें

बारिश के मौसम में मैथी, पालक (Spinach) जैसी पर्ण साग-सब्जियों को खाना वर्जित है। जहरीले जीवों की मौजूदगी के कारण स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका के कारण वर्षाकाल में पर्ण आधारित सब्जियों को खाना मना किया गया है। बारिश में सड़ने के खतरे के कारण भी किसान पालक जैसी फसलों को उगाने से बचते हैं। हालांकि अगस्त का महीना पालक की तैयारी के लिए मददगार माना जाता है। लौह तत्व से भरपूर पालक (Paalak) को भारतीय थाली में सम्मानजनक स्थान हासिल है। पौष्टिक तत्वों से भरपूर हरी भरी पालक को सब्जी के अलावा जूस आदि में भरपूर उपयोग किया जाता है।

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सर्दी के मौसम में पालक के पकौड़े, पालक पनीर, पालक दाल आदि व्यंजन लगभग प्रत्येक भारतीय रसोई का हिस्सा होते हैं। अगस्त के महीने में पालक की तैयारी कर किसान मित्र ठंड के मौसम में अच्छी कृषि आय प्राप्त कर सकते हैं।

चौलाई (amaranth) में भलाई

चौलाई की भाजी की साग के भारतीय खासे दीवाने हैं। गरमी और ठंड के सीजन में चौलाई की भाजी बाजार मेें प्रचुरता से बिकती है। चौलाई की भाजी किसान किसी भी तरह की मिट्टी में उगा सकता है। अगस्त के महीने में सब्जियों की खेती की तैयारी कर ठंड के मौसम के लिए कृषि आय सुनिश्चित कर सकते हैं। तो किसान मित्र ऊपर वर्णित किस्मों विधियों से अगस्त के दौरान खेत में लगाएंगे गोभी, पालक और शलजम तो ठंड में होगी भरपूर कमाई, नहीं रहेगा किसी तरह का कोई गम।

गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

गौमूत्र से बना ब्रम्हास्त्र और जीवामृत बढ़ा रहा फसल पैदावार

छत्तीसगढ़ पहला राज्य जहां गौमूत्र से बन रहा कीटनाशक

इस न्यूज की हेडलाइन पढ़कर लोगों को अटपटा जरूर लगेगा, पर यह खबर किसानों के लिए बड़ी काम की है। जहां गौमूत्र का बड़ा धार्मिक महत्व माना जाता है और गांवों में आज भी लोग इसका सेवन करते हैं, उनका कहना है कि गौमूत्र पीने से कई बीमारियों से बच पाते हैं। वहीं, गौमूत्र अब किसानों के खेतों में कीटनाशक के रूप में, उनकी जमीन की सेहत सुधारकर फसल उत्पादन का बढ़ाने में उनकी काफी मदद करेगा। जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि आधुनिकता के युग में खान-पान सही नहीं होने और फसलों में बेतहासा
जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से हमारा अन्न जहरीला होता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने भी सिद्ध कर दिया है कि जहरीले कीटनाशक के प्रयोग से लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है और आयु घटती जा रही है। लोगों की इस तकलीफ को किसानों ने भी समझा और अब वे भी धीरे-धीरे जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। इससे वे अपनी आमदनी तो बढ़ा ही रहे हैं, साथ-साथ देश के लोगों और भूमि की सेहत भी सुधार रहे हैं। इसी के तहत लोगों की सेहत का ख्याल रखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने किसान हित में एक बड़ा कदम उठाया है और पशुपालकों से गौमूत्र खरीदने की योजना शुरू की है, जिससे कीटनाशक बनाया जा रहा है। इसका उत्पादन भी सरकार द्वारा शुरू कर दिया गया है।

चार रुपए लीटर में गौमूत्र की खरीदी

पहले राज्य सरकार ने किसानों को जैविक खेती के प्रति प्रोत्साहित किया, जिसके सुखद परिणाम भी सामने आने लगे हैं, इसके बाद पशुपालकों से गौमूत्र खरीदकर उनको एक अतिरिक्त आय भी दे दी। राज्य सरकार पशुपालक किसानों से चार रुपए लीटर में गौमूत्र खरीद रही है। राज्य के लाखों किसान इस योजना का फायदा उठाकर गौमूत्र बेचने भी लगे हैं।


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हरेली पर मुख्यमंत्री ने गौमूत्र खरीद कर की थी शुरूआत

हरेली पर्व पर 28 जुलाई से गोधन न्याय योजना के तहत गोमूत्र की खरीदी शुरू की गई है। मुताबिक छत्तीसगढ़ गौ-मूत्र खरीदी करने वाला देश का पहला राज्य है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में हरेली (हरियाली अमावस्या) पर्व के अवसर पर गोमूत्र खरीदा और वे पहले ग्राहक बने। वहीं मुख्यमंत्री ने खुद भी गौमूत्र विक्रय किया था।

अन्य राज्य भी अपना रहे

छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जो पशुपालक ग्रामीणों से चार रुपए लीटर में गोमूत्र खरीद रहा है। गोधन न्याय योजना के बहुआयामी परिणामों को देखते हुए देश के अनेक राज्य इसे अपनाने लगे हैं। इस योजना के तहत, अमीर हो या गरीब, सभी को लाभ मिल रहा है।


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गौमूत्र से बने ब्रम्हास्त्र व जीवामृत का किसान करे उपयोग

अब आते हैं गौमूत्र से बने कीटनाशक की बात पर। विदित हो कि किसान अब जैविक खेती को अपना रहे हैं। ऐसे में गौमूत्र से बने ब्रम्हास्त्र व जीवामृत का उपयोग किसान अपने क्षेत्र में करने लगे हैं। राज्य की महत्वकांक्षी सुराजी गांव योजना के अंतर्गत, गोधन न्याय योजना के तहत अकलतरा विकासखण्ड के तिलई गौठान एवं नवागढ़ विकासखण्ड के खोखरा गौठान में गौमूत्र खरीदी कर, गोठान समिति द्वारा जीवामृत (ग्रोथ प्रमोटर) एवं ब्रम्हास्त्र (जैविक कीट नियंत्रक) का उत्पादन किया जा रहा है।


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गौठानों में सैकड़ों लीटर गौमूत्र की खरीदी की जा चुकी है। जिसमें निर्मित जैविक उत्पाद का उपयोग जिले के कृषक कृषि अधिकारियों के मार्गदर्शन में अपने खेतों में कर रहे हैं। इससे कृषि में जहरीले रसायनों के उपयोग के विकल्प के रूप में गौमूत्र के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा मिलेगा, रसायनिक खाद तथा रसायनिक कीटनाशक के प्रयोग से होने वाले हानिकारक प्रभाव में कमी आयेगी, पर्यावरण प्रदूषण रोकने में सहायक होगा तथा कृषि में लगने वाली लागत में कमी आएगी।

50 रुपए लीटर ब्रम्हास्त्र और जीवामृत (वृद्धि वर्धक) का मूल्य 40 रुपए लीटर

गौमूत्र से बनाए गए कीट नियंत्रक ब्रम्हास्त्र का विक्रय मूल्य 50 रूपये लीटर तथा जीवामृत (वृद्धि वर्धक) का विक्रय 40 रूपये लीटर है। इस प्रकार गौमूत्र से बने जैविक उत्पादों के दीर्घकालिन लाभ को देखते हुए जिले के कृषक बंधुओं को इसके उपयोग की सलाह कृषि विभाग द्वारा दी जा रही है।
परती खेत में करें इन सब्जियों की बुवाई, होगी अच्छी कमाई

परती खेत में करें इन सब्जियों की बुवाई, होगी अच्छी कमाई

सितंबर महीने में अपने परती पड़े खेत में करें इन फली या सब्जियों की बुवाई

भारत के खेतों में मानसून की शुरुआत में बोयी गयी
खरीफ की फसलों को अक्टूबर महीने की शुरुआत में काटना शुरू कर दिया जाता है, पर यदि किसी कारणवश आपने खरीफ की फसल की बुवाई नहीं की है और जुलाई या अगस्त महीने के बीत जाने के बाद सितंबर में किसी फसल के उत्पादन के बारे में सोच रहे हैं, तो आप कुछ फसलों का उत्पादन कर सकते है, जिन्हें मुख्यतः सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

मानसून में बदलाव :

सितंबर महीने के पहले या दूसरे सप्ताह में भारत के लगभग सभी हिस्सों से मानसून लौटना शुरू हो जाता है और इसके बाद मौसम ज्यादा गर्म भी नहीं रहता और ना ही ज्यादा ठंडा रहता है। इस मौसम में किसी भी सीमित पानी की आवश्यकता वाली फसल की पौध को वृद्धि करने के लिए एक बहुत ही अच्छी जलवायु मिल सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस्तेमाल आने वाली सब्जियों की बुवाई मुख्यतः अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह या फिर सितंबर में की जाती है।

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  • मटर की खेती

 15 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में के साथ 400 मिलीमीटर की बारिश में तैयार होने वाली यह सब्जी दोमट और बलुई दोमट मिट्टी में उगाई जा सकती है। मानसून के समय अच्छी तरीके से पानी मिली हुई मिट्टी इसके उत्पादन को काफी बढ़ा सकती है।अपने खेत में दो से तीन बार जुताई करने के बाद इसके बीज को जमीन से 2 से 3 सेंटीमीटर के अंदर दबाकर उगाया जा सकता है।
मटर की खेती से संबंधित पूरी जानकारी और बीमारियों से इलाज के लिए यह भी देखें : जानिए मटर की बुआई और देखभाल कैसे करें
  • पालक की खेती

वर्तमान में उत्तरी भारत में पालक के लगभग सभी किसानों के द्वारा हाइब्रिड यानी कि संकर बीज का इस्तेमाल किया जाता है। 40 से 50 दिन में पूरी तरह से तैयार होने वाली यह सब्जी किसी भी प्रकार की मिट्टी में आसानी से उगाई जा सकती है, हालांकि इसकी पौध लगाने से पहले किसानों को मिट्टी की अम्लता की जांच जरूर कर लेनी चाहिए। 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड के मध्य बेहतर उत्पादन देने वाली यह सब्जी पतझड़ के मौसम में सर्वाधिक वृद्धि दिखाती है। प्रति हेक्टेयर 20 से 30 किलोग्राम बीज की मात्रा से बुवाई करने के तुरंत बाद खेत की सिंचाई कर देनी चाहिए।
पालक की खेती के दौरान खेत को तैयार करने की विधि और इस फसल में लगने वाले रोगों से निदान के बारे में 
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  • पत्ता गोभी की खेती

सितंबर महीने के पहले या दूसरे सप्ताह में शुरुआत में नर्सरी में पौध उगाकर 20 से 40 दिन में खेत में पौध को स्थानांतरित कर उगायी जा सकने वाली यह सब्जी भारत में लगभग पूरे वर्ष भर इस्तेमाल की जाती है। 70 से 80 दिनों के अंतर्गत पूरी तरह तैयार होने वाली यह फसल पोषक तत्वों से भरपूर और अच्छी सिंचाई वाली मिट्टी में आसानी से बेहतरीन उत्पादकता प्रदान कर सकती है। ड्रिप सिंचाई विधि तथा उर्वरकों के सीमित इस्तेमाल से इस फसल की पत्तियों की ग्रोथ काफी तेजी से बढ़ती है। 15 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में तैयार होने वाली यह सब्जी की फसल जब तक कुछ पत्तियां नहीं निकालती है, अच्छी मात्रा में पानी की मांग करती है। इस फसल की खास बात यह है कि इससे बहुत ही कम जगह में अधिक पैदावार की जा सकती है, क्योंकि इसके दो पौध के मध्य की दूरी 30 सेंटीमीटर तक रखनी होती है, इस वजह से एक हेक्टेयर में लगभग 20 हज़ार से 40 हज़ार छोटी पौध लगायी जा सकती है।
पत्ता गोभी फसल तैयार करने की संपूर्ण जानकारी और इसकी वृद्धि के दौरान होने वाले रोगों के निदान के लिए,
यह भी देखें : पत्ता गोभी की खेती की सम्पूर्ण जानकारी
  • बैंगन की खेती

भारत में अलग-अलग नामों से उगाई जाने वाली यह सब्जी 15 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान के मध्य अच्छी उत्पादकता प्रदान करती है। हालांकि, इस सब्जी की खेती खरीफ और रबी की फसल के अलावा पतझड़ के समय भी की जाती है। अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में उगने वाली यह फसल अम्लीय मिट्टी में सर्वाधिक प्रभावी साबित होती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्र में बैंगन उत्पादित करने के लिए लगभग 400 से 500 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। इन बीजों को पहले नर्सरी में तैयार किया जाता है और उसके बाद खेत को अच्छी तरीके से तैयार कर 50 सेंटीमीटर की दूरी रखते हुए बुवाई जाती है। ऑर्गेनिक खाद और रासायनिक उर्वरकों के सीमित इस्तेमाल से 8 से 10 दिन के अंतराल पर बेहतरीन सिंचाई की मदद से भारत के किसान काफी मुनाफा कमा रहे है।
बैंगन की फसल से जुड़ी हुई अलग-अलग किस्म और वैज्ञानिकों के द्वारा जारी की गई नई विधियों की संपूर्ण जानकारी के लिए, 
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  • मूली की खेती

सितंबर से लेकर अक्टूबर के महीनों में उगाई जाने वाली यह सब्जी बहुत ही जल्दी तैयार हो सकती है। पिछले कुछ समय में बाजार में बढ़ती मांग की वजह से इस फसल का उत्पादन करने वाले किसान काफी अच्छा मुनाफा कमा रहे है। 15 से 20 सेंटीग्रेड के तापमान में अच्छी उत्पादकता देने वाली यह फसल उपजाऊ बलुई दोमट मिट्टी में अपनी अलग-अलग किस्मों के अनुसार प्रभावी साबित होती है। किसान भाई कृषि विज्ञान केंद्र से अपनी खेत की मिट्टी की अम्लीयत या क्षारीयता की जांच अवश्य कराएं, क्योंकि इस फसल के उत्पादन के लिए खेत की पीएच लगभग 6.5 से 7.5 के मध्य होनी चाहिए। सितंबर के महीने में अच्छी तरीके से खेत को तैयार करने के बाद गोबर की खाद का इस्तेमाल कर, 10 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की बुवाई करते हुए उचित सिंचाई प्रबंधन के साथ अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।
मूली की फसल में लगने वाले कई प्रकार के रोग और इसकी अलग-अलग किस्मों की जलवायु के साथ उत्पादकता का पता लगाने के लिए, 
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  • लहसुन की खेती

ऊटी 1 और सिंगापुर रेड तथा मद्रासी नाम की अलग-अलग किस्म के साथ उगाई जाने वाली लहसुन की फसल लगभग 12 से 25 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में बोयी जाती है। पोषक तत्वों से भरपूर और अच्छी तरह से सिंचाई की हुई मिट्टी इस फसल की उत्पादकता के लिए सर्वश्रेष्ठ साबित होती है। प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में 500 से 600 किलोग्राम बीज के साथ उगाई जाने वाली यह खेती कई प्रकार के रोगों के खिलाफ स्वतः ही कीटाणुनाशक की तरह बर्ताव कर सकती है। बलुई और दोमट मिट्टी में प्रभावी साबित होने वाली यह फसल भारत में आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के अलावा गुजरात राज्य में उगाई जाती है। वर्तमान में भारतीय किसानों के द्वारा लहसुन की गोदावरी और श्वेता किस्मों को काफी पसंद किया जा रहा है। इस फसल का उत्पादन जुताई और बिना जुताई वाले खेतों में किया जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्र वाले इलाकों में सितंबर के महीने को लहसुन की बुवाई के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, जबकि समतल मैदानों में इसकी बुवाई अक्टूबर और नवंबर महीने में की जाती है।
लहसुन की फसल से जुड़ी हुई अलग-अलग किस्म और जलवायु के साथ उनकी प्रभावी उत्पादकता को जानने के अलावा,
इस फसल में लगने वाले रोगों के निदान के लिए यह भी देखें : लहसुन को कीट रोगों से बचाएं
भारत के किसान भाई इस फसल के बारे में कम ही जानकारी रखते है, परंतु अरुगुला (Arugula) सब्जी से होने वाली उत्पादकता से कम समय में काफी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसे भारत में गारगीर (Gargeer) के नाम से जाना जाता है।यह एक तरीके से पालक के जैसे ही दिखने वाली सब्जी की फसल होती है जो कि कई प्रकार के विटामिन की कमी को दूर कर सकती है। पिछले कुछ समय से उत्तरी भारत के कुछ राज्यों में इस सब्जी की डिमांड बढ़ने की वजह से कई युवा किसान इसका उत्पादन कर रहे है। सितंबर महीने के दूसरे सप्ताह में बोई जाने वाली यह सब्जी वैसे तो किसी भी प्रकार की मिट्टी में अच्छा उत्पादन दे सकती है, परंतु यदि मिट्टी की ph 7 से अधिक हो तो यह अधिक प्रभावी साबित होती है। पानी के सीमित इस्तेमाल और जैविक खाद की मदद से इस फसल की वृद्धि दर को काफी तेजी से बढ़ाया जा सकता है। इस सब्जी की फसल की छोटी पौध 7 से 10 दिन में अंकुरित होना शुरू हो जाती है। बहुत ही कम खर्चे पर तैयार होने वाली यह फसल 30 दिन में पूरी तरीके से तैयार हो सकती है। दक्षिण भारत के राज्यों में इसकी बुवाई सितंबर महीने के दूसरे सप्ताह में शुरू हो जाती है, जबकि उत्तरी भारत में यह अक्टूबर महीने के पहले सप्ताह में बोयी जाती है। इस फसल के उत्पादन में बहुत ही कम सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है परंतु फिर भी नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम के सीमित इस्तेमाल से उत्पादकता को 50% तक बढ़ाया जा सकता है।


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आशा करते हैं कि Merikheti.com के द्वारा किसान भाइयों को सितंबर महीने में बुवाई कर उत्पादित की जा सकने वाली फसलों के बारे में दी गई यह जानकारी पसंद आई होगी और यदि आप भी किसी कारणवश खरीफ की फसल का उत्पादन नहीं कर पाए है तो खाली पड़ी हुई जमीन में इन सब्जी की फसलों का उत्पादन कर कम समय में अच्छा मुनाफा कमा सकेंगे।
गुजरात में गोबर-धन से मिलेगी क्लीन एनर्जी, एनडीडीबी और सुजुकी ने मिलाया हाथ

गुजरात में गोबर-धन से मिलेगी क्लीन एनर्जी, एनडीडीबी और सुजुकी ने मिलाया हाथ

आम तौर पर खेती करने वाले लोग कृषि क्षेत्र में गाय के गोबर का उपयोग करते हुए नजर आते हैं, क्योंकि गाय के गोबर से बने हुए खाद में मौजूद पोषक तत्व फसल के उपज को बढ़ाव देते हैं। मानव सभ्यता के जन्म से ही गाय के गोबर का उपयोग प्राकृतिक खाद के रूप में किया जाता रहा है। व्यापक पैमाने पर अब गाय के गोबर से जैविक खाद बनाई जा रही है, दूसरी तरफ देश का प्रमुख राज्य गुजरात गाय के गोबर से स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खाद को बढ़ावा देने के लिए जबरदस्त रणनीति तैयार कर रहा हैं। बीते दिनों नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड यानी एनडीडीबी (राष्‍ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (NDDB - National Dairy Development Board)) और जापानी कार निर्माता कंपनी सुजुकी (Suzuki) ने साथ मिलकर दो बायोगैस संयंत्र (Biogas plant) बनाने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है।

गुजरात में दो बायोगैस प्लांट लगाने की तैयारी

इस वर्ष सुजुकी का भारत में 40 साल पूरे होने पर पिछले दिनों गुजरात में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल भी मौजूद थे। इस कार्यक्रम में एनडीडीबी और सुजुकी के बीच दो बायोगैस प्लांट बनाने को लेकर एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। गुजरात पहले से ही रीन्यूएबल और क्लीन एनर्जी (Renewable and Clean Energy) उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी रहा है।


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राज्य में सौर ऊर्जा विकल्पों पर भी काफी काम किया गया है| अब, गोबर गैस प्लांट यानी बायो गैस उत्पादन के जरिये एक बार फिर गुजरात पूरे देश के लिए एक मिसाल बन कर सामने उभरेगा। गौरतलब है की देश में जितनी बड़ी संख्या में दुधारू पशुओं की संख्या है और आम लोग भी जितनी बड़ी संख्या में पशुपालन के कार्य से जुड़े हुए हैं, उसे देखते हुए अगर गोबर गैस प्लांट के विकल्प पर इसी संजीदगी से हर राज्य विचार करे, तो देश रीन्यूएबल एवं क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की क्षमता रखता है।

कई राज्यों ने शुरू कर दिया है पशुपालकों से गोबर खरीदने का काम

बीते दिनों छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने भी यह घोषणा की थी कि राज्य सरकार पशुपालकों से गाय का गोबर खरीदेगी। सरकार इस योजना का विस्तार अब अनेक शहरों में भी कर रही हैं क्योकि गाय का गोबर एक सस्ता और आसानी से उपलब्ध जैव संसाधन है। गाय के गोबर में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने की प्राकृतिक क्षमता होती है। वास्तव में छतीसगढ़ की सरकार राज्य में लगभग 500 से अधिक बॉयोगैस प्लांट स्थापित करने की योजना पर पहल कर रही हैं।
दिल्ली सरकार ने की लम्पी वायरस से निपटने की तैयारी, वैक्सीन खरीदने का आर्डर देगी सरकार

दिल्ली सरकार ने की लम्पी वायरस से निपटने की तैयारी, वैक्सीन खरीदने का आर्डर देगी सरकार

देश में लम्पी वायरस ( Lumpy Virus ) कहर मचा रहा है। इस बीमारी के कारण देश में अब तक लाखों मवेशी मारे जा चुके हैं। लम्पी वायरस का सबसे ज्यादा कहर राजस्थान में देखने को मिला है, जहां पर इस वायरस की वजह से रातों रात लाखों गायों ने दम तोड़ दिया। इसके साथ ही राजस्थान की सीमा से लगने वाले राज्यों में भी इस वायरस का प्रकोप देखा जा रहा है। इस वायरस ने दिल्ली को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे दिल्ली के किसान बेहद चिंतित हैं। इसके समाधान के लिए अब दिल्ली सरकार ने पहल शुरू कर दी है। इसके तहत दिल्ली सरकार 60 हजार गोट पॉक्स वैक्सीन ( Goat Pox Vaccine ) खरीदने जा रही है। इसकी जानकारी दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री गोपाल राय ने दी थी। उन्होंने बताया कि लम्पी वायरस दिल्ली में तेजी से फ़ैल रहा है। अभी तक दिली में इस वायरस के 173 मामले दर्ज किये जा चुके हैं जो बेहद चिंता का विषय है। दिल्ली में लम्पी वायरस के सभी मामले दक्षिण-पश्चिम दिल्ली से सामने आये हैं जहां इस वायरस का प्रकोप दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। सरकारी पशु चिकित्स्कों के साथ दिल्ली सरकार की टीम ने गोयला डेयरी, घुम्मनहेड़ा, नजफगढ और रेवला खानपुर इलाके से लम्पी वायरस के ये मामले दर्ज किये हैं। इन इलाकों में बहुत सारी गौशालाएं मौजूद हैं जहां पर हजारों की तादाद में गायें रहती हैं।


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दिल्ली सरकार में कैबिनेट मंत्री गोपाल राय ने बताया कि दिल्ली में लगभग 80 हजार गायें हैं। इस हिसाब से सरकार ने कैलकुलेशन करके 60 हजार गोट पॉक्स वैक्सीन खरीदने की योजना बनाई है। ताकि जल्द से जल्द राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की गायों को लम्पी वायरस से सुरक्षित किया जा सके। गोपाल राय ने बताया कि वैक्सीन खरीददारी अपने अंतिम दौर में है और दवा कम्पनी की तरफ से जल्द से जल्द दिल्ली सरकार को वैक्सीन उपलब्ध करवा दी जाएंगी। गोपाल राय ने बताया कि सरकार इस वायरस से निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इसके तहत दिल्ली सरकार ने वायरस की रोकथाम में के लिए सैम्पल लेने प्रारम्भ कर दिए हैं और सैम्पलों की जांच जल्दी से जल्दी की जा रही है ताकि समय रहते गायों में वायरस का पता लगाया जा सके। इसके लिए सरकार ने वायरस के नमूने इकट्ठे करने के लिए दो मोबाइल पशु चिकित्सालय भी तैनात किए हैं जो जगह-जगह पर जाकर पशुओं से सैंपल एकत्रित करके जांच के लिए भेज रहे हैं। इसके साथ ही सरकार ने वायरस से निपटने के लिए ग्यारह रैपिड रिस्पांस टीमों का गठन किया है। साथ ही कई अन्य लोगों को नियुक्त किया है जो समूह में जाकर गौ पालकों को लम्पी वायरस से होने वाले नुकसान के बारे में जागरुक करेंगे। गोपाल राय ने बताया कि सरकार ने इस बीमारी से सम्बंधित गौ पालकों और किसानों की समस्याओं को सुनने के लिए एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है। किसान 8287848586 में फ़ोन करके वायरस से सम्बंधित अपनी शंकाओं का समाधान कर सकते हैं। इसके लिए सरकार ने एक अलग से कार्यालय बनाया है जहां पर इसका कॉल सेंटर स्थापित किया गया है।


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पशुओं में फैलने वाला यह लम्पी रोग देश के कई राज्यों में तेजी से पैर पसार रहा है। अभी तक देश के 12 से अधिक राज्यों में 15 लाख से ज्यादा पशु इस रोग से संक्रमित हो चुके हैं। साथ ही हजारों पशुओं की इस वायरस की वजह से मौत हो चुकी है। इसका कहर मुख्यतः राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और दिल्ली में देखने को मिल रहा है। हालांकि कई प्रदेशों की सरकारों ने वैक्सीनेशन की रफ़्तार तेज करके इस रोग पर काबू पाने का भरसक प्रयास किया है। फिलहाल सबसे ज्यादा वैक्सीनेशन राजस्थान में किया जा रहा है क्योंकि इस वायरस की वजह से राजस्थान सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है।

क्या है लम्पी वायरस और यह कैसे फैलता है ?

विशेषज्ञों ने बताया है कि लम्पी वायरस एक त्वचा रोग है। यह पशुओं के बीच तेजी से फैलता है। इस वायरस के माध्यम से स्वस्थ्य पशु, संक्रमित पशु के संपर्क में आने के बाद तुरंत ही संक्रमित हो जाता है। इसके अलावा यह वायरस मच्छरों, मक्खियों, जूं और ततैया के माध्यम से भी फैलता है, क्योंकि इनकी वजह से स्वस्थ्य पशुओं का बीमार पशुओं के साथ संपर्क स्थापित हो जाता है। इसके अलावा यह वायरस पशुओं के एक ही पात्र में पानी पीने से भी तेजी से फैलता है। इस वायरस से संक्रमित होने के बाद मवेशियों में तेज बुखार, आंखों से पानी आना, नाक से पानी निकलना, त्वचा की गांठें और दुग्ध उत्पादन में कमी हो जाना जैसे लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं जो बेहद चिंता का विषय है, क्योंकि इस वायरस से संक्रमित होने के बाद पशु बहुत जल्दी दम तोड़ देते हैं।


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लम्पी वायरस के बढ़ते प्रकोप के कारण देश में हजारों मवेशी प्रतिदिन मारे जा रहे हैं, जिससे देश में जानवरों की कमी हो सकती है। इसका सीधा असर देश में दुग्ध उत्पादन पर पड़ेगा। अगर ऐसा ही चलता रहा तो कुछ दिनों बाद भारत में दूध की कमी महसूस की जाने लगेगी, जो सरकार के लिए एक नया सिरदर्द साबित हो सकती है। क्योंकि दुग्ध उत्पादन में कमी के बाद दूध के दामों में तेजी से बढ़ोत्तरी संभव है और यह बाजार में ग्राहकों को प्रभावित करेगी।