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सरसों की खेती से होगी धन की बरसात, यहां जानिये वैज्ञानिक उपाय जिससे हो सकती है बंपर पैदावार

सरसों की खेती से होगी धन की बरसात, यहां जानिये वैज्ञानिक उपाय जिससे हो सकती है बंपर पैदावार

सरसों (Mustard; sarson) भारत में एक प्रमुख तिलहन की फसल है, इसकी खेती ज्यादातर उत्तर भारत में की जाती है। इसके साथ ही उत्तर भारत में सरसों के तेल का बहुतायत में इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि भारत तिलहन का बहुत बड़ा आयातक देश है, इसलिए सरकार भारत में तिलहन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हमेशा प्रयासरत रहती है। सरकार ने पिछले कुछ सालों में सरसों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी का ज्यादा से ज्यादा प्रयास किया है ताकि भारत को तिलहन उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाया जा सके। सरसों की खेती रबी सीजन में की जाती है, इस फसल की खेती में ज्यादा संसाधन नहीं लगते और न ही इसमें ज्यादा सिंचाई की जरुरत होती है। एक आम और छोटा किसान कम संसाधनों के साथ भी सरसों की खेती कर सकता है। लेकिन अगर हम पिछले कुछ समय को देखें तो जलवायु परिवर्तन और मौसम की भीषण मार का असर सरसों की खेती पर भी हुआ है, जिसके कारण उत्पादन में कमी आई है और खेती लागत बढ़ती जा रही है। ऐसे में यदि किसान सरकार द्वारा बताये गए वैज्ञानिक उपायों का इस्तेमाल करते हैं, तो वो इस घाटे की भरपाई आसानी से कर सकते हैं।


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किन-किन राज्यों में होती है सरसों की खेती

भारत में कुछ राज्यों में सरसों की खेती बहुतायत में होती है। इनमें पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और गुजरात का नाम शामिल है। इन राज्यों की जलवायु और मिट्टी सरसों की खेती के अनुकूल है और राज्य के किसान भी खेती करना पसंद करते हैं।

मिट्टी की जांच किस प्रकार से करें

किसी भी फसल की खेती में मिट्टी सबसे महत्वपूर्ण घटक है। इसलिए किसान को चाहिए कि सबसे पहले वह अपने खेत की मिट्टी की प्रयोगशाला में जांच करवायें, ताकि उसे मिट्टी की कमियों, संरचना और इसकी जरूरतों का पता चल सके। मिट्टी की जांच के पश्चात किसानों को इसका रिपोर्ट कार्ड दिया जाता है, जिसे मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) कहते हैं। इसमें मिट्टी के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के बारे में सम्पूर्ण जानकारी होती है। कार्ड में दी गई जानकारी के अनुसार ही निश्चित मात्रा में खाद-उर्वरक, बीज और सिंचाई करने की सलाह किसानों को दी जाती है। यह वैज्ञानिक तरीका सरसों की पैदावार को कई गुना तक बढ़ा सकता है।

सरसों की बुवाई

भारत में सरसों की बुवाई प्रारम्भ हो चुकी है। वैसे तो सरसों की बुवाई अक्टूबर से लेकर दिसंबर तक की जा सकती है। लेकिन यदि इस फसल की बुवाई 5 अक्टूबर से लेकर 25 अक्टूबर के मध्य की जाए, तो बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। सरसों की बुवाई करने के पहले खेत को पर्याप्त गहराई तक अच्छी तरह से जुताई करनी चाहिए। इसके बाद हैप्पी सीडर या जीरो टिल बेड प्लांटर के माध्यम से 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सरसों के उन्नत बीजों की बुवाई करनी चाहिए।


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बाजार में उपलब्ध सरसों की उन्नत किस्में

भारतीय बाजार में वैसे तो सरसों की उन्नत किस्मों की लम्बी रेंज उपलब्ध है। लेकिन इन दिनों आरजीएन 229, पूसा सरसों 29, पूसा सरसों 30, सरसों की पीबीआर 357, कोरल पीएसी 437, पीडीजेड 1, एलईएस 54, जीएससी-7 (गोभी सरसों) किस्में को किसान बेहद पसंद कर रहे हैं। इसलिए सरसों के इन किस्मों के बीजों की बाजार में अच्छी खासी मांग है।

सरसों की फसल में सिंचाई किस प्रकार से करें

सरसों वैसे तो विपरीत परिस्तिथियों में उगने वाली फसल है। फिर भी यदि सिंचाई का साधन उपलब्ध है तो इस फसल के लिए 2-3 सिंचाई पर्याप्त होती हैं। इस फसल में पहली बार सिंचाई बुवाई के 35 दिनों बाद की जाती है, इसके बाद यदि जरुरत महसूस हो तो दूसरी सिंचाई पेड़ में दाना लगने के दौरान की जा सकती है। किसानों को इस बात के विशेष ध्यान रखना होगा कि जिस समय सरसों के पेड़ में फूल लगने लगें, उस समय सिंचाई न करें। यह बेहद नुकसानदायक साबित हो सकता है और इसके कारण बाद में किसानों को उम्दा क्वालिटी की सरसों प्राप्त नहीं होगी।

ध्यान देने वाली अन्य चीजें

सरसों की खेती में खरपतवार की समस्या एक बड़ी समस्या है। इससे निपटने के लिए किसानों को खेत की निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। साथ ही यदि खेत में खरपतवार जरुरत से ज्यादा बढ़ गया है, तो किसानों को परपैंडीमेथालीन (30 EC) की एक लीटर मात्रा 400 लीटर पानी में घोलकर खेत में स्प्रे के माध्यम से छिड़कना चाहिए। ऐसा करने से किसानों को खरपतवार से निजात मिलेगी। अगर किसान चाहें तो खेत की जुताई करते समय मिट्टी में खरपतवारनाशी मिला सकते हैं ताकि बाद में परपैंडीमेथालीन के छिड़काव की जरुरत ही न पड़े। सरसों की फसल में माहूं या चेंपा कीट के आक्रमण की संभावना बनी रहती है। ये कीट फसल को पूरी तरह से बर्बाद कर सकते हैं, इनकी रोकथाम के लिए किसान बाजार में उपलब्ध बढ़िया कीटनाशक का छिड़काव कर सकते हैं। यदि किसान सरसों की खेती के साथ मधुमक्खी का पालन करते हैं तो उन्हें रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग से बचना चाहिए। रासायनिक कीटनाशकों की जगह पर वो नीम के तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं, इसके लिए 5 मिली लीटर नीम के तेल को 1 लीटर पानी के साथ मिश्रित करें और उसका खेत में छिड़काव करें।
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सरसों की फसल में अच्छी पैदावार के लिए खेत की मेढ़ों पर मधुमक्खी पालन के डिब्बे जरूर रखें। मधुमक्खियां फसल की मित्र कीट होती है, जो पॉलीनेशन में मदद करती हैं, इससे उत्पादन में बढ़ोत्तरी संभव है। इसके साथ ही किसानों को मधुमक्खी पालन से अतिरिक्त आमदनी हो सकती है। सरसों की खेती में कुछ और चीजें ध्यान देने की जरुरत होती है, जैसे- जब सरसों के पेड़ में फलियां लगने लगें तब पेड़ के तने के निचले भाग की पत्तियों को हटा दें, इससे फसल की देखभाल आसानी से हो सकेगी और पूरा का पूरा पोषण पेड़ के ऊपरी भाग को मिलेगा। इसके साथ ही यदि ठंड के कारण फसल में पाला लगने की आशंका हो, तो 250 ग्राम थायोयूरिया को 200 लीटर पानी में घोलकर फसल के ऊपर छिड़काव कर दें। यह वैज्ञानिक उपाय करने के बाद फसल में पाला लगने की संभावना खत्म हो जाएगी।
इस वैज्ञानिक विधि से करोगे खेती, तो यह तिलहन फसल बदल सकती है किस्मत

इस वैज्ञानिक विधि से करोगे खेती, तो यह तिलहन फसल बदल सकती है किस्मत

पिछले कुछ समय से टेक्नोलॉजी में काफी सुधार की वजह से कृषि की तरफ रुझान देखने को मिला है और बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों को छोड़कर आने वाले युवा भी, अब धीरे-धीरे नई वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से भारतीय कृषि को एक बदलाव की तरफ ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

जो खेत काफी समय से बिना बुवाई के परती पड़े हुए थे, अब उन्हीं खेतों में अच्छी तकनीक के इस्तेमाल और सही समय पर अच्छा मैनेजमेंट करने की वजह से आज बहुत ही उत्तम श्रेणी की फसल लहलहा रही है। 

इन्हीं तकनीकों से कुछ युवाओं ने पिछले 1 से 2 वर्ष में तिलहन फसलों के क्षेत्र में आये हुए नए विकास के पीछे अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। तिलहन फसलों में मूंगफली को बहुत ही कम समय में अच्छी कमाई वाली फसल माना जाता है।

पिछले कुछ समय से बाजार में आई हुई हाइब्रिड मूंगफली का अच्छा दाम तो मिलता ही है, साथ ही इसे उगाने में होने वाले खर्चे भी काफी कम हो गए हैं। केवल दस बीस हजार रुपये की लागत में तैयार हुई इस हाइब्रिड मूंगफली को बेचकर अस्सी हजार रुपये से एक लाख रुपए तक कमाए जा सकते हैं।

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इस कमाई के पीछे की वैज्ञानिक विधि को चक्रीय खेती या चक्रीय-कृषि के नाम से जाना जाता है, जिसमें अगेती फसलों को उगाया जाता है। 

अगेती फसल मुख्यतया उस फसल को बोला जाता है जो हमारे खेतों में उगाई जाने वाली प्रमुख खाद्यान्न फसल जैसे कि गेहूं और चावल के कुछ समय पहले ही बोई जाती है, और जब तक अगली खाद्यान्न फसल की बुवाई का समय होता है तब तक इसकी कटाई भी पूरी की जा सकती है। 

इस विधि के तहत आप एक हेक्टर में ही करीब 500 क्विंटल मूंगफली का उत्पादन कर सकते हैं और यह केवल 60 से 70 दिन में तैयार की जा सकती है।

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मूंगफली को मंडी में बेचने के अलावा इसके तेल की भी अच्छी कीमत मिलती है और हाल ही में हाइब्रिड बीज आ जाने के बाद तो मूंगफली के दाने बहुत ही बड़े आकार के बनने लगे हैं और उनका आकार बड़ा होने की वजह से उनसे तेल भी अधिक मिलता है। 

चक्रीय खेती के तहत बहुत ही कम समय में एक तिलहन फसल को उगाया जाता है और उसके तुरंत बाद खाद्यान्न की किसी फसल को उगाया जाता है। जैसे कि हम अपने खेतों में समय-समय पर खाद्यान्न की फसलें उगाते हैं, लेकिन एक फसल की कटाई हो जाने के बाद में बीच में बचे हुए समय में खेत को परती ही छोड़ दिया जाता है, लेकिन यदि इसी बचे हुए समय का इस्तेमाल करते हुए हम तिलहन फसलों का उत्पादन करें, जिनमें मूंगफली सबसे प्रमुख फसल मानी जाती है।

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भारत में मानसून मौसम की शुरुआत होने से ठीक पहले मार्च में मूंगफली की खेती शुरू की जाती है। अगेती फसलों का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इन्हें तैयार होने में बहुत ही कम समय लगता है, साथ ही इनकी अधिक मांग होने की वजह से मूल्य भी अच्छा खासा मिलता है। 

इससे हमारा उत्पादन तो बढ़ेगा ही पर साथ ही हमारे खेत की मिट्टी की उर्वरता में भी काफी सुधार होता है। इसके पीछे का कारण यह है, कि भारत की मिट्टि में आमतौर पर नाइट्रोजन की काफी कमी देखी जाती है और मूंगफली जैसी फसलों की जड़ें नाइट्रोजन यौगिकीकरण या आम भाषा में नाइट्रोजन फिक्सेशन (Nitrogen Fixation), यानी कि नाइट्रोजन केंद्रीकरण का काम करती है और मिट्टी को अन्य खाद्यान्न फसलों के लिए भी उपजाऊ बनाती है। 

इसके लिए आप समय-समय पर कृषि विभाग से सॉइल हेल्थ कार्ड के जरिए अपनी मिट्टी में उपलब्ध उर्वरकों की जांच भी करवा सकते हैं।

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मूंगफली के द्वारा किए गए नाइट्रोजन के केंद्रीकरण की वजह से हमें यूरिया का छिड़काव भी काफी सीमित मात्रा में करना पड़ता है, जिससे कि फर्टिलाइजर में होने वाले खर्चे भी काफी कम हो सकते हैं। 

इसी बचे हुए पैसे का इस्तेमाल हम अपने खेत की यील्ड को बढ़ाने में भी कर सकते हैं। यदि आपके पास इस प्रकार की हाइब्रिड मूंगफली के अच्छे बीज उपलब्ध नहीं है तो उद्यान विभाग और दिल्ली में स्थित पूसा इंस्टीट्यूट के कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती है जिसमें बताया जाता है कि आपको किस कम्पनी की हाइब्रिड मूंगफली का इस्तेमाल करना चाहिए। 

समय-समय पर होने वाले किसान चौपाल और ट्रेनिंग सेंटरों के साथ ही दूरदर्शन के द्वारा संचालित डीडी किसान चैनल का इस्तेमाल कर, युवा लोग मूंगफली उत्पादन के साथ ही अपनी स्वयं की आर्थिक स्थिति तो सुधार ही रहें हैं, पर इसके अलावा भारत के कृषि क्षेत्र को उन्नत बनाने में अपना भरपूर सहयोग दे रहे हैं। 

आशा करते हैं कि मूंगफली की इस चक्रीय खेती विधि की बारे में Merikheti.com कि यह जानकारी आपको पसंद आई होगी और आप भी भारत में तिलहन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के अलावा अपनी आर्थिक स्थिति में भी सुधार करने में सफल होंगे।

कहां कराएं मिट्टी के नमूने की जांच

कहां कराएं मिट्टी के नमूने की जांच

जमीन की सेहत लगातार बिगड़ रही है।इसका प्रमुख कारण यह है कि किसान भाई पिछले कुछ दशकों में खेती में कार्बनिक खादों का प्रयोग बंद प्रायः कर चुके हैं। जमीन से लगातार फसलें ली जा रही हैं। दावेदार फैसले लेने से जमीन की उपज क्षमता लगातार प्रभावित हुई है। देश के हर राज्य में एवं जिला मुख्यालय स्तर पर मृदा नमूना जांचने के लिए प्रयोगशाला स्थापित है जहां किसान अपनी नमूने की जांच निशुल्क या अधिकतम 5-7 रुपए मैं करा सकते हैं। वेस्ट बंगाल में 48, उत्तराखंड में 44, यूपी में 180, त्रिपुरा में 21, तेलंगाना में 64, तमिलनाडु में 321, आंध्र प्रदेश में 951, पंजाब में 149 ,हरियाणा में 65 मृदा परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित हैं। देश के अन्य राज्यों में भी इसी तरह प्रयोगशाला स्थापित हैं।

 

जिला स्तर पर प्रयोगशाला कहां पर स्थित है उसकी जानकारी farmer.gov.in पोर्टल पर जाकर राज्यवार ली जा सकती है। इसके अलावा जिला मुख्यालय पर स्थित जिला कृषि अधिकारी एवं उप कृषि निदेशक कार्यालय तथा कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से जानकारी लेकर नमूना दिया जा सकता है। इतना ही नहीं उर्वरक कंपनी इफको एवं क्रभको के केंद्रों पर भी म्रदा जांच की व्यवस्था कई जगह रहती है। भारत सरकार के फार्मर पोर्टल पर दिए गए विवरण के अनुसार देश में 3887 मृदा परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित हैं। मृदा परीक्षण के लिए कई इलाकों में प्राइवेट लोगों ने भी प्रयोगशाला स्थापित की हैं जहां 50 से ₹100 में मृदा नमूने की जांच कराई जा सकती है। 

अच्छे रोजगार का है माध्यम

मृदा परीक्षण का काम रोजगार के नजरिए से भी काफी अच्छा है। ₹25000 से ₹50000 के सेटअप के माध्यम से मृदा परीक्षण प्रयोगशाला शुरू की जा सकती है। पूसा संस्थान नई दिल्ली द्वारा विकसित मृदा परीक्षण किट तकनीकी प्राइवेट कंपनियों को दी जा चुकी है । यह कंपनी एक छोटी सी किट गो मार्केट में उतार चुकी हैं। स्केट के माध्यम से दिन में 100 से 200 नमूनों की जांच की जा सकती है। 

सोयल हेल्थ कार्ड को लेकर भ्रम

सॉइल हेल्थ कार्ड किसी क्षेत्र विशेष में कृषि विभाग के लोगों द्वारा खुद-ब-खुद लिए गए नमूनों के आधार पर तैयार किए जाते हैं। इस कार्ड को बनाने के पीछे और नमूना लेने के पीछे सिर्फ यही उद्देश्य है के देश के हर गांव और क्षेत्र की मृदा में मौजूद तत्वों की स्थिति का पता सरकार को रहे। हर किसान को कार्ड देना इस स्कीम में सरकार का उद्देश्य नहीं है।

घर पर मिट्टी के परीक्षण के चार आसान तरीके

घर पर मिट्टी के परीक्षण के चार आसान तरीके

किसान भाइयों आप यह तो जानते ही हैं कि मिट्टी अच्छी हो तो फसल अधिक हो सकती है। मिट्टी की कमियों को दूर करके फसल उगायी जायेगी तो अधिक फायदा होगा। सरकार ने मृदा परीक्षण के लिए सेंटर खोल दिये हैं, उसके लिये किसान भाइयों को अपने जरूरी काम छोड़ कर सरकारी सेंटरों तक आने-जाने की दौड़ भाग करनी होती है। यदि यही मृदा परीक्षण का काम घर पर आसान तरीकों से हो जाये तो फिर कहना ही क्या? आज हम आपके लिए वो चार आसान तरीके लेकर आये हैं, जिनसे आप घर बैठे अपनी मिट्टी यानी मृदा का परीक्षण कर सकते हैं।

मिट्टी के परीक्षण के चार आसान तरीके:

प्रथम चरण

मृदा में  पानी को सोखने की क्षमता, अम्लीय या खनिज तत्व की कमी या अधिकता की जानकारी मिल जाने से किसान भाई किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति से बच सकते हैं। आम तौर पर तीन तरह की मिट्टी होती है। चिकनी मिट्टी, रेतीली मिट्टी या दोमट मिट्टी होती है। 1.चिकनी मिट्टी में पोषक तत्व अधिक होते हैं लेकिन इसमें पानी देर तक बना रहता है। 2.रेतीली मिट्टी में पानी जल्दी से निकल जाता है लेकिन इसमें खनिज तत्व कम होते हैं और क्षारीय होती है। 3.दोमट मिट्टी खेती के लिए सबसे अधिक उपजाऊ होती है। इसमें खनिज तत्व अधिक होते हैं और पानी जल्दी सूख जाता है लेकिन नमी काफी देर तक बनी रहती है। इन मिट्टियों को कैसे पहचानें, पहले चरण में यह है कि आप अपनी मिट्टी गीली नहीं बल्कि नमी वाली मिट्टी हाथ में लें और उसे कसके निचोड़ने की कोशिश करें। जब आप हाथ खोलेंगे तो उसमें तीन तरह के परिणाम सामने आयेंगे उससे पहचान लेगें कि आपकी मिट्टी कौन सी है 1.पहला परिणाम होगा कि जैसे ही आप हाथ खोलेगें तो मिट्टी ढेला बना नजर आयेगा उसे हल्के से प्रहार करेंगे तो वह बिखर जायेगी लेकिन महीन नहीं होगी यानी छोटे-छोटे ढेले बने रहेंगे तो समझिये कि आपकी मिट्टी दोमट मिट्टी है जो खेती के लिए सबसे अधिक उपयोगी होती है। 2.दूसरा परिणाम यह होगा कि मिट्टी निचोड़ने के बाद हाथ खोलेंगे और मिट्टी के ढेले पर हल्का सा प्रहार करेंगे तो यह मिट्टी उस जगह से पिचक जायेगी यानी टूटेगी नहीं। ऐसी स्थिति किसान भाइयों को समझना चाहिये कि उनकी मिट्टी चिकनी मिट्टी है। 3.तीसरा परिणाम यह होगा कि हाथ खोलने के बाद जब मिट्टी के ढेले पर हल्का सा प्रहार करेंगे तो वह पूरी तरह से बिखर जायेगी यानी रेत बन जायेगी । इस तरह से आपकी मिट्टी का परीक्षण हो जायेगा। इसके बाद आपको यह समझना चाहिये कि आपकी मिट्टी कैसी है। मिट्टी में यदि कमियां हों तो उनका उपचार करके अपनी मनचाही फसल उगा सकते हैं। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=30hjGe10MIw&t[/embed]

दूसरा चरण

दूसरे चरण में आपको मिट्टी की जल निकासी की समस्या का परीक्षण करना बताया जा रहा है। खेती में जल निकासी का परीक्षण करना बहुत ही आवश्यक है। जलभराव से कई तरह के फसलों के पौधों की जड़ें सड़ जाती हैं और फसल नष्ट हो जाती है। मिट्टी की जलनिकासी का परीक्षण इस तरह से करें:- जो किसान भाई इस तरह का परीक्षण अपने खेत का करना चाहते हों तो उन्हें वहां पर छह इंच लम्बा और छह इंच चौड़ा तथा एक फुट गहरा गड्ढा खोदना चहिये। इस गड्ढे में पानी भर दें, पहली बार इसका पानी अपने आप निकलने दें। जब एक बार गड्ढे का पानी निकल जाये तो उसमें दोबारा पानी भर दें। इसके बाद उस गड्ढे पर नजर रखें तथा पानी डालने का टाइम नोट करना चाहिये। फिर उसका पानी निकलने का समय नोट करें। यदि पानी निकलने में चार घंटे से अधिक समय लगता है तो आपको समझना चाहिये कि आपकी इस मिट्टी में जल निकासी की समस्या है। यानी जल निकासी की गति काफी धीमी है। इसके बाद उस मिट्टी का उपचार कराना चाहिये। उसके बाद ही कोई फसल बोने की योजना बनानी चाहिये।

तीसरा चरण

अब तीसरे चरण के रूप में हम मिट्टी की उर्वरा शक्ति यानी उसकी जैविक शक्ति का परीक्षण करेंगे। मिट्टी की जैविक शक्ति उसकी उर्वरा शक्ति का परिचय देती है। इसका परीक्षण करके आप मिट्टी की जैविक गतिविधियों की परख कर सकते हैं। इससे आपको मालूम हो सकता है कि आपकी मिट्टी कितनी उपजाऊ  है। क्योंकि यदि आपकी मिट्टी में केंचुए हैं तो आपको यह समझना चाहिये कि आपकी मिट्टी में अन्य तरह के भी बैक्टीरिया व कीट भी हो सकते हैं। केंचुए और बैक्टीरिया तो आपकी खेती के लिए लाभकारी होते हैं और यह मिट्टी को स्वस्थ और उपजाऊ बनाने में मदद करते हैं लेकिन रोगाणु कीट आपकी फसल को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। उनका उपचार आपको पहले से ही करना होगा। 1.जैविक शक्ति का परीक्षण करने के लिए आप यह तय करें कि आपकी मिट्टी कम से कम 55 डिग्री तक गर्म हो गई है। उस स्थिति में मिट्टी में नमी है तब आप मिट्टी में एक फुट लम्बा और एक फुट चौड़ा तथा एक फुट गहरा गड्ढा खोदें। गड्ढे से निकली मिट्टी को किसी कार्ड बोर्ड पर रख लें। 2.इसके बाद आप इस मिट्टी को आप अपने हाथों से छानते हुए उसे गड्ढे में वापस डालने की कोशिश करें। इस प्रक्रिया को पूरा करते समय आप मिट्टी व गड्ढे पर पैनी नजर रखें। मिट्टी को छानते वक्त आपके हाथों में केंचुएं टकराते हैं तो आपको उनकी गिनती करते रहना चाहिये। इस दौरान आपको अपनी मिट्टी में यदि 10 केंचुए मिल जाते हैं तो आपको खुश हो जाना चाहिये क्योंकि इस तरह की मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है और खेती के लिए बहुत अच्छी मानी जा सकती है। 3.यदि इससे कम केंचुए आपको मिलते हैं तो आपका यह जान लेना चाहिये कि आपकी मिट्टी की जैविक शक्ति बहुत कम है। यह मिट्टी स्वस्थ जैविक बैक्टीरिया वाली नहीं है और इसमें जैविक शक्ति वाले जीवाणुओं को पनपने देने की शक्ति नहीं है। इसका अर्थ यह समझना चाहिये कि आपकी मिट्टी में पर्याप्त कार्बन नहीं है और यह मिट्टी अम्लीय या क्षारीय है। इस तरह की मिट्टी का आवश्यक उपचार कराकर ही उसे फसल योग्य बना सकते हैं। इस तरह के परीक्षण से किसान भाइयों को उर्वरक प्रबंधन में भी काफी मदद मिल सकती है। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=C4mhtK8HEiY[/embed]

चौथा चरण

किसान भाइयों मिट्टी की अम्ल और क्षार की परख करने के लिए हमें पीएच मान का परीक्षण करना होगा। मिट्टी के अम्ल या क्षारीय स्तर के आधार पर ही यह कहा जा सकता है कि आपकी मिट्टी कितनी उपजाऊ है और उसमें कौन-कौन सी फसल ली जा सकती है और कौन सी नहीं ली जा सकती है। कुछ फसलें कम उपजाऊ वाली मिट्टी में भी उगाई जा सकती है जबकि अधिकांश फसलों के लिए सामान्य पीएच मान वाली मिट्टी चाहिये। इसलिये मिट्टी का पीएच मान निकालना बहुत आवश्यक होता है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाये कि इस पीएच मान पर ही खेती का भाग्य टिका होता है। इसकी जांच के बिना खेती के बारे में फैसला नहीं किया जा सकता है। किसान भाइयों आपकी मिट्टी के अम्लीय स्तर पर सारा कुछ निर्भर करता है कि आपके खेत में पौधे किस तरह से विकसित हो सकते हैं और कौन सी खेती की जा सकती है। पीएम मान का परीक्षण शून्य से लेकर 14 तक किया जा सकता है। इसमें पीएम मान्य शून्य बहुत अम्लीय होता है और 14 बहुत क्षारीय होता है। ये अम्लीय और क्षारीय दोनों एक शब्द नहीं हैं और दोनों के अर्थ अलग-अलग हैं। हम जानते हैं कि अम्लीय और क्षारीय में क्या अंतर होता है।

1.अम्लीय मिट्टी क्या होती है

अम्लीय मिट्टी उसे माना जा सकता है जिसका पीएच मान शून्य से लेकर 5 या 6 तक होता है। इस मिट्टी में हाइड्रोक्साइड आयन की मात्रा कम हो ती है। यदि इस तरह के घोल के स्वाद की बात करें तो इसका स्वाद खट्टा होता है। पीएच का मान जितना कम होता है, उतनी ही वह मिट्टी अम्लीय अधिक  होती है। इस तरह की मिट्टी में जैविक उर्वरा शक्ति नहीं होती है।

2.क्षारीय मिट्टी क्या होती है

क्षारीय मिट्टी वह होती है जिसका पीएच मान 8 से 14 तक होता है। इस तरह की मिट्टी में हाइड्रोक्साइड आयन की मात्रा ज्यादा होती है। यदि हम इस तरह के घोल की बात करें तो परीक्षण में इसका स्वाद कसैला होता है और इसका लिटमस टेस्ट में रंग नीला होता है। अधिक क्षारीय मिट्टी में फसल व मिट्टी को स्वस्थ बनाने वाले बैक्टीरिया नहीं होते हैं। अच्छी खेती के लिए पीएम मान 6 से सात के बीच सबसे अच्छा माना जाता है। मिट्टी का पीएच मान 5 से कम या 8 से अधिक होता है। इस तरह की मिट्टी में फसल अच्छी नहीं हो सकती। किसान भाइयों इसके लिए प्रत्येक उद्यान केन्द्र में पीएच परीक्षण किट आसानी से मिल जाती है। यह किट काफी अच्छे टेस्टिंग के परिणाम देतीं हैं। इससे आप अपनी मिट्टी के पीएच मान को आसानी से जांच परख सकते हैं। यदि आपकी मिट्टी का पीच मान 6 से 7 के बीच है तो आपको कोई समस्या नहीं है और इससे कम या अधिक होने पर आपको सहकारी सेवा केन्द्रों या जिला कृषि केन्द्रों से सम्पर्क करना होता। वो आपकी मिट्टी को परीक्षण के लिए लैब में भेजेंगे और जांच रिपोर्ट में आपको सारी बातें बताई जायेंगी।  जो कमियां होंगी उनके उपचार के बारे में भी बताया जायेगा।  इस तरह से आप अपनी मिट्टी का सुधार करके अपनी मनचाही फसल ले सकते हैं।
जानिए क्या है नए ज़माने की खेती: प्रिसिजन फार्मिंग

जानिए क्या है नए ज़माने की खेती: प्रिसिजन फार्मिंग

नमस्कार किसान भाइयो, आज हम Merikheti.com में आपसे कुछ नई तकनीकी पर आधारित खेती की बात करेंगें. भाइयों अपने देश में जिस तरह से खेती होती है उससे आप सभी परचित हो. यहाँ आपको ज्ञान बांटने की जरूरत नहीं है. आज हम Precision farming के बारे में बात करेंगें. क्या है प्रिसिजन फार्मिंग और कितने किसान भाई इस तकनीक के बारे में जानते हैं? में समझता हूँ की हम में से ज्यादातर किसान भाई इसके बारे में नहीं जानते होंगें. जैसा की आप जानते हैं दिन प्रतिदिन हमारी खेती की जमीन कम होती जा रही है. खेती की जमीन पर अब कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे हैं. खेती की जमीन कोई रबर तो है नहीं की उसको खींचा जा सके? अब इसमें सरकार और किसान दोनों को ही टेक्नोलॉजी का प्रयोग करना पड़ेगा तभी जाकर हम अपने देश के लिए पर्याप्त भोजन की व्यवस्था कर सकते हैं. खेती में टेक्नोलॉजी के प्रयोग को हम प्रिसिजन फार्मिंग (Precision agriculture) कहते हैं. हमारे देश में एक बड़ी सोच यह है की हम अपने पडोसी को देख कर काम करते हैं. वो कहते हैं ना जब किसी की बिजली चली जाये तो वो बस पडोसी की बिजली आ रही है या नहीं ये देखेगा और बस कुछ नहीं. अगर उसकी नहीं आ रही है तो कोई बात नहीं है, अगर उसकी आ रही है तो मेरी क्यों नहीं. यही बात हम अपने खेतों में लागू करते हैं. अगर पडोसी ने गेहूं करे हैं तो में भी गेंहूं ही करूँगा आलू या सरसों, सब्जी की फसल नहीं. जो नुकसान फायदा इसका होगा वही मेरा होगा. हमें इस सोच से निकल कर आगे जाना होगा और नई टेक्नोलॉजी को भी अपनी खेती में लाना होगा. इसी को प्रिसिजन फार्मिंग (Precision agriculture) कहते हैं.

क्या है नए ज़माने की खेती प्रिसिजन फार्मिंग?

प्रिसिजन फार्मिंग:

प्रिसिजन फार्मिंग (Precision agriculture) मतलब खेती में शुरुआत से लेकर अंत तक टेक्नोलॉजी का प्रयोग करना ही प्रिसिजन फार्मिंग (Precision agriculture) होता है. इसमें ना तो ज्यादा खाद चाहिए होता है और ना ही ज्यादा पानी. इसमें सेंसर की मदद से हमारी फसलों की जरूरत पता की जाती है उसके बाद उसी चीज को पौधे या फसल को लगाया जाता है. इसको शुरू करने से पहले मिटटी की जाँच कराइ जाती है उसके आधार पर उसमें क्या फसल बोई जाएगी ये तय किया जाता है. फिर मौसम, पानी, बैक्टीरिया आदि सभी बातों को ध्यान में रख के किसान अपनी फसल तय करता है. इससे किसान की लगत भी काम होती है तथा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता है. इसमें किसान भेड़चाल में आकर अपना पैसा बर्बाद होने से बचाता है. जैसे की अगर पड़ोसी ने 10 किलो बीघा का यूरिआ लगाया है तो वो भी इतना ही खाद अपने खेत में डालेगा. जो की अक्सर किसान भाई करते है. इस तकनीक से पौधे को जब पानी की आवश्यकता होती है तो पानी दिया जाता है, जब खाद की जरूरत होती है तो खाद दिया जाता है और वो भी पौधे की जड़ में पाइप की मदद से. तो इससे किसान की लागत कम आती है और उसका मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है. ये भी पढ़ें : ग्रीनहाउस टेक्नोलॉजी में रोजगार की अपार संभावनाएं

कब शुरू हुआ प्रिसिजन फार्मिंग (Precision agriculture) ?

इस तरह की खेती अमेरिका में सन 1980 के दशक में हुई थी.धीरे धीरे अन्य देशों ने भी इसे करना शुरू किया. आज नीदरलैंड में आलू की खेती इसी विधि से की जा रही है. और वो आलू में अच्छा उत्पादन भी ले रहे हैं. हम भी इस तकनिकी का प्रयोग करके कम लागत में ज्यादा उत्पादन ले सकते हैं.

प्रिसिजन फार्मिंग के फायदे:

  1. प्रिसिजन फार्मिंग के बहुत सारे फायदे हैं. इसकी सहायता से हम फसल में रोग आने पर उसकी रोकथाम के लिए सेंसर की सहायता से समय से उपचार कर सकते हैं.
  2. इसकी सहायता से सीधे पौधों के जड़ों में पानी और कीटनाशक दे सकते हैं.
  3. इसकी सहायता से हम अपनी लागत कम कर सकते हैं तथा उत्पादन को बढ़ा सकते हैं. इससे किसान की आमदनी बढाती है तथा उसके जीवन स्तर में सुधार आता है.
  4. पानी का प्रयोग जरूरत के हिसाब से कर सकते हैं. पूरे खेत में पानी देने की आवश्यकता नहीं होती सीधे पेड़ों की जड़ों में पानी दे सकते हैं.
  5. फसल का उत्पादन अच्छी गुणवत्ता वाला होता है. इसके द्वारा उत्पादन की गई फसल के दाने सामान्य तरीके से उगाई गई फसल से ज्यादा चमकदार और अच्छे होते हैं.
  6. मिटटी की गुणवत्ता भी ख़राब नहीं होती है.
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भारत में इसके प्रयोग को लेकर चुनौतियां:

प्रिसिजन फार्मिंग पर किए गए कई रिसर्च से पता चलता है कि इसके लिए सबसे बड़ी चुनौती उचित शिक्षा और आर्थिक स्थिति है. भारत में 80 % छोटे किसान हैं जिनकी जोत आकार बहुत छोटा है. उनकी आर्थिक हैसियत भी उतनी अच्छी नहीं है जिससे की वो किसी भी टेक्नोलॉजी को बिना सरकार की सहायता से अपने खेत में इस्तेमाल कर सकें. एक अनुमान में कहा गया है कि 2050 तक दुनिया की आबादी करीब 10 अरब के पार पहुंच जाएगी. ऐसे में भारत के पास भी मौका है कि कृषि उत्पादन के मामले में अपनी पकड़ और भी ​मौजूद कर लें. इसके लिए सरकार को अपनी तरफ से किसानों को प्रशिक्षण देना होगा जिससे की आने वाली समस्या की तैयारी अभी से की जा सके.
इन सब्जियों को आप अपने घर पर ही उगा सकते हैं

इन सब्जियों को आप अपने घर पर ही उगा सकते हैं

आज हम आपको घर में सब्जियां उगाने के कुछ अहम तरीकों के बारे में जानकारी देंगे। यहां आज हम आपको सबसे आसान, सस्ता एवं टिकाऊ तरीका बताने वाले हैं। बतादें, कि इन पांच सब्जियों का उत्पादन आप घर में भी बड़े आराम से कर सकते हैं।  भारत के प्रत्येक घर में सब्जियों का प्रतिदिन उपयोग होता है। महीने के खर्च के मुताबिक, देखें तो केवल सब्जियों के लिए आपको प्रति माह हजारों रुपये खर्च करने होते हैं। ऐसी स्थिति में यदि हम कहें कि आप अपने घर में ही कुछ सब्जियां बड़ी आसानी से उगा सकते हैं तो आप क्या कहेंगे। आइए आज हम आपको पांच ऐसी सब्जियों के विषय में बताऐंगे, जिन्हें आप अपने घर में किसी पुराने डिब्बे अथवा बाल्टी के अंदर भी उगा सकते हैं।

आप टमाटर और बैंगन भी घर में उगा सकते हैं 

सर्दियों का मौसम है, ऐसे में टमाटर का उपयोग भारतीय घरों में काफी होता है। सब्जी बनानी हो अथवा फिर चटनी खानी हो टमाटर तो चाहिए ही। यदि आप अपने घर के अंदर टमाटर उगाना चाहते हैं, तो इसके लिए पहले एक पुरानी खाली बाल्टी अथवा टब लीजिए। उसके बाद उसमें मिट्टी एवं कोकोपीट आधा भर दीजिए। वर्तमान में टमाटर के अथवा बैंगन के पौधे लगा दीजिए। सुबह-शाम इसमें थोड़ा-थोड़ा पानी डालें। आप देखेंगे कि कुछ ही समय के अंदर ये पौधे सब्जी देने लायक हो जाएंगे।

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धनिया और लहसुन सहजता से घर में ही उगा सकते हैं

सर्दियों में सर्वाधिक मांग धनिया की पत्ती एवं लहसुन की पत्ती की होती है। बाजार में ये काफी ज्यादा कीमतों पर बिकती हैं। इसके साथ ही बहुत बार ये ताजा भी नहीं मिलते। हालांकि, आप इन दोनों को बड़ी सहजता से घर में उगा सकते हैं। इन्हें उगाने के लिए आपको बस कोई टब अथवा पुरानी बाल्टी लेनी है, उसके बाद उसमें कोकोपीट एवं मिट्टी को मिलाकर आधा भर देना है। इसके उपरांत यदि आप धनिया उगाना चाहते हैं, तो उसके बीज इस के अंदर लगा सकते हैं। यदि आप लहसुन उगाना चाहते हैं, तो पहले लहसुन की कलियों को भिन्न-भिन्न कर लीजिए, फिर उनको सिरे की तरफ से मिट्टी में घुसा दीजिए। सुबह शाम इसमें थोड़ा-थोड़ा पानी डालिए। आप देखेंगे कि कुछ ही दिनों में आपकी बाल्टी अथवा टब हरी-हरी पत्तियों से भर जाएगी।

शिमला मिर्च भी आप घर पर ही उगा सकते हैं

शिमला मिर्च स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होती है। सर्दियों में इसकी खूब मांग होती है। अब ऐसे में यदि आप अपने घर में शिमला मिर्च उगाना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको ऊपर दी गई प्रक्रिया को दोहराना पड़ेगा। फिर उस बाल्टी अथवा टब में शिमला मिर्च के एक या दो पौधे लगा देने होंगे। इन पौधों को लगाने के कुछ दिनों पश्चात इनमें शिमला मिर्च लगने शुरू हो जाएंगे। 
मटर एवं अन्य दलहनी फसलों में जड़ के सड़ने एवं पौधे के पीला होने की समस्या को कैसे करें प्रबंधित?

मटर एवं अन्य दलहनी फसलों में जड़ के सड़ने एवं पौधे के पीला होने की समस्या को कैसे करें प्रबंधित?

मटर एवम अन्य दलहनीय फसलों में लगने वाले जड़ गलन बहुत ही महत्त्वपूर्ण रोग है ,क्योंकि इससे उपज प्रभावित होती है।यह रोग मुख्यतः जड़ों को प्रभावित करता है, जिससे अंकुर ठीक से नहीं निकलते, पौधों का कम विकास होता है, और उपज कम होती है। लक्षणों में दबे हुए घाव, जड़ों का भूरे या काले रंग से बदरंग होना, सिकुड़ती हुई जड़ प्रणाली और जड़ों की गलन शामिल हैं। यदि गांठें निकलती भी हैं, तो वे संख्या में कम, छोटी और हल्के रंग की होती हैं। संक्रमित बीजों से उगने वाले पौधों में अंकुर निकलने के कुछ समय बाद ही मुरझा जाते हैं। जीवित बचने वाले पौधे हरितहीन होते हैं और उनकी जीवन शक्ति कम होती है। विकास की बाद कि अवस्थाओं में संक्रमित होने वाले पौधों में विकास अवरुद्ध हो जाता है। सड़ते हुए ऊतकों पर अवसरवादी रोगाणु बसेरा करते हैं, जिससे लक्षण और अधिक खराब हो जाते हैं। इस रोग में कभी भी पूरा खेत प्रभावित नही होता है बल्कि इसके विपरित यह रोग खेतों में, प्रायः धब्बों में (पैच) होता है और रोगाणुओं के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर प्रभावित क्षेत्र बढ़ जाता है।

रूट रॉट रोग को आर्द्र गलन रोग के नाम से भी जाना जाता है। मटर की फसल को इस रोग से काफी नुकसान होता है। लेकिन यदि इस रोग का सही तरह से प्रबंध किया जाए तो पौधों को इस रोग से बचाने के साथ हम अच्छी गुणवत्ता की फसल भी प्राप्त कर सकेंगे। यह एक मृदा जनित रोग है वातावरण में अधिक आर्द्रता होने पर यह रोग ज्यादा तेजी से फैलते हैं।आमतौर पर इस रोग का प्रकोप छोटे पौधों में अधिक देखने को मिलता है।इस रोग से प्रभावित पौधों की निचली पत्तियां हल्के पीले रंग की होने लगती हैं।कुछ समय बाद पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं। पौधों को उखाड़ कर देखा जाए तो उसके जड़ सड़े हुए दिखते हैं।

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रोग से प्रभावित पौधे सूखने लगते हैं। इससे उत्पादन में भारी कमी आती है।लक्षण मिट्टी में रहने वाले कवकीय जीवाणुओं के मिश्रण के कारण होते हैं जो पौधों को उनके विकास के किसी भी चरण में संक्रमित कर सकते हैं। राइज़ोक्टोनिया सोलानी और फ़्यूज़ेरियम सोलानी शेष समूह की तरह इस मिश्रण का हिस्सा हैं, यह मिट्टी में लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तो ये जड़ों के ऊतकों पर बसेरा करते हैं और पौधे के ऊपरी भाग तक पानी और पोषक तत्वों का परिवहन बाधित करते हैं, जो पौधों के मुरझाने और हरितहीन होने का कारण है। जैसे- जैसे ये पौधों के ऊतकों के अंदर बढ़ते जाते हैं, ये प्रायः इन कवकों के साथ पाए जाते हैं जो जड़ों के सामान्य विकास और गांठों के निर्माण को बाधित करते हैं। मौसम के आरंभ में ठंडी और नम मिट्टी रोग के विकास के लिए अनुकूल होती है। दरअसल, लक्षण प्रायः जलजमाव के इलाक़ों में ज्यादा देखे जाते हैं। बुआई की तिथि और बुआई की गहराई का भी अंकुरों के निकलने और उपज पर गहरा प्रभाव होता है।

मटर एवम अन्य दलहनीय फसलों में लगने वाले जड़ गलन रोग को कैसे करें प्रबंधित?

फसल चक्र के माध्यम से रोकथाम

रोगज़नक़ों के जीवन चक्र को बाधित करने और जड़ सड़न के जोखिम को कम करने के लिए फसल चक्रण एक मौलिक अभ्यास है। एक ही खेत में लगातार मटर या अन्य दलहनी फसलें लगाने से बचें। इसके बजाय, रोग चक्र को तोड़ने और मिट्टी में रोगज़नक़ों के निर्माण को कम करने के लिए गैर-दलहनी फसलों के साथ बारी-बारी से खेती करें।

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन

जड़ सड़न को रोकने के लिए सर्वोत्तम मृदा स्वास्थ्य बनाए रखना महत्वपूर्ण है। जलभराव की स्थिति से बचने के लिए उचित जल निकासी सुनिश्चित करें, क्योंकि अतिरिक्त नमी रोगज़नक़ों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है। कार्बनिक पदार्थों के समावेश के माध्यम से मिट्टी की संरचना और वातन में सुधार से मिट्टी के समग्र स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है और रोग का दबाव कम हो सकता है।

प्रतिरोधी किस्में

जड़ सड़न से निपटने के लिए प्रतिरोधी किस्मों का चयन एक प्रभावी रणनीति है। प्रजनन कार्यक्रमों ने विशिष्ट रोगजनकों के प्रति उन्नत प्रतिरोध वाली किस्में विकसित की हैं। अपने क्षेत्र में प्रचलित जड़ सड़न रोगज़नक़ों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शित करने वाली मटर और दलहन फसल की किस्मों की पहचान करने और चुनने के लिए स्थानीय कृषि विस्तार सेवाओं या बीज आपूर्तिकर्ताओं से परामर्श करें।

बीज उपचार

रोपण से पहले बीजों को फफूंदनाशकों से उपचारित करना मिट्टी से पैदा होने वाले रोगजनकों से बचाव का एक निवारक उपाय है। कवकनाशी बीज उपचार एक सुरक्षात्मक बाधा प्रदान कर सकता है, जो जड़ों के प्रारंभिक संक्रमण को रोकता है। बीज व्यवहार्यता से समझौता किए बिना उचित बीज उपचार सुनिश्चित करने के लिए अनुशंसित आवेदन दरों और दिशानिर्देशों का पालन करें।

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उचित सिंचाई

जड़ सड़न को रोकने के लिए जल प्रबंधन महत्वपूर्ण है। एक नियंत्रित सिंचाई प्रणाली को लागू करने से जो अत्यधिक पानी भरने से बचती है और समान नमी वितरण सुनिश्चित करती है, रोगज़नक़ प्रसार के लिए कम अनुकूल परिस्थितियाँ बनाने में मदद करती है।

जैविक नियंत्रण

जैविक नियंत्रण में रोगजनक कवक के विकास को दबाने के लिए लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग करना शामिल है। कुछ बैक्टीरिया और कवक प्रतिपक्षी के रूप में कार्य करते हैं, जो जड़ सड़न रोगजनकों के विकास को रोकते हैं। जैव कीटनाशकों को लगाने या मिट्टी में लाभकारी रोगाणुओं को शामिल करने से फसल के जड़ क्षेत्र को स्वस्थ बनाने में योगदान मिल सकता है।ट्राइकोडर्मा की 10 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर पानी में घोल कर प्रयोग करने से मिट्टी से फैलने वाले रोग(Soil borne disease), जैसे कि दलहन की जड़ों की सड़न पर नियंत्रण पाने के लिए किया जा सकता है। इसके साथ ही, ये जीवित बचने वाले पौधों के विकास और उत्पादकता को बेहतर करता है।

स्वच्छता के उपाय

रोग प्रबंधन के लिए क्षेत्र में अच्छी स्वच्छता अपनाना आवश्यक है। इनोकुलम के निर्माण को रोकने के लिए संक्रमित पौधों के अवशेषों को तुरंत हटा दें और नष्ट कर दें। दूषित मिट्टी को असंक्रमित क्षेत्रों में फैलने से बचाने के लिए उपकरणों और औजारों को अच्छी तरह साफ करें।

पोषक तत्व प्रबंधन

पौधों के स्वास्थ्य और रोगों के प्रति लचीलेपन के लिए उचित पोषक तत्व स्तर बनाए रखना महत्वपूर्ण है। सुनिश्चित करें कि मटर और दलहन फसलों को पर्याप्त लेकिन अत्यधिक पोषक तत्व न मिलें, क्योंकि असंतुलन से पौधें जड़ सड़न रोग के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते है। पोषक तत्वों के स्तर की निगरानी करने और तदनुसार उर्वरक प्रथाओं को समायोजित करने के लिए नियमित मिट्टी परीक्षण करें।

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निगरानी और शीघ्र पता लगाना

जड़ सड़न के शुरुआती लक्षणों का पता लगाने के लिए नियमित क्षेत्र की निगरानी महत्वपूर्ण है। मुरझाने, पीले पड़ने, या रुके हुए विकास पर ध्यान दें, जो सामान्य लक्षण हैं। शीघ्र पता लगने से त्वरित हस्तक्षेप की अनुमति मिलती है, जिससे फसल की उपज पर बीमारी का प्रभाव कम हो जाता है। संभावित मुद्दों की पहचान करने के लिए स्काउटिंग कार्यक्रमों को लागू करने और नैदानिक ​​​​उपकरणों का उपयोग करने पर विचार करें।

रासायनिक नियंत्रण

यदि खेत में जड़ सड़न पहले से ही स्थापित है, तो रासायनिक नियंत्रण को अंतिम उपाय माना जाता है। जड़ सड़न नियंत्रण के लिए लेबल किए गए फफूंदनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन पर्यावरणीय और आर्थिक कारकों को ध्यान में रखते हुए इस दृष्टिकोण को विवेकपूर्ण तरीके से अपनाया जाना चाहिए। रोको एम या कार्बेंडाजिम नामक कवकनाशक की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर मिट्टी का उपचार करने से (Soil drenching) रोग की उग्रता में भारी कमी आती है। उचित रासायनिक नियंत्रण उपायों पर मार्गदर्शन के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों या विस्तार सेवाओं से परामर्श लें।

सारांश

मटर और दलहन फसलों में जड़ सड़न के प्रबंधन के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जो निवारक उपायों, सांस्कृतिक प्रथाओं और, यदि आवश्यक हो, लक्षित हस्तक्षेपों को जोड़ती है। इन रणनीतियों को एक एकीकृत कीट प्रबंधन योजना में शामिल करके, किसान जड़ सड़न के प्रभाव को कम कर सकते हैं, फसल के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं और समग्र फसल उत्पादकता में लगातार वृद्धि कर सकते हैं।

जानें सबसॉइलर (Subsoiler) कृषि मशीन की बेहतरीन विशेषताओं के बारे में

जानें सबसॉइलर (Subsoiler) कृषि मशीन की बेहतरीन विशेषताओं के बारे में

सबसॉइलर कृषि मशीन खेत के अंदर गहरी जुताई करने के लिए बेहद ही ज्यादा उपयोगी मशीन होती है। इस मशीन को ट्रैक्टर के पीछे लगाकर संचालित किया जाता है। सबसॉइलर से खेत की जुताई करने के उपरांत फसल में रोग लगने की आशंका बेहद ही कम हो जाती है। यहां पर जानें इस कृषि मशीन की बाकी महत्वपूर्ण जानकारियों के बारे में। खेती-किसानी के कार्यों को सुगमता से पूर्ण करने के लिए बाजार में विभिन्न प्रकार के शानदार कृषि उपकरण उपलब्ध हैं। इन्हीं कृषि मशीनों में एक सबसॉइलर कृषि यंत्र भी शम्मिलित है, जो कि कम परिश्रम में खेतों की गहरी जुताई करने में सक्षम है। इस उपकरण को संचालित करने के लिए आपको ट्रैक्टर की जरूरत पड़ेगी। दरअसल, सबसॉइलर कृषि मशीन को ट्रैक्टर के पीछे लगाकर खेत में संचालित किया जाता है। बतादें, कि इस सबसॉइलर कृषि मशीन को खेत में फसल बिजाई से पूर्व ही तैयार करने के लिए चलाया जाता है। यह मशीन खेत के अंदर गहरी जुताई करने के लिए बेहद उपयोगी साबित होती है। इस मशीन के माध्यम से की गई जुताई के उपरांत किसानों की फसल में रोग लगने की आशंका कम होती है। खेत की जुताई का कार्य शीघ्रता से किया जा सके, इसको मंदेनजर रखते हुए सबसॉइलर कृषि मशीन को तैयार किया गया है।

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सबसॉइलर कृषि मशीन

यह कृषि उपकरण ट्रैक्टर के साथ जोड़कर चलने वाली मशीन है, जो खेत में कम समय में ही गहरी जुताई करने में सक्षम है। इसे मिट्टी को तोड़ना, मिट्टी को ढीला करना और गहरी अच्छी जुताई करने के लिए सबसॉइलर कृषि मशीन बेहद लोकप्रिय है। यह मशीन मोल्डबोर्ड हल, डिस्क हैरो या रोटरी टिलर मशीन के मुकाबले काफी अच्छे से खेत की जुताई करती है. इसके अलावा, सबसॉइलर कृषि मशीन खेत की मिट्टी को अच्छी उर्वरता शक्ति प्रदान करने में भी मदद करती है. इस मशीन से खेत की जुताई करने के बाद किसानों को फसल की अच्छी उपज प्राप्त होती है।

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सबसॉइलर कृषि मशीन का उपयोग

  • किसान भाई इस मशीन का अधिकतर उपयोग खेत की जुताई करने के लिए करते हैं।
  • इस मशीन का इस्तेमाल खेत में पानी को रोकने के लिए भी किया जाता है।
  • सबसॉइलर मशीन खेत की खराब स्थिति को सुधारने के लिए भी खेत में चलाई जाती है।
  • सबसॉइलर कृषि मशीन से क्या क्या फायदे होते हैं
  • सबसॉइलर कृषि मशीन को खेत में चलाने के पश्चात फसल में कीट और रोग लगने की आशंका काफी कम हो जाती है।
  • सबसॉइलर मशीन के उपयोग से खेत की मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बनी रहती है।
  • देश के जिन हिस्सों में जल के अभाव की वजह खेत की सिंचाई नहीं की जाती उन इलाकों के लिए यह बेहद उपयोगी कृषि यंत्र है।
  • इस मशीन के इस्तेमाल से किसान कम से कम ढाई फीट तक गहरी नाली बना सकते हैं।
  • सबसॉइलर कृषि मशीन किसानों पर पड़ने वाले मजदूरों के भार को कम करती है।
जुताई का राजा रोटावेटर(Rotavator)

जुताई का राजा रोटावेटर(Rotavator)

रोटावेटर ट्रैक्टर के साथ चलने वाला जुताई का आधुनिक यंत्र है। जमीन पर बढ़ते फसलों के बोझ की स्थिति में यह सूखे या गीली जमीन में जुताई करने का उपयुक्त माध्यम है। इसका खास लाभ किभी फसल के कूडे़ या डंठलों को जमीन में मिलाने के लिए किया जाता है। एक ही जुताइ में खेत को तैयार करने वाली परिस्थितियों के लिए यह बेहद कारगर मशीन है। रोटावेटर मक्का,गेहूं,धान,गन्ना आदि के अवशेष को हटाने अथवा इसके मिश्रण करने के लिए उपयुक्त माना जाता है। रोटावेटर के उपयोग से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार भी आता है। इसके अलावा धन,लागत,समय और ऊर्जा आदि की भी बचत होती है। रोटावेटर के खास तरीके से डिजाइन किए गए ब्लेडों की खास बनावट रोटावेटर को एक मजबूत मशीन का आकार देती है।आज कई कंपनियां अलग- अलग प्रकार के रोटावेटर मशीनें बना रही हैं, जो किसानों का खेती का काम आसान कर रही हैं।

वर्तमान समय में दो प्रकार के रोटावेटर प्रचलन में हैं।पहला टिलमेट और दूसरा सायल मास्टर रोटावेटर

सायल मास्टर रोटावेटर(Soil Master Rotavator)

Soil Master Rotavator 


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सायल मास्टर रोटावेटर को किसी भी तरह की मिट्टी में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे कठोर और मुलायम दोनों तरह की मिट्टी के इस्तेमाल के लिए खासतौर से डिजायन किया गया है। इसकी डिजाइन मजबूत होने के कारण इसमें कम्पन कम होता है और यही कारण है कि ट्रक्टर पर भी भार कम पड़ता है। यह अकेली ही ऐसी मशीन है जिसमें दोनों तरफ बैरिंग लगे हैं।यही कारण है कि यह सूखी और गीली मिट्टी दोनों पर ही काम करके अच्छे नतीजे देता है। अच्छी क्वालिटी होने की वजह से इसके रखरखाव पर भी कम खर्च आता है। इसका बाक्स कवर खेत में काम करते समय गीयर बाक्स को पत्थरों व दूसरी बाहरी चीजों से बचाता है।साइड स्किड असेंबली के साथ जुताई की गहराई में 4 से 8 इंच तक का फेरबदल किया जा सकता है। 

टिलमेट रोटावेटर (Tilmate Rotavator)

इसको खास तरीके से डिजाइन किया गया है। इसमें बोरान स्टील के ब्लेड लगे होते हैं। इसमें एक गियर ड्राइव भी लगा होता है जिसकी वजह से यह लंम्बे समय तक चलता है। इसमें ट्रेनिंग बोर्ड को एडजस्ट करने के लिए ऑटोमैटिक सिं्प्रग लगे होते हैं। इसका भी प्रयोग गीले और सूखे दोनों ही स्थानों पर कर सकते है। रोटाबेटर अन्य जुताई मशीनों की तुलना में डीजल की भी काफी बचत करता है। यह मिट्टी को तुरंत तैयार कर देता है जिससे पिछली फसल की मिट्टी की नमी का पूर्णतया उपयोग में आ जाता है। रोटावेटर का उपयोग 125 मिमी -150 मिमी की गहराई तक की मिट्टी के जुताई के लिए उपयुक्त है। इससे बीज की बुआई में आसानी रहती है। इससे जुताई अन्य यंत्रों के मुकाबले चैथाई समय में ही हो जाती है। इसका उपयोग फसलों के अवशेषो को हटाने में भी किया जाता है। इसे चलाते समय खेत में घुमाने में भी आसानी रहती है।

सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम | Soil Health Card Scheme

सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम | Soil Health Card Scheme

मृदा स्वास्थ्य कार्ड स्कीम समूचे देश में चलाई जा रही है। इसका उद्देश्य एक डाटा तैयार करना है कि देश की मृदा की स्थिति क्या है। किन राज्यों में किन पोषक तत्वों की कमी है। सरकार की मंशा है कि राज्यों की स्थिति के अनुरूप किसानों तक उर्वरकों की पहुंच आसान और सुनिश्चत की जाए ताकि उत्पादन में इजाफा हो सके। किसानों की माली हालत में भी सुधार हो सके। राज्य सरकार के कृषि विभाग की मदद से मृदा नमूनों का संकलन, परीक्षण एवं इसे आनलाइन अपलोड करने का काम पूरे देश में चरणबद्ध तरीके से कराया जा रहा है। यह योजना कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय  भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही है। सॉयल हेल्थ कार्ड का उद्देश्य प्रत्येक किसान को उसके खेत की सॉयल के पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी देना है।

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 यह एक प्रिंटेड रिपोर्ट है जिसे किसान को उसके प्रत्येक जोतों के लिए दिया जायेगा। इसमें 12 पैरामीटर जैसे एनपीके (मुख्य - पोषक तत्व), सल्फर (गौण – पोषक तत्व), जिंग, फेरस, कॉपर, मैग्निश्यम, बोरॉन (सूक्ष्म – पोषक तत्व), और इसी ओसी (भौतिक पैरामीटर) के संबंध में उनकी सॉयल की स्थिति निहित होगी। इसके आधार पर एसएचसी में खेती के लिए अपेक्षित सॉयल सुधार और उर्वरक सिफारिशों को भी दर्शाया जायेगा। यह कार्ड आगामी फसल के लिए जरूरी पोषक तत्वों की जानकारी भी देता है। यह बात अलग कि मृदा नमूना लेने का काम क्षेत्र विशेष में ग्रिड बनाकर किए जा रहा है। इससे मोटा मोटी अनुमान लग जाता है कि किस इलाके में कौनसे पोषक तत्वों की कमी है। 

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 सवाल यह उठता है कि क्या किसान प्रत्येक वर्ष और प्रत्येक फसल के लिए एक कार्ड प्राप्त करेंगे। यह कार्ड 3 वर्ष के अंतराल के बाद उपलब्ध कराया जाएगा। सॉयल नमूने जीपीएस उपकरण और राजस्व मानचित्रों की मदद से सिंचित क्षेत्र में 2.5 हैक्टर और वर्षा सिंचित क्षेत्र में 10 हैक्टर के ग्रिड से नमूने लिए जा रहे हैं। नमूनों का संकलन सरकारी कर्मचारी, कालेज स्टूडेंट, एनजीओ वर्कर आदि किसी भी माध्यम से संकलित कराए जाते हैं। नमूनों का संकलन खाली खेतों में आसानी से हो जाता है। 

नमूना लेने का तरीका समझें किसान

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 सॉयल नमूने V आकार में मिट्टी की कटाई के उपरांत 15 – 20 सेण्टी मीटर की गहराई से निकालने चाहिए। किसान भी यह काम कर सकते हैं। नमूना कभी मेंड की तरफ से नहीं लेना चहिए। नमूने को समूचे खेत से संकलित करना चहिए ताकि समूची मृदा का प्रतिनिधित्व हो और जांच ठीक हो सके। अच्छा हो कि किसी जानकार या कृषि विभाग के व्यक्ति से नमूना लेने का तरीका समझ लिए जाए।  छाया वाले क्षेत्र से नमूना न लिया जाए। चयनित नमूने को बैग में बंद करके खेत की पहचान वाली पर्ची डालकर ​ही दिया जाए। इसके बाद ही नमने को जांच के लिए भेजा जाए। नमूनों में तीन मुख्य तत्वों की जांच तो हर जनपद स्तर पर हो जाती है लेकिन शूक्ष्म पोषक तत्वों की जांच मण्डल स्तीर प्रयोगशालाओं पर ही होत पाती है। इस परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही कार्ड बनाकर जनपदों को भेजे जाते हैं। इसके बाद यह किसानों में वितरित होते हैं। किसान अपनी मिट्टी की जांच कई राज्यों में नि:शुल्क या महज पांच सात रुपए की दर से कराई जा सकती है।

खेती की लागत घटाएगा मृदा कार्ड

खेती की लागत घटाएगा मृदा कार्ड

स्वायल हेल्थ कार्ड किसानों की आय बढ़ाने के अलावा खेती की लागत को करने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि यह हर किसान का बने और कमसे कम हर तीसरे साल में हर किसान के खेत के नमूने की जांंच हो जाए। भारत सरकार इस योजना को अमली जामा पहनाने के दाबे तो कर रही है लेकिन उसके लिए जरूरी संसाधनों का अभी बेहद अभाव है। 

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास व पंचायती राज मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 19 फरवरी को कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में अधिशेष क्षमता प्राप्त करने में मदद की है। उन्होंने कहा कि मौसम की अनिश्चितताएं देश के सामने एक नई चुनौती पेश कर रही हैं। पिछले साल बेमौसम बरसात के कारण ही प्याज की कीमतों में उछाल आया था। कृषि वैज्ञानिक लगातार इस संबंध में समाधान खोजने में लगे हुए हैं। श्री तोमर ने कहा, “हमारी योजनाओं को केवल फाइलों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि किसानों को इसका लाभ मिलना चाहिए।

   

 पांच साल पहले इस योजना के शुरू होने के बाद से दो चरणों में 11 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) जारी किए गए हैं। सरकार आदर्श ग्राम की तर्ज पर मृदा परीक्षण प्रयोगशाला (एसटीएल) स्थापित करने के प्रयास कर रही है। अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।

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श्री तोमर ने बताया कि इस योजना के तहत दो साल के अंतराल में सभी किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किए जाते हैं। इन कार्डों में मृदा के स्वास्थ्य की स्थिति और महत्वपूर्ण फसलों के लिए मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्वों की सिफारिशें शामिल होती हैं। उन्होंने किसानों से आग्रह किया कि उर्वरकों के कुशल उपयोग और कृषि आय में सुधार के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिशों को अपनाएं। 

कैसे घटेगी लागत

 

फास्फोरस ​निर्यात किया जाता है। इस पर किसानों को सरकार सब्सिडी देती है। इधर किसान जानकारी के अभाव में जमीन में पर्याप्त मौजूदगी के बाद भी इसे डालते रहते हैं और हजारों रुपए एकड़ का अतिरिक्त खर्चा कर अपनी लागत में इजाफा कर बैठते हैं। इससे उजप का मुनाफा भी कम हो जाता है। कार्ड हर पोषक तत्व की मौजूदगी के अलावा आगामी फसल के लिए उसकी मात्रा की संस्तुति करता है। 

कैसे बढ़ रही आय

जब जरूरत के अनुरूप उर्वरकों का प्रयोग होगा तो उन पर होने वाले अतिरिक्त खर्चे से किसान बच सकेंगे और इससे उनके शुद्ध मुनाफे में बढ़ोत्तरी होगी। 

सुधरेगी सेहत

मिट्टी परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर यदि किसान प्रबंधन करना सीख जाएंगे तो वह दिन दूर नहीं कि आम उपभोक्ता और मिट्टी दोनों की सेहर में सुधार होगा। इसका असर किसान की सेहर और आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक पड़ना तय है।

अधिक पैदावार के लिए करें मृदा सुधार

अधिक पैदावार के लिए करें मृदा सुधार

विनोद कुमार शर्मा, रविंद्र कुमार एवं कपिल आत्माराम
भारत में कृषि प्रगति का श्रेय किसान एवं वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत के अलावा उन्नत किस्म उर्वरकों एवं सिंचित क्षेत्र को जाता है. इसमें अकेले उर्वरकों का खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के लिए 50 परसेंट योगदान माना जाता है. उल्लेखनीय है कि फसलों द्वारा उपयोग की जाने वाली पोषक तत्वों की मात्रा और आपूर्ति में बहुत बड़ा अंतर है. फसलें कम उर्वरक लेती हैंं, किसान ज्यादा डालते हैं जिसका दुष्प्रभाव जमीन की उर्वरा शक्ति पर लगातार पड़ रहा है. देश के किसान उर्वरकों के उपयोग में न तो वैज्ञानिकों की संस्तुति का ध्यान रखते हैं ना अपने ज्ञान विशेष का। असंतुलित उर्वरकों के उपयोग से उन्नत व पौधों को हर तत्व की पूरी मात्रा मिल पाती है और ना ही उत्पादन ठीक होता है। इसके अलावा किसानों की लागत और बढ़ जाती है। जरूरत इस बात की है कि किसान संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें ताकि उत्पादन अच्छा और गुणवत्ता युक्त हो एवं
मृदा स्वास्थ्य ठीक रहे।

उपज में इजाफा ना होने के कारण

improve soil quality # मृदा में मौजूद पोषक तत्वों की सही जानकारी का अभाव रहता है। # किस फसल के लिए कौन सा पोषक तत्व जरूरी है इसका ज्ञान ना होना। # मुख्य एवं क्षमा सूक्ष्म पोषक तत्वों के विषय में जानकारी ना होना। # उर्वरकों के उपयोग की विधि एवं समय कर सही निर्धारण न होना। # सिंचाई जल का प्रबंधन ठीक ना होना। # फसलों में कीट एवं खरपतवार प्रबंधन समय से ना होना। # लगातार एक ही फसल चक्र अपनाना। # कार्बनिक खाद का उपयोग न करने से रासायनिक खादों से भी उपज में ठीक वृद्धि ना होना।

मृदा परीक्षण क्यों जरूरी है

यदि फसल उगाने की तकनीक के साथ उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर किया जाए तो दोहरा लाभ होता है। किसानों को गैर जरूरी उर्वरकों पर होने वाला खर्च नहीं करना होता इसके अलावा संतुलित उर्वरक फसल को मिलने के कारण उत्पादन अच्छा और गुणवत्ता युक्त होता है। संतुलित उर्वरक प्रयोग से मिट्टी की भौतिक दशा यानी सेहत ठीक रहती है।

फसलों के लिए उर्वरकों की वैज्ञानिक संस्तुति

इस विधि को विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा दशकों पहले देश के विभिन्न भागों और राज्यों एवं मिट्टी की विभिन्न दशाओं में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश उर्वरक की अलग-अलग मात्रा तथा उनके संयोजन के साथ विभिन्न फसलों पर प्रयोग किए गए। इन प्रयोगों के फसलों की उपज पर होने वाले प्रभावों व आर्थिक पहलुओं का मूल्यांकन करने के बाद विभिन्न फसलों के लिए सामान्य संस्तुति यां  विकसित की गईं। कुछ प्रमुख फसलों की सामान्य संस्तुतियां प्रस्तुत हैं।

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फसलें/उर्वरक तत्वों की मात्रा किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

नाइट्रोजन फास्फोरस/ पोटाश 
धान 120 60 40
गेहूं      120 60 40
मक्का  120 60 40
बाजरा   80 40 40
सरसों    80 40 80
अरहर   25 60 ×
चना     25 50 ×
मूग     25 50 ×
उर्द     25 50 ×

वैज्ञानिक सुझाव भी कारगर नहीं

इस विधि का मुख्य जोश लिया है की इसमें मिट्टी की उर्वरा शक्ति का ध्यान नहीं रखा जाता। खेतों की उर्वरा शक्ति अलग-अलग होती है लेकिन बिना जांच के हमें एक समान ही खाद लगाना पड़ता है। किसी खेत में किसी एक तत्व की मात्रा पहले से ही मौजूद होती है लेकिन बगैर जांच के हम उसे और डाल देते हैं। उपज पर इसका अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

पोषक तत्वों की कमी के लक्षण

Improve soil quality १. नाइट्रोजन- पुरानी पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है। अधिक कमी होने पर पत्तियां बोरी होकर सूख जाती हैैं। २.फास्फोरस-पत्तियों एवं तनाव पर लाल लिया बैगनी रंग आ जाता है। जड़ों के फैलाव में कमी हो जाती है। ३.पोटेशियम- पुरानी पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं। पत्तियां बाद में भंवरी झुलसी हुई लगने लगती हैं। ४.सल्फर- नई पत्तियों का रंग हल्का हरा एवं पीला पड़ने लगता है दलहनी फसलों में गांठें कब बनती हैं। ५. कैल्शियम-नई पत्तियां पीली अथवा गहरी हो जाती हैं। पत्तियों का आकार सिकुड़ जाता है। ६-मैग्नीशियम पुरानी पत्तियों की नसें हरी रहती हैं लेकिन उनके बीच का स्थान पीला पड़ जाता है। पत्तियां छोटी और सख्त हो जाते हैं। ७-जिंक-पुरानी पत्तियों पर हल्के पीले रंग के धब्बे देखने लगते हैं। शिरा के दोनों और रंगहीन पट्टी जिंक की कमी के लक्षण है। ८-आयरन-नई पत्तियों की शिराओं के बीच का भाग पीला हो जाता है। अधिक कमी पर पत्तियां हल्की सफ़ेद हो जाती हैैं। ंं ९-कॉपर-पत्तियों के शिराओं की चोटी-छोटी एवं मुड़ी हुई हल्की हरी पीली हो जाती है। १०-मैग्नीज-की कमी होने पर नई पत्तियों की शिराएं भूरे रंग की तथा पत्तियां पीली से भूरे रंग में बदल जाती हैं। ११-बोरान-नई पत्तियां गुच्छों का रूप ले लेती हैं। डंठल, तना एवं फल फटने लगते हैं। १२-मालिब्डेनम-पत्तियों के किनारे झुलस या मुड जाते हैं या कटोरी का आकार ले सकते हैं।

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क्या है बायो फर्टिलाइजर

बायो फर्टिलाइजर जमीन में मौजूद पढ़े अतिरिक्त खादों को घुलनशील बनाकर पौधों को पहुंचाने में मददगार होता है।

नत्रजन तत्व की पूर्ति के लिए

राइजोबियम कल्चर-इसका उपयोग दलहनी फसलों के लिए किया जाता है । 1 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 200 ग्राम के 3 पैकेट राइजोबियम लेकर बीज को उपचारित करके बुवाई करें। एजेक्वेक्टर एवं एजोस्पाइरिलम कल्चर-बिना दाल वाली सभी फसलों के लिए निम्नानुसार प्रयोग करें। रोपाई वाली फसलों के लिए दो पैकेट कल्चर को 10 लीटर पानी के घोल में पौधे की जड़ों को 15 मिनट तक ठोकर रखने के बाद रोपाई करें।

फास्फोरस तत्व की पूर्ति के लिए

पीएसबी कल्चर-रासायनिक उर्वरकों द्वारा दिए गए फास्फोरस का बहुत बड़ा भाग जमीन में घुलनशील होकर फसलों को नहीं मिल पाता । पीएसबी कल्चर फास्फोरस को घुलनशील बनाकर फसलों को उपलब्ध कराता है । बीजोपचार उपरोक्तानुसार करें या 2 किलो कल्चर को 100 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर खेत में मिला दे। वैम कल्चर-यह कल्चर फास्फोरस के साथ-साथ दूसरे सभी तत्वों की उपलब्धता बढ़ा देता है । उपरोक्त अनुसार बीज उपचार करें।