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गोवंश में कुपोषण से लगातार बाँझपन की समस्या बढ़ती जा रही है

गोवंश में कुपोषण से लगातार बाँझपन की समस्या बढ़ती जा रही है

पशुओं में कुपोषण की वजह से बांझपन की बीमारियां निरंतर बढ़ती जा रही हैं। खास कर गोवंश में देखी जा रही है। गोवंश में बांझपन के बढ़ते मामलों के का सबसे बड़ा कारण कुपोषण है। इसका मतलब है, कि पशुओं को पौष्टिक आहार नहीं मिल पा रहा है। इस गंभीर समस्या से किसानों के साथ-साथ पशुपालन से संबंधित समस्त संस्थाऐं भी काफी परेशान हैं। सरदार बल्लभभाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय वेटनरी कॉलेज के अधिष्ठाता डॉ राजीव सिंह ने बताया है, कि व्यस्क पशुओं में कम वजन व जननागों के अल्प विकास से पशुओं में प्रजनन क्षमता में कमी देखने को मिल रही है। जैसा कि उपरोक्त में बताया गया है, कि इसका मुख्य कारण कुपोषण है। इफ्को टोकियो जनरल इंश्योरेंस लिमिटेड के वित्तीय सहयोग से कृषि विश्व विद्यालय और पशुपालन विभाग द्वारा मेरठ के ग्राम बेहरामपुर मोरना ब्लॉक जानी खुर्द में निशुल्क पशु स्वास्थ्य शिविर का आयोजन कुलपति डॉ के.के. सिंह एवं पशुपालन विभाग के अपर निदेशक डॉ अरुण जादौन के निर्देश में हुआ है।

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इस उपलक्ष्य पर परियोजना के मार्ग दर्शक डॉ राजवीर सिंह ने कहा है, कि मादा पशुओं को संतुलित आहार के साथ-साथ प्रोटीन और खनिज मिश्रण जरूर देना चाहिए। जिसकी सहायता से उनकी गर्भधारण क्षमता बरकरार रहे। परियोजना प्रभारी डॉ अमित वर्मा का कहना है, कि पशुओं में खनिज तत्वों के अभाव की वजह से भूख ना लगना, बढ़वार एवं प्रजनन क्षमता में कमी जैसे समय पर गर्मी में ना आना, अविकसित संतानो की उत्पत्ति, दूध उत्पादन में कमी, एनीमिया इत्यादि समस्याऐं आ सकती हैं। बतादें, कि पशुओं को प्रतिदिन 30 - 50 ग्राम मिनरल मिक्सचर पाउडर पशु आहार के लिए जरूर देना चाहिए। पशु स्वास्थ्य शिविर में पशु चिकित्सा महाविद्यालय कॉलेज मेरठ के विशेषज्ञों इनमें डॉ. अमित वर्मा, डॉ अरविन्द सिंह, डॉ अजीत कुमार सिंह, डॉ विकास जायसवाल, डॉ प्रेमसागर मौर्या, डॉ आशुतोष त्रिपाठी और डॉ रमाकांत इत्यादि की टीम के द्वारा 157 पशुओं को कृमिनाशक, बाँझपन प्रबंधन, गर्भावस्था निदान, रक्त व गोबर की जाँच जैसी पशु चिकित्सा सेवाएं और तदानुसार मुफ्त दवाएं भी प्रदान की गईं। पशु चिकित्साधिकारी डॉ रिंकू नारायण एवं डॉ विभा सिंह ने पशुपालन के लिए सरकार की तरफ से दिए जाने वाले किसान क्रेडिट कार्ड तथा सब्सिड़ी योजनाओं के संबंध में जानकारी प्रदान की। प्रशांत कौशिक ग्राम प्रधान समेत अन्य ग्रामवासियों ने शिविर के आयोजन हेतु कृषि विवि की कोशिशों की सराहना करते हुए धन्यवाद व्यक्त किया।

जानें टमाटर की कीमतों में क्यों और कितनी बढ़ोत्तरी हुई है

जानें टमाटर की कीमतों में क्यों और कितनी बढ़ोत्तरी हुई है

टमाटर के भाव में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है। टमाटर के एक थोक विक्रेता ने बताया है, कि बारिश एवं ओलावृष्टि की वजह से टमाटर की लगभग 50% प्रतिशत फसल चौपट हो गई। इससे आकस्मिक तौर पर बाजार में टमाटर की अवक में गिरावट आ गई, जिससे कीमतों में इजाफा होने लगा है। महाराष्ट्र राज्य में टमाटर की कीमतों में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। विगत एक सप्ताह के भीतर कीमत में 100% फीसद का इजाफा हुआ है। इससे आम जनता की रसोई का बजट प्रभावित हो गया है। परंतु, टमाटर की खेती करने वाले उत्पादकों के चेहरे पर मुस्कराहट आई है। कृषकों को यह आशा है, कि यदि इसी प्रकार से टमाटर के भावों में इजाफा होता रहा, तो वह थोड़ी-बहुत हानि की भरपाई कर सकते हैं। विगत माह महाराष्ट्र के टमाटर उत्पादक भाव में कमी आने के चलते लागत तक भी नहीं निकाल पा रहे थे। मंडियों के व्यापारी उनसे 2 से 3 रुपये किलो टमाटर खरीद रहे थे। परंतु, फिलहाल उनको टमाटर का अच्छा-खासा भाव अर्जित हो रहा है।

टमाटर की कीमत 30 से 60 रूपए प्रतिकिलो हो चुकी है

मीडिया एजेंसियों के अनुसार, महाराष्ट्र में टमाटर का खुदरा भाव 30 रुपये से बढ़ कर 50 से 60 रुपये प्रति किलो हो चुका है। अंधेरी, नवी मुंबई, मंबुई एवं ठाणे समेत विभिन्न शहरों में रिटेल बाजार में टमाटर 50 से 60 रुपये प्रति किलो के हिसाब से विक्रय किए जा रहे हैं। साथ ही, एपीएमसी वाशी के निदेशक संजय पिंगले ने बताया है, कि टमाटर की आवक में गिरावट आने के चलते भाव में इजाफा हुआ है।  कुछ महीने पहले मांग के मुकाबले टमाटर का उत्पादन काफी अधिक था। इस वजह से टमाटर का भाव धड़ाम से गिर गया था। तब खुदरा बाजार में टमाटर 20 से 30 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचे जा रहे थे। संजय पिंगले के अनुसार, जब टमाटर की आवक बढ़ेगी तब ही कीमतों में सुधार हो सकता है। हालांकि, अभी कुछ दिनों तक टमाटर की कीमत यथावत ही रहेगी। यह भी पढ़ें: भारत में लाल टमाटर के साथ-साथ काले टमाटर की भी खेती शुरू हो चुकी है

थोक व्यापारी इतने रुपए किलो टमाटर खरीद रहे हैं

वाशी के थोक व्यापारी मंगल गुप्ता ने बताया है, कि वर्षा और ओलावृष्टि की वजह से टमाटर की लगभग 50 प्रतिशत फसल चौपट हो चुकी है। इसकी वजह से अचानक बाजार में टमाटर की आवक में गिरावट आई है। नतीजतन भाव बढ़ने लगा। फिलहाल, थोक व्यापारी 16 से 22 रुपए किलो टमाटर खरीद रहे हैं। यही वजह है, जो इसका खुदरा भाव 60 रुपए किलो पर पहुँच गया है। मंगल गुप्ता के मुताबिक, मौसम अगर ठीक रहा तो कुछ ही हफ्तों के अंदर कीमत में गिरावट आ सकती है।

इन जगहों पर टमाटर की कीमतें हुई महंगी

साथ ही, पुणे के एक व्यवसायी ने बताया है, कि पहले रिटेल बाजार में टमाटर का भाव 10 से 20 रुपये प्रति किलो था। परंतु, दो माह के अंदर ही टमाटर कई गुना महंगा हो गया। बतादें, कि टमाटर की कीमतें राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली व महाराष्ट्र के साथ-साथ गाजियाबाद एवं नोएडा में भी बढ़ी हैं। जो टमाटर यहां पर एक सप्ताह पूर्व 15 से 20 रुपये प्रति किलो बिक रहा था। वर्तमान में उसकी कीमत 30 रुपये प्रति किलो पर पहुँच गई है।
MBA करने के बाद नौकरी की जगह खेती चुन किसान को हो रहा लाखों का मुनाफा

MBA करने के बाद नौकरी की जगह खेती चुन किसान को हो रहा लाखों का मुनाफा

आज हम आपको एक ऐसे किसान की कहानी सुनाऐंगे जो कि MBA जैसी बड़ी डिग्री करने के उपरांत बेहतर नौकरी तलाशने की बजाय खेती कर रहा है। यह युवा किसान बिहार से आता है, जिसने नौकरी की जगह कृषि को चुना और आज वह वार्षिक लाखों का मुनाफा उठा रहे हैं। 

आजकल युवा अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी बड़ी कंपनी में एक अच्छी नौकरी पाना चाहते हैं। परंतु, ऐसे युवा बहुत कम संख्या में हैं, जो कि नौकरी के बदले खेती को प्राथमिकता देते हैं। वह भी तब, जब किसी ने MBA जैसी बड़ी डिग्री हांसिल की हो। जी हां, ये कहने में तो आसान लगता है। परंतु, कुछ ऐसी ही कहानी है बिहार के शेखपुरा जनपद के रहने वाले प्रगतिशील किसान अभिनव वशिष्ट की। जिन्होंने अपनी MBA की पढ़ाई पूरी करने के बाद खेती में हाथ आजमाया और आज वह खेती से वार्षिक लाखों रुपये की आमदनी कर रहे हैं।

अभिनव वशिष्ट ने नौकरी के बजाय खेती को चुना 

किसान अभिनव वशिष्ट ने बताया कि वह विगत करीब 19 साल से खेती कर रहे हैं। उन्होंने M.Com और MBA तक अपनी पढ़ाई की है। अपनी पढ़ाई संपन्न करने के पश्चात उन्होंने नौकरी की बजाय खेती करना सही समझा और आज खेती से ही वह वार्षिक लाखों की कमाई कर रहे हैं, जो शायद ही उन्हें नौकरी में मिल पाता। उन्होंने यह कहा कि उनके पास खेती के लिए 35 एकड़ भूमि है, जिसमें 4 एकड़ में उनका आम का बगीचाऔर 2 तालाब हैं, जो 1-1 बीगा में बने हुए हैं।

औषधीय पौधों की खेती की वजह से मिल रहा अच्छा खासा लाभ

उन्होंने बताया कि वह खेती के साथ-साथ फिश फार्मिंग और डेयरी फार्मिंग भी करते हैं। डेयरी फार्मिंग में उनके पास 25 गाय और 4 भैंस हैं। किसान अभिनव ने बताया कि उनके यहां 2004 के पहले से ही पारंपरिक फसलें उगाई जा रही हैं, जिसमें चावल, गेहूं समते कई दलहनी फसले शामिल हैं। लेकिन अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने औषधीय पौधों की खेती करनी भी शुरू की। जिससे उनका मुनाफा कई गुना तक बढ़ गया। इसके अलावा उनका मुख्य फोकस सुगंधित पौधों की खेती पर रहा है। 

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किसान ने बताया कि वह सुगंधित पौधों में मिंट, सिट्रोनेला, तुलसी, लेमनग्रास और मेंथा की खेती किया करते हैं। जनपद के 5 से 6 लोगों ने मिलकर एक संगठन बनाया और धीरे-धीरे इन पौधों को संपूर्ण राज्य तक पहुंचाया है। किसान अभिनव का कहना है, कि सुगंधित पौधे की खेती करने के उपरांत एक यूनिट के जरिए प्रोसेसिंग पूरी की जाती है। 2005 में इस यूनिट को खरीदने में लगभग 5 लाख रुपये का खर्च आया था. मशीन को खरीदने में सरकार की तरफ से भी मदद मिली थी। 

किसान वार्षिक लाखों का मुनाफा उठा रहा है 

दरअसल, वर्षभर आने वाला खर्च और मुनाफे के विषय में बात करते हुए किसान अभिनव वशिष्ट ने कहा कि सुगंधित पौधे की खेती में अधिक खर्चा नहीं आता है। क्योंकि, एक बार इनके बीज या पौधा रोपने के पश्चात 7 से 8 वर्ष तक इन्हें बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इनकी खेती में वर्षभर में करीब 1 एकड़ में 25 से 30 हजार रुपये तक की लागत आती है। इससे करीब 70 से 75 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। इसी प्रकार 1 बीघा में फिश फार्मिंग में करीब डेढ लाख रुपये तक का खर्चा आता है। डेयरी फार्मिंग में यह खर्चा काफी कम बैठता है। उन्होंने बताया कि उनके तबेले से हर रोज 200 लीटर तक दूध निकलता है, जिसको वह बेच देते हैं। उन्होंने बताया कि वह कृषि, मछली पालन और डेयरी उद्योग से वार्षिक 20 से 25 लाख रुपये तक का मुनाफा कमा लेते हैं। इस हिसाब से उनकी वार्षिक आमदनी 30 लाख रुपये से अधिक है।

जानें दुम्बा बकरी की विशेषता और कीमत के बारे में

जानें दुम्बा बकरी की विशेषता और कीमत के बारे में

दुम्बा बकरी का बाजार में शानदार भाव इसकी खूबसरती तथा चकली के भारी पन के अधार मिलता है। बतादें, कि दो माह के समयांतराल में ही दुम्बा के बच्चे की कीमत 30000 रुपए तक पहुँच जाती है। बतादें, कि तीन चार महीने तक इसकी कीमत 70-75 हजार रुपए तक पहुँच जाती है। कृषकों की आमदनी बढ़ाने के लिए कृषि के अतिरिक्त पशुपालन भी एक शानदार विकल्प हो सकता है। पशुपालन में अब तक गाय बकरी एवं सुअर पालन के बारे में आपने सामान्यतः सुना होगा। लेकिन, दुम्बा पशुपालन इन्ही में से एक अच्छा विकल्प है। निश्चित तौर पर यह भी रोजगार का एक अच्छा विकल्प है। दुम्बा पालन की विशेष बात यह है, कि इसमें आमदनी काफी शानदार होती है। दरअसल, बाजार में दुम्बा की मांग भी होती है। इसके साथ ही, यह शीघ्रता से तैयार भी हो जाता है। अपनी इन्हीं समस्त विशेषताओं की वजह यह पशुपालन के माध्यम से पैसे कमाने का अच्छा विकल्प हो सकता है।

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में भी दुम्बा पालन

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जनपद के किसान गुड्डू अंसारी विगत चार वर्षों से दुम्बा पालन कर रहे हैं। इससे वो हर एक वर्ष लाखों रुपए अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि वो एक ऐसा रोजगार चाह रहे थे, जिसमें कम वक्त निवेश करना पड़े। साथ ही, शानदार मुनाफा प्राप्त हो इस वजह से उन्होंने दुम्बा पालन करने का निर्णय किया। गुड्ड का कहना है, कि शुरुआत में उन्होंने पांच दुम्बा से अपना व्यवसाय शुरु किया, जिसमें चार मादा एवं एक नर को रखा। इसके पश्चात उन्होंने बीस और दुम्बा खरीदा।

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दुम्बा बकरी की कीमत एवं वजन

दुम्बा बकरी की एक प्रजाति जिनकी दुम चक्की की पाट की तरह गोल और भारी होती है। दुम्बा की इस खूबी की वजह से इसकी कीमत भी अच्छी रहती है। इसलिए लोग इसे बेहद पसंद करते हैं। विशेष रूप से लोग नर को काफी ज्यादा पसंद करते हैं। साथ ही, इसके अतिरिक्त बच्चों को भी बेचते हैं। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि एक बार में दुम्बा एक ही बच्चे को पैदा करती है। बाजार मांग पर गुड्डू अंसारी उन्हें दुम्बा के बच्चे विक्रय करते हैं। दुम्बा सात माह से लगाकर 1 वर्ष के मध्य 9वें माह में बच्चा देती है। प्रारंभिक दो माह में ही बच्चा 25 – किलो का हो जाता है। इसकी शानदार खूबसरती एवं चकली के भारी पन के अनुरूप भाव मिलता है। बतादें, कि दो माह में ही दुम्बा के बच्चे की कीमत 30000 तक पहुँच जाती है। बतादें, कि तीन चार माह तक इसकी कीमत 70-75 हजार रुपए हो जाती है। दुम्बा के भाव नर अथवा मादा नहीं उसकी गुणवत्ता पर मिलते हैं। हालांकि, मादा दुम्बा का भाव अच्छा मिलता है, जो बच्चे दे सकती है। एक वर्ष के दुम्बे का वजन 100 किलोग्राम हो जाता है।

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दुम्बा पालक गुड्डू बकरी का चारा एवं रखरखाव किस तरह करते हैं

गुड्डू अंसारी का कहना है, कि वो दुम्बा को भूस की सानी खिलाते तथा चने का दाना खाने के तौर पर देते हैं। सर्दी के मौसम में चने का दाना, जौ एवं बाजरा खिलाते हैं। इसके अतिरिक्त शर्दियों से बचाने के लिए सरसों तेल का इस्तेमाल किया जाता है। 
मिनी सेगमेंट के ये पांच ट्रैक्टर बागवानी एवं कमर्शियल कार्यों के लिए काफी फायदेमंद हैं

मिनी सेगमेंट के ये पांच ट्रैक्टर बागवानी एवं कमर्शियल कार्यों के लिए काफी फायदेमंद हैं

जैसा कि हम सब जानते हैं, कि बाजार में आजकल मिनी ट्रैक्टर के बहुत सारे ऐसे मॉडल आ रहे हैं, जिनसे खेती-किसानी के समस्त कार्य हो रहे हैं। अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित ये ट्रैक्टर लुक और डिजायन की बदौलत नये जमाने के किसानों के पसंदीदा हैं। इस वजह से इनकी मांग भी तीव्रता से बढ़ रही है। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि 5 लाख रुपये से कम बजट हैं और ऐसा ट्रैक्टर खरीदना है, जिससे आप खेती के कार्य पूर्ण कर सकें। उसे बागवानी के व्यवसाय में इस्तेमाल कर सकें। साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर कमर्शियल कार्य भी पूरे हो सकें, तो इन सभी कामों के लिए बड़ा ट्रैक्टर खरीदने की आवश्यकता नहीं है। ये समस्त कार्य छोटा ट्रैक्टर भी बड़ी सहजता से पूरा कर सकता है। ट्रैक्टर बाजार में छोटे ट्रैक्टर का ट्रेंड काफी रफ्तार पकड़ रहा है। साथ ही, हर बड़ी कंपनी मिनी ट्रैक्टर के मॉडल लॉन्च कर रही है। 18-28HP की पावर में कौन से उत्तम 5 मिनी ट्रैक्टर हैं। जानें इनकी विशेषता और कीमतों के विषय में।

1 -Swaraj Code

किसान भाइयो स्वराज कोड 2WD ट्रैक्टर खेत में कार्य करने के लिए छोटा मगर काफी दमदार ट्रैक्टर है। इस मिनी ट्रैक्टर के उपयोग से बागबानी के कार्य अच्छी तरह से किये जा सकते हैं। 11HP वाले इस ट्रैक्टर में 389CC का 1 सिलेंडर इंजन है। ट्रैक्टर का भार लगभग 455 किलोग्राम है। वहीं, इसकी लिफ्टिंग क्षमता की बात की जाए तो 220 किलोग्राम है। ट्रैक्टर में 2 व्हील ड्राइव है। इसमें 6 गियर हैं, जिसमें से 6 फॉरवर्ड एवं 3 रिवर्स गियर हैं। ट्रैक्टर में ऑइल इमर्स्ड ब्रेक मौजूद हैं। स्वराज कोड ट्रैक्टर की कीमत 2.45- 2.50 लाख रुपये है। यह भी पढ़ें:
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2 -Kubota Neostar A211N-OP

बतादें, कि मिनी सेगमेंट ट्रैक्टर के अंतर्गत कुबोटा न्यूस्टार A211N-OP भी एक अच्छा विकल्प है। इस ट्रैक्टर में 1001 cc का 3 सिलेंडर इंजन है, जिसकी पावर 21 हॉर्सपावर है। इस ट्रैक्टर में सिंगल ड्राई सिंगल प्लेट क्लच सिस्टम है। इसका स्टेयरिंग मैनुअल है, 9 फॉरवर्ड और 3 रिवर्स गीयर हैं। इसकी कीमत 4.40 लाख रुपये से चालू है। कम कीमत में ये किसानों के लिए एक दमदार ट्रैक्टर है, जो कि खेती के अतिरिक्त बागवानी के कार्यों को भी सुगमता से कर सकता है।

3 -New Holland Simba 30

किसान भाइयों के लिए मिनी ट्रैक्टर में खरीदने के लिए न्यू हॉलैंड का Simba 30 भी उत्तम विकल्प है। इस ट्रैक्टर में 4 व्हील ड्राइव है और 29 HP का इंजन है। इसमें 9 फॉरवर्ड गेयर के साथ 3 रिवर्स गेयर मौजूद हैं। ट्रैक्टर में पावर स्टेयरिंग एवं ऑइल इमर्स्ड ब्रेक हैं। इसकी लिफ्टिंग कैपेसिटी 750 किलोग्राम है। ट्रैक्टर की कीमत 5 लाख रुपये से चालू होती है।

4 - Mahindra Oja 2121

यह न्यू लॉन्च ट्रैक्टर 4WD विशेषताओं से युक्त है, जिससे यह कितने भी ऊबड़-खाबड़ अथवा ऊंची नीची जगह पर चल सकता है। इस ट्रैक्टर में 3 सिलेंडर के साथ 21 HP का इंजन लगा है, जिससे इसका माइलेज बेहद शानदार आता है। ट्रैक्टर में 2400RPM है। ट्रैक्टर में 12 फॉरवर्ड के साथ 12 ही रिवर्स गीयर मौजूद हैं। ट्रैक्टर में ऑइल इमर्स्ड ब्रेक उपलब्ध हैं। ये फ्यूल एफिशियेंट ट्रैक्टर है। इसमें आपको पावर स्टेयरिंग मिलेगा। इसके रियर टायर का आकार 8x18 है। ट्रैक्टर की लिफ्टिंग कैपेसिटी 950 किलोग्राम है। यह भी पढ़ें: महिंद्रा ने भारत के 77 वें स्वतंत्रता दिवस के पावन पर्व पर 7 ट्रैक्टर लॉन्च किए

5 - Sonalika MM18

सोनालिका मिनी ट्रैक्टर MM 18 में 863.5CC के साथ 18HP का इंजन उपलब्ध है। यह सिंगल सिलेंडर एवं वॉटर कूल्ड इंजन है, जो 1200RPM पर 54Nm टॉर्क उत्पन्न करता है। इसके फ्यूल टैंक की क्षमता 28 लीटर है। सोनालिका मिनी ट्रैक्टर MM 18 में स्लाइडिंग मैश के साथ मैनुअल गीयरबॉक्स है। ट्रैक्टर में ड्राई ब्रेक और मेकेनिकल स्टीयरिंग मौजूद है। इसमें सिंगल क्लच सिस्टम है और डुअल PTO और PTO स्पीड 540 है। सोनालिका मिनी ट्रैक्टर MM 18 का वजन 1160 किलोग्राम है। इसकी कीमत 3 लाख रुपये से कम है।
सिम्बा -30 : न्यू हॉलैंड ट्रैक्टर इंडिया कंपनी ने भारतीय किसानों के अनुरूप एक नया कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर लॉन्च किया 30HP की उप-श्रेणी में

सिम्बा -30 : न्यू हॉलैंड ट्रैक्टर इंडिया कंपनी ने भारतीय किसानों के अनुरूप एक नया कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर लॉन्च किया 30HP की उप-श्रेणी में

अमेरिका के पेनिसलेवेनिया के न्यू होलेंड (New Holland) नाम की जगह से 1895 में शुरू हुई न्यू हॉलैंड एग्रीकल्चर (New Holland Agriculture) नाम की कंपनी पिछले कुछ सालों से कृषि से जुड़े किसानों के लिए इस्तेमाल में आने वाली मशीनें और ट्रैक्टर जैसे उत्पाद बनाती है।

न्यू हॉलैंड ट्रैक्टर सिम्बा-30 (New Holland Tractor Simba - 30)

न्यू हॉलैंड ट्रैक्टर इंडिया कंपनी ने भारतीय किसानों की जरूरतों और खेती में इस्तेमाल आने वाले ट्रैक्टर की मांग के अनुसार अपना एक नया ट्रैक्टर लॉन्च कर दिया है, जिसे सिम्बा-30 (Simba-30) नाम दिया गया है। 30 हॉर्स पावर के इंजन वाला यह ट्रैक्टर बहुत ही कॉम्पैक्ट डिजाइन में बनाया गया है। ढलान वाली जगहों पर बेहतर तरीके से जुताई और सामान ढोने के लिए ट्रैक्टर की मजबूती का भी पूरा ध्यान रखा गया है, सिम्बा ट्रैक्टर की लिफ्टिंग कैपेसिटी 750 किलोग्राम से भी अधिक है। सिंगल क्लच के साथ आने वाला यह ट्रैक्टर पावर स्टेरिंग जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध करवाता है। हिमाचल प्रदेश के टिहरी गढ़वाल जिले के किसान नवदीप सिंबा ट्रैक्टर के इस मॉडल की टेस्ट ड्राइव कर चुके हैं और इसे अपने खेत में भी चला कर देख चुके हैं। नवदीप बताते हैं कि कंपनी ने इस ट्रैक्टर को पावर और एफिशिएंसी के एक बेहतरीन कॉन्बिनेशन के रूप में तैयार किया है और पहली बार किसी मॉडल को बनाने में भारतीय किसानों की आवश्यकता और भारत की जमीन तथा भूभाग के आकार का ध्यान रखा गया है।

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किसानों के लिए बहुत किफायती हैं न्यू हॉलैंड के ये ट्रैक्टर पिछले कुछ सालों में एक बड़े क्वालिटी ब्रांड के रूप में उभरकर आई न्यू-होलैंड नाम की यह ट्रैक्टर कंपनी बेहतरीन 'इंजन इंजीनियरिंग' की मदद से आज इतने दमदार ट्रैक्टर बना रही है। पिछले 3 सालों से कंपनी की रिसर्च टीम 30 हॉर्स पावर कैटेगरी के मिनी ट्रैक्टर को लेकर परीक्षण कर रही थी, जो कि अब धान और दूसरे प्रकार की खेती में इस्तेमाल आने वाले मॉडल सिंबा के रूप में सामने आया है। कंपनी के भारतीय जोन (Indian zone) के मैनेजिंग डायरेक्टर रोनक वर्मा के अनुसार इस साल कंपनी कम से कम 500 से 600 ट्रैक्टर बेचने का टारगेट बना चुकी है, जल्दी ही 30 HP श्रेणी में अपना दबदबा बनाने का लक्ष्य रखा गया है। पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी के पूरे विश्व भर में बिके 9 लाख ट्रैक्टर में से, भारत में ही लगभग एक लाख से अधिक ट्रैक्टर बिके हैं, इसी बात को ध्यान में रखते हुए अब कंपनी भारतीय मार्केट पर पूरा फोकस करना चाहती है। साथ ही रौनक बताते हैं कि कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्य के किसानों के द्वारा सिंबा ट्रैक्टर को काफी पसंद भी किया जा रहा है। यदि बात करें इस ट्रैक्टर की कुछ और स्पेसिफिकेशन की तो इसे एयरोडायनेमिक (Aerodynamic) डिजाइन में बनाया गया है, मेटल से बने बोनट में बेहतरीन क्वालिटी का लॉक सिस्टम दिया गया है जो कि ट्रैक्टर की चाबी से ही खुल सकता है। एलइडी डिजाइन के इंडिकेटर के साथ ही ट्रैक्टर के वजन में बैलेंस बनाए रखने के लिए बैटरी को सामने के हिस्से में लगाया गया है, जिससे कि वजन खींचते समय ट्रैक्टर अपना संतुलन बनाकर रख सके। हैलोजन हेड लाइट के साथ आने वाला यह ट्रैक्टर चलते समय बहुत ही कम आवाज करता है। मित्सुबिसी (Mitsubishi) का  29 हॉर्स पावर और 1300cc का इंजन बेहतरीन कूलिंग सिस्टम के साथ ट्रैक्टर को पावर देने के लिए पर्याप्त दिखाई दे रहा है। आगे चलाने के लिए फ्रंट में 9 गियर और रिवर्स में 3 गियर के साथ आने वाले इस सिम्बा ट्रैक्टर की मेंटेनेंस कोस्ट भी काफी कम बताई जा रही है। एनालॉग टाइप का इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर ड्राइवर को फ्यूल और स्पीड के बारे में पूरी जानकारी तो देगा ही, वहीं पास ही लगा मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट जैसी अत्याधुनिक तकनीकों किसानों की ड्राइविंग को आसान बनाने में मददगार साबित हो सकती है। ट्रैक्टर के सामने के टायर 12 इंच की साइज में जबकि पीछे के टायर 20 इंच की साइज के साथ आते हैं। 4 व्हील ड्राइव मोड में आने वाला यह ट्रैक्टर न्यू हॉलैंड कंपनी के ही भारत विकास केंद्र में तैयार किया गया है। इंजन से निकलने वाली गर्मी को रोकने के लिए दोनों तरफ हीट गार्ड लगाए गए हैं। न्यू हॉलैंड एग्रीकल्चर कंपनी का यह सिम्बा-30 मॉडल ट्रैक्टर वर्तमान में नीले कलर में उपलब्ध है, हालांकि अभी तक इस ट्रैक्टर की ऑफिसियल कीमत के बारे में कोई खुलासा नहीं हो पाया है। कम्पनी की टीम आने वाले समय में 30 हॉर्स पावर की केटेगरी में ही ट्रैक्टर के कई और मॉडल लांच करने के लिए उत्साहित नजर आ रही है, क्योंकि सिम्बा मॉडल को लॉन्चिंग के बाद से ही किसान भाइयों के द्वारा अच्छा खासा पसंद किया जा रहा है।
पढ़िए बिहार के MBA पास किसान की बेमिसाल कहानी, अब तक बांट चुके हैं 15 लाख पौधे

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पटना। आज हम आपके लिए लेकर आये हैं, पढ़े-लिखे किसान की बेमिसाल कहानी। आमतौर पर यह धारणा रहती है कि खेती-किसानी करने वाले किसान पढ़े-लिखे नहीं होते हैं। लेकिन आज पढ़िए एक ऐसे किसान की कहानी, जो MBA की पढ़ाई पास करके 40 एकड़ से ज्यादा जमीन में करता है खेती और अब तक देश के विभिन्न स्थानों पर 15 लाख से ज्यादा पौधे बांट चुका है।


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जी हां, हम बात कर रहे हैं कि बिहार के मधुबनी जिले के बिरौल गांव के रहने वाले कपिल देव झा (Kapil Dev Jha) की, जिन्होंने MBA की पढ़ाई पूरी करके 17 साल तक एक फाइनेंस कंपनी में काम किया, लेकिन नौकरी छोड़कर आज खेती किसानी का काम कर रहे हैं। साधारण कद-काठी वाले कपिल इन दिनों 40 एकड़ जमीन पर पेड़-पौधों की नर्सरी (Nursery) लगाते हैं और अब तक देश के विभिन्न स्थानों पर 15 लाख से ज्यादा पौधे बांट चुके हैं।

40 एकड़ का घना जगंल बना है फार्म हाउस

गांव के निकट ही सड़क किनारे कपिल ने 40 एकड़ में एक फार्म हाउस बना रखा है। इसमें कुछ पौधे फलों व कुछ लकड़ियों के लिए लगाए गए हैं, जिनको देखकर पूरा फार्म हाउस एक घने जंगल की तरह दिखाई देता है।

आम की बीजू वैरायटी संजोये हुए हैं कपिल

कपिल ने अपने फार्म हाउस में 3500 से अधिक आम के पेड़ लगाए हुए हैं। वर्तमान स्थिति में अधिकांश किसान ग्राफ्टेड आम पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। कपिल देव लगातार वर्षों पुरानी बीजू वैरायटी को संजोये हुए हैं, जबकि अधिकांश किसान बीजू आम को वरीयता नहीं दे रहे हैं। हालांकि आज भी अच्छी सेहत और लकड़ी के मामले में बीजू आम का कोई मुकाबला नहीं है।


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खेतों की मेड़ पर लगा रखे हैं पोपलर के पेड़

पूरे फार्म हाउस में अच्छी पैदावार के लिए जमीन को कई छोटे-बड़े खेतों में बांट रखा है और खेतों की मेड़ पर पोपलर के पेड़ लगा रखे हैं, जो काफी फायदेमंद साबित हो रहे हैं।

मिनी फारेस्ट बनाने वाले कपिल को ग्रामीण बोलते हैं मालिक

कपिल देव निरंतर निस्वार्थ रूप से अपना पूरा जीवन पर्यावरण और जल संरक्षण में लगाकर मानव-जाति के कल्याण में जुटे हुए हैं और लोगों की जिंदगी में प्रेम का भाव जागृत कर रहे हैं। यही वजह है कि स्थानीय लोग कपिल देव को मालिक कहकर पुकारते हैं।

वाटर कंजर्वेशन में किया है काम

कपिल देव के 40 एकड़ मिनी फॉरेस्ट में 5 एकड़ का एक तालाब है। इसी तालाब में वाटर कंजर्वेशन का काम कर रहे हैं, जिसमें वह मछ्ली पालन के साथ-साथ मखाने की खेती भी करते हैं। इन्ही खूबियों के कारण आज उनकी गांव में अलग ही पहचान बन गई है।
गोबर के जरिए फौज की वर्दी निर्मित करने के साथ ही, उत्पादन योग्य बनाया जाएगा रेगिस्तान

गोबर के जरिए फौज की वर्दी निर्मित करने के साथ ही, उत्पादन योग्य बनाया जाएगा रेगिस्तान

केंद्र एवं राज्य सरकार के माध्यम से राजस्थान के जनपद कोटा में कृषि महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर से विभिन्न स्टार्टअप (startup) भी शम्मिलित होने के लिए पहुंच रहे हैं। इसमें एक अनोखा स्टार्टअप (startup) भी सम्मिलित हुआ है, इसके अंतर्गत गोबर के जरिए रसायन निर्मित कर विभिन्न रूप में प्रयोग किया जा रहा है। आईआईटियन (IITians) डॉक्टर सत्य प्रकाश वर्मा के मुताबिक उनके द्वारा गोबर खरीदी होती है। उसके बाद में विभिन्न प्रकार के रसायन तैयार किए जाते हैं। इस रसायन के उपयोग से सेना के जवानों की वर्दी भी बनाई जा सकती है। इसके अतिरिक्त रेगिस्तान को उत्पादक निर्मित करने एवं पुताई हेतु भी प्रयोग किए जाने वाले पेंट भी तैयार हो रहा है। डॉ. सत्य प्रकाश वर्मा कहा है, कि यह गाय के गोबर द्वारा रसायनिक विधि के माध्यम से निकलने वाले नैनोसैलूलोज से हो रहा है। डेढ़ वर्ष पूर्व उन्होंने स्टार्टअप गोबर वाला डॉट कॉम (.com) चालू किया था। जिसके माध्यम से प्राप्त होने वाले गोबर द्वारा रसायन प्रोसेस के जरिए नैनोसैलूलोज तैयार किया जा रहा है। जो कि हजारों रुपए किलोग्राम में विक्रय किया जा रहा है। इसके विभिन्न अतिरिक्त इस्तेमाल भी किए जा रहे हैं। उनका यह दावा है, कि नैनोसैलूलोज तैयार होने के उपरांत गोबर में बचा हुआ तरल एक गोंद की भांति हो जाता है, जिसको लिग्निन कहा जाता हैं। यह लिग्निन प्लाई निर्माण के कार्य में लिया जाता है एवं 45 रुपए प्रतिकिलो तक के भाव में विक्रय होता है।
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राजस्थान राज्य के जनपद कोटा में जय हिंद नगर के रहने वाले सत्य प्रकाश वर्मा जी विगत कई वर्षों से पशुओं के अपशिष्ट के ऊपर गंभीरता से शोध में जुटे हुए हैं। उन्होंने वर्ष 2003 में आईआईटी बॉम्बे से रसायन इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की है। साथ ही, वर्ष 2007 के दौरान उन्होंने पीएचडी भी आईआईटी बॉम्बे से करी है। इसके उपरांत फ्लोरिडा से मार्केटिंग मैनेजमेंट से भी पीएचडी कर रखी है। सत्यप्रकाश वर्मा जी ने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट मुम्बई (National Institute of Management Mumbai) से एमबीए की डिग्री भी हांसिल की है। इस सब के उपरांत सत्य प्रकाश एवं उनकी इंजीनियर पत्नी भावना गोरा दुबई में रहने लगे। दुबई में उन्होंने ऑयल इंडस्ट्री में नौकरी किया करते थे। उसके कुछ समय उपरांत वहीं पर स्वयं का व्यवसाय आरंभ किया एवं ऑयल एंड गैस कंपनीज हेतु उत्पाद निर्मित करने में जुट गए। इस समय के अंतर्गत सत्य प्रकाश जी गाय, बकरी और सुअर के अपशिष्ट पदार्थों पर निरंतर शोध में लगे हुए थे। वह स्वयं की कंपनी को भारत में स्थापित करने के उद्देश्य से ही देश वापस आए हैं।

वैदिक पेंट जलरोधक होता है

डॉ. सत्य प्रकाश वर्मा का कहना है, कि गोबर द्वारा निकाले गए इस अल्फा नैनोसैलूलोज का इस्तेमाल वैदिक पेंट को बनाने हेतु होता है। इसका इस्तेमाल तीन प्रकार की पेंटिंग करने के लिए किया जाता है। इन तीन प्रकार में पहला वॉल पुट्टी, दूसरा वॉल प्राइमर एवं तीसरा इमर्शन होता है। इसको प्लास्टिक पेंट के नाम से भी जाना जाता है। वॉल पुट्टी के उपरांत किसी भी पेंट की जरुरत नहीं पड़ती है। यह आपको विभिन्न रंग में मिल जाता है एवं यह पेंट वाटरप्रूफ भी रहता है। आपको बतादें, कि इसका उपयोग अब बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है। ये भी देखें: इस राज्य की आदिवासी महिलाएं गोबर से पेंट बनाकर आत्मनिर्भर बन रहीं हैं

रेगिस्तान को इस विधि से बनाया जा रहा है उपजाऊ क्षेत्र

उनका कहना है, कि नैनो बायो उर्वरक तैयार करने में भी नैनोसैलूलोज का इस्तेमाल किया जाता है। इसके माध्यम से रेगिस्तान की रेतीली भूमि को उपजाऊ किया जाता है। नैनोसैलूलोज की निश्चित मात्रा को रेगिस्तान की मिट्टी पर फैलाया जाता है। तदोपरांत वह जमाव हेतु तैयार हो जाती है। रेगिस्तान की भूमि पहले से कहीं अधिक उत्पादक होती है। भूमि में मात्र जमाव का तत्व विघमान नहीं होता है, वह भी नैनोसैलूलोज डालने के उपरांत आ जाता है।

डीआरडीओ की सहायता से निर्मित की जा रही फौज की वर्दी

डॉ.सत्य प्रकाश के बताने के अनुसार, नैनोसैलूलोज के माध्यम से वे फाइबर का निर्माण कर रहे हैं। जिसका इस्तेमाल सैनिकों की वर्दी निर्मित करने हेतु हो रहा है। इसके अंतर्गत हेलमेट से लेकर जूता तक भी आता हैं। उनका कहना है, कि यह यूनिफॉर्म सामान्यतः सैनिकों की वर्दी से बेहद कम वजन व अधिक मजबूत भी मानी जाती है। यह वर्दी पसीने को भी सोख जाती है। इसके अतिरिक्त यदि सैनिक घायल हो जाए, तो इस यूनिफार्म के कारण से ब्लड क्लॉटिंग बड़ी सुगमता से हो जाती है। इस प्रकार यह एक टिशू रीजनरेशन आरंभ कर देती है। इससे जवान के जीवन की समयावधि काफी बढ़ जाती है।
दूध बेचने पर राजस्थान सरकार दे रही है 5 रुपए अनुदान, जानें कैसे ले सकते हैं लाभ

दूध बेचने पर राजस्थान सरकार दे रही है 5 रुपए अनुदान, जानें कैसे ले सकते हैं लाभ

राजस्थान सरकार ने अपने राज्य में पशुपालकों को प्रोत्साहन देने के लिए एक बहुत ही अच्छी पहल की है। यहां पर दुग्ध उत्पादन करने वाले लोगों के लिए सरकार ने एक स्कीम शुरू की है। जिसे दूध उत्पादक संबल योजना का नाम दिया गया है। इस योजना के तहत प्रति लीटर दूध बेचने पर पशुपालकों को सरकार की तरफ से ₹5 अनुदान के तौर पर दिया जाएगा। राजस्थान सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2019 में इस स्कीम को लागू किया गया था। उसके बाद से अभी तक 764 करोड रुपए अनुदान राशि के तौर पर पशुपालकों को दिए जा चुके हैं।

पहले दी जाती थी ₹2 अनुदान राशि

दूध उत्पादक संबल योजना की शुरुआत की बात की जाए तो सरकार ने इसे 2013 में ही लागू कर दिया था। लेकिन कुछ कारणों से इसे बीच में ही बंद करना पड़ा। 2019 में इस स्कीम को पुनः लागू किया गया और इसके तहत पशुपालकों को प्रति लीटर दूध बेचने पर ₹2 अनुदान राशि दी जाती थी। सरकार की तरफ से 2022 में यह अनुदान राशि बढ़ाकर ₹5 कर दी गई है। सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार राजस्थान सरकार ने लगभग 550 करोड रुपए बजट में इस योजना के लिए रखें हैं। राजस्थान सरकार में 9 लाख से भी ज्यादा पशु पालक इस योजना के तहत लाभ उठा रहे हैं।

कौन-कौन से पशुपालक उठा सकते हैं लाभ

राजस्थान में जो भी पशु पालक राज्य के सरकारी दुग्ध उत्पादन संघ को दूध बेचते हैं। वह इस स्कीम के तहत अनुदान राशि ले सकते हैं। बहुत से पशुपालक ऐसे भी हैं, जो प्राइवेट कंपनी को अपना दूध बेचते हैं। लेकिन उन्हें इस स्कीम के तहत लाभार्थी नहीं बनाया गया है। हालांकि, यह पशुपालक भी लंबे समय से अनुदान राशि की मांग कर रहे हैं। अभी केवल सहकारी दुग्ध उत्पादन संघ को दूध बेचने वाले पशुपालकों को भी इसके तहत रखा गया है। प्राइवेट कंपनी को दूध बेचने वाले पशुपालकों के लिए सरकार की तरफ से कोई खबर सामने नहीं आई है। ये भी देखें: पशुओं का दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए करे ये उपाय, होगा दोगुना फायदा

कैसे उठा सकते हैं पशुपालक लाभ

इस योजना के तहत दूध बेचने वाले सभी लोगों को डीबीटी के माध्यम से यह अनुदान राशि भेजी जाती है। पशुपालकों को इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए कुछ दस्तावेज भी जमा करवाना जरूरी है। ताकि अच्छी तरह से उनकी पहचान हो सके। इन दस्तावेज में स्थाई निवास प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, आय प्रमाण पत्र, संबंधित पशु का ब्यौरा, बैंक अकाउंट डीटेल और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर शामिल है। अगर आप इस योजना के तहत लाभ उठाना चाहते हैं। तो आप सरकार द्वारा ही जारी किए गए डेयरी बूथ पर जाकर इसके बारे में जानकारी ले सकते हैं। इसके अलावा अधिक जानकारी के लिए आप अपने जिले के पशुपालन विभाग के कार्यालय में जाकर भी संपर्क कर सकते हैं। दूध उत्पादक संबल योजना का लाभ उठाने के लिए सरकार की ओर से जारी किए डेयरी बूथ पर संपर्क कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए अपने जिले के पशुपालन विभाग के कार्यालय में भी संपर्क कर सकते हैं।
बदली MBA पास की किस्मत, अमरूद की खेती से बना करोड़पति

बदली MBA पास की किस्मत, अमरूद की खेती से बना करोड़पति

आज का अधिकांश युवा वर्ग खेती किसानी की तरफ रुख कर रहा है. इससे उन्हें उनके सुनहरे भविष्य को नये पंख लग रहे हैं. नई सोच और नई तकनीक से खेती के मायने बदलने वाले युवाओं में से एक हैं MBA पास राजीव भास्कर. जो अमरूद बेचकर करोड़पति बन गये हैं. राजीव भास्कर का जन्म नैनीताल में हुआ था. उन्होंने रायपुर की एक बीज कंपनी में भी काम किया. जिसमें उन्हें विशेषज्ञता मिली. जिस वजह से वो आज एक समृद्ध और उद्यमी किसान बन सके. राजीव ने बताया कि, उन्होंने बिक्री और मार्केटिंग के मेंबर के तौर पर VNR सीड्स कंपनी में करीब चार सालों तक काम किया. इस दौरान उन्होंने देश के अलग अलग क्षेत्र के कई किसानों के साथ मुलाकात की. जिसके बाद उन्हें खेती और किसानी से जुड़ी कई अहम जानकारियां मिली. इन्हीं जानकारियों के दम पर राजीव भास्कर ने नौकरी छोड़ कर खेती करने का फैसला किया.

MBA पास कर शुरू की खेती

राजीव भास्कर ने कृषि से BSC पूरा किया. हालांकि जब तक उन्होंने VNR बीजों के साथ काम करना नहीं शुरू किया था, तब तक खेती किसानी की दिशा में उन्होंने आगे बढ़ने के बारे में भी नहीं सोचा था. जिस बीच राजीव ने MBA का कोर्स कर लिया. जो Distance Learning था. राजीव भास्कर बताते हैं कि, जैसे जैसे उन्होंने बीजों और पोधौं को बेचने का काम शूरू किया, वैसे वैसे कृषि में उनकी दिलचस्पी भी बढ़ती गयी. जिसके बाद उन्होंने इस ओर काम करने का मन बना लिया. नौकरी के साथ ही राजीव ने अमरूद की थाई किस्म के बारे में जाना और समझा. जिसने बाद उन्होंने इसकी खेती करने का फैसला लिया, और काम शुरू कर दिया. ये भी देखें:
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5 एकड़ जमीन पर की खेती, चमक गयी किस्मत

राजीव ने अमरूद की खेती के लिए सबसे पहले 5 एकड़ जमीन किराए पर ली. उन्होंने इसकी खेती हरियाणा के पंचकुला में की. उन्होंने अमरूद की थाई किस्म की खेती की और उसके लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी. जिसके बाद राजीव के उगाए थाई किस्म के अमरूदों ने पूरे हरियाणा में तहलका मचा दिया और इसकी डिमांड बढ़ गयी. जिसके चलते सिर्फ पांच सालों में ही राजीव करोड़पति बन गये. लेकिन इन पांच सालों में उनकी खेती का रकबा बढ़ा और आज वो 5 नहीं बल्कि 25 एकड़ की जमीन में थाई किस्म के अमरूद की खेती कर रहे हैं.

अच्छी पैदावार के लिए जैविक खेती जरूरी

राजीव भास्कर की उम्र महज 30 साल ही है. उनकी मानें तो अब तक उनके खेत में लगभग 12 हजार अमरूद के पेड़ हैं. जिसके चलते वो एक साल में करीब एक से डेढ़ करोड़ तक की कमाई कर रहे हैं. राजीव बताते हैं कि, नौकरी छोड़ने के बाद जब उन्होंने पहली बार खेती करनी शुरू की थी तो, उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि, ज्यादा विकास और ज्यादा उत्पादन के लिए अच्छे उर्वरक और सिंचाई की जरूरत होती है. राजीव भास्कर अपने उगाए हुए अमरूद की खेती के बारे में बताते हुए कहते हैं कि, उनके अमरूद ना सिर्फ टेस्टी बल्कि हेल्दी और पौष्टिक तत्वों से भरपूर हैं. इसके अलावा उनका यह भी कहना है कि, अगर आप जमीन पर खेती कर रहे हैं, और उर्वरकों का कम इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उस जगह पर जैविक खेती करने से अच्छी पैदावार मिल सकती है. राजीव कहते हैं कि, वो अपना सारा सामान दिल्ली एपीएमसी मार्केट तक पहुंचाते है. जहां उन्हें एक हफ्ते की पेमेंट दी जाती है. अच्छी वैरायटी और मौसम के हिसाब से उन्हें प्रति किलो अमरूद के 40 से 100 रुपये के बीच तक होती है. जिस तरह वो सालाना प्रति एकड़ के हिसाब से लगभग 6 लाख रुपये तक कमाते हैं.
जानें कृषि क्षेत्र से संबंधित व्यवसायों के बारे में जिनसे आप अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं

जानें कृषि क्षेत्र से संबंधित व्यवसायों के बारे में जिनसे आप अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं

मधुमक्खी पालन करने के दौरान आप केवल शहद से ही धन नहीं कमाते। आप रॉयल जैली, विष, मोम, पराग और प्रापलिस के माध्यम से भी आप अच्छा-खासा धन अर्जित कर सकते हैं। सामान्य सी बात है, हर इंसान को मुनाफा चाहिए होता है। फिर चाहे वो खेती से हो अथवा किसी व्यापार से अर्जित हो। दरअसल, अब आप अपने कृषि को ही व्यवसाय बनाकर उसी से अच्छा-खासा मुनाफा अर्जित कर सकते हैं। आज हम आपको ऐसे ही बहुत सारे व्यवसायों के विषय में जानकारी देंगे, जिनसे आप आसानी से अच्छा खासा मुनाफा प्रति माह कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है, कि इस व्यवसाय के लिए आपको अत्यधिक धन भी निवेश करने की आवश्यकता नहीं है। तो आइए आपको बताते हैं, बेस्ट कृषि व्यवसायों के विषय में।

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दूध का काम

दूध का काम किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। यदि आपके पास गांव देहात में अच्छी खासी जमीन है, तो आप दूध का काम चालू कर सकते हैं। दूध के कार्य में काफी धन एवं यह कृषि व्यवसायों में सबसे ज्यादा मुनाफे का व्यवसाय है। इसे आरंभ करने के लिए काफी ज्यादा निवेश की भी आवश्यकता नहीं पड़ती एवं मुनाफा भी काफी जम कर होता है।

शहद का काम यानी मधुमक्खी पालन

दुसरे नंबर पर शहद का काम आता है। शहद का काम जिसको हम मधुमक्खी पालन भी कहते हैं, काफी ज्यादा साफ काम है। मधुमक्खी पालन करने के दौरान आप केवल शहद से ही धन अर्जित नहीं करते हैं। उसके साथ-साथ मोम, पराग, प्रापलिस, रॉयल जैली और विष इत्यादि के माध्यम से भी आप मोटा धन अर्जित कर सकते हैं। इस कार्य को आप काफी कम धन लगा कर भी चालू कर सकते हैं।

फूलों की खेती

बाजार में फूलों की मांग प्रति दिन बढ़ रही है। पहले फूल केवल पूजा पर उपयोग होते थे। परंतु, अब हर फंक्शन में इस्तेमाल होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि फूलों की कीमत किसानों को काफी अच्छी मिल जाती है। साथ ही, फूलों की पैदावार भी किसी अन्य फसल से कहीं अधिक होती है। एक बार किसी फूल का पौधा लग गया तो वह तीन से चार बार फूल देकर ही जाता है।
बैंक की नौकरी छोड़ महज डेढ़ कट्ठा में मशरूम उत्पादन कर 60 हजार महीना कमा रहा किसान

बैंक की नौकरी छोड़ महज डेढ़ कट्ठा में मशरूम उत्पादन कर 60 हजार महीना कमा रहा किसान

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि किसान देवाशीष कुमार MBA पास हैं। वह पहले एचडीएफसी बैंक में नौकरी किया करते थे। परंतु, उनका मन खेती में नहीं लगता था। अब ऐसी स्थिति में उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़कर उन्होंने मशरूम की खेती चालू कर दी। खेती की शुरुआत उन्होंने महज एक हजार रुपये से की थी। मशरूम की सब्जी बेहद ही ज्यादा स्वादिष्ट होती है। इसका सेवन करना अधिकांश लोग पसंद करते हैं। मशरूम में विटामिन B1, विटामिन B2, विटामिन B12, विटामिन C, विटामिन E, प्रोटीन, खनिज, डाइटरी फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसका नियमित तौर पर सेवन करने से लोगों के शरीर में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती है। यही कारण है, कि बाजार में मशरूम की मांग काफी बढ़ती जा रही है। ऐसी स्थिति में इसकी खेती करने वाले किसानों की तादात भी बढ़ रही है। बिहार एवं झारखंड में किसान आज कल पारंपरिक फसलों के साथ-साथ मशरूम का भी उत्पादन कर रहे हैं। इससे उनको काफी मोटी आमदनी हो रही है।

किसान देवाशीष की मशरूम की खेती ने बदली किस्मत

इस लेख में हम झारखंड के एक ऐसे किसान के विषय में चर्चा करेंगे, जिनकी तकदीर
मशरूम की खेती से बदल चुकी है। वह अब मशरूम उत्पादन से महीने में हजारों रुपये की आमदनी कर रहे हैं। मशरूम की खेती करने वाले इस किसान का नाम देवाशीष कुमार है। वह पूर्वी सिंहभूम जनपद मौजूद जमशेदपुर के मूल निवासी हैं। उन्होंने डेढ़ कट्ठे भूमि पर मशरूम की खेती कर रखी है, जिससे उनको प्रति महीने 50 से 60 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। मुख्य बात यह है, कि देवाशीष कुमार ने अपने इस व्यवसाय की शुरुआत केवल 1 हजार रुपये की धनराशि से की थी।

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देवाशीष कुमार पहले कहां नौकरी किया करते थे

जैसा कि उपरोक्त में बताया गया है, कि देवाशीष कुमार एबीए पास हैं। बतादें, कि साल 2015 से पूर्व वह एचडीएफसी बैंक में नौकरी किया करते थे। इसी दौरान उनका बिहार राज्य के समस्तीपुर मौजूद राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में जाना हुआ। जहां पर उनको मशरूम की खेती के विषय में जानकारी मिली है। इसके पश्चात उन्होंने मशरूम की खेती करने का प्रशिक्षण लिया। उसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी एवं घर आकर एक हजार रुपए की पूंजी लगाकर मशरुम की खेती चालू कर दी है। हालांकि, आरंभ में घर वालों ने उनके इस निर्णय का कड़ा विरोध किया, परंतु वह अपने काम में बिना रुके लगे रहे।

किसान देवाशीष मशरुम उत्पादन का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं

देवाशीष कुमार का गांव में काफी बड़ा घर है। वह घर के ही चार कमरों में मशरुम की खेती कर रहे हैं। उनको पहली बार में ही सफलता हाथ लग गई। मशरूम की पैदावार भी अच्छी हुई बाजार में भाव भी अच्छा मिल गया, जिससे उन्हें काफी मोटी आमदनी भी हुई। इसके उपरांत देवाशीष कुमार ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज उन्होंने अपनी खेती में 2 महिलाओं को स्थाई तौर पर रोजगार भी दे रखा है। खास बात यह है, कि देवाशीष मशरूम उत्पादन के साथ-साथ नए लोगों को मशरुम उत्पादन का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

देवाशीष इन किस्मों के मशरूम की खेती कर रहे हैं

देवाशीष ने बताया है, कि चारों कमरों का क्षेत्रफल तकरीबन डेढ़ कट्ठे जमीन के समतुल्य होता है। साथ ही, गर्मी के मौसम में कमरे का तापमान कम करने के लिए भूमि पर तीन इंच बालू को बिछा देते हैं। बाद में उसके ऊपर समय-समय पर पानी का छिड़काव करते रहते हैं। इससे कमरे का तापमान एक संतुलित मात्रा में रहता है। देवाशीष प्रमुख रुप से मिल्की मशरूम, ऑएस्टर, पैडी स्ट्रॉ एवं क्लाऊड मशरुम की खेती करते हैं। साथ ही, मशरुम पाउडर भी निर्मित करते हैं। वेंडर्स आकर उनसे सारा मशरुम खरीद लेते हैं। सर्दियों के दौरान चार के स्थान पर छह कमरों में मशरुम की खेती करते हैं।